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  • लेख
  • मुहर्रम: स्मृति, प्रतिरोध और सत्य की अमर परंपरा

    मुहर्रम को प्रायः एक धार्मिक आयोजन या शोक-परंपरा के रूप में देखा जाता है, लेकिन उसके भीतर स्मृति, प्रतिरोध और नैतिक साहस की जो गहरी मानवीय चेतना निहित है, उस पर हिंदी में अपेक्षाकृत कम गंभीर लेखन हुआ है। कर्बला का आख्यान केवल इतिहास की एक घटना नहीं है; वह इस प्रश्न से भी जुड़ा है कि समाज अपने नैतिक आदर्शों, अपने शहीदों और अपने प्रतिरोधों को किस प्रकार स्मृति में सुरक्षित रखता है। इस दृष्टि से मुहर्रम केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि स्मरण की एक जीवित सांस्कृतिक परंपरा है।

    “मुहर्रम : स्मृति, प्रतिरोध और सत्य की अमर परंपरा” शीर्षक यह लेख इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में कर्बला और अज़ादारी की परंपरा को समझने का प्रयास करता है। इसके लेखक सुहैब अहमद फ़ारूक़ी पेशे से पुलिस अधिकारी हैं, किंतु साहित्य, इतिहास और उर्दू संस्कृति में उनकी गहरी रुचि रही है। इस लेख में उन्होंने जॉर्ज ईलियट, कर्बला, हज़रत ज़ैनब, बाबा बुल्ले शाह और अपनी एक नज़्म के माध्यम से यह रेखांकित करने का प्रयास किया है कि स्मृति केवल अतीत का संरक्षण नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध मनुष्य की नैतिक चेतना को जीवित रखने का माध्यम भी है। यह लेख किसी ऐतिहासिक शोध या धार्मिक व्याख्या का दावा नहीं करता। यह इतिहास, साहित्य और सांस्कृतिक स्मृति के संगम पर खड़े होकर मुहर्रम के अर्थ को एक व्यापक मानवीय परिप्रेक्ष्य में देखने का आमंत्रण देता है। जानकीपुल पर इसे प्रकाशित करने का उद्देश्य भी इसी विमर्श को अपने पाठकों तक पहुँचाना है- मॉडरेटर

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    “हमारे अपने वास्तव में तब तक नहीं मरते, जब तक वे हमारी स्मृतियों से विलुप्त नहीं हो जाते। हम उन्हें भूलकर ही उनसे दूर होते हैं। वे हमारे पश्चाताप, हमारे हृदय की रिक्तता, हमारी आँखों के आँसू और उनकी छोड़ी हुई सबसे छोटी-सी निशानी से हमारे प्रेम को भी मानो अनुभव करते रहते हैं।”

    उन्नीसवीं शताब्दी की महान अंग्रेज़ी लेखिका जॉर्ज ईलियट ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास एडम बीड में स्मृति और शोक के इसी शाश्वत सत्य को अभिव्यक्त किया है। इस विचार का सार यही है कि मृत्यु मनुष्यों को हमसे अलग नहीं करती, बल्कि विस्मृति करती है। जिस दिन हम अपने प्रियजनों को भूल जाते हैं, उसी दिन वे सचमुच हमसे दूर हो जाते हैं। इसलिए अपने दिवंगत जनों का स्मरण करना, उनके आदर्शों को जीवित रखना और उनके लिए शोक व्यक्त करना मानव सभ्यता की सबसे पुरानी और सबसे मानवीय परंपराओं में से एक है।

    भारतीय लोकजीवन में इसे बैन करना या मातम मनाना कहा जाता है। अरबी-फ़ारसी परंपरा में यही अज़ादारी या ताज़ियत है और शोक व्यक्त करने वाला अज़ादार कहलाता है। इस दृष्टि से देखें तो मुहर्रम केवल इस्लामी पंचांग का पहला महीना नहीं, बल्कि स्मृति, प्रतिरोध और सत्य के पक्ष में खड़े रहने की उस शाश्वत मानवीय परंपरा का प्रतीक है, जो अन्याय को भुलाने से इंकार करती है।

    सत्य और असत्य के मध्य चल रहे अनवरत संघर्ष के इतिहास में कर्बला की घटना मानवता के सबसे बड़े नैतिक प्रतिरोधों में गिनी जाती है। सन् 680 ईस्वी में हज़रत इमाम हुसैन ने सत्ता के समक्ष आत्मसमर्पण करने के स्थान पर सत्य, न्याय और मानवीय गरिमा की रक्षा के लिए अपने परिवार और साथियों सहित सर्वोच्च बलिदान दिया। किंतु यदि कर्बला केवल एक युद्ध या एक नरसंहार बनकर रह जाती, तो संभव है कि वह इतिहास के असंख्य रक्तरंजित अध्यायों में कहीं खो जाती।

    यहीं से एक प्रश्न जन्म लेता है—आज चौदह शताब्दियों बाद भी कर्बला का वृत्तांत हम तक कैसे पहुँचा? आखिर किसने सुनिश्चित किया कि यह बलिदान केवल आशूरा के दिन की घटना बनकर इतिहास में विलीन न हो जाए?

    इस प्रश्न का उत्तर है—हज़रत ज़ैनब।

    कर्बला के रणक्षेत्र में जब इमाम हुसैन और उनके अधिकांश साथी शहीद हो चुके थे, तब इस ऐतिहासिक संघर्ष का दूसरा और उतना ही महत्वपूर्ण अध्याय प्रारंभ हुआ। इस्लाम के अत्याचारी शासक यज़ीद और उसके समर्थकों की योजना थी कि इस शहादत को कर्बला की रेत में ही दफ्न कर दिया जाए। लेकिन हज़रत ज़ैनब ने अपने भाई के मिशन को केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं रहने दिया। उन्होंने निराशा के स्थान पर धैर्य, विलाप के स्थान पर संदेश और पराजय के स्थान पर प्रतिरोध का मार्ग चुना। अपनी आँखों के सामने अपने भाइयों, भतीजों, पुत्रों और परिजनों की निर्मम हत्या देखने के बाद भी उन्होंने शेष बचे हुए महिलाओं और बच्चों की अस्मिता की रक्षा की। कर्बला के शहीदों के कटे हुए सिर भालों पर टंगे थे और उनके पीछे बिना काठी के ऊँटों पर बेड़ियों में जकड़े बंदियों का कारवाँ चल रहा था। इस कारवाँ में एकमात्र जीवित पुरुष इमाम अली सज्जाद (ज़ैनुल आबिदीन), लगभग बीस महिलाएँ और अनेक बच्चे सम्मिलित थे। कर्बला से दमिश्क तक लगभग अट्ठाईस दिनों की इस पीड़ादायक यात्रा के दौरान हज़रत ज़ैनब ने मौन धारण नहीं किया।

    जहाँ-जहाँ यह कारवाँ रुका, उन्होंने लोगों को बताया कि कर्बला में क्या हुआ, किन परिस्थितियों में हज़रत इमाम हुसैन ने अपने प्राण न्योछावर किए और किस प्रकार सत्ता ने पैग़म्बर मुहम्मद के परिवार पर अमानवीय अत्याचार किए। उन्होंने अपने विलाप को केवल व्यक्तिगत शोक नहीं रहने दिया; उसे इतिहास की सजीव गवाही बना दिया। यही कारण है कि कर्बला केवल एक युद्ध का नाम नहीं रहा। वह स्मृति का आंदोलन बन गया, और उस स्मृति की प्रथम संरक्षिका थीं—हज़रत ज़ैनब।

    यज़ीद का दरबार और स्मृति की पहली विजय

    दमिश्क पहुँचने तक बंदियों का यह कारवाँ केवल युद्धबंदियों का समूह नहीं रह गया था; वह कर्बला का चलता-फिरता इतिहास बन चुका था। मार्ग में जहाँ-जहाँ यह कारवाँ रुका, हज़रत ज़ैनब लोगों को बताती रहीं कि ये कोई विद्रोही नहीं, बल्कि पैग़म्बर मुहम्मद के नवासे और उनके परिवार के सदस्य हैं, जिन पर सत्ता ने अमानवीय अत्याचार किए हैं। इस प्रकार कर्बला की कथा जन-जन तक पहुँचने लगी और सत्य की पहली किरण लोगों के हृदयों में उतरने लगी।

    दमिश्क में यज़ीद ने एक भव्य दरबार सजवाया। उसका उद्देश्य केवल अपनी राजनीतिक विजय का प्रदर्शन करना नहीं था, बल्कि यह सिद्ध करना भी था कि उसने अपने विरोधियों पर वैध विजय प्राप्त की है। उस समय के प्रभावशाली साम्राज्यों के प्रतिनिधियों, दरबारियों और गणमान्य व्यक्तियों के साथ-साथ, अनेक ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, बाइज़न्टाइन ( रोमन) साम्राज्य का दूत भी उस दरबार में उपस्थित था। यज़ीद चाहता था कि इस अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति के बीच वह स्वयं को विजेता और कर्बला के शहीदों को पराजित सिद्ध करे। किन्तु इतिहास ने उस दिन एक अप्रत्याशित दृश्य देखा।

    जिस दरबार में यज़ीद अपनी महिमा का उद्घोष करना चाहता था, वहीं हज़रत ज़ैनब ने अपने निर्भीक, तार्किक और ओजस्वी ख़ुत्बे से सत्ता के समूचे नैरेटिव को ध्वस्त कर दिया। उन्होंने निर्भय होकर स्पष्ट किया कि कर्बला में पैग़म्बर मुहम्मद के परिवार पर किस प्रकार अत्याचार किए गए और किस प्रकार सत्ता ने अपने ही नैतिक आधार को नष्ट कर दिया। उनके शब्द केवल दरबारियों तक सीमित नहीं रहे; विदेशी प्रतिनिधियों के समक्ष भी उन्होंने यज़ीद के पाखंड का पर्दाफाश कर दिया। जिस दरबार को यज़ीद अपनी प्रतिष्ठा का मंच बनाना चाहता था, वही उसकी नैतिक पराजय का साक्षी बन गया। उस दिन कर्बला के शहीदों का रक्त शब्दों के रूप में बोल रहा था और उसकी आवाज़ हज़रत ज़ैनब की ज़बान से निकल रही थी।

    लेकिन बंदियों की पीड़ा यहीं समाप्त नहीं हुई। उन्हें दमिश्क की एक काल-कोठरी में कैद रखा गया। उन्हीं कैदियों के साथ इमाम हुसैन की लगभग चार वर्षीय पुत्री, बीबी सकीना भी थीं। मासूमियत की उस आयु में उन्हें भूख, प्यास, भय और अपनों के बिछोह की असहनीय यातनाएँ सहनी पड़ीं। परंपरागत विवरणों के अनुसार, जब उनके सामने उनके पिता का कटा हुआ सिर लाया गया, तो वे बार-बार उन्हें पुकारती रहीं। एक रात अपने पिता की याद में विलाप करते-करते यह मासूम बच्ची संसार से विदा हो गई। बीबी ज़ैनब और उनकी माता बीबी रबाब ने उन्हें उसी कारागार में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया।

    बीबी सकीना की शहादत ने दमिश्क के जनमानस को भीतर तक झकझोर दिया। लोगों ने पहली बार इतने निकट से देखा कि सत्ता की क्रूरता का सबसे भारी बोझ एक नन्ही बच्ची तक को उठाना पड़ा। अहल-ए-बैत के प्रति सहानुभूति तीव्र होने लगी और यज़ीद के विरुद्ध जनाक्रोश का स्वर मुखर होता गया। इतिहास के अनेक विवरणों में उल्लेख मिलता है कि बदलते जनमत और संभावित असंतोष को देखते हुए यज़ीद ने बंदियों को मुक्त करने तथा क्षतिपूर्ति का प्रस्ताव रखने का निर्णय लिया। किंतु हज़रत ज़ैनब के लिए यह व्यक्तिगत प्रतिपूर्ति का नहीं, बल्कि सत्य और न्याय की प्रतिष्ठा का प्रश्न था। उनका उत्तर केवल एक अस्वीकार नहीं था; वही उत्तर आगे चलकर अज़ा-ए-हुसैन की संगठित परंपरा की नींव बनने वाला था।

    अज़ा-ए-हुसैन : स्मृति से प्रतिरोध तक

    यज़ीद ने जब बंदियों को रिहा करने और क्षतिपूर्ति की बात कही, तब उसे शायद यह आभास नहीं था कि इतिहास का सबसे बड़ा उत्तर उसे तलवार से नहीं, बल्कि स्मृति से मिलने वाला है। परंपरागत विवरणों के अनुसार, हज़रत ज़ैनब ने उत्तर दिया—”यज़ीद से कहो कि वह क्षतिपूर्ति की बात पैग़म्बर मुहम्मद से करे। हम मदीना अवश्य लौटेंगे, लेकिन उससे पहले हमें दमिश्क में एक ऐसा स्थान उपलब्ध कराया जाए जहाँ हम अपने शहीदों का शोक मना सकें। इसके बाद हम कर्बला होते हुए मदीना लौटेंगे।”

    कहा जाता है कि कुछ हिचकिचाहट के बाद यज़ीद ने यह अनुमति दे दी। शायद उसे लगा कि कुछ दिनों का मातम उसकी राजनीतिक विजय को प्रभावित नहीं करेगा। किंतु यही उसका सबसे बड़ा भ्रम सिद्ध हुआ। जिस नगर को उसने अपनी सत्ता का केंद्र बनाया था, उसी दमिश्क में हज़रत ज़ैनब ने सात दिनों तक अज़ा-ए-हुसैन की परंपरा स्थापित की। यह केवल शोक-सभा नहीं थी; यह अन्याय के विरुद्ध सत्य की पहली सार्वजनिक गवाही थी।

    जब दमिश्क की महिलाएँ उस घर में संवेदना व्यक्त करने पहुँचीं, तब हज़रत ज़ैनब ने उन्हें कर्बला की पूरी त्रासदी सुनाई—कैसे फ़ुरात के किनारे प्यासे बच्चों को पानी से वंचित रखा गया; कैसे मासूमों की प्यास सत्ता की कठोरता के सामने तड़पती रही; कैसे छह महीने के अली असगर को गोद में उठाकर कुछ बूँद पानी की याचना की गई और उसके उत्तर में एक तीर उस शिशु के गले में उतार दिया गया; कैसे एक-एक कर पैग़म्बर के परिवार के सदस्य शहीद होते गए।

    इन घटनाओं का वर्णन सुनकर दमिश्क की महिलाओं का हृदय द्रवित हो उठा। उनका विलाप केवल मृतकों के लिए शोक नहीं था; वह अन्याय के विरुद्ध मानवीय संवेदना की पहली सामूहिक प्रतिक्रिया था। इस प्रकार जिस राजधानी से कर्बला की त्रासदी को भुला देने की योजना बनाई गई थी, वहीं से उसे स्मृति में अमर कर देने वाली परंपरा का जन्म हुआ। यही कारण है कि मुहर्रम की अज़ादारी केवल अतीत की किसी घटना का स्मरण नहीं है। यह स्मृति के माध्यम से अन्याय का प्रतिरोध है। यह हर पीढ़ी को यह याद दिलाती है कि सत्ता की शक्ति चाहे जितनी बड़ी क्यों न हो, यदि उसके सामने सत्य पर अडिग रहने वाले लोग मौजूद हैं, तो इतिहास अंततः उसी सत्य का साक्षी बनता है।

    इसी सत्य को मौलाना मुहम्मद अली जौहर ने अपने प्रसिद्ध शेर में अत्यंत संक्षेप और प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है—

    क़त्ल-ए-हुसैन अस्ल में मर्ग-ए-यज़ीद है,
    इस्लाम ज़िंदा होता है हर कर्बला के बाद

    इस शेर को केवल धार्मिक संदर्भ में पढ़ना उसके अर्थ को सीमित कर देना होगा। यहाँ “यज़ीद” किसी एक ऐतिहासिक व्यक्ति का ही नाम नहीं, बल्कि अत्याचार, अन्याय, निरंकुश सत्ता और नैतिक पतन का प्रतीक है; उसी प्रकार “हुसैन” केवल एक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, आत्मसम्मान और नैतिक साहस का रूपक हैं। और “कर्बला” केवल इराक़ का एक भूभाग नहीं, बल्कि वह हर परिस्थिति है जहाँ सत्य और असत्य का निर्णायक संघर्ष होता है।

    इसलिए मौलाना के इस शेर का आशय यह है कि अत्याचार क्षणिक रूप से विजयी दिखाई दे सकता है, किंतु उसकी नैतिक मृत्यु उसी क्षण आरंभ हो जाती है जब वह सत्य के विरुद्ध खड़ा होता है। इसके विपरीत सत्य का मार्ग बलिदान माँग सकता है, परंतु वही बलिदान उसे कालजयी बना देता है। इस अर्थ में हज़रत इमाम हुसैन की शहादत किसी व्यक्ति की पराजय नहीं, बल्कि अन्याय की अंतिम नैतिक पराजय का उद्घोष है।

    इसीलिए चौदह शताब्दियों बाद भी मुहर्रम केवल इतिहास का स्मरण नहीं, बल्कि मानवता की अंतरात्मा को यह याद दिलाने का अवसर है कि सत्य को तलवारों से पराजित नहीं किया जा सकता। उसे जितना दबाया जाता है, वह उतनी ही गहराई से स्मृति, संस्कृति और चेतना में जीवित होता जाता है।स्मृति की यही विजय है मुहर्रम।

    इस लेख का उद्देश्य इतिहास का पुनर्लेखन करना नहीं है और न ही किसी धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध करना। कर्बला की घटनाओं के ऐतिहासिक विवरण अनेक स्रोतों में उपलब्ध हैं; उन्हें जानने के इच्छुक पाठक स्वयं उनका अध्ययन कर सकते हैं। मेरा प्रयोजन केवल इतना है कि चौदह सौ वर्षों से चली आ रही अज़ादारी की परंपरा को एक व्यापक मानवीय परिप्रेक्ष्य में समझा जाए। मेरी दृष्टि में मुहर्रम किसी संप्रदाय विशेष का आयोजन भर नहीं है। यह उस नैतिक स्मृति का नाम है, जो हमें अन्याय को भूलने नहीं देती। यह उन लोगों को याद रखने की परंपरा है जिन्होंने सत्य और न्याय के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। यदि स्मृति जीवित रहती है, तो अत्याचार कभी अपनी पूर्ण विजय प्राप्त नहीं कर सकता।

    मैं मूलतः एक धर्मभीरु मनुष्य हूँ। मेरा विश्वास है कि संसार के सभी धर्म अपने मौलिक स्वरूप में मनुष्य को सत्य, करुणा, न्याय और प्रेम का ही संदेश देते हैं। भिन्नता प्रायः पूजा-पद्धतियों और कालांतर में विकसित हुए कर्मकांडों में दिखाई देती है; मूल मानवीय मूल्य लगभग समान हैं। कबीर, नानक, रूमी, बुल्ले शाह और गांधी जैसे मनीषियों ने भी मनुष्य की इसी आंतरिक एकता पर बल दिया है।

    इसी भाव को सूफ़ी संत बाबा बुल्ले शाह अपने विशिष्ट अंदाज़ में व्यक्त करते हैं—

    धरमसाल धड़वाई रहंदे, ठाकुरद्वारे ठग्ग
    विच्च मसीत कुसीते रहंदे, आशक रहण अलग्ग

    अर्थात धर्मशालाएँ और मंदिर भी कभी-कभी स्वार्थ और आडंबर के केंद्र बन जाते हैं, मस्जिदों में भी बाहरी कर्मकांड रह जाते हैं; किंतु सच्चा प्रेमी इन सीमाओं से परे होता है। उसका धर्म प्रेम, सत्य और मनुष्यता है।

    शायद यही कर्बला का सबसे बड़ा संदेश भी है। हज़रत इमाम हुसैन ने किसी भूभाग, सिंहासन या साम्राज्य के लिए अपना बलिदान नहीं दिया था; उन्होंने मनुष्य की नैतिक स्वतंत्रता, सत्य और न्याय की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर किए। इसी कारण उनकी स्मृति किसी एक समुदाय की धरोहर नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की नैतिक विरासत बन चुकी है।

    लेख के आरंभ में जॉर्ज ईलियट के विचार का उल्लेख किया गया था कि हमारे अपने तब तक नहीं मरते, जब तक हम उन्हें भूल नहीं जाते। संभवतः मुहर्रम उसी विचार का सबसे सशक्त ऐतिहासिक उदाहरण है। चौदह शताब्दियाँ बीत जाने के बाद भी यदि कर्बला आज जीवित है, तो इसलिए कि हज़रत ज़ैनब ने शहादत को विस्मृति में नहीं जाने दिया और अज़ादारों ने स्मृति की उस मशाल को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जलाए रखा।

    अंत में, इसी भावना को मेरी यह नज़्म अभिव्यक्त करती है—

    मुहर्रम है
    महीना इक
    सबक़ जिसका
    है वो रास्ता
    जो तलवारों के साये में
    ‘बहत्तर’ की वो हिम्मत है
    प्यासों की अजब शिद्दत
    गवाही है वो ज़ख़्मों की
    जो सदियों से सुनाई देती रहती है
    हुसैनी जोश-ए-ईमानी
    कि उन क़दमों की हर इक गूँज
    जो ज़ैनब की सदाओं में
    सदाए-हक़ सुनाई दे
    ज़माने की सदाओं में
    हमेशा ज़िंदा रहती है।
    मुहर्रम यह बताता है—
    अलम-ए-हक़ का उठाने वाला हर इंसाँ
    कभी रुसवा नहीं होता।
    — सुहैब फ़ारूक़ी

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