
त्रिपुरारि शरण के उपन्यास ‘अंतिम आश्रय’ का मार्मिक अंश। यह त्रिपुरारि शरण का दूसरा उपन्यास है। हिन्दी में पीरियड उपन्यास पढ़ना है तो उनके दोनों उपन्यास पढ़िए। फ़िलहाल पढ़िए कैसे एक 12 वर्षीय बालक बाल विवाह से बचने के लिए घर छोड़ता है और आगे चलकर समाज व स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ता है। उपन्यास सेतु प्रकाशन से प्रकाशित है- मॉडरेटर
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राधामंदन त्रिपाठी
ट्रेन बनारस स्टेशन के यार्ड में खड़ी थी। ट्रेन की धुलाई-सफाई होनी थी। सारे पैसेंजर पहले ही प्लेटफॉर्म पर उतर चुके थे। सफाई कर्मचारी सभी डिब्बों में घुसकर सफाई कर रहे थे। तभी एक डिब्बे में चादर से ढँकी एक लाश जैसी आकृति एक कर्मचारी को दिखाई दी। उसने सोचा कि ऐसा तो अक्सर होता ही है। लावारिस लाशें ट्रेनों के डिब्बों में बाँधकर फेंक दी जाती हैं। जब उस सफाई मजदूर ने ढँके हुए शरीर को हिलाया-डुलाया तो एकाएक चादर हटी और एक लड़का उठकर बैठ गया। इतने में मजदूर के दो-तीन और सहकर्मी वहाँ आ जुटे। उस लड़के ने पूछने पर झूठ बता दिया कि वह रात भर ट्रेन की भीड़-भाड़ के कारण जगा रह गया था और जैसे ही उसे सीट पर जगह मिली तो वह लेट गया और उसे गहरी नींद आ गई। यह पूछने पर कि उसे कहाँ जाना है उसने बताया कि वह घर से भाग रहा है और वापस नहीं जाना चाहता है। उम्र पूछने पर उसने बताया वह बारह वर्ष का है। वह घर से भाग क्यों रहा है यह पूछने पर उसने बताना शुरू किया, “मेरी उम्र मात्र बारह वर्ष है और मैं छठी क्लास में पढ़ता हूँ। मैं जात का ब्राह्मण हूँ और मेरी इच्छा आगे तक पढ़ाई करने की है लेकिन मेरे माँ-बाप और परिवार के अन्य लोग मेरी शादी करा देना चाहते हैं। उन लोगों ने मेरे ऊपर दबाव डाला तो मैंने कहा कि मैं शादी तो कर लूँगा लेकिन मुझे फलदान में कम से कम पाँच रुपये चाहिए होंगे। पहले तो लड़की वालों ने बहुत आनाकानी की, यहाँ तक कहा कि बारह वर्ष के बच्चे के लिए पाँच रुपये जैसी बड़ी राशि नाजायज लगती है। जब मैंने उनकी बात नहीं मानी तो हारकर लड़की के पिता ने मेरे हाथ में पाँच रुपया थमा दिया। बस उसके बाद मैं वहाँ से भाग निकला और दौड़ते-दौड़ते रेलवे स्टेशन पहुँचा। संयोगवश यही ट्रेन वहाँ खड़ी थी। ट्रेन खचाखच भरी हुई थी लेकिन मुझे ट्रेन में घुसने की जगह मिल गयी। फिर धीरे-धीरे ट्रेन खाली होने लगी और दो-चार घण्टे बाद जब सीट खाली हुई तो मैं लेट गया और मुझे नींद आ गयी।”
सफाई मजदूरों ने बच्चे के शरीर पर जनेऊ देखा तो और भी आश्वस्त हो गये कि उसने अपने ब्राह्मण होने की जो बात कही है वह शायद सही है। उस समय बनारस में ब्राह्मणों का एक समूह एक पाठशाला के प्रकार की संस्था चलाता था जिसे गुरुपिण्डा कहते थे। इसमें अनाथ और अनाश्रित ब्राह्मण बच्चों के परवरिश की व्यवस्था होती थी। मजदूरों ने गुरुपिण्डा में खबर कर दी और वहाँ से दो गुरु जी लोग आए और इस लड़के को अपने साथ ले जाने लगे, बिना कुछ बताये हुए। गुरु जी लोगों ने लड़के से पूछा उसका गाँव कहा है तो उसने बताने से साफ मना कर दिया। उस लड़के की अपनी पहचान को अज्ञात रखने की इच्छाशक्ति इतनी प्रबल थी कि दोनों गुरु जी उसके सामने झुक गये और उससे कहा कि उसे गुरुपिण्डा में रहने-खाने की सुविधा प्राप्त हो सकेगी और उसे अपनी पढ़ाई को भी जारी रखने का मौका मिल सकेगा।
वैसे तो उसके पास पाँच रुपये थे लेकिन लड़के ने यह भी सोचा कि आखिरकार उसे कहीं तो एक ठिकाना, तत्काल अस्थायी तौर पर ही सही, खोजना होगा। ऐसे में इन दोनों व्यक्तियों का प्रस्ताव बुरा विकल्प नहीं है, उसने सोचा।
जब वह उनके साथ चलने लगा तो एक गुरु जी ने उससे पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”
“राधानन्दन त्रिपाठी”, लड़के ने बताया।
“तुम असलियत बता सकते हो कि तुम घर से भाग क्यों रहे हो?”, दोनों लोगों ने पूछा।
“मैं आगे पढ़ना चाहता हूँ और मेरे पिता मेरी शादी कराना चाहते हैं। मैं जानता हूँ कि अगर मेरी शादी हो जाएगी तो मैं आगे पढ़ नहीं पाऊँगा। मैंने अपने ही गाँव में कई गरीब ब्राह्मण लड़कों को देखा है कि शादी हो जाने के एक-दो साल बाद तक तो वे किसी तरह पढ़ाई को घसीटते हैं और मौका लगते ही अपने पिता अथवा परिवार के पण्डिताई अथवा खेती-बारी के धन्धों में शामिल हो जाते हैं”, राधानन्दन ने बड़े आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया।
यह उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों का समय था। पढ़ाई और एक बेहतर जीवन के बीच कारण और कारक का सम्बन्ध गुरु जी लोगों को भी सम्भवतः ठीक से समझ नहीं आता था लेकिन वे समझते थे कि ब्राह्मणों को एक धर्मनिष्ठ जीवन जी पाने के लिए शास्त्रों का बुनियादी ज्ञान आवश्यक था और इसी उद्देश्य से बनारस के पण्डितों के एक समुदाय ने कुछेक गुरुपिण्डा स्थापित कर रखा था जिसे समाज के सदस्यों के द्वारा दिये गये चन्दे के माध्यम से संचालित किया जाता था। राधानन्दन को दोनों गुरु जी द्वारा गुरुपिण्डा ले जाया गया। गुरु जी लोगों ने राधानन्दन से उसके गाँव-घर आदि के बारे में पूछने का कोई प्रयास फिर नहीं किया और राधानन्दन ने भी गुरु जी लोगों का कोई प्रतिकार नहीं किया।
राधानन्दन जब गुरुपिण्डा में रहने लगे तो वे वहाँ के वातावरण में एकदम रम गये। वैसे तो घर की, और खासकर माँ की, याद बहुत आती थी लेकिन अपनी आकांक्षाओं के आवेग के आगे बराबर उसे ऐसी भावनाओं को तिलांजलि देनी पड़ती थी। कुछ ही वर्षों के अन्दर उसने अपनी एक मित्र मण्डली बना ली और इस मित्र मण्डली में उसने लगभग एक नायक का स्थान अपने लिए बना लिया। नायक की तरह का उसे मान-सम्मान भी मिलने लगा लेकिन तीन-चार वर्षों के अन्दर ही उसे यह महसूस होने लगा कि गुरुपिण्डा जैसी संस्था उसकी आकांक्षाओं के लिए अपर्याप्त रह जाएगी। लेकिन गुरुपिण्डा छोड़ने के बाद तो उसे अपने भरण-पोषण का भी इन्तजाम करना होगा। इसी बीच उसे यह भी सुनने में आया कि पाठशाला और गुरुकुल पद्धति के ही उत्क्रमित स्वरूप की एक संस्था हरिद्वार के पास कांगड़ी में खोली गयी है जहाँ मेधावी छात्रों को छात्रवृत्ति भी दिये जाने का प्रबन्ध किया गया है। फिर क्या था, राधानन्दन जी-जान से लग गये गुरुकुल कांगड़ी को अपना गन्तव्य बनाने में और वे सफल भी हुए अपने इस प्रयास में। आगे का आठ साल उनका गुरुकुल में ही बीता और इस अन्तराल के बाद उन्होंने अपने गाँव लौटने का विचार किया। ऐसा करने के पीछे मुख्य कारण यह था कि गुरुकुल कांगड़ी की उनकी पढ़ाई अब समाप्त हो गयी थी और उन्हें अपनी आजीविका का उपाय भी ढूँढना था। आर्य प्रतिनिधि सभा द्वारा उनको दी जाने वाली स्कॉलरशिप भी अब समाप्त हो गयी थी। उन्हें एम.ए. के बराबर की डिग्री हासिल हो गयी थी। कोई ढंग की नौकरी पाने में उन्हें कठिनाई की सम्भावना नहीं दिखती थी।
तो बारह वर्षों के बाद राधानन्दन बिहार के गोपालगंज इलाके में अवस्थित अपने गाँव लौट गये लेकिन त्रासदी यह थी कि उन्हें तो अब गाँव में कोई पहचानता भी नहीं था। सभी लोगों ने तो यही समझ रखा था कि वह मर गया है। इतना ही नहीं, जब राधानन्दन कुछ वर्षों तक घर नहीं लौटे तो उनका श्राद्धकर्म भी घर वालों ने करा दिया था। जब उन्होंने गाँव पहुँचकर लोगों को अपना नाम बताया तो एकाएक लोग भूत-भूत चिल्लाने लगे और उनसे दूर भागने लगे। इसी बीच गाँव के ही एक जमींदार ने लोगों की ओर मुखातिब होकर अपनी भाषा में कहा, “अरे सुनअ लोग सब, ई अदमिया के बोली त राधानन्दन के बुझाता हो।” इसके बाद तो सामूहिक कौतूहल का एक सिलसिला जैसा निकल पड़ा। राधानन्दन इन सबसे पार पाये, सभी प्रश्नों का सन्तोषजनक जवाब दे पाये तब उन्हें अपने घर में प्रवेश पाने की अनुमति मिली।
राधानन्दन के पिता इलाके के सम्पन्न खेतिहर थे। अतः जब हरिद्वार से लौटने पर उन्होंने अपने गाँव के आसपास के इलाके के लोगों के लिए वेद की शिक्षा के लिए एक संस्था शुरू करने का प्रस्ताव अपने पिता को दिया तो उनके पिता ने उसे सहर्ष स्वीकार किया। शायद उनके पिता के मन में भी यह बात रही होगी कि ऐसा करने से स्थानीय लोगों के मन में राधानन्दन के बारह वर्षों की अनुपस्थिति के कारणों के बारे में जो कयास लग सकते थे उन्हें विराम दिया जा सके। हुआ ऐसा ही। कुछ ही समय के अन्तराल में राधानन्दन ने वेद-वेदान्त के अपने ज्ञान से लोगों को प्रभावित किया और इलाके के कई सारे नवयुवक और कुछ उम्रदराज लोग भी, नियमित तौर पर उनको सुनने के लिए आने लगे। वे मामूली तौर पर एक ख्यातिवान व्यक्ति बन गये और उनकी चर्चा जिले से बाहर के इलाकों में भी होने लगी। यही मौका देखकर राधानन्दन के पिता ने उनकी शादी कर दी। वैसे तो शुरू में उन्हें यह आशंका हुई थी कि शायद राधानन्दन शादी के प्रस्ताव को स्वीकार न करें क्योंकि बारह वर्ष पूर्व जो घटना घटी थी उसकी स्मृतियों के अवशेष तो, एक क्षीण स्वरूप में ही सही, अभी भी परिवार में बरकरार थे। सम्भवतः सत्यार्थ प्रकाश के गहन अध्ययन का प्रभाव था कि गार्हस्थ्य की ओर उन्मुख करने के लिए राधानन्दन के पिता को बहुत ज्यादा प्रयास नहीं करना पड़ा। इस प्रकार राधानन्दन के गृहस्थ जीवन की शुरुआत हो गयी।
यही वह दौर था जब जलियाँवाला बाग हत्याकांड की खबर पूरे उत्तर भारत में आग की तरह फैली हुई थी। यह भी खबर फैली हुई थी कि तुर्की के खलीफा का मुसलमानों का धार्मिक गुरु और उनके ऊपर उनका आध्यात्मिक वर्चस्व ब्रिटेन की हुकूमत ने समाप्त कर दिया था जिसके कारण मुस्लिम समुदाय में अँग्रेजों के खिलाफ बहुत ज्यादा रोष था। गुरुकुल में पढ़ाई के दिनों में राधानन्दन ने सुन रखा था कि मोहनदास नाम के किसी युवक ने दक्षिण अफ्रीका में अन्याय का विरोध करने का एक अनूठा प्रयोग किया था। अब हाल-फिलहाल ही उसके अपने जिले से सटे हुए चम्पारण जिले में भी जब यह मोहनदास नामक युवक आया था तो उसको देखने के लिए जगह-जगह लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था। मोहनदास ने इसी पृष्ठभूमि में असहयोग आन्दोलन की शुरुआत की और सभी जगह उनके आह्वान पर युवक एवं वृद्ध सभी इस आन्दोलन में उतर पड़े थे।
अँग्रेजी सरकार की खुफिया पुलिस ऐसे आन्दोलन के मौकों पर तो और भी अधिक सक्रिय रहती थी। चौरी चौरा काण्ड के बाद हुई गिरफ्तारियों के पहले दौर में ही पुलिस राधानन्दन को उठा ले गयी और उन्हें छपरा जेल में ठूँस दिया।
राधानन्दन के घर में तो तबाही मच गयी। गाँव-घर में विरोध और उसमें भी फिरंगी सरकार के विरोध की किसी प्रकार की संस्कृति अथवा प्रवृत्ति तो थी नहीं। तो लगा जैसे पूरे परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। कोर्ट-कचहरी दौड़ने से भी कोई खास फायदा नहीं हो पा रहा था। भाग्यवश राजेन् बाबू छपरा आए हुए थे तो राधानन्दन के पिता, जिनकी राजेन् बाबू से थोड़ी-बहुत जान-पहचान थी, उनसे मिलने गये। असहयोग आन्दोलन में मोहनदास गांधी के निर्देशों के पालन में अपनी व्यस्तता का हवाला देते हुए उन्होंने राधानन्दन के पिता को सलाह दी कि वे किसी अच्छे स्थानीय वकील की सेवा ले लें और राधानन्दन को जेल से छुड़वाने का प्रयास करें। राधानन्दन के पिता को एक तरह से समझा जाए तो निराशा ही हाथ लगी क्योंकि उन्होंने तो अनुमान किया था कि राजेन् बाबू जैसे कद्दावर वकील की पैरवी पर शायद राधानन्दन को जेल से मुक्ति मिल जाएगी। खैर, ऐसा होना राधानन्दन की किस्मत में नहीं लिखा था। इस बात को उनके पिता ने स्वीकार लिया और खेती, खासकर ऊख की खेती, से हुई आमदनी के बचत के पैसे से उन्होंने सारण जिला के ही दो बड़े वकीलों को लगाया राधानन्दन को जेल से छुड़वाने में। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ किसी आन्दोलन में, तथाकथित रूप से ही सही, भाग लेने पर इतनी आसानी से जेल से छूट तो मिलती नहीं थी। फल यह हुआ कि मुकदमे की तारीख पर तारीख पड़ती गयी और जब तक राधानन्दन छूट पाये तब तक उनके पिता की खेती की आमदनी से हुई बचत तकरीबन काफूर हो गयी और परिवार निर्धनता के कगार पर आ गया। वैसे भी उस जमाने में गाँव-देहात में यह बात प्रचलित थी कि किसी भी व्यक्ति से अगर बैर साधना हो तो उसे आप दो-चार केस-मुकदमों में फँसा दें और फिर देखते रहिए कैसे वह व्यक्ति एक चक्रव्यूह में फँस जाता है और उसका घर निर्धनता के कगार पर पहुँच जाता है। तकरीबन डेढ़ वर्षों के बाद राधानन्दन जेल से छूटकर घर आए। राधानन्दन का जेल जाना समूचे परिवार के लिए एक तरह से आर्थिक विपत्ति का आह्वान तो बना लेकिन साथ-साथ उसका एक अप्रत्यक्ष और दूरगामी फायदा भी हुआ। राधानन्दन को अब पूरे इलाके में ख्याति प्राप्त हो गयी, एक सार्थक आन्दोलनकारी के रूप में। एक आर्यसमाजी कार्यकर्ता के अलावा अब वे मोहनदास गांधी के अनुयायी में से भी गिने जाने लगे। वे अब इलाके में दूर-दूर जाकर सभाओं को सम्बोधित करने लगे और आम लोगों के लिए ब्रिटिश हुकूमत की असली सच्चाइयों और आमजन विरोधी नीतियों का पर्दाफाश भी करने लगे। वे जहाँ भी जाते थे वहाँ उनका स्थानीय लोगों के द्वारा सत्कार किया जाता था।
इसी दौर में राधानन्दन की दूसरी सन्तान और प्रथम पुत्री का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया रमा त्रिपाठी।

