अमित कुमार चरण पहाड़ी की कविताएँ

आज प्रस्तुत है अमित कुमार चरण पहाड़ी की बेहद ज़रूरी सवाल करती कविताएँ – अनुरंजनी
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1. यह सिर्फ़ घंटा नहीं है

यह कोई अफ़वाह नहीं,
न कोई विरोधियों की साज़िश,
यह पानी है—
जिसे पीकर लोग मरे हैं,
और सत्ता कहती है
‘घंटा कुछ नहीं हुआ।’

इंदौर,
जिसे चमकदार पोस्टरों में
स्वच्छता का मुकुट पहनाया गया,
वहीं नलों से ज़हर टपका,
और फाइलों में सब कुछ
‘नियंत्रण में’ लिखा गया।

सवाल यह नहीं
कि कितने मरे,
सवाल यह है—
मरने वालों को
गिना ही क्यों नहीं गया?

किसकी ज़िम्मेदारी थी
नल में बहते पानी की,
और किसकी मजबूरी
सच को बहा देने की?

सत्ता के पोषित तत्व
टीवी स्टूडियो में बैठकर बोले—
‘घंटा है ये सब,
बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है।’
शायद उनके घरों में
बोतलबंद सच पहुँचता है,
इसलिए नल का ज़हर
उन्हें छूता नहीं।

जिनकी लाशें उठीं,
वे आँकड़े नहीं थे,
वे भी मतदाता थे—
पर अब वे
किसी काम के नहीं।

जब पूछा गया—
तो जाँच बैठा दी गई,
जब चीख उठी—
तो समिति बना दी गई,
और जब सवाल तेज़ हुए—
तो कह दिया गया,
‘घंटा कुछ नहीं है।’

अगर यही सुशासन है,
तो डर है—
कल और कितने शहर
पानी नहीं,
मौत पीएँगे।

और सत्ता फिर कहेगी—
‘घंटा है,
सब ठीक है।’

2. झोले वाली जाति

सबकी अपनी–अपनी जातियाँ थीं,
नाम थे, नारे थे, पहचान थी,
हम पूछते रहे—
‘हम कौन हैं?’
तो जवाब मिला—
‘तुम जनता हो, बस उतना ही काफी है।’

हमारी कोई जाति नहीं थी,
क्योंकि जातियाँ तो
कुर्सियों पर बैठती हैं,
मंचों से बोलती हैं,
और भाषणों में अमर हो जाती हैं।

हम अगर किसी जाति में गिने भी गए,
तो उस जाति का नाम था—
‘झोले वाली जाति’
जो झोला टाँगे
हर मौसम में निकल पड़ती है—
कभी रैली में,
कभी लाइन में,
कभी वादों की मंडी में।

झोले में था
थोड़ा धैर्य,
थोड़ी भूख,
पुराने सपनों की रोटियाँ
और हर चुनाव में
नए झूठ का पर्चा।

हम न मंदिर के थे,
न मस्जिद के पूरे,
न सत्ता के प्रिय,
न विपक्ष के जरूरी—
बस वोटर थे,
जो लोकतंत्र को
अपनी एक-एक उँगली से
मजबूत करते रहे।

नेता बोले—
‘आप ही देश हैं।’
और देश फिर
फुटपाथ पर सो गया।

हमारी जाति ने
न कभी हिंसा माँगी,
न आरक्षण,
न विशेषाधिकार—
बस इतना चाहा
कि झोले से
कभी खाली पेट न झाँके।

पर हर बार
हमारी जाति की गिनती
मतदान के दिन हुई,
और उसके बाद
फाइलों में दबा दी गई।

आज भी
सबकी अपनी जातियाँ हैं—
संगठित, संरक्षित, सम्मानित—
और हम…
झोला टाँगे
फिर निकल पड़े हैं
लोकतंत्र को बचाने,
शायद इस बार भी
खुद को खो देने के लिए।

3. प्रेम और जीवन का संघर्ष

जीवन की उन तमाम विषम परिस्थितियों से
गुज़रते हुए हमने
एक चाँद-सा जीवन देखा था—
और हम कुछ इस क़दर उसमें मशगूल हो गए
कि ख़ुद का भी भान न रहा।

बस चलते रहे…
और बरसात होती रही,
पर मुझे एहसास ही न हुआ—
शायद ये बारिश
उन आँसुओं को छुपाए थी,
जो हर पल
एक बूँद बनकर गिरते थे,
मोती-से चमकते
और बरसात में बह जाया करते थे।

शायद वे किसी एक दिन का
इंतज़ार कर रहे थे—
जानते हो किसका?
अरे उसी का,
जिसने अपने ही जिस्म को कुरेद कर
अपने लहू से इतिहास लिखने का
सपना पाल रखा था।

उसे ख़ुद नहीं पता था
कि वह कौन है,
कैसा दिखता है,
और वास्तव में चाहता क्या है—
बस सोचता था,
और सोचता ही चला जाता था।

शायद उसे यह आभास था
कि कुछ नया होने वाला है—
हालाँकि नया
सिर्फ़ वस्तुओं का ही तो नहीं होता,
कभी-कभी विचार भी
नए जन्म लेते हैं।

वह निर्भीक, निडर
बस चलता चला जाता था—
शायद उसकी मंज़िल
किसी प्रेमिका की तरह
उसे चूम ले,
जैसे मधुमक्खियाँ
पुष्प-गुच्छ को चूम लेती हैं।

उसे भी तो वही स्वाद चाहिए था,
जिसके ख़्यालों में
वह दिन-रात डूबा रहता था—
वही ख़्याल,
जहाँ सब कुछ यूटोपिया था।

और उसे साकार करने की चाह में
कभी इधर ठोकर खाता,
तो कभी उधर—
फिर भी चलता रहा,
इस उम्मीद में कि
किसी मोड़ पर,
कहीं न कहीं,
उसे उसकी प्रियतमा
ज़रूर मिल जाएगी।

परिचय-

•अमित कुमार चरण पहाड़ी,

सामाजिक दायित्व : संचालक मगध युवा प्रकोष्ठ व समन्वयक दीया रक्त अग्रदूत, बिहार

• शिक्षक: ओपन माइंड्स अ बिरला स्कूल,गया (टीजीटी हिंदी व संस्कृत)

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