द गार्डियन.कॉम पर अमृत ढिल्लन ने एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने लिखा कि भारत में किताब आनंद के लिए नहीं जाता, भारत में अंग्रेज़ी भाषा की किताबें भी नहीं बिकतीं, इसलिए भारत में आयोजित होने वाले लिट फ़ेस्ट में साहित्य के अलावा सब कुछ होता है। उनके इस लेख का तर्कसम्मत और कड़ा प्रतिवाद किया है आशुतोष कुमार ठाकुर ने। आशुतोष अंग्रेज़ी किताबों पर देश विदेश के सभी प्रमुख मंचों पर लिखते हैं, लिट फ़ेस्ट के आयोजनों से जुड़े रहे हैं और किताबों की इस दुनिया को बहुत अच्छे से समझते हैं। आउटलुक इंडिया.कॉम पर प्रकाशित उनका यह लेख साभार आपके लिये प्रस्तुत है- मॉडरेटर
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यह धारणा कि अधिकांश भारतीय लोग आनंद या प्लेजर के लिए नहीं पढ़ते, और इसलिए देश में साहित्य उत्सवों की भरमार एक विसंगति है, एक कमजोर मान्यता पर टिकी हुई है। यह मान लेती है कि पढ़ना एक निजी, मौन और एकाकी क्रिया है। यह मान लेती है कि किताबें मुख्यतः अलमारियों या बिस्तर के पास की मेज़ों पर रहती हैं। और यह भी मान लेती है कि साहित्यिक संस्कृतियाँ अपनी उपस्थिति मुख्यतः बिक्री के आँकड़ों और ख़ाली समय में किए जाने वाले सर्वेक्षणों के माध्यम से दर्ज कराती हैं।
भारत इन तीनों मान्यताओं को अस्थिर कर देता है।
कोलकाता की एक शीतकालीन दोपहर में, शहर का वार्षिक पुस्तक मेला मैदान पर इस तरह फैल जाता है मानो मुद्रित शब्दों का कोई अस्थायी गणराज्य बस गया हो। स्कूली बच्चे ज़ोर-ज़ोर से मोलभाव करते हुए पुराने-से हो चुके बंगाली उपन्यासों को उलटते-पलटते हैं। कॉलेज के विद्यार्थी दोस्तोयेव्स्की और गार्सिया मार्केस के रियायती अनुवादों के लिए कतारों में खड़े दिखाई देते हैं। बुज़ुर्ग पाठक स्टॉलों के बीच ठहर-ठहर कर घूमते हैं- ज़रूरी नहीं कि खरीदने के लिए, बल्कि देखने, सुनने और उस साझा उपस्थिति का हिस्सा बनने के लिए। पास ही घास पर बैठे श्रोताओं के सामने एक कवि पाठ कर रहा होता है। कुछ लोग किताबें खरीदेंगे। बहुत-से नहीं खरीदेंगे। पर लगभग सभी फिर लौटकर आएँगे।
दो सप्ताह बाद जब अंतरराष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेला समाप्त होगा, तब तक वह लगभग तीस लाख आगंतुकों को आकर्षित कर चुका होगा और 26 करोड़ रुपये से अधिक की बिक्री दर्ज कर चुका होगा। यह सब वह बिना किसी चमकदार वैश्विक कवरेज या उत्सवधर्मी उद्योग-रिपोर्टों के करेगा। फिर भी, यह दुनिया के सबसे बड़े पुस्तक आयोजनों में से एक बना रहता है।
यही वह दृश्य है जो भारत की पठन-संस्कृति पर होने वाली अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं में शायद ही कभी जगह पाता है। हाल ही में प्रकाशित एक लेख में भी यह प्रश्न उठाया गया था कि जिस देश में कथित तौर पर अधिकांश लोग आनंद के लिए नहीं पढ़ते, वहाँ सौ से अधिक साहित्य उत्सव क्यों आयोजित होते हैं। पश्चिमी मानकों से पढ़ने की प्रवृत्ति को परखें तो यह प्रश्न तार्किक प्रतीत होता है। किंतु भारत की सामाजिक और भाषाई वास्तविकताओं के सामने यह तर्क कमजोर पड़ जाता है।
सार्वजनिक दृष्टि से ओझल एक प्रकाशन महाशक्ति
भारत आज विश्व के सबसे बड़े पुस्तक-उत्पादक देशों में से एक है। फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स और यूनेस्को के आँकड़ों के अनुसार, देश में प्रतिवर्ष लगभग 90,000 नई पुस्तकें प्रकाशित होती हैं, जिससे भारत वैश्विक स्तर पर शीर्ष दस प्रकाशन-राष्ट्रों में स्थान पाता है। ये पुस्तकें दो दर्जन से अधिक भाषाओं में प्रकाशित होती हैं—जिनमें से अनेक की अपनी लंबी और सशक्त साहित्यिक परंपराएँ हैं, जिन्हें बड़े आग्रह और आत्मगौरव के साथ संजोया गया है।
भारत के कुल प्रकाशन का लगभग आधा हिस्सा भारतीय भाषाओं में है। हिंदी, बांग्ला, तमिल, मलयालम, मराठी, मैथिली, तेलुगु, गुजराती, पंजाबी, असमिया और उर्दू- सभी मिलकर व्यापक, विकेंद्रीकृत साहित्यिक संसारों को जीवित रखती हैं। इस प्रकाशन-कार्य का बड़ा हिस्सा महानगरीय केंद्रों से बाहर, छोटे और मध्यम आकार के प्रकाशनों के माध्यम से होता है, जो वैश्विक बाज़ार-विश्लेषणों में प्रायः दिखाई ही नहीं देते।
भारतीय पुस्तक बाज़ार का आकार 6 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक आँका जाता है, जिससे यह विश्व के सबसे तेज़ी से बढ़ते बाज़ारों में शामिल है। इस बाज़ार का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा शैक्षिक प्रकाशन का है। पाठ्यपुस्तकें, परीक्षा-मार्गदर्शिकाएँ और संदर्भ-ग्रंथ बिक्री में प्रमुख स्थान रखते हैं। लाखों परिवारों के लिए पुस्तकें सांस्कृतिक विलासिता की वस्तु नहीं, बल्कि आकांक्षा के साधन हैं- पुस्तकें नौकरी पाने के लिए, परीक्षाएँ उत्तीर्ण करने के लिए, अस्थिरता से बाहर निकलने के लिए खरीदी जाती हैं।
इसी आधार पर कई पर्यवेक्षकों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि भारतीय लोग आनंद के लिए नहीं, बल्कि उपयोगितावादी उद्देश्य से पढ़ते हैं। किंतु जैसे ही हम यह स्वीकार करते हैं कि जिन समाजों में पुस्तकों तक पहुँच ऐतिहासिक रूप से असमान रही है, वहाँ आनंद अक्सर सीधे नहीं, बल्कि परोक्ष रूप से आता है- तब यह निष्कर्ष ढह जाता है। कभी किताबों को यूँ ही उलटते-पलटते हुए, कभी सुनते हुए, कभी सामूहिक खोज की प्रक्रिया में पाठ सुख अपना रास्ता स्वयं बना लेता है।
जब आँकड़े कुछ और कहानी कहते हैं
यदि सचमुच भारतीय पढ़ते ही न हों, तो पुस्तक मेले सबसे पहले समाप्त हो जाने चाहिए थे। परंतु इसके उलट, वे निरंतर फल-फूल रहे हैं।
नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित पुणे पुस्तक महोत्सव में हाल ही में 12.5 लाख से अधिक आगंतुक आए और 50 करोड़ रुपये से अधिक की बिक्री दर्ज की गई। नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला आज भी पखवाड़े भर में लगभग बीस लाख लोगों को आकर्षित करता है। केरल में ज़िला-स्तरीय पुस्तक मेले नियमित रूप से ऐसी भीड़ दर्ज करते हैं जो बड़े सांस्कृतिक उत्सवों को टक्कर देती है।
छोटे शहरों में भी आँकड़े कम प्रभावशाली नहीं हैं। तमिलनाडु के कांचीपुरम में एक स्थानीय पुस्तक मेले में आठ लाख से अधिक आगंतुक आए। गुवाहाटी में असम पुस्तक मेला तीन दशकों में क्रमशः विकसित होकर एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय आयोजन बन चुका है। ये आयोजन वैश्विक दृश्यता के लिए गढ़े गए अभिजात्य समारोह नहीं हैं। ये जन-आयोजन हैं- जिनमें विद्यार्थी, शिक्षक, क्लर्क, किसान, सेवानिवृत्त लोग और पूरे परिवार सम्मिलित होते हैं।
ये पश्चिमी अर्थों में ‘फेस्टिवल’ कम और नागरिक अनुष्ठान अधिक हैं- बार-बार लौटने वाले, जिद्दी, गहरे स्थानीय।
सार्वजनिक संवाद के रूप में साहित्य
भारत में साहित्य उत्सव इसी व्यापक पारिस्थितिकी से स्वाभाविक रूप से उभरते हैं। वे पढ़ने के विकल्प नहीं हैं, बल्कि उसका विस्तार हैं। हालाँकि आज जो समकालीन रूप वे ग्रहण कर चुके हैं, उसकी एक निर्णायक शुरुआत हुई थी।
वह निर्णायक मोड़ था- जयपुर।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल से पहले भारत में साहित्यिक सभाएँ प्रायः अंतरामुखी हुआ करती थीं। वे विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थानों या बंद सभागारों तक सीमित रहती थीं। जयपुर ने इस व्याकरण को बदल दिया। उसने साहित्य को खुले, सुलभ सार्वजनिक स्थलों पर रखा और पाठक को विशेषज्ञ नहीं, नागरिक के रूप में देखा। इस प्रकार उसने भारतीय संदर्भ में साहित्य उत्सव के अर्थ को पुनर्परिभाषित किया।
जयपुर का महत्व केवल उसके आकार या प्रसिद्ध हस्तियों की उपस्थिति में नहीं है, बल्कि उसकी संरचना में है। उसने क्षेत्रीय भाषाओं को अंग्रेज़ी के साथ समान स्तर पर संवाद में रखा। अनुवादकों को हाशिये से उठाकर केंद्र में स्थापित किया। इतिहासकारों, पत्रकारों, कवियों, उपन्यासकारों और राजनीतिक चिंतकों को बिना किसी विधागत पदानुक्रम के एक ही मंच पर स्थान दिया। और सबसे महत्वपूर्ण- उसने इस विचार को सामान्य बनाया कि सुनना भी साहित्यिक भागीदारी का एक वैध और अर्थपूर्ण रूप है।
एक बार जब यह मॉडल स्थापित हुआ, तो यात्रा शुरू हो गई।
बैंगलोर लिटरेचर फेस्टिवल में अब संवाद सहजता से कन्नड़ और अंग्रेज़ी के बीच, संस्मरण और सार्वजनिक नीति के बीच, नए लेखकों और अनुभवी अनुवादकों के बीच संभव होते हैं। कोझिकोड में केरल लिटरेचर फेस्टिवल समुद्रतट पर हजारों लोगों को आकर्षित करता है- जिनमें से अनेक पूरे सत्र ध्यान से सुनते हैं, भले ही वे पुस्तकें न खरीदें। यहाँ सुनना एक सेतु बन जाता है, अक्सर पढ़ने की दिशा में पहला कदम।
उत्तर भारत में जयपुर, देहरादून, कोलकाता, भुवनेश्वर, नैनीताल, पटना, जमशेदपुर, मुरादाबाद और लखनऊ के उत्सव इसी विरासत को आगे बढ़ाते हैं। वे विद्यार्थियों, शिक्षकों, सिविल सेवकों, तीर्थयात्रियों और पहली बार साहित्यिक आयोजन में आए श्रोताओं तक को आकर्षित करते हैं। यहाँ साहित्य आस्था, इतिहास या राजनीति से अलग-थलग नहीं है; वह दैनिक जीवन की संरचना में गुँथा हुआ है।
वाराणसी- भारत के प्राचीनतम जीवित नगरों में से एक- में लिट फ़ेस्ट एक अतिरिक्त अर्थ-स्तर ग्रहण कर लेता है। बनारस लिट फेस्ट स्वयं को परंपरा से विच्छेद के रूप में नहीं, बल्कि सार्वजनिक संवाद की एक पुरानी संस्कृति की निरंतरता के रूप में प्रस्तुत करता है। शास्त्र, टीका, वाद-विवाद और मौखिक परंपरा से निर्मित इस शहर में समकालीन लेखन पहले से ही सुनने की परंपरा से संपृक्त परिदृश्य में समाहित हो जाता है। यह जयपुर की उदारता को ग्रहण करते हुए बनारस की अपनी दीर्घ बहस, व्याख्या और कथन-परंपरा से ऊर्जा लेता है।
और आगे पूर्व की ओर शिलांग, इम्फाल, कोहिमा और गुवाहाटी में आयोजित साहित्य उत्सव इस मॉडल को पूर्वोत्तर राज्यों तक विस्तार देते हैं। यहाँ उत्सव मौखिक इतिहासों, आदिवासी भाषाओं और उन कथात्मक परंपराओं को केंद्र में रखते हैं जो लंबे समय से मुद्रित संस्कृति के बाहर विद्यमान रही हैं। उत्सव यहाँ एक प्रकार की मान्यता का कार्य करता है- ऐसी आवाज़ों को उनके अपने स्वर और शर्तों पर सुनने का अवसर देता है, जो सदैव उपस्थित थीं पर पर्याप्त रूप से सुनी नहीं गईं।
भारत से बाहर भी इसकी तरंगें दक्षिण एशिया में दिखाई देती हैं। नेपाल में पोखरा साहित्य महोत्सव उसी सांस्कृतिक पारिस्थितिकी के भीतर संचालित होता है, जिसकी प्रेरणा जयपुर ने दी। वह एक साझा साहित्यिक सार्वजनिकता का निर्माण करता है, जहाँ नेपाली, मैथिली, हिंदी और अंग्रेज़ी के लेखक उन सीमाओं के पार संवाद करते हैं, जिन्हें राजनीति अक्सर कठोर बना देती है, पर साहित्य अब भी कोमल करता रहता है। अनुवाद, स्मृति, प्रवासन और भाषा-क्षय के प्रश्न सत्रों में बार-बार प्रतिध्वनित होते हैं, जो इस क्षेत्र की साझा सांस्कृतिक चिंताओं और आकांक्षाओं को रेखांकित करते हैं।
इन आयोजनों को मात्र तमाशा कहकर खारिज कर देना उनके वास्तविक कार्य-स्वरूप को न समझना है। ऐसे देश में जहाँ पुस्तकालयों का वितरण असमान है और बड़े शहरों से बाहर पुस्तक-दुकानें विरल हैं, उत्सव पहुँच के स्थल बन जाते हैं। वे लोगों को पढ़ने से पहले सुनने का अवसर देते हैं; पुस्तक खरीदने से पहले लेखक से मिलने का अनुभव कराते हैं; और यह अहसास कराते हैं कि साहित्य कोई दूरस्थ संस्था नहीं, बल्कि एक जीवित संवाद है।
जयपुर की सबसे स्थायी विरासत स्वयं उत्सव नहीं, बल्कि वह पारिस्थितिकी है जिसे उसने संभव बनाया। उसने यह सिद्ध किया कि भारत में साहित्य तब फलता-फूलता है जब उसे सार्वजनिक, मुक्त और सहभागी बनाया जाता है। आज जो अनेक साहित्य उत्सव देश और व्यापक क्षेत्र में फैले हुए हैं, वे किसी अनुकरण की उपज नहीं हैं; वे उस मॉडल के स्थानीय प्रत्युत्तर हैं जिसने एक मूलभूत सत्य को प्रमाणित किया। साहित्य को जब सुने जाने का अवकाश दिया जाता है, तो वह अपने पाठक स्वयं खोज लेता है।
अंग्रेज़ी का जाल
भारतीयों की पठन-आदतों को लेकर वैश्विक संदेह का बड़ा कारण अंग्रेज़ी भाषा की पुस्तकों की अपेक्षाकृत सीमित बिक्री है। भारत में अंग्रेज़ी की सफल पुस्तकें भी प्रायः कुछ हज़ार प्रतियों तक ही बिकती हैं। पश्चिमी बाज़ारों की तुलना में ये आँकड़े क्षीण प्रतीत होते हैं।
परंतु अंग्रेज़ी भारत की सघन पाठकीय बुनावट का केवल एक धागा है।
केवल हिंदी प्रकाशन ही व्यापारिक प्रकाशन के कुल परिदृश्य का अनुमानतः 25 से 30 प्रतिशत हिस्सा वहन करता है। केरल में सशक्त पुस्तकालय नेटवर्क और स्थानीय प्रकाशन संस्थानों के सहारे मलयालम साहित्य को गहरा जन-संपर्क प्राप्त है। पूर्वी भारत में बांग्ला प्रकाशन आज भी एक सुदृढ़ पाठक-वर्ग को बनाए हुए है। तमिल, मराठी, तेलुगु और गुजराती साहित्य अपनी-अपनी परंपराएँ, विमर्श और पाठक-समुदाय लेकर सक्रिय हैं।
अंतरराष्ट्रीय प्रकाशकों ने भी इस वास्तविकता के अनुरूप स्वयं को ढाला है। पेंगुइन रैंडम हाउस, हार्पर कॉलिन्स, ब्लूम्सबरी, हैशेट, पैन मैकमिलन और वेस्टलैंड जैसे वैश्विक प्रकाशन-गृह अब जगरनॉट, रूपा, एलेफ़, स्पीकिंग टाइगर, नियोगी बुक्स, राजकमल प्रकाशन, वाणी प्रकाशन, सेतु प्रकाशन, डीसी बुक्स, आनंद पब्लिशर्स, कालचुवाडु, अंतिका, नवारंभ, बी बुक्स और साहित्य अकादेमी जैसे भारतीय प्रकाशनों के साथ सह-अस्तित्व में हैं। साहित्य उत्सवों में उनकी उपस्थिति प्रायः केवल अधिक बिक्री के लिए नहीं, बल्कि दृश्यता, अनुवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए होती है।
कई पाठकों के लिए साहित्य उत्सव वह पहला स्थल होता है जहाँ वे किसी अनूदित कृति से परिचित होते हैं। या किसी अन्य भाषा के लेखक से। या इस विचार से कि साहित्य सीमाएँ पार करता है, यात्रा करता है।
वे दृश्य जो गिने नहीं जाते
वाराणसी के एक साहित्य उत्सव में पास के एक ज़िले से आए एक स्कूल शिक्षक ने बताया कि वह हर वर्ष अपने विद्यार्थियों को यहाँ क्यों लाते हैं। “हो सकता है आज वे पुस्तकें न खरीदें,” उन्होंने कहा, “लेकिन वे लेखकों को बोलते हुए देखेंगे। वे जानेंगे कि किताबें किसी संस्था नहीं, मनुष्यों द्वारा रची जाती हैं।”
पुणे में एक किशोरी उस कवि से मिलने के लिए घंटों कतार में खड़ी रही, जिसे उसने सोशल मीडिया पर खोजा था। वह मराठी की तीन पतली पुस्तिकाएँ लेकर लौटी- कई महीनों में बचाए गए पैसों से खरीदी हुई। कोलकाता में बुज़ुर्ग पाठक हर साल लौटते हैं, इसलिए नहीं कि उन्हें और पुस्तकें चाहिए, बल्कि इसलिए कि मेला उनके वार्षिक कैलेंडर का हिस्सा बन चुका है- एक ऐसे अनुष्ठान की तरह, जो धार्मिक उत्सव जितना ही परिचित और आत्मीय है।
ये वे क्षण हैं जो आँकड़ों में दर्ज नहीं होते। वे अवकाश-पठन के सर्वेक्षणों में दिखाई नहीं देते। फिर भी यही क्षण बताते हैं कि साहित्य उत्सव क्यों निरंतर बढ़ते जा रहे हैं।
सुनने की विरासत
भारत का साहित्यिक इतिहास उसकी मौखिक परंपराओं से अलग नहीं किया जा सकता। महाकाव्य पढ़े जाने से बहुत पहले सुने जाते थे। कविता मुद्रित होने से पहले गाई जाती थी। सुनना कभी भी सहभागिता का कमतर रूप नहीं माना गया।
साहित्य उत्सव इसी विरासत को स्पर्श करते हैं। जब श्रोता किसी कवि को पाठ करते हुए सुनने या किसी उपन्यासकार को उस पुस्तक पर बोलते हुए सुनने के लिए एकत्र होते हैं, जिसे उन्होंने अभी पढ़ा भी नहीं है, तब साहित्य निजी से सामुदायिक हो जाता है। अनेक लोगों के लिए यह पढ़ने का अंत नहीं, बल्कि उसकी शुरुआत होती है।
गलत प्रश्न पूछना
यह प्रश्न कि अवकाश-पठन के अपेक्षाकृत निम्न आँकड़ों के बावजूद भारत में इतने साहित्य उत्सव क्यों आयोजित होते हैं, इस धारणा पर आधारित है कि उत्सव किसी अनुपस्थिति की भरपाई के लिए अस्तित्व में आते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि वे इसलिए हैं क्योंकि भारत में पढ़ना सदैव सामाजिक जीवन के साथ गुँथा रहा है।
यह पूछना कि क्या भारतीय आनंद के लिए पढ़ते हैं, स्वयं आनंद की एक संकीर्ण परिभाषा थोपना है। एक ऐसे समाज में जो भाषाई बहुलता, पहुँच की असमानता और सशक्त मौखिक परंपराओं से निर्मित है, आनंद अक्सर सुनने, बहस करने और सामूहिक खोज के अनुभव से आता है।
उत्सव वास्तव में क्या संकेत करते हैं
भारत के साहित्य उत्सव किसी ऐसी संस्कृति के लक्षण नहीं हैं जो पुस्तकों से दूर हो चुकी हो। वे अनुकूलन के प्रमाण हैं। वे दिखाते हैं कि ऐसे परिवेश में, जहाँ पढ़ना असमान हो सकता है पर जिज्ञासा प्रचुर है, साहित्य किस तरह जीवित रहता है और विकसित होता है।
वे हमें याद दिलाते हैं कि पठन-संस्कृतियों को केवल बेस्टसेलर सूचियों या अवकाश-सर्वेक्षणों से नहीं आँका जा सकता। उन्हें उन स्थानों के माध्यम से समझना होगा जहाँ लोग इकट्ठा होते हैं, सुनते हैं, तर्क करते हैं और बार-बार लौटते हैं।
भारत पढ़ता है।
बस उन तरीकों से नहीं, जिन्हें दुनिया ने गिनना सीखा है।

