इरशाद ख़ान सिकंदर के कहानी संग्रह पर अशोक कुमार पांडेय

इरशाद ख़ान सिकंदर का पहला कहानी संग्रह ‘सिलवटों भरी रूह’ का प्रकाशन उनके निधन के बाद प्रकाशित हुआ। यह सोचकर बहुत अफ़सोस होता है। उनके निधन के बाद हम उनकी कहानियाँ जुटाई गईं। इसका संपादन अशोक कुमार पांडेय ने किया। राजपाल एंड संज प्रकाशन ने प्रकाशित किया। आइये इस संग्रह की भूमिका पढ़ते हैं जो अशोक कुमार पांडेय की लिखी हुई है- प्रभात रंजन

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इरशाद खान सिकंदर को हम सबने एक शायर के तौर पर ही जाना था, भाषाई संस्कार और इंसानी जज़्बात से गहरे भरे ऐसे शायर के रूप में जो बेहद जटिल भावनाओं को भी चंद अल्फ़ाज़ में पिरोकर दुनिया के सामने किसी चुनौती की तरह फेंक देता था कि आप उसे आसान समझ के सुन लें और फिर बहुत देर तक उसके असर में डूबे रहें, गुत्थियाँ सुलझाते रहें।

उन्हें एक कहानीकार के रूप में जानना किसी नए इरशाद खान सिकंदर को जानना नहीं था बल्कि उस शायर की दृष्टि के विस्तार और समझ की गहराई को नए सिरे से समझना था। पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक साधारण से परिवार से आने वाले इरशाद के पास ज़िंदा अनुभवों का जो खजाना था, स्मृतियों की जो पेंचदार विरासत थी और भाषा के जो बहुरंगी औज़ार थे, उन सबने इन कहानियों को बड़ी खूबसूरती से बुना है। पढ़ते हुए आश्चर्य होता है कि इतनी ज़रा सी उम्र में इरशाद लगातार कितना लिख-पढ़-सोच और महसूस कर रहे थे।

हिन्दी-उर्दू या कहें हिन्दुस्तानी की कहानियों की परंपरा में इरशाद की ये कहानियाँ क़िस्सागोई शैली के सबसे करीब हैं जहाँ भाषा और दृश्यों की महीन बुनाई की जगह थोड़े खिलंदड़ तरीक़े से क़िरदारों और उनके संवादों के ज़रिए कहानी को धीरे-धीरे बढ़ाते हुए एक ऐसे मोड़ पर खत्म कर दिया जाता है कि अब तक हँसता-मुसकुराता पाठक संजीदा हो जाए। उनके क़िरदार भी आसमानी नहीं बिल्कुल ज़मीनी हैं जिनकी शिनाख्त कोई भी आम पाठक अपने आसपास की रोज़मर्रा की दुनिया से कर सकता है। ज़मींदार का बेटा यहाँ कोई राजकुमार नहीं एक आशिक है तो मल्लाह की बेटी माशूका होने से ज़्यादा एक आम औरत। अपनी-अपनी सामाजिक स्थितियों के ग़ुलाम और उन्हें तोड़ने की मुश्किल जद्दोजहद करते ना-मामूली हो गए इंसान। कामयाबी के लिए आसान रास्ते तलाशता तिकड़मी भी है यहाँ तो अपने रास्ते के सही होने पर पूरा भरोसा करता सबकुछ दांव पर लगा देने वाला कलाकार भी।

रंगमंच को कई शानदार नाटक दे चुके इरशाद की इन कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि वे होते और मौक़े मिलते तो वे साहित्य को कई अच्छी रचनाएं और सिनेमा को कई मानीखेज स्क्रिप्ट भी दे सकते हैं और यह सोचकर उनके न होने का एहसास और गहरा हो जाता है।

मैं आभारी हूँ राजपाल एंड संस का कि उन्होंने इस किताब के सम्पादन की ज़िम्मेदारी सौंपी और मुझे उम्मीद है कि हिन्दी का पाठक इन कहानियों को पढ़ते हुए खुद को और समृद्ध तथा और मानवीय होने का एहसास करेगा।

अशोक कुमार पाण्डेय

दिल्ली  

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