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  • प्रिंस कुमार की कविताएँ

    मानव सभ्यता के विकास ने मानव जीवन को ही कितना चुनौतीपूर्ण बना दिया है इसकी सटीक अभिव्यक्ति प्रिंस कुमार की कविताओं में है। प्रिंस कुमार दिल्ली के एक स्कूल में अंग्रेज़ी के अध्यापक हैं, जानकीपुल पर प्रकाशित होने का उनका यह पहला अवसर है- अनुरंजनी

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    1. दीवार में एक खिड़की को खुला रखने वाला आदमी
    (विनोद कुमार शुक्ल जी को समर्पित)

    वह व्यक्ति जो चला गया है अपना भारी कोट पहनकर,
    वह दरअसल गया ही नहीं—
    उसने कोट के भीतर एक समूचा घर बसा लिया है।

    उसकी कविताओं में बाज़ार से लाया गया राशन सिर्फ अनाज नहीं,
    बल्कि जीवन की सबसे बड़ी और मासूम उपलब्धि है।
    वहाँ ‘दीवार में एक खिड़की’ सिर्फ हवा के लिए नहीं,
    बल्कि उम्मीद के लिए खुलती है—
    ताकि बाहर की हरियाली भीतर आ सके
    और भीतर की चुप्पी बाहर जाकर आकाश हो जाए।

    ‘नौकर की कमीज़’ के सिलवटों में छिपा है एक सीधा-सादा मनुष्य,
    जो व्यवस्था की ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर बड़ी कोमलता से नंगे पाँव चलता है।
    उसके पास कोई भारी भरकम शब्द नहीं,
    बस ‘होने’ का एक जादुई अहसास है।

    वे लिखते नहीं,
    वे बस चीजों को उनके सही नाम से पुकारते हैं।
    एक ऐसी दुनिया जहाँ-
    मछलियाँ पानी में नहीं, मनुष्य की आँखों में तैरती हैं,
    पेड़ थककर घर लौट आते हैं,
    और प्यार, ‘सब कुछ होना बचा रहने’ की ज़िद है।

    विनोद जी,आपकी भाषा उस पुरानी लकड़ी की मेज़ की तरह है
    जिस पर हाथ फेरते ही अतीत की गंध
    और भविष्य का भरोसा
    एक साथ महसूस होता है।
    आप उस दुनिया के कवि हैं
    जहाँ “सब कुछ होना बचा रहेगा”
    जब तक एक भी मनुष्य दूसरे को बिना किसी शर्त के ‘देख’ रहा है।

    2.अरावली को सम्मन

    वह खड़ा है— एक आदिम झुकाव के साथ,
    जैसे समय की रीढ़ की हड्डी में थोड़ा ‘कैल्शियम’ कम हो गया हो।
    अरावली, कोई भूगोल नहीं है,
    वह पृथ्वी के माथे पर उभरी हुई एक ‘नीली नस’ है,
    जो अब अदालती कागजों की सफेदी में पीली पड़ रही है।
    सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की फाइलें,
    सफेद कबूतर बनकर उड़ती हैं
    और खदानों के गहरे गड्ढों में गिरकर
    काला पत्थर बन जाती हैं।

    यहाँ ‘इतिहास’ कोई बीती हुई बात नहीं,
    बल्कि धौक के पेड़ों की जड़ों में फंसा हुआ एक पुराना सिक्का है, जो बोलता है।

    पहाड़ अपनी जेब से निकालता है-
    मेवाड़ की अस्मिता का एक टुकड़ा,
    और उसे ‘रियल एस्टेट’ के विज्ञापनों पर दे मारता है।

    अदालत कहती है— “खनन प्रतिबंधित है,”
    मगर पहाड़ों के फेफड़ों में ‘जेसीबी’ की खांसी दर्ज है।

    यह एक ‘अति-यथार्थवादी’ पेंटिंग है
    जहाँ एक तरफ ‘इको-सेंसिटिव जोन’ का बोर्ड लगा है,
    और दूसरी तरफ विकास की भूख में –
    पर्वत का आधा धड़ किसी ‘मॉल’ की नींव में दफन है।

    कानून की स्याही और अरावली का पसीना,
    दोनों का घनत्व अलग-अलग है।

    न्याय की तराजू पर जब रखा गया ‘पर्यावरण’,
    तो दूसरी तरफ ‘अर्थव्यवस्था’ का बाट थोड़ा भारी निकला— यही वह ‘बाइनरी’ है जिसमें अरावली फंस गया है।

    यह पर्वत नहीं, एक ‘सबटेक्स्ट’ है।
    बनास के तटों से लेकर रायसीना की पहाड़ियों तक,
    इसकी शिराओं में ‘इंडस वैली’ का डीएनए दौड़ता है।
    लेकिन आज का ‘पॉलिटिकल नैरेटिव’
    इसे केवल एक ‘प्लॉट नंबर’ समझता है।
    संस्कृति?
    वह तो अब केवल ‘टूरिज्म’ के ब्रोशर में चिपकी हुई एक सूखी पत्ती है।

    अरावली दिल्ली का ‘फिल्टर’ है, एक विशाल ‘ग्रीन लंग्स’
    जिसे अब दमे की बीमारी दे दी गई।
    रेगिस्तान का बढ़ता हुआ हाथ,
    पहाड़ की ओट में रुका हुआ है
    जैसे कोई डरा हुआ बच्चा अपनी मां के आंचल में दुबका हो।
    मगर माँ का आंचल तो ‘लीज’ पर दे दिया गया है!

    जब कोर्ट पहाड़ की परिभाषा बदलता है,
    तो पहाड़ के भीतर का ‘इकोसिस्टम’
    अपनी भाषा भूल जाता है।
    तेंदुए के पैरों के निशान,
    अब ‘कंक्रीट’ के जंगलों में रास्ता ढूंढते हैं।

    अंततः, अरावली एक ‘सिंबल’ है— हमारी उस हार का,
    जहाँ हम ‘संरक्षण’ और ‘उपभोग’ के बीच
    एक ढहता हुआ पुल बना रहे हैं।

    अरावली खड़ा है, सुप्रीम कोर्ट के ‘सम्मन ‘के साथ
    जिसमें फैसला किया गया है कि
    यह दिल्ली में प्रदूषण फैलाने का आदतन अपराधी है।


    3. शांति

    राजा ने चुरगुन से पूछा –
    क्या चाहती हो ?
    चोंच भर शांति ,
    चुरगुन ने फरियाद किया।

    राजा ने कहा-
    एवं अस्तु।
    खबर है कि,
    चुरगुन का पूरा शरीर ही शांत हो गया
    दूसरे दिन ।

    4. धुँआ

    अब कोयल की कूक भी सुनाई नहीं देती
    अब कौए भी नजर नहीं आते
    जो हाथ छप्पर भी उठाने के लिए तत्पर रहते थे
    आज वे अर्थी तक नहीं उठाते
    ऐसा ही होता है जब मानवता मर जाती है
    तब समाज जलता है
    फिर मुर्दों से नहीं
    जिंदो से धुँआ निकलता है।

    5.गिद्ध

    वैज्ञानिक खोज रहे हैं गिद्धों को
    और उनके विलुप्त होने के कारणों को भी
    पर अभी तक नहीं मिल पाया है कोई प्रामाणिक साक्ष्य

    मैंने भी खोजना शुरू किया गिद्धों को
    और उनके विलुप्त होने के कारणों को

    इस खोजी अभियान में
    मुझे तो बहुत गिद्ध मिले
    और सच कहूं तो मुझे लगता है
    मैं चारों ओर से
    गिद्धों से ही घिरा हुआ हूँ

    मैं थोड़ा डरा हुआ भी हूँ
    क्योंकि ये गिद्ध की नई प्रजाति है
    यह मुर्दों को नहीं जिन्दों को खाता है
    और यह उनसे ताकतवर भी है
    जिनको वैज्ञानिक खोज रहे हैं

    इस समय जबकि कैद है दुनिया मुठ्ठी में
    बिल्कुल ही संभव है
    आदमी का गिद्ध होना
    इन मुटेड गिद्धों की तादाद
    बढ़ती जा रही है दिन पर दिन
    इनकी क्लोनिंग की प्रक्रिया सूक्ष्म है
    और इससे भी सूक्ष्मतर है
    इनकी ‘मल्टीप्ल फिशन ‘के द्वारा प्रजनन की प्रक्रिया
    यह फैलते जा रहे हैं हमारे बाहर
    हमारे भीतर
    अंततः लाइसोसोम की तरह
    बर्बाद होते जा रहे हैं हम
    खुद ब खुद
    बर्बादी की इस प्रक्रिया में मुझे याद आ रहे हैं डार्विन
    और याद आ रहा है
    ‘थ्योरी ऑफ़ इवोल्यूशन’ एवं ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट ‘का सिद्धांत।

    6. डिलीवरी बॉय

    नीली टी-शर्ट में लिपटा एक विस्थापित विज्ञापन,
    सड़कों के ‘सिंटेक्स’ पर रेंगता हुआ— वह कोई व्यक्ति नहीं, एक ‘डिजिटल डॉट’ है जो जीपीएस के स्क्रीन पर थरथराता है।
    कर्कश ट्रैफिक का कोलाहल, कालिख और कुंठा,
    उसके फेफड़ों में ‘फ्यूल’ बनकर जमती है।
    समय की टिक-टिक, टीस और टूटन,
    उसे एक ‘डिस्काउंट कूपन’ की तरह भुनाती है।
    वह भागता है— जैसे मौत के मुहाने पर कोई बेबस मृग,
    मगर यहाँ शिकारी कोई व्याध नहीं, एक ‘एल्गोरिदम’ है।

    थकी हुई लाल बत्तियाँ उसे घूरती हैं—खूनभरी आँखों से,
    सूनी सड़कें उसे निगलने को जबड़ा खोलती हैं।
    उसकी पीठ पर लदा बड़ा-सा चौकोर बैग— कोई थैला नहीं, उसकी महत्वाकांक्षाओं का ताबूत है,
    जिसमें दफ़्न हैं उसकी डिग्रियाँ,
    उसके पहले प्यार के ख़त, और वे तमाम ‘शायद’
    जो अब ‘कभी नहीं’ में बदल चुके हैं।

    वह एक ‘मोबाइल दास’ है,
    जिसका ईश्वर ‘कस्टमर रेटिंग’ के सितारों में कैद है।
    एक ‘फाइव स्टार’ के बदले वह अपना लहू बेचता है,
    और शून्य के डर से अपनी आत्मा गिरवी रखता है।
    दरवाज़े की घंटी—एक चीख़ है,
    जो उसके अस्तित्व को ‘थैंक यू’ की बेरुखी में दफ़ना देती है।
    वह लौटता है जब अपने कमरे में
    रात की काली चादर फटने लगती है,
    अपने कमरे के एकांत में
    वह बिखर जाता है
    पर वह खुद को कुछ ‘डिलीवर’ नहीं कर पाता।
    वह केवल एक ‘अनरीड नोटिफिकेशन’ बनकर रह जाता है, दुनिया के इनबॉक्स में।

    7. आगमन

    जबसे हुआ है
    आगमन
    श्वेतांबरों का
    काले हृदय के साथ
    तब से
    जनता
    हो गई है
    दिगम्बर।

    8.फ़िलिस्तीन के मासूम फ़रिश्तों के नाम

    मिट्टी में दफ़्न हो गए खिलते गुलाब क्यों,
    मासूम चेहरे खो गए, बोलो जनाब क्यों?

    माँ की दुआओं का असर क्यों न हो सका,
    क़ुर्बान हो गए जो फ़रिश्त-ए शबाब क्यों?

    मिट्टी से पूछता है जहाँ का ज़मीर अब,
    बच्चे लहू में भीगें तो ख़ामोश आफताब क्यों?

    हँसने की चाह, खेलने की ज़िद, सब छिन गई,
    बचपन ही बन गया जहाँ विषाद क्यों?

    अब आसमान में तारे भी रोते नज़र आएँ,
    चाँद भी कह रहा है ये दिल में मवाद क्यों?

    ख़्वाबों की नींद उड़ गई बमों की गूँज से
    सोते हुए बच्चों पे गिरे फौलाद क्यों?

     

    कवि परिचय: नाम – प्रिंस कुमार
    मगही,भोजपुरी , हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा में कविता लेखन । पत्र – पत्रिकाओं में कविता प्रकाशित हैं। पटना रेडियो स्टेशन एवं दूरदर्शन केंद्र से कविता पाठ।
    सम्प्रति – वर्तमान में शिक्षा निदेशालय , दिल्ली सरकार में एक अंग्रेजी के शिक्षक के रूप में कार्यरत।
संपर्क – princeawgp051096@gmail.com

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