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  • अंचित को पढ़ते हुए : मोह, विरक्ति और बेबसी

    इस साल पटना पुस्तक मेले में युवा कवि अंचित के कविता संग्रह ‘आधी पंक्ति’ का लोकार्पण हुआ। निस्संदेह अंचित की कविताओं का अपना सिग्नेचर है जो दूर से पहचान में आ जाता है। राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह पर यह टिप्पणी लिखी है युवा कवयित्री गुंजन उपाध्याय पाठक ने। आप भी पढ़ सकते हैं- जानकी पुल

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    “हमें सर्वहारा का राज चाहिए था और बिना टैक्स की धरती।
    हमें खुद के लिए नहीं,
    खुद से भागना था।
    हमें सूरजमुखी चाहिए़ था और पुराने कवियों की तारीफ।
    कितना हसीन है इस शहर का होना
    कि एक दरिया इसके साथ चलता हुआ
    जिसमें अवसाद बहता है।
    हम अपनी पीढ़ी के सबसे शानदार लोग थे,
    यानी अपने समय के सबसे बेकार, आवारा, फ़ालतू।”

    किताब जैसा कि इसका नाम है या फिर इसका कवर पेज, सब बोलते बतियाते है इक विचित्र सी भाषा में, और जो इस भाषा को ठीक ठीक पढ़ ले, समझ ले तो ये मांगते हैं “एक कौर मांस। ” इसे पढ़ते हुए कितनी ही बार बेबसी का बोध हुआ और उतनी ही बार या उससे कुछ ज्यादा मुहब्बत का! स्मृतियों के ताने बाने में कसी, उलझी और आपके मनोवृति के हिसाब से ढलती, बदलती ये कविताएं, मन में उमड़ते, घुमड़ते बादलों की फुहारों में भी भींगती है और कुछ पल को तो इमोशनल ब्रेकडाउन वाले ज़ोन में भी।

    “बीत जाने को जिन्दगी और कविता दोनों से निकाल देना था
    दोनों में ही रखना था बीत जाने को।”

    “एक स्वप्न बेधता है एक साथ एक सिनेमाई दृश्य,
    एक न जिया गया जीवन और कोई घड़ियाल बोलता है”

    “कौन कहेगा तुमसे कि अब छोड़ दो अपना अकेलापन और मेरे पास बैठो”

    इन आधी पंक्तियो में गजब का मोह और विरक्ति एक ही साथ उत्पन्न होता है, यहां कवि की दृष्टि को समझने और समझाने वाला मसला नहीं है

    “तुमने मेरी ऊब में इज़ाफ़ा किया है और
    मैं मनुष्य होने की शर्तों से उकता गया हूं।

    खोने की अमरता रोज़
    मेरे ऊपर नई स्थितियों में टूटती है।
    तुम्हारे रह जाने में भी,
    तुम्हें मैं खो ही देता श्वेतवर्णा।”

    “एक अनंत जाल है वर्तमान और
    मैं जिनसे भी प्रेम करता था उनसे दूर भाग रहा हूँ
    कुछ भी महसूस करने से डरा हुआ।
    जब तक तुम बाँहों में भरी जा सकती थी
    मुझे कविता नहीं तुम्हारी आत्मा चाहिए थी
    अपनी देह पर गोदने की तरह गुदी हुई।”

    इस तरह अंचित की किताब में असफलताओं से जूझते लोगों को सहारा मिलता है, सो कॉल्ड नॉट सो फिट लोगों को एक वृहत एकांत जिसमें सृजन के लिए फॉर्मूला नहीं तय किया जाता, यह एक अलग दुनिया है, जी लेने की साध और मर जाने की कशिश के बाद, बची हुई जिन्दगी की दुनिया। छूट गई दुनिया से अलग, हारे हुए लोगों की दुनिया, जिन्होंने संवेदना के साथ समझौता करने से मना कर दिया है और उससे उपजी पीड़ को यूं जी रहे हैं जैसे सब कुछ सामान्य चल रहा हो इनकी जिन्दगी में।

    “वह सिर्फ मेरा राग नहीं था
    इसमें बेजोड़ मिलावट थी
    एक मिसरे में थे सैकड़ों विच्छेद
    एक पहलू में नाकामियां तमाम उम्र की।
    वह मेरा किस्सा ही नहीं था
    किसी मियां मीर का था।“

    अपने दुखों से भागना भी तो इस तरह कि वह जैसे आपके वजूद का हिस्सा हो, कोई भी नाकामयाबी ऐसी कैसे हो सकती है कि वह इस तरह आपकी हो कि उसके दंश की भी आदत हो जाए। इन कविताओं में दोहराव नहीं है, इनके बिम्ब बिल्कुल ताजे फूल या घाव समान, अंचित की ये सिग्नेचर कविताएं मानी जायेंगी, खुद को न दोहराते हुए भी, अपनी बातों को इतनी ईमानदारी से रखना ही इस किताब का आकर्षण है।

    “कोई मुझसे कहता क्लिष्ट होता जा रहा हूँ तो मैं कहता कि समझे जाने की कोशिश मैने छोड़ दी है। मेरे दम्भ मुझे प्यारे हो गए। हालांकि आस्था मुझसे दूर ही रही। फिर भी इतना सच तो रहा कि एक लड़की थी इसी दुनिया में, समुन्दर जैसी, जो मेरे साथ, एक दृश्य में रो पड़ी थी। सिर्फ एक चाह थी और उसे छोड़ना ही था हमको।”

    यहाँ यादों का जखीरा है और है पीठ दर्द, सांसों पर धुएं का अतिरेक है और होंठो पर एक नाम, इस दौड़ती भागती दुनिया में सब ठहरा ठहरा हुआ है यहाँ।

    यहां आत्महत्याओं की जगह नहीं है न ही इतनी सुखी है दिन की निकम्मेपन की हसरतों में गुजार दी जाए, यहाँ दिनों के अलग माँग है और रातों की अलग, शाम इतनी उदास इतनी बैनर कि शाम में झलकने लगता हो अपना ही चेहरा, फ़िर भी एक दफ्तर है एक घर है, घर की उम्मीदें है और दफ्तरों की नियत समयावली। और इसीलिए है मियां मीर के किस्से। जितनी बार पढ़ी जाएंगी ये कविताएं, ये उतना ही आयाम में खुलती जायेंगी, जहां इच्छाओं की नाचती परछाइयों पर कवि लूट जाना चाहता है और श्रृंगार पूरा हो जाता है।

    इन दिनों की गिनती भी कितनी ही बार कविताओं का शीर्षक हो जाती है और मन कांप कांप उठता है और फिर विश्वास भी दिलाता है, कवि अपनी माशूका से पूछता है कि क्या अब भी याद आती है उसे, क्या अब भी नए गमलों को खरीदते हुए उसे याद करती है या फिर नई नोटबुक खरीदते हुए, इतने छूटे हुए दिनों की रातों में कवि पूछता है कि क्या तुम्हें वो कहानी याद है जिसमें एक नर्तकी और एक कवि हाथ थामें सचमुच सागर की ओर चले जाते हैं?

    “उसकी पीठ झुकने लगी थी
    सात लम्बे सालों में उत्साह की जगह ऊब लेने लगी थी।
    उसने सोचा, वह जीवित क्यों हैं?
    उसको लगा क्योंकि जीवित वह अपने मत से नहीं था।

    जितनी सिगरेटें उसने जलाई
    सब श्वेत-श्याम की तरफ लौट पाने की चाहें थीं।
    जो चुम्बन उसके पास रह गए
    वह घाव बन चुके थे।”

    अंचित की यह किताब मोह, विरक्ति और बेबसी की सिर्फ़ पड़ताल नहीं करती—वह इन्हें जीने की एक पैटर्न की तरह प्रस्तावित करती है। यह उन लोगों की किताब है जो जीवन से पूरी तरह नाराज़ नहीं हैं, लेकिन उससे बहुत सहज भी नहीं हो पाए हैं। इस संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धि इसकी ईमानदारी है, और सबसे बड़ी सीमा भी शायद वही है। क्योंकि ईमानदारी जब आत्मसंरक्षण में बदलने लगे, तो कविता अपने ही बनाए घेरे में घूमने लगती है।फिर भी, इस घेरे के भीतर जो कुछ लिखा गया है— वह समकालीन हिंदी कविता में एक अलग, अकेली और याद रह जाने वाली आवाज़ है। इसे नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं, और इससे पूरी तरह सहमत होना भी।

    अंततः यह संग्रह पाठक से सहमति नहीं, संवाद चाहता है। वह हमें अपने भीतर उतरने का न्योता देता है, लेकिन वहीं ठहर जाने की संभावना भी छोड़ देता है। ऐसे में कुछ सवाल अनायास उठते हैं—क्या लगातार आत्मकेंद्रित दुख को कविता का नैतिक आधार बना लेना, संवेदना की सीमा को संकुचित नहीं करता? क्या स्त्री की उपस्थिति को मुख्यतः स्मृति, देह और अनुपस्थिति में रूपांतरित कर देना, प्रेम की जटिलताओं को सरल बना देता है—या यह भी कवि की एक सचेत सौंदर्य-रणनीति है? और सबसे ज़रूरी यह कि जब कविता बार-बार जीवन से विमुखता की भाषा गढ़ती है, तो क्या वह केवल अनुभव को दर्ज कर रही होती है, या अनजाने में एक जीवन-दृष्टि भी प्रस्तावित कर देती है? कवि लगातार एक ही बात कहता है, थकता नहीं है और पढ़ने वाले को हर बार अपनी भाषा से अचरज में डाल देता है।

    इन सवालों के उत्तर यह किताब नहीं देती—और शायद देना चाहती भी नहीं। लेकिन इन्हीं अनुत्तरित प्रश्नों के कारण यह संग्रह पढ़े जाने के बाद भी पाठक के भीतर बना रहता है, कसक की तरह, स्मृति की तरह, और एक अधूरी बहस की तरह।

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