सीता सही मायने में धरती पुत्री थीं

सुबह मैंने सीता जयंती के मौके पर देवदत्त पट्टनायक की किताब ‘सीता के पांच निर्णय’ का एक प्रसंग साझा किया था. बाद में ध्यान आया कि देवदत्त पट्टनायक की एक और किताब है ‘सीता’ जिसका अनुवाद जानी मानी अनुवादिका रचना भोला यामिनी ने किये है. मंजुल प्रकाशन से आई इस किताब से एक प्रसंग जिसमें सीता वन जाने से पहले राम की बहन शांता के साथ संवाद कर रही हैं- प्रभात रंजन

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…शांता ने सीता को अपनी गोद में बिठा लिया और बोलीं, ‘तुमने वन में पति का साथ देने का निर्णय लिया, यह बहुत ही अच्छी बात है। परंतु एक वधू के रूप में, वन में यात्रा करना सरल नहीं होगा, तुम्हारे साथ दो मनमोहक युवक हैं परंतु दोनों में से कोई भी तुम्हारी ओर नहीं देखता, एक तपस्वी है और दूसरा तुम्हें इसलिए नहीं देख सकता क्योंकि तुम उसके भाई की पत्नी, उसके लिए माता समान हो। तुम्हें अपने चारों ओर, संयोग के लिए व्याकुल पशुओं की पुकार सुनाई देगी। तुम सर्पों, मेंढकों, हिरणों व बाघों को मैथुन रत देखोगी और तुम देखोगी कि पुष्प अपनी गंध से मधुमक्खियों व तितलियों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। तुम्हारी देह पुकार उठेगी; सीता तुम अपनी इंद्रियों की पुकार को कैसे उपेक्षित करोगी? और ये राक्षस, वे तो निष्ठा और ब्रह्मचर्य का अर्थ तक नहीं जानते। वे तुम्हें विवश करेंगे कि तुम और मेरे ये दो भाई उनकी तृष्णा शांत करें, उनके लिए तो यह स्वाभाविक सी बात है। तब तुम क्या करोगी, सीता? तुम अपनी इच्छाओं तथा अपने आसपास मिलने वाले पुरुषों से अपना रक्षण कैसे करोगी? सीता वन में कोई सीमाएँ नहीं होतीं। जहाँ सीमाएँ नहीं होतीं, वहाँ लंघन भी नहीं कहलाता।‘

सीता सोचने लगीं कि शांता वे सब बातें उन्हें क्यों कह रही थीं। उन्होंने उन सब भावनाओं के विषय में रोमानी कथाओं तथा चारणों के मुख से गाए जाने वाले लोकगीतों में सुना था, जिनके बारे में शांता बता रही थीं, परंतु स्वयं कभी उन्हें अनुभव नहीं किया था। हाँ, विवाह समारोह के समय तथा अंतःपुर में एकाध बार राम ने जिस दृष्टि से उन्हें देखा, वह उन्हें बहुत भाई थी परंतु अब वे उसे देखते ही नहीं, कम से कम वैसी दृष्टि से तो नहीं देखते। क्या शांता इसी बारे में बात कर रही थीं या और कोई बात कह रही थीं?

उनके विचारों को भाँप कर शांता बोलीं, ‘मेरी बच्ची, तुम अभी छोटी हो किंतु तुम्हारी देह पूर्णयौवना होने जा रही है। मैं इसे देख सकती हूँ। तुम्हें भी शीघ्र ही इसका अनुमान हो जाएगा। मानो तुम्हारे वन में आगमन से इसके शीघ्र आने की संभावना बन गई है। तुम सही मायनों में धरती पुत्री हो।‘…

 शांता सीता को अनसूया व अत्रि मुनि के आश्रम में ले गईं। अनसूया, अरुंधती की तरह अपने पातिव्रत्य और सतीत्व के लिए विख्यात थीं। ….

अनसूया ने जनक पुत्री का स्वागत किया और उसे एक पुष्पित वृक्ष के नीचे ले गईं। वहाँ उन्होंने उन्हें उनकी काया के वे रहस्य बताए, जो अब प्रकट होने लगे थे। उन्होंने सीता को एक वस्त्र, एक माला तथा उबटन का पात्र दिया। वह वस्त्र कभी मलिन नहीं होगा, वह माला कभी नहीं कुम्हलाएगी तथा उबटन सदा उनकी त्वचा को कोमल बनाए रखेगा।

‘यदि तुम महल में होतीं, तो यह एक भव्य उत्सव का कारण बनता। तुम्हारे पिता और माता की ओर से तुम्हें उपहार भेजे जाते। तुम्हारे पति की माताएँ तुम्हें हल्दी का उबटन लगा कर, स्नान करवातीं, पुष्पों से तुम्हारा श्रृंगार करतीं। तुम्हें निजी महल दिया जाता और जब तुम स्वयं को मिलन के लिए तैयार समझतीं, तो तुम अपने पति को पान के पत्तों में लिपटी सुपारी भेजतीं ताकि वे तुम्हें आ कर अरुंधती सितारा दिखाएँ। परंतु हाय, वह सब करने के लिए तुम्हें चौदह वर्षों तक प्रतीक्षा करनी होगी। मैं इसकी क्षतिपूर्ति के लिए तुम्हें क्या दे सकती हूँ?’

सीता बोलीं, ”आप मुझे इन चौदह वर्षों के वनवास के दौरान अपनी देह तथा मन के प्रति सच्चा रहने का बल व आशीष प्रदान करें। मेरी बड़ी ननद शांता का कहना है कि यह सब इतना सरल नहीं होगा,’….

अत्रि मुनि ने देखा कि उनकी पत्नी सीता का पुष्पों से श्रृंगार कर रही थीं। उन्होंने राम व लक्ष्मण से पूछा, ”बसंत ऋतु है और चारों ओर पुष्प खिले हैं। क्या भौंरा मकरंद का लोभ नहीं करेगा?’

पहले लक्ष्मण ने उत्तर दिया : ”मेरा पुष्प तो अयोध्या में सो रहा है। वह तो चौदह वर्ष बाद खिलेगा।“

इसके बाद राम बोले, ‘मैं कोई भ्रमर नहीं। न ही मैं कोई तितली हूँ। मैं रघुकुल का वंशज हूँ, जिसे चौदह वर्षों तक वन में तपस्वी की तरह जीवन बिताना है। मेरा मन किसी भी चीज़ से विचलित नहीं होगा।‘

अत्रि सोचने लगे कि क्या वे शब्द उन्हें प्रभावित करने को कहे गए थे या वास्तव में एक युवा राजकुमार के विवेक से फूटे थे, उन्होंने कहा, ‘यदि मन विचलित हो भी जाए, तो स्वयं को दंडित मत करना। केवल मनुष्य ही परख़ करते हैं, प्रकृति ऐसा नहीं करती’

                                 वन में होने वाले वार्तालाप

…सीता का अधिकतर समय मधुमक्खियां, तितलियों व कीटों के निरीक्षण में बीतता। उन्होंने सीखा कि मधुमक्खियों को सताए बिना, वन्य शहद कैसे जमा किया जाए और जब मादा चीता अपने बच्चों को दूध पिला चुकी हो तो बचा हुआ दूध कैसे दोहा जाए। वे हाथियों के झुँड का पीछा कर, जल स्त्रोतों का पता लगा लेतीं, ये वे स्थान थे, जो सुदूर पर्वतों पर केवल महामाताओं को ही ज्ञात थे। उन्होंने प्रवासी पक्षियों व मछलियों के आवागमन को समझा। उन्होंने भालुओं, भेड़ियों तथा गिद्धों से संप्रेषण की कला सीखी…

संध्या समय, जब वे एक स्थान पर अलाव जला कर बैठते, तो वे राम और लक्ष्मण को दिन भर में बीती घटनाओं का विवरण देतीं और उन्हें बतातीं कि उन्होंने क्या-क्या सीखा। ….

….सीता ने दशरथ पुत्रों से कहा, ‘पुष्प स्वयं को सुगंधित बना कर, अपने मकरंद का सेवन करने का आमंत्रण देते हैं, ऐसा क्यों? वे मधुमक्खियों को पोषण देना चाहते हैं, अपना परागण चाहते हैं अथवा दोनों ही कारण सत्य हैं? प्रकृति में, आपको कुछ पाने के लिए कुछ देना पड़ता है। यहाँ कोई दान नहीं मिलता। कोई शोषण, कोई स्वार्थपरता अथवा निःस्वार्थ भाव नहीं। यहाँ एक दूसरे को विकसित होने में सहायक हो कर, स्वयं विकसित होता है। क्या यह संपूर्ण समाज नहीं है?’

राम बोले, ”मैं इन बातों को अलग दृष्टिकोण से देखता हूँ, मैं देखता हूँ कि पादप तत्वों से जीवित हैं, पशु पादप के कारण जीवित हैं और माँसाहारी पशु, शाकाहारी पशुओं को खा कर जीवित हैं। मैं उन्हें देखता हूँ जो खाते हैं और जिन्हें खाया जाता है। जो खाते हैं, उन्हें भय है कि हो सकता है कि उन्हें पर्याप्त मात्रा में न मिले। जिन्हें खाया जा सकता है, उन्हें यह भय सताता है कि उनका उपभोग हो जाएगा। मुझे हर स्थान पर भय दिखाई देता है। किसी भी संपूर्ण समाज में इस प्रकार का भय व्याप्त नहीं होना चाहिए। इसे प्राप्त करना ही सच्चे अर्थों में धर्म है।“

 सारा दिन, जब वे वन में भ्रमण करते, तो सीता राम के पीछे तथा लक्ष्मण के आगे चलतीं। वे किसी का भी मुख नहीं देखती थीं। अनेक वर्षों के दौरान, उन्होंने राम के चौड़े कंघों व पीठ को सराहना सीख लिया था, जो वन प्रवास के दौरान एक बार भी नत नहीं दिखे, उनकी त्वचा का रंग तपते सूरज के कारण साँवला पड़ गया था, अब उनके केश उस प्रकार सुगंधित तैलयुक्त व घुँघराले नहीं थे जैसे महल में हुआ करते थे, अब उनक जटाएँ बनी हुई थीं। लक्ष्मण की दृष्टि सदैव सीता के पदचिन्हों पर रहती। वे उनसे बच कर चलने की चेष्टा करते, उन्होंने देखा कि सीता के पदचिन्ह सदा राम के बाईं ओर, उनके हृदय के निकट होते थे।

एक दिन, सीता ने केले के गाछ के निकट ही बेर का झाड़ देखा। अचानक तेज़ हवा के झोंके की वजह से कांटों ने केले के मुलायम पत्तों को छेद दिया। ”यहाँ अपराधी कौन है? कौन है खलनायक?“ उन्होंने राम से पूछा।

राम बोले, ”कोई भी नहीं, मनुष्य के नेत्र ही वस्तुओं को मोल देते हैं, वे ही प्राकृतिक घटनाओं को संघर्ष व समाधान से भरे, विशाल रोमांचों में बदल देते हैं। यही माया है, मापदंडों के जन्म से उत्पन्न भ्रम!’….

इस प्रकार के वार्तालापों के बीच सीता को उन ऋषियों का स्मरण हो आता, जिनके वार्तालाप वे अपने बाल्यकाल से सुनती आई थीं।….

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