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  • मणिपुर की राजकुमारी और अंग्रेज़ बड़े साहिब की कहानी 

     

    युवा लेखिका प्रदीपिका सारस्वत ने  ‘द प्रिंसेस एंड द पोलिटिकल एजेंट’ पर लिखा है। कुछ बातें उसी किताब से पढ़िए-

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    कई बार किताब को पढ़कर खत्म करते वक्त दिल इतना भारी हो जाता है कि समझ नहीं पड़ता अब क्या करूँ. इन दिनों लगातार कई किताबें पढ़ीं, पर मणिपुरी लेखिका बिनोदिनी की ‘द प्रिसैस एंड द पोलिटिकल एजेंट’ पढ़ने के बाद लगा कि भीतर कुछ फाँस सी बची रह गई. लगा कि यह फाँस और भी बढ़नी चाहिए, यह किताब और लोगों तक पहुँचनी चाहिए.

    मणिपुर के मैतेई राजपरिवार से संबंध रखने वाली एम. के. बिनोदिनी देनी का यह पहला उपन्यास 1976 में मैतेलोन भाषा में ‘बोरो साहेब ओन्ग्बी सानातोंबी’ नाम से छपा. वर्ष 1979 में उन्हें इस किताब के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. पेंग्विन से छपी जिस किताब को मैंने अभी पढ़ा वह उस उपन्यास का अंग्रेज़ी अनुवाद है, जो कि बिनोदिनी के बेटे एल. सोनी रॉय ने किया है. किताब मणिपुरी राजपरिवार की राजकुमारी सानातोंबी और ब्रिटिश सरकार के पोलिटिकल एजेंट मैक्सवैल की वास्तविक कहानी पर आधारित है। एल. सोनी संदर्भ जानते हैं, तो अनुवाद अच्छा बन पड़ा है।

    उपन्यास को नारीवादी उपन्यास कहकर प्रचारित किया गया है पर मुझे लगता है उपन्यास का प्रमुख विषय है स्थान विशेष के लिए प्रेम. सानातोंबी बेशक कहानी की मुख्य पात्र है, पर उस पात्र के केंद्र में मणिपुर, मैतेई जनता और राजपरिवार के लिए उसका प्रेम ही प्रमुख है. दूसरी तरफ कांग्लीपाक पर पहली बार यूनियन जैक फहराने वाला अंग्रेज सैनिक मैक्सवैल है, जिसे मणिपुर की सुंदर धरती, उसकी नदियों, गीतों, पंछियों और सानातोंबी से प्रेम हो जाता है.

    कहानी वर्तानिया सरकार और मणिपुर के संघर्ष की नहीं है. यह सत्ता के लिए लड़ बैठने वाले मणिपुर के राजकुमारों की कहानी भी नहीं है. इस कहानी में कोई भी घटना या पात्र क्रूर नहीं है. लेखिका ने हर एक व्यक्ति और हर घटना को पूरी करुणा के साथ गढ़ा है. कहानी तमाम राजनीतिक उठापठक के बीच फँसे लोगों की है. कहानी को पढ़ते हुए घटनाओं और उनमें शामिल लोगों को बिलकुल अलग-अलग करके देखा जा सकता है. देखा जा सकता है कि दो अलग-अलग दिशाओं के प्रति निष्पक्ष रूप से अनुरक्त हुआ जा सकता है और यह अनुराग जो एक स्रोत से बहकर दो अलग गंतव्यों को जाता है तो स्रोत को कितनी पीड़ा हो सकती है.

    सानातोंबी को मणिपुर से प्रेम है. पर सानातोंबी को मणिपुर के विदेशी प्रशासक से भी प्रेम है. विकल्प होने पर भी वह मणिपुर नहीं छोड़ पाती. पर मैक्सवैल के जाने पर वह जीने की इच्छा छोड़ देती है. किसी व्यक्ति में प्रेम पाने पर हम मान बैठते हैं कि अब सब ठीक हो जाएगा. अपनी तेजस्वी और प्रभावशाली परदादी के सानिध्य में पली-बढ़ी सानातोंबी भी महसूस करती है कि राजमाता सब ठीक कर सकती हैं. उनके चले जाने के बाद वह अपनी स्थिति से बहुत संतुष्ट न होने के बावजूद उसे ही अपना सच मानकर जीना सीखने लगती है. पर मैक्सवैल के आने के बाद उसे एक बार फिर उम्मीद मिलती है.

    यह प्रेम उसे उम्मीद देता है, ताकत देता है, कई तरह की चुनौतियों और नई तरह के अनुभवों से भरा जीवन देता है. पर यही प्रेम उससे जीवन छीन लेता है. कैसे? यह हम कहानी के साथ आगे बढ़ते हुए देखते हैं. हम देखते हैं कि प्रेम किसी समस्या का हल, किसी बीमारी का इलाज नहीं है. वह अपने आप में एक अनुभव है, एक घटना है, जैसे कि अंग्रेज़ों का मणिपुर पर क़ब्ज़ा या मणिपुर के राजकुमारों में सत्ता के लिए संघर्ष. जैसे, सानातोंबी का एक लड़की के रूप में पैदा होना या फिर उसके पिता राजा सुरचंद्र के खिलाफ उनके अपने ही भाइयों का विद्रोह.

    मैक्सवैल से प्रेम में पड़ना सानातोंबी को एक व्यक्ति के तौर पर प्रेम पाने का सुख तो देता है, पर उसे मणिपुर की राजकुमारी के तौर पर मिले अन्य दुखों को कम नहीं कर पाता. इसी तरह मैक्सवैल का मणिपुर से एक करीबी संबंध महसूस करना या उसे सानातोंबी का प्रेम मिलना घटनाएं हैं. इन घटनाओं का असर मणिपुर से उसके प्रशासनिक संबंध पर होता है. पर यह प्रेम उसे मणिपुर और सानातोंबी, दोनों से दूर जाने की सज़ा से बचा नहीं पाता.

    कहानी में हम देखते हैं कि प्रेम एक चीज़ है और जीवन दूसरी. यह अंतर मुझे और साफ इसलिए दिखता है क्योंकि पिछली किताब, चेन ऑस्टिन की प्राइड एंड प्रिजुडिस में एलिज़ाबेथ और मिस्टर डार्सी या फिर जेन और मिस्टर बिंगले की कहानी शादी पर आकर खत्म हो जाती है. ज़्यादातर प्रेम कहानियाँ, हम देखते आए हैं, शादी या साथ आने के बाद खत्म हो जाती हैं. पर बिनोदिनी की कहानी में हम देखते हैं कि और भी ग़म हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा. और ये जो और भी ग़म हैं, वे भी मोहब्बत से ही निकलते हैं.

    कोई तीन साल पहले मैं मणिपुर के इंफाल से गुज़री थी. उपन्यास पढ़ते हुए मैं दुखी होती हूँ कि मैंने कांग्ला क़िला क्यों नहीं देखा. पर जब पढ़ती हूँ कि अंग्रेज़ों ने क़िले के सामने बनी दो मैतेई ड्रैगन प्रतिमाओं को गिरा दिया था, तो मैं सोचती हूँ कि भला किया वहां नहीं गई. मुझे अचानक फ़ोर्ट कोचिन के सेंट फ़्रांसिस चर्च के सामने का पेड़ याद आता है, जो पिछली यात्रा के दौरान वहां नहीं था. मैं सोचती हूँ कि हम अनजान चीज़ों में प्रेम छुपा आने वाले और उनके खो जाने से दुखी होने वाले भावुक लोग हैं. अगर हम ऐसे हैं तो किसी के साथ बुरा कैसे कर सकते हैं? पर यही डिवाइड तो बिनोदिनी के पात्रों में दिखता है. हम भीतर से क्रूर हुए बिना भी क्रूरता करने में सक्षम हैं. हम कांग्ला पर यूनियन जैक फहरा सकते हैं और फिर उसी देश के प्रेम में भी पड़ सकते हैं.

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