भगवानदास मोरवाल के उपन्यास ‘सुर बंजारन’ का एक अंश

एक समय में इस देश में लगने वाले मेलों की ठाठ नौटंकी के बिना अधूरी रहती थी. नौटंकी को गरीबों का सिनेमा कहा जाता था, जिस में गीत-संगीत के साथ कहानी दिखाई जाती थी. नौटंकी विधा को आधार बनाकर भगवानदास मोरवाल ने ‘सुर बंजारन’ नामक उपन्यास लिखा जो वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है. उसी का एक अंश- मॉडरेटर

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जिन दिनों हमारा देश अपने पड़ोसी मुल्क चीन के साथ हुई जंग में मिली शिकस्त के रंज-ओ-ग़म में डूबा हुआ था l उसी चीन के साथ हुई जंग में, जिसमें उसकी लाल सेना असम के तेज़पुर तक आ पहुंची थी, और हमारा सबसे बड़ा फौजी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल असम से भागकर दिल्ली आकर छिप गया था। उस जंग में जिसमें हथियारों से कम, हिमालय की गगन चुंबी चोटियों पर लहू जमा देने वाली ठण्ड से कहीं ज़्यादा हमारे जवान शहीद थे, और इसमें मिली इस शिकस्त ने आज़ाद हिन्दुस्तान के पहले वज़ीर-ए-आज़म के माथे पर हिंदी चीनी,भाई-भाई  जैसे नारे को हमेशा के लिए एक कलंक की तरह चस्पाँ कर दिया था l उन्हीं दिनों डायरेक्टर सूरज प्रसाद शर्मा एक दिन यूँ ही, घूमते-फिरते इस छोटे-से शहर की अलसायी-सी गलियों में निकल गये l उन्हीं उदास और अलसायी गलियों में, जिनके अधखुले दरवाज़े-खिड़कियों के पीछे पसरे अनंत मटमैले उजास में गाहे-ब-गाहे कोई अदृश्य उदासी भी खंखारती, तो लगता जैसे किसी शीशा पिघलाने वाली सुर्ख़ भट्टी से, ताज़ा-ताज़ा बाहर आयी कोई बदनसीब ठण्डी चूड़ी खनक रही है l अभी वे इसकी एक उनींदी-सी गली, रहट गली में दाख़िल हुए ही थे, कि एक अधखुली खिड़की से एकाएक उनके कानों में कुछ कमसिन-से सुर पड़े l हिन्दुस्तान थिएटर के डायरेक्टर के आगे बढ़ते क़दम वहीं ठिठक गये l वे धीरे-से दबे पाँव खिड़की के पास आये और अन्दर से आ रही आवाज़ को ध्यान से सुनने लगे –

                                      घायल हिरनिया मैं बन-बन डोलूँ          

                                      किसका लगा बाण मुख से न बोलूँ

इतने सधे बोलों को सुन सूरज प्रसाद शर्मा जैसे इनके पाश में बँधते चले गये l काश, यह आवाज़ हिन्दुस्तान थिएटर में शामिल हो जाए l नहीं रुका गया उनसे l वे दरवाज़े पर आये और उनका हाथ दरवाज़े को खटखटाने के लिए बढ़ गया l

          दरवाज़ा खुला l इसे पहले कि वे कुछ कह पाते, अन्दर से एक बेजान-सी काँपती जनानी आवाज़ आयी,”माला कौन है ?”

          “पता नहीं जिया कौन है !” सामने खड़े एक अजनबी को देख लड़की ने जवाब दिया l

          इसी बीच पुरानी धोती लपेटे एक बारह-तेरह वर्षीय साँवले रंग की किशोरी भी आकर खड़ी  हो गयी l

“बेटी, मैं अन्दर आ जाऊँ ?” दरवाज़े के बीचों-बीच खड़े हिन्दुस्तान थिएटर के डायरेक्टर ने माला से पूछा l

न चाहते हुए माला दरवाज़े से एक तरफ़ हट गयी l इस बीच जिया भी अन्दर से आ गयी l जिया ने सवालिया निगाहों से इस अजनबी की तरफ़ देखा l अजनबी समझ गया जिया का इस तरह देखने का मतलब l

“मेरा नाम सूरज प्रसाद शर्मा है l आपके शहर में जो हिन्दुस्तान थिएटर आया हुआ है, उसका डायरेक्टर हूँ l इधर से गुज़र रहा था तो भीतर से किसी की आवाज़ सुन रुक गया l” सूरज प्रसाद शर्मा ने अपने आने की वजह बतायी l

“अरे भाई साब, यह होगी l पता नहीं मरी क्या-क्या गाती रहती है l” जिया ने पास में खड़ी,  पुरानी धोती में लिपटी उसी बारह-तेरह वर्षीय किशोरी की तरफ़ देखकर कहा l

“जो भी है, पर गाती बहुत अच्छा है l गला और सुर दोनों बड़े सधे हुए हैं l” इतना कह सूरज प्रसाद शर्मा चुप हो गये l फिर थोड़ा रुक कर बोले,”बहन जी, आपसे एक गुज़ारिश है…यानी मेरा आपके लिये एक ऑफ़र है !”

जिया अपलक सामने खड़े अजनबी को देखती रही l कुछ नहीं समझी कि सामने वाला क्या कह रहा है l थोड़ी हिम्मत बटोरी और झिझकते हुए बोलो,”मैं कुछ समझी नहीं ?”

“बहन जी, मेरा कहने का मतलब यह है कि मैं आपकी इस लड़की को अपने थिएटर में लेना चाहता हूँ l”

“ क्याSSS?” जिया ने अकबकाते हुए अपने क़दम पीछे खींचे l

”नहीं-नहीं, ऐसी कोई ज़ल्दी नहीं है l घर में आराम से सलाह-मशविरा कर लीजिए l अभी इस इलाक़े में हमारा थिएटर ढाई-तीन महीने और रहेगा l आगरा, हाथरस, फ़िरोज़ाबाद, सिरसागंज और जसराना में कई शो करने हैं l” सूरज प्रसाद शर्मा ने किसी भी तरह की ज़ल्दबाजी न दिखाते हुए आगे कहा,“वो क्या है बहन जी कि हमारे पास जितने भी कलाकार हैं, उनके पास अदाकारी तो पर गला नहीं है l अगर हमारे पासSSS आपकी यह लड़की…”

“भाई साब, आSSSप यह क्या कह रहे हैं ?” जिया के शब्द उखड़ने लगे l

“आराम से सोच लो l मुझे कोई ज़ल्दी नहीं है l वैसे मैं बीच-बीच में आपसे मिलता रहूँगा l” बीच-बीच में आने की बात कह कर हिन्दुस्तान थिएटर के डायरेक्टर सूरज प्रसाद शर्मा जैसे आये थे, वैसे ही चले गये l

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