पहचान के जो मायने स्त्रियों के लिए हैं क्या पुरुषों के लिए भी वही हैं? निश्चित ही नहीं। पुरुषों के पास उनके व्यक्ति होने की पहचान शुरु से है, इसके अलावा उन्हें और पहचान बनानी होती है लेकिन स्त्रियों के साथ पहला संघर्ष यही है कि उन्हें सबसे पहले एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में पहचाना जाए तब वे अपने जीवन के लिए कुछ कर सकती हैं। लेकिन इसमें कितनी अड़चनें आती हैं इसकी एक बानगी महेश कुमार की कहानी ‘पहचान’ में मिलती है। युवा आलोचक महेश कुमार की यह पहली कहानी, अब आप सबों के सामने है- अनुरंजनी
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पहचान
रक्षित को लगभग दो साल बाद अचानक से संचिता का फेसबुक पोस्ट दिखा। कैप्शन था ‘मूव्ड हैप्पली टू जर्मनी विथ हसबैंड’। सेल्फी में पति और नवजात बच्ची की तस्वीर थी। पति मुस्कुरा रहे थे। पेट निकला हुआ और बाल हल्के पके हुए। उम्र का फासला पता चल रहा था। वह भी मुस्कुरा रही थी। शादी के बाद उसका वजन भी बढ़ा है और गाल बेहद फूले हुए हैं। पिछली बार उसने जब कॉल किया था तब जून का महीना था। साल 2024। “हेलो..ओ.. ओ, हाँ, बोलिए । अरे एक सरप्राइज देना था आपको। मैं शादी कर रही हूँ। …क्या ??अचानक???कब मतलब क्यों इतना जल्दबाजी में..???? अरे दादा एक लड़का देखे हैं। उनके दोस्त हैं। कॉलेज में पढ़ाते हैं। कह रहे थे कबतक अकेली रहोगी। लड़का अच्छा है I पढ़ाई आगे भी करती रहना। मैंने भी हाँ कह दिया। अब मैं भी ऊब गयी हूँ। आपको ही बस शादी में बुला रही हूँ मित्रों में।” रक्षित सुन रहा था और भीतर ऐसा लग रहा था कि कुछ दरक रहा है। कोई विश्वास की डोरी थी जो टूट गई। खुद को नियंत्रित करते हुए बस इतना ही कहा “पति की उम्र क्या है?” उधर से थोड़ा हिचक के साथ ही जवाब आया “होंगे मुझसे दस-बारह साल बड़े।”
उसके इस झूठ को सुनकर रक्षित का पूरा देह काँप गया। उसके दादा (रक्षित के लिए सुमित भैया) ही उससे चौदह साल बड़े हैं। जल्दबाजी में इतना ही कहा… “छुट्टी नहीं है, नहीं आ पाऊँगा,शादी मुबारक” और फोन रख दिया। फिर कभी बात नहीं हुई।
आज तस्वीर देखकर पहली मुलाकात से शादी तक की बातें याद आती रही। साल 2021 और दिसंबर महीने की बात थी जब वह पहली बार मिला था उससे। शहर जयपुर। एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने गया था। वहीं रहते थे सुमित भैया। उनसे मिलने चला गया। भैया ने किसी को कॉल किया। कुछ देर बाद एक लड़की आयी। भैया परिचय कराते हुए बोले “मिलो इससे, ये संचिता है। अभी-अभी सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार, गया से एम.ए. की है हिन्दी में। मोतिहारी की है। नेट की तैयारी में लगी है। तैयारी के संबंध में इसे कुछ बता दो और संपर्क में रहना।” उसने संचिता की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा “जी मैं रक्षित। पी-एच.डी.की तैयारी कर रहा हूँ। समस्तीपुर का रहने वाला हूँ। कोशिश में हूँ कि किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय में हो जाए।” इसके बाद उनके बीच ई-मेल का आदान-प्रदान हुआ। बात आई-गई हो गयी। बस एक उत्सुकता मन में रह गयी कि बिहार की कोई विद्यार्थी केवल नेट की तैयारी के लिए जयपुर में क्यों रह रही है? इस प्रकरण के लगभग छह महीने बाद एक दिन संचिता का मेल आया जिसमें नेट की तैयारी के लिए नोट्स की माँग की गई थी और साथ में व्हाट्सएप नंबर भी आया। रक्षित के पास जो भी था वह सब व्हाट्सएप पर भेज दिया। अगली बातचीत 2022 में नेट की परीक्षा के बाद हुई। उसने बताया कि इस बार नहीं हो पाया। रक्षित ने तैयारी संबंधित और बातें की और अगली बार हो जाएगा इसका आश्वासन देकर फ़ोन रख दिया। बीच-बीच में पढ़ाई संबंधित बातें होती रही। इस बीच रक्षित को दिल्ली विश्वविद्यालय में पी-एच.डी.में प्रवेश मिल गया। फिर आया साल 2023, महीना फरवरी का। इस बार शहर पटना। यहाँ भी रक्षित एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आया था। शाम का समय था। एक पुरानी किताब की दुकान में कुछ पुरानी किताबें पता कर रहा था। तभी कॉल आया। “हेलो, मैं संचिता। मैं अभी महेंद्रू घाट के पास हूँ। पता चला आप भी पटना आए हैं। मैं भी कार्यक्रम में रहूँगी। सुमित दादा के साथ आई हूँ। आइए अभी मिलते हैं चाय पर।” रक्षित ने “ठीक है दस मिनट लगेगा” बोलकर कॉल काट दिया। जल्दी-जल्दी ऑटो पकड़कर महेन्द्रू तक आया। घाट पर बैठे, चाय पी और कल मिलने का वादा करते हुए अपने होटल की ओर चल दिया। दूसरे दिन साथ में रहे, साथ में खाना खाए और कुछ इस बात पर निराश हुए कि लोग साहित्यिक आयोजनों में तैयारी करके नहीं आते। युवाओं को बोलने के लिए पाँच मिनट दिया जाता है और मुख्य वक्ता विषय को छोड़कर बाकी सब बातें करते हैं। इस बात पर भी चर्चा हुई कि आजकल सभा-सेमिनार में विषय पर तैयारी से ज्यादा; कपड़ा क्या पहनें और ज्यादा सुंदर कैसे दिखें इसकी तैयारी वक्ता ज्यादा करके आते हैं। इसके कारण क्या हो सकते हैं? संचिता का मानना था कि जब लोग ढंग से पढ़ना-लिखना छोड़ देते हैं तो अपनी कुंठा और अयोग्यता छिपाने के लिए तड़क-भड़क का सहारा लेते हैं। कई बार यह प्रयोग सफल भी रहता है। सेमिनार खत्म होने के बाद दोनों अपने-अपने कमरे की ओर चले गए। रात दस बजे संचिता का कॉल आया। घबराहट और डर के मारे उसकी आवाज टूटकर आ रही थी।
“र…क्षी…त जीईईई जल्दी आ जाइए मेरे कमरे में।” “अरे…. आप तो दूसरे होटल में रुकी हैं न?”
“नहीं आपके होटल में ही रुकी हूँ सुमित दादा के कमरे में। वो अपने दोस्त के यहाँ गए हैं आज। आप बस जल्दी आइये कमरा नंबर 216 में।”
वह भागा-भागा गया। कमरा खटखटाया तो जितनी तेजी से दरवाजा खुला उतनी ही तेजी से बन्द हुआ। वो बस रोए जा रही थी। पूछने पर जो उसने बताया वह इस तरह है :- कार्यक्रम के बाद सुमित दादा और उनके एक दोस्त का पीने का प्लान बन गया। दादा ने मुझसे पूछा। मैंने भी हाँ कह दिया। शाम को सात बजे से दादा के दोस्त के कमरे में ही पीने की व्यवस्था की गई। साढ़े आठ तक दादा चले गए। उनके दोस्त के व्यवहार अचानक से बदलने लगा। कहने लगा कि पीने के बाद साथ में नहाते हैं और तुम मेरे ही कमरे में रुक जाओ। मैं एकदम से जड़ हो गई कुछ सेकंड के लिए। फिर स्थिति संभालते हुए मैंने कहा कि मैं अपने कमरे में जा रही हूँ। आपको इस तरह की बात नहीं करनी चाहिए। उसके बाद मैं जल्दी से वहाँ भागते हुए कमरे में आई। पीछे-पीछे वह मेरे कमरे तक आ गया। कहने लगा सुमित को मत बताना। इतना बोलते-बोलते वह जोर से रोने लगी। हिचकी लेते हुए कहने लगी “खुद को लेखक कहता है। सेमिनार में कितनी संवेदनशील बातें कह रहा था। रात होते ही एक अकेली लड़की को दारू पीते देख उसकी हवस कैसे बाहर आ गई! ये लेखक लोग कैसे यह सब मैनेज कर लेता है। मुझे घिन्न आ रही है। ऐसा नहीं है कि मैंने सेक्स नहीं किया है। लेकिन, इस तरह किसी लड़की को लेबलिंग करके उपलब्ध समझना यह लेखकों का ही नहीं पुरुषों का घटियापन है!!” रक्षित बस सुनता रहा और उसके बालों को हल्का-हल्का सहलाते रहा। साढ़े ग्यारह बजे जब वह चलने को हुआ तो संचिता ने कहा कि यहीं सो जाइए। मुझे आप पर भरोसा है। फिर रक्षित रात भर उसी कमरे में रुका। संचिता को डर था कि वह फिर न आ जाए। उस रात रक्षित बिस्तर के एक किनारे पर कई तरह के विचारों की दुनिया में आवाजाही कर रहा था। वह एक कस्बाई लड़का था। बारहवीं तक किसी लड़की से बात नहीं हुई। बी.ए. और एम.ए. में बस नोट्स लेने-देने तक ही लड़कियों से वास्ता रहा। कस्बों में लड़का-लड़की दोस्त नहीं होते। होते भी हैं तो इतनी अफवाहें तैरती हैं कि या तो वे प्रेमी-प्रेमिका हो जाते हैं या फिर दोस्ती खत्म हो जाती है। इससे ज्यादा खराब होता है कि लड़की किसी की ‘माल’ बना दी जाती है। रक्षित के ज्यादातर दोस्त ऐसे ही रहे हैं। उसे पहली बार एहसास हो रहा था कि लड़का-लड़की दोस्त हो सकते हैं। एक कमरे में रहते हुए सहज रह सकते हैं और लड़की एक लड़के के साथ सुरक्षित महसूस कर सकती है। यह नई दुनिया में प्रवेश करने जैसा था। एक झटके में कई पूर्वग्रह टूट गए। स्त्री-पुरूष का एकांत केवल यौन इच्छा की पूर्ति के लिए नहीं है। इतनी सहज बात जिसे दुनिया इतनी असाधारण बताती है, एक झटके में उसे समझ में आ गया। ब्रह्मचर्य और वीर्य रक्षा के सारे सिद्धांत और आडम्बर धराशायी हो गए। रक्षित के भीतर के ‘पुरूष’ में उस रात थोड़ा ‘स्त्रैण’ का निर्माण हुआ। यही सब सोचता हुआ कब आँख लग गई उसे पता नहीं चला। आँख खुली जब संचिता ने हौले से माथा सहलाते हुए उठाया। वह सामने कॉफी का कप लिए खड़ी थी। दोनों ने साथ में कॉफी पी और फिर रक्षित अपने कमरे में चला गया। रात वाली घटना के बारे में फिर आगे क्या हुआ कोई चर्चा नहीं हुई। न संचिता ने कुछ बताया न रक्षित ने कुछ पूछा। शाम को सात बजे मैसेज आया कि वह जयपुर वापस जा रही है। रक्षित ने बस ‘शुभ यात्रा-सुरक्षित यात्रा’ का रिप्लाई किया। दो दिन बाद रक्षित भी वापस आ गया दिल्ली। कुछ दिनों बाद रक्षित ने ही मैसेज किया।
“हेलो! संचिता। आप कैसी हैं?”
जवाब आया “ठीक हूँ।आप कैसे हैं?”
“मैं ठीक हूँ। आपसे कुछ पूछूँ?”
“हाँ-हाँ, पूछिए!”
“आप पढ़ाई गया के केंद्रीय विश्वविद्यालय में की है। रहने वाली मोतिहारी की हैं। फिर जयपुर में क्यों रहती हैं? वहाँ से नेट की तैयारी क्यों कर रही हैं?”
“अब क्या बताऊँ? आपको दोस्त मानती हूँ। बताती हूँ। मैं घर की बड़ी बेटी हूँ। दो भाई हैं। मैं बचपन से पिताजी की दुकान में बैठती थी। घर-दुकान दोनों काम सीखती गई। पढ़ना चाहती थी तो गया आ गई। साथ में भाईयों को भी भेजा गया। ग्रेजुएशन पूरा भी नहीं हुआ कि घरवाले शादी का दबाव बनाने लगे। इधर गया में मेरे कुछ दोस्त बन गए थे। कमरे पर जरा भी देर पहुँचती तो भाई मारपीट भी करते थे और घर में भी कान भरते। एम.ए. में किसी तरह नामांकन लिया यह कहकर कि पूरा होते ही शादी कर लूँगी। इस बीच मैं घबराती और तड़पती थी कि कैसे इन सबसे पार पाऊँ? इस बीच मेरा एक अच्छा दोस्त बना। उसी से अपनी बात कहती थी। उसके बारे में किसी ने मेरे भाइयों को बता दिया। उनलोगों ने मुझे रात में कमरे से बाहर कर दिया। मेरा सामान फेंक दिया। मैं दो दिनों तक अपने एक दोस्त के यहाँ रही। इन परिस्थितियों को झेलते हुए एम.ए. की परीक्षा दी। इसी बीच सुमित दादा से मुलाकात हुई। विश्वविद्यालय में ही एक सेमिनार में आए थे। उनसे अपनी बात कही। उन्होंने कहा कि जब न सह पाओ तो जयपुर आ जाना। संपर्क में रहना। इधर शादी का दबाव बढ़ता जा रहा था। एक लड़का मिल गया था। मल्टी नेशनल कंपनी में काम करता था। अच्छा कमा रहा था। मुझसे दस साल बड़ा था। घरवालों को पसंद था। मुझे नहीं था। मैंने मना किया। ये लोग मुझे जबर्दस्ती घर ले जाना चाहते थे। भाइयों को इसके लिए काम पर लगाया गया। मैं चुपचाप एक दिन अपने बैग में कपड़े और कुछ किताब लेकर जयपुर आ गई। सुमित दादा को कॉल किया। उन्होंने ही सारी व्यवस्था कराई। तबसे जयपुर रह रही हूँ। सिम और बैंक एकाउंट बन्द कराना पड़ा ताकि घरवाले मेरे बारे में पता न कर सकें। सुनने में आया है कि मेरी गुमशुदगी का रिपोर्ट लिखाया गया है। यह भी कि मिल जाए तो सबके सामने उसे मार देंगे ताकि पता चले कि इज्जत जाने की कीमत क्या होती है!!”
रक्षित को सुनकर सदमा भी लगा और संचिता के लिए सम्मान भी जगा कि अपनी पहचान और आजादी के लिए यह लड़की कितना संघर्ष कर रही है! इसके बाद दोनों की बात नियमित होने लगी। रक्षित ने जरूरी किताबों की सूची बनाकर और कुछ किताबें खरीदकर जयपुर भेज दिया। वहाँ हिन्दी किताबें आसानी से नहीं मिलती हैं। रक्षित सोचता कि पता नहीं खर्च कैसे चलाती है? लेकिन स्वाभिमान को चोट न पहुँचे इसलिए पूछता भी नहीं था। वह नियमित परीक्षा से संबंधित सवाल पूछता और न बताने पर डाँटता भी। इस बीच उसे जयपुर में भी उसे दो बार घर बदलना पड़ा। लोग बार-बार यह पूछते थे कि तुम घर क्यों नहीं जाती? तुमसे घर वाले मिलने क्यों नहीं आते हैं? शादी कब करोगी? जयपुर में क्यों रह रही हो? यह पूछताछ जब ज्यादा बढ़ती तो उसे घर बदलना पड़ता। तीसरी बार उसने ऊबकर जयपुर ही छोड़ दिया। गाजियाबाद आ गई। इस बीच वह परीक्षाएँ देती रही। सफलता नहीं मिली। उसका धैर्य भी जवाब दे रहा था। धीरे-धीरे उसने बातचीत कम कर दी। रक्षित भी अपनी तैयारी में व्यस्त हो गया था। कभी-कभी मैसेज और कॉल करता था। संचिता अनमने ढंग से उत्तर देती। फिर रक्षित ने भी बातचीत कम कर दी। एक दिन संचिता का कॉल आया। तारीख 12 मार्च 2024। उधर से निवेदन मिश्रित आदेश की तरह कहा गया कि “22 मार्च को पूरी आ जाइए । आपके साथ एक बार समुद्र देखना चाहती हूँ। पता नहीं फिर मिल भी पाऊँगी की नहीं!” रक्षित को कुछ समझ नहीं आया बस उसने कहा “ठीक है आ जाऊँगा।” 22 मार्च को रक्षित पूरी में था। दो दिन आसपास के समुद्री तटों को देखते हुए बीता। उन दो दिनों में वह खुश दिखने की भरपूर कोशिश करती रही। अपने पसन्द के कपड़े पहने, ढेर सारी और ढेरों पोज में फ़ोटो खिंचवाए। रक्षित जान रहा था कि वह खुश नहीं है लेकिन उसने कुछ भी नहीं पूछा। लौटते हुए संचिता ने इतना ही कहा “आप मेरे सबसे अच्छे दोस्त हैं। शादी सोच समझकर करिएगा।” रक्षित हल्का मुस्कुराया और हाथ मिलाते हुए ट्रेन में बैठ गया। वह उन दोनों की आखिरी मुलाकात थी। उसके बाद संचिता की शादी का कॉल आया था और आज दो साल बाद उसकी पारिवारिक तस्वीर दिखी। रक्षित बेचैन हो गया। रहा नहीं गया तो मेसेंजर में पूछ बैठा- “क्या हाल है? कैसा चल रहा है जीवन? पढ़ाई चल रही है?”
दस मिनट बाद जवाब आया “बढ़िया है जी! पढ़ाई छोड़ दी मैंने।”
“क्यों छोड़ दी?”
“अरे क्या कहें! शादी के बाद इनके घरवाले बच्चे का दबाव बनाने लगे तो करना पड़ा तुरंत ही। इसी बीच इनकी नौकरी जर्मनी में हो गई तो साथ में आना पड़ा। वैसे भी अब पढ़ाई क्या ही होगा हमसे? ये अच्छा पैसा कमाते हैं। मैं पत्नी बनकर ही अब खुश हूँ। अच्छा! आपसे बाद में बात करती हूँ। वो आ गए हैं उनको खाना देना है।” रक्षित केवल हरे डॉट का ग़ायब होना देखता रह गया।

