कुछ महीने पहले प्रसिद्ध कवि-लेखक-चिंतक उदयन वाजपेयी के उपन्यास ‘क़यास’ का अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। ब्लूम्सबेरी से इसका अंग्रेज़ी अनुवाद ‘Love Is Participation in Eternity’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है और इसका अनुवाद किया है प्रसिद्ध लेखिका-पत्रकार, फ़िल्म विशेषज्ञ और हिन्दी की कुछ अच्छी किताबों की अनुवादक पूनम सक्सेना ने किया है। इसी अनुवाद पर यह टिप्पणी लिखी है कुमारी रोहिणी ने। रोहिणी कोरियन भाषा की विशेषज्ञ और अनुवादक हैं। आप यह टिप्पणी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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उदयन वाजपेयी से मेरा परिचय पहले एक कवि के रूप में हुआ था। हालाँकि मैंने उनकी पहली कृति जो पढ़ी वह थी उनका कहानी-संग्रह ‘पिराउद’। उस कहानी संग्रह का कुछ तो ऐसा असर हुआ कि जब-तब उनके लिखे की याद आती रही। कहने का मतलब कि उन कहानियों और उनकी भाषा ने पीछा नहीं छोड़ा बल्कि साथ बनी रही। इस लालच में ही मैंने उनके उपन्यास ‘Love Is Participation in Eternity’ को पढ़ना शुरू किया।
इस किताब को पढ़ते हुए मुझे इस सवाल का जवाब मिला कि आख़िर इस उपन्यास को एक कवि का गद्य कहना क्यों प्रेफ़र किया जाता रहा है। दरअसल, इसकी भाषा आपको साफ़-साफ़ बताती है कि इसे लिखने वाला कोई उपन्यासकार नहीं बल्कि एक संवेदनशील कवि है।
इस उपन्यास की कहानी सुदिप्त नाम के कैरेक्टर के इर्द-गिर्द घूमती है। सुदिप्त एक छोटे से क़स्बे में अकार उस के लगभग बंद हो चुके एक पब्लिक लाइब्रेरी को अपनी मेहनत-लगन और जुनून से वापस खड़ा कर दिया है। इस लाइब्रेरी के फिर से सक्रिय हो जाने से उस जगह के लोगों के जीवन में उथल-पुथल मच जाती है। लेकिन तभी कहानीकार फ़ैसला लेता है कि सुदिप्त की हत्या हो जानी चाहिए, सो उसकी हत्या हो जाती है। इस पूरे उपन्यास में लेखन ने सुदिप्त को किसी शहर विशेष से जुड़ा हुआ नहीं बताया है। उसे बस एक ऐसे व्यक्ति के रूप में रचा गया है जो कहीं बाहर से एक छोटे कस्बे में आता है और वहीं का होकर रह जाता है। हालाँकि बाद के एक अध्याय में अलीम ने उसे पेरिस से आया हुआ कहा है लेकिन वह भी इतने हल्के ढंग से कि यह जानकारी पढ़ते हुए दिमाग़ में ठहरती ही नहीं। जगह का नाम यूँ अनाम रहने देना अनायास नहीं बल्कि एक सायास प्रयास लगता है। ताकि सुदिप्त किसी एक शहर या भूगोल तक सीमित न रहे, बल्कि वह हर उस “बाहर से आए” व्यक्ति का प्रतीक बन सके जो किसी जगह को अपनी उपस्थिति, अपने काम और अपने रिश्तों से अर्थ देता है और अपनी एक नई पहचान गढ़ता है।
सही मायने में यह उपन्यास सुदिप्त की हत्या के बाद ही शुरू होता है। और जल्द ही यह बात समझ में आ जाती है कि यह किताब किसी ‘Whodunit’ वाले एंगल से आगे नहीं बढ़ने वाली है।
दरअसल, इस उपन्यास में लेखक ने हत्या से ज़्यादा उसके बाद खुलने वाली स्मृतियों, यादों, उससे जुड़ी आशंकाओं, रिश्तों और मन के अँधेरे-उजले कोनों की कहानी कही है। सुदिप्त की पत्नी मृदुला, बेटी नोआ, दोस्त वंदना, उसका परिवार, नौकर लखना, लाइब्रेरी में काम करने वाला अलीम, किशोर, सुशीला, सांवली, वीणा, बिद्दू हर कोई अपनी-अपनी तरह से सुदिप्त को याद करता है, उसके साथ अपने रिश्ते को टटोलता है। और इन सब के बीच उन सभी के मन में कहीं न कहीं शक भी साथ चलता रहता है।
लेकिन उनके मन का यह शक सुदिप्त की हत्या से जुड़ी किसी जाँच का हिस्सा नहीं बनता। बल्कि इंसानी मनोविज्ञान को स्पष्ट और उजागर करता है।
इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताक़त ही यही है कि न तो इसका कोई पात्र गवाही देता है और न ही किसी तरह का झूठ ही कहता-सुनता है। लेकिन उन सबके कहे-सुने में उन सब का अपना-अपना सच शामिल होता है। इनके ही तमाम सच को मिलाकर लेखक सुदिप्त की एक जटिल, मानवीय लेकिन पूरी तस्वीर रचता है। इस उपन्यास को पढ़ते हुए आपको रोशोमन इफ़ेक्ट भी बार-बार याद आता है। जिसमें सब कुछ सही होने के बावजूद भी अधूरा होता है।
यहाँ पात्र के संवाद एक-दूसरे के साथ सहजता से बहते चले जाते हैं। उनके संवादों से यह सवाल नहीं उठता कि “कौन झूठ बोल रहा है?” बल्कि मन में यह प्रश्न करने लगता है कि “हम सच को कितनी दूर तक देख सकते हैं?”
सबसे ज़्यादा मार्मिक हिस्सा सुदिप्त की बेटी नोआ वाला है। नोआ एक ऐसी छोटी बच्ची है जिसे इस बात की समझ ही नहीं कि उसके ‘बाबा’ के लौटकर न आने का क्या मतलब है।
वहीं सुदिप्त के नौकर लखना का चरित्र भी देर तक साथ रहता है। लखना गरीब है, उसके घर में नौकरी करता है और इसलिए हत्या का सबसे पहला शक उस पर ही आ जाता है। यह एक ऐसी बात है जो हमारे सामाजिक ढांचे और परिवेश को देखते हुए चौंकाती नहीं है। यह इंसानी प्रवृत्ति है या शायद बन गई है कि ग़रीब होने का मतलब ही है पहली नज़र में अनैतिक, बेईमान और अपराधी मान लिया जाना! यही मानसिकता है जिसके कारण लखना शक के घेरे में आने वाला और फिर पुलिस की मार खाने वाला सबसे पहला आदमी बन जाता है। लेकिन अपने प्रति हुए इस अन्याय के बावजूद भी अपने मालिक और उसके परिवार के प्रति लखना की निष्ठा में रत्ती भर कमी नहीं आती है।
एक जगह सुदिप्त की उ लाइब्रेरी में काम करने वाला अलीम कहता है कि मौत से जीवन नाम की किताब बंद या पूरी नहीं हो जाती, बल्कि उसके बाद ही व्यक्ति की सारी कहानियों के दरवाज़े खुल जाते हैं। हालाँकि अलीम बड़ी सहजता से अपनी यह बात दर्ज करता है लेकिन उसकी यह बात इस पूरे उपन्यास की आत्मा बन जाती है।
पढ़ते-पढ़ते कभी-कभी उपन्यास बोझिल और लेन्दी सा लगने लगता है। प्रकृति से जुड़े रूपकों के अधिकाधिक प्रयोग से कभी-कभी ऊब भी होने लगती है।लेकिन कुछेक पन्नों तक धीर धरने के बाद फिर से उसी प्रवाह में लौट आते हैं। भाषा की काव्यतमकता, कहानी कहने की शैली और कहानी दोनों पर हावी हो जाती है, फिर आपको याद आता है कि यह एक कवि का उपन्यास है और वह खटकने वाला एहसास ग़ायब हो जाता है।
कुल मिलाकर अंत तक जाते-जाते यह स्पष्ट हो जाता है कि भले ही लेखक ने इसके केंद्र में हत्या को रखा है लेकिन वास्तव में यह हत्या की बात न करके इंसानी रिश्तों का चित्र खींचती है।
इस उपन्यास में आपको प्रेम अपने संकुचित और सीमित नहीं बल्कि व्यापक और वृहद अर्थों में समझ में आता है। आप समझते हैं कि प्यार नाम की यह शै न केवल शादी-शुदा जीवन है न ही केवल छोड़-छिपे किया गया रोमांस ही।
अपने इस उपन्यास में लेखक प्रेम के जिस रूप से आपका परिचय करवाता है वह जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है। जीवन में उसकी अपनी भूमिका और भागीदारी दोनों है। अपनी इसी भूमिका में यह प्रेम सिखाता है कि हमें एक दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए एक दूसरे की स्मृति में बने रहना चाहिए।
उपन्यास का मुख्य पात्र सुदिप्त इसलिए महत्तपूर्ण नहीं है क्योंकि उसकी हत्या हो गई है बल्कि पूरी कहानी में उसकी महत्ता और उपस्थिति इसलिए बनी रह गई है क्योंकि उसने अपने जीवन में आए तमाम लोगों के ज़ेहन में अपनी जगह बनाई थी। मृदुला, नोआ, वंदना, लखना, अलीम सबके हिस्से का सुदिप्त उनके पास था और वे सब भी सुदिप्त के जीवन में वैसे ही मौजूद थे।
Love Is Participation in Eternity (क़यास) को पढ़ते हुए यह महसूस होता है कि इसे लिखने वाले को लोगों से, उनके अंतर्विरोधों से और प्रेम करने के उनके अनूठे तरीकों से गहरा लगाव है। यह एक ऐसी किताब है जिसे पढ़ते हुए लगता है कि लिखने वाले ने जीवन की बारीकियों को बहुत ध्यान से देखा है। और शायद, बहुत प्रेम से भी।
इस उपन्यास में उदयन वाजपेयी कथाकार की भूमिका में नहीं, बल्कि एक सोचते हुए मनुष्य की तरह लगातार बने रहते हैं। ऐसा लगता है कि वे पाठक से कुछ साबित करने नहीं आए हैं। वे केवल अपने सवालों के साथ बैठे हैं और पढ़ने वाले को भी उन्हीं सवालों के साथ बैठने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
जहाँ उनके कहानी-संग्रह पिराउद को पढ़ते हुए मुझे कभी-कभी एक तरह का आनंद भी मिला था जिसका मैंने ऊपर भी ज़िक्र किया है, वहीं इस उपन्यास में ऐसा लगता है मानो लेखक ने अपनी उस राइटिंग कैरेक्टरिस्टिक को संदिग्ध बना दिया है। यह उपन्यास आपको सहज नहीं रहने देता। यह आपको बार-बार याद दिलाता है कि जीवन में बहुत कुछ ऐसा है जिसे हम केवल अनुमान के सहारे ही समझ सकते हैं। रिश्ते, प्रेम, स्मृति, पहचान, सब कुछ एक तरह का क़यास ही तो है।
इस उपन्यास ने मेरी इस सोच को और पुख़्ता किया कि साहित्य केवल अभिव्यक्ति का माध्यम भर नहीं है बल्कि एक नैतिक और बौद्धिक ज़िम्मेदारी भी है। और उस ज़िम्मेदारी में विषय-वस्तु, पटकथा, चरित्रों-पात्रों का चयन, उनका परिवेश, उनका बर्ताव-व्यवहार और उनकी भाषा सब शामिल होते हैं। साहित्य एक माध्यम है जिसके सहारे आप तेज़ी से भाग रही अपनी दुनिया में कुछ पल ठहरने की कोशिश करते हैं। और Love Is Participation in Eternity इसे एक हद तक सही मानती हुई लगती है।
मेरे लिए यह उपन्यास कोई आसान किताब नहीं रही। मैं इसे किताबों की अपनी उस सूची में रख रही हूँ जिन्हें पढ़ लेने के बाद आप भीतर से थोड़े बदल जाते हैं। यह उपन्यास धीरे-धीरे असर करता है, ठीक वैसे ही जैसे कोई पुरानी कोई याद अचानक किसी दिन बिना बुलाए लौट आती है। मैंने अब तक इनका लिखा जितना भी पढ़ा है उससे इसी निष्कर्ष पर पहुँची हूँ कि उदयन वाजपेयी के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता है संभवतः यही है कि वे शोर नहीं करते, लेकिन देर तक सुनाई देते रहते हैं और दूर तक आपके साथ चलते हैं।
मैंने यह किताब अंग्रेज़ी में, पूनम सक्सेना के अनुवाद में पढ़ी है। पढ़ते हुए एक भी पल ऐसा नहीं आया जब यह महसूस हो कि मैं किसी दूसरी भाषा की कृति से होकर गुजर रही हूँ। भाषा इतनी सहज और बहती हुई है कि वह कहानी के रास्ते में कभी दीवार नहीं बनती, बल्कि हर मोड़ पर उसका हाथ थामे चलती है।
अनुवाद की भाषा में वह संवेदनशीलता साफ़ दिखाई देती है जिसके बिना इस जैसी किसी किताब का मूल अर्थ ही खो सकता था। एक अनुवादक होने के नाते मेरे लिए इस किताब से कुछ एक्स्ट्रा टेकअवे भी है।

