• यात्रा
  • देहरादून की घाटियों में घुमक्कड़ी

    यात्राएँ हमेशा हमारे अनुभव संसार को समृद्ध करती हैं जिसे केवल वही लोग जी सकते हैं जो यात्रा करते हैं। बाक़ी हम उनके अनुभवों से सीखने-समझने का प्रयास भर कर सकते हैं। ज्योति नंदा का यह यात्रा वृत्तांत उनके अनुभवों को तो सामने लाता ही है साथ ही इस ओर भी संकेत करता है कि बतौर स्त्री अकेले यात्रा में या किसी के साथ भी, कितनी अलग तरह की चुनौतियाँ हैं। प्रस्तुत है देहरादून की यात्रा का वृत्तांत – घुमक्कड़ी और संभावनाओं का विस्तार – अनुरंजनी

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    घुमक्कड़ी और संभावनाओं का विस्तार – देहरादून यात्रा  

     पर्यटन लग्जरी है और घुमक्कड़ी भूख। सुबह शाम एक-सी, नीरस दिनचर्या जीते हुए ऊब तारी हो जाना सामान्य है और इस मोनोटनी से उबरने के लिए पर्यटन या घूमना भी उतना ही सामान्य और प्रचलित विकल्प है। हर प्रचलित विकल्प पहले ही किस्से-कहाँनियों, सेकेंड हैंड अनुभवों, स्मृतियों, तस्वीरों से भरा हुआ है। और बाकी बची उत्सुकता सर्च इंजन शोध, खत्म कर चुका होता है। ऐसे में मौलिक अनुभव की भूख घुमक्कड़ी ही शांत कर सकती है। हालांकि यह वो भूख है जो हर घड़ी, घड़ी की सुइयों जैसी दिमाग मे घूमती रहती है। यूँ कि घूमते हुए भी घुमक्कड़ी की प्यास बढ़ती जाती है।

    ज़रूरी नहीं कि हर बार घूमने के लिए किसी नई जगह ही जाया जाए। ऐसी ही थी इस बार की मेरी देहरादून यात्रा। जैसे एक स्थान की अलग-अलग एंगल से तस्वीर खींचना, और हर बार कुछ नायाब ढूँढ लेना। बीते चौदह, पंद्रह वर्षों में देहरादून कम से कम सात, आठ बार तो गई ही होऊँगी। कभी बच्चे के साथ गर्मी की छुट्टियाँ बिताने की जिम्मेदारी, तो कभी दोस्त से मिलने की तलब। और ये तलब ही लगभग हर बार यात्रा का कारण बनी। देहरादून और साथ में मसूरी की यात्राओ के बाद भी अब तक संस्मरण न लिखा जाना महज संयोग नहीं था। ऐसा भी नहीं की उन यात्राओ की यादें सुंदर नहीं थी। बल्कि याद करूँ तो उन यात्राओं में हमारी दोस्ती के वो कीमती पल हैं जो हमने अपनी बेटियों के साथ जिए। उन्हें बढ़ते हुए उनके बीच गहरा रिश्ता पनपते देखा।यह एक अद्भुत एहसास है। जब हम अपनी दोस्ती की विरासत को एक कदम आगे बढ़ते देख रहे थे। कितनी तस्वीरें हैं उन बरसों की। मसूरी की माल रोड से लेकर गुचूपानी की गुफा में एक दूसरे का हाथ पकड़े आगे बढ़ते जाने की, किसी पहाड़ी रास्ते पर रुककर बहती नदी बगल बैठना, भुट्टे और मोमो का स्वाद, माल देवता गाँव की अप्रतिम सुंदरता में खो जाना, पारदर्शी बहते पानी में किसी पत्थर पर पैर लटका कर घंटों बैठे आसमान, देवदार, सारे रंग यूँ घुलमिल, इकसार होते देखे जैसे कोई पेंटिंग जी उठी हो और हम उसका हिस्सा बन गए।शाम में कैफे सनबर्न के तेज म्यूजिक का फायदा हम चारों ने खूब उठाया। बेफ़िकर, बेलौस ठहाकों की, मस्ती भरी खिलखिलाहटों की ढेरों यादें बुलबुले-सी फूट रही हैं। 

    इनमे एक सिंगर दोस्त की गायकी से गुलज़ार शामें भी शामिल हैं। 

    पहले की सारी यात्राओं में बहुत कुछ एक जैसा है।बीती देहरादून यात्रा; घूमना नहीं, छुट्टियाँ नहीं, किसी से मिलना नहीं, कोई प्लान नहीं। बस जिंदगी के रात-दिन के गोल-गोल घूमते  कसते, जकड़ते धागों में लगातार उलझते जाने से खुद को खींचकर बाहर निकालने की कवायद थी। ये एक जानी पहचानी जगह का अनप्लान सफर था। घुमक्कड़ी थी। घुमक्कड़ी वही जहाँ मंजिल तय नहीं होती। बस की निकल पड़ना होता है। और निकल पड़ी। लखनऊ से रात की ट्रेन में देहरादून की ओर। पहली बार एकदम अकेले। खुद से भी अनजान। शहर से बिल्कुल नई  मुलाकात करने। एक वक्त था ट्रेन के सफर में रूमानियत, एक जीवन दर्शन,एक फलसफा ढूँढ़ लेने जितनी एकाग्रता हुआ करती थी। भीड़ के बीच भी खिड़की से बाहर देखते हुए पीछे छूटते दृश्यों में बीतते समय की झलक पाने की कोशिश को अब मोबाइल फोन के बेजा इस्तेमाल से बार-बार आती किरकिराहट नाकाम कर देती है। ट्रेन के सफर में किताब पढ़ते लोग कम, फोन पर ऊँची आवाज़ में बात करते या कोई रील देखते यात्रियों को देख समझ सकते है मंजिल पर पहुँचने की कितनी जल्दी है।  

    लखनऊ जैसे मैदानी इलाकों में नवंबर गुनगुनी ठंड का महीना होता है। वो नवंबर का आखिरी  हफ्ता था। इससे पहले इस मौसम में देहरादून नहीं गई थी।अलसुबह, समय से पहले ही ट्रेन स्टेशन पे लग गई थी। मेरे सफर के अनुभवों में ऐसा कई बार हुआ है कि ट्रेन निर्धारित समय से पहले प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँच गई। सुबह के छः बजे देहरादून शहर में अभी अंधेरा ही था। प्रतिभा  लेने आई। उसकी व्यस्त दिनचर्या से समय चुराकर छोटे- छोटे टुकड़ों में वो दिन जीया हमने क्योंकि उसे दूसरे दिन बाहर जाना था। शाम लंबी वाक करते हुए, कैफ़े में गरम जिन्जर लेमन टी की सिप के साथ पचीस साल से ज्यादा पुरानी दोस्ती में बातों का सिलसिला शुरू नही होता, चलता रहता है। जब हम बात नहीं कर रहे होते तब भी।

    पहला दिन 

     पाँच छः सदस्यों वाले परिवार के बीच पले- बढ़े लोगों को अगर अपने ही घर में अकेले एक दिन हाथ लग जाए तो समझ नहीं आता कि उसका क्या करें। वो अपने साथ कैसे दिन बिताए?  ये सवाल स्त्री पुरुष दोनों के लिए मुश्किल हो सकता है। लेकिन यदि वो एक स्त्री हो तो और भी कठिन है। बचपन से जिसके वजूद में स्वतंत्रता शब्द की स्वस्थ जगह नहीं है। उसके लिए ही सबसे ज्यादा मुश्किल। अकेली स्वतंत्र स्त्री अभी हमारे सामाजिक ढाँचे में फिट नहीं होती। ऐसा किसी “असामान्य परिस्थिति में ही हो सकता है” के पूर्वाग्रह से ग्रस्त मानसिकता के साथ ही देखा जाता हो वहाँ कोई स्त्री अकेली घूमने निकली हो तो उसके लिए ये सहज नही है। उसे इसे संभव बनाने के लिए घुमक्कड़ी से पहले लंबी यात्रा पार करनी होती है। शुभचिंतकों के सवालों के जवाब के रूप में। और अक्सर इस असहज स्थिति का सामना न करना पड़े। इस कारण कई स्त्रियों की आँखों के सपने बुझते देखे हैं मैंने। कई बार मैंने भी तमाम घरेलू  जिम्मेदारियों का हवाला देते हुए उन संभावनाओं से दूरी बना ली जो मुझे खुद से मिलवा सकते थे। 

    मैं इस यात्रा को पूरी तरह आत्मनिर्भर यात्रा नहीं कह सकती। यह न तो पूरी तरह सोलो ट्रिप थी ना ही पूरी तरह अनप्लान। बल्कि इनके बीच, थोड़ी सुरक्षित थोड़ी अनजान। शायद भविष्य में किए जाने वाले सोलो सफर के अभ्यास जैसा।अगली सुबह, मुहब्बत और मेहनत से बनाये कोज़ी से घर को आगे तीन दिनों के लिए मेरे हवाले करके ऑफिस के काम से प्रतिभा दूसरे शहर चली गई। एक दोस्त से अच्छा कोई नहीं समझ सकता कि कब किस चीज की सख्त जरूरत है। या यूँ कहना बेहतर होगा कि दोस्त वही है जो ये सिर्फ समझे ही नहीं बल्कि मुश्किल समय में हाथ बढ़ा कर खींच के निकल ले। प्रतिभा वहाँ नहीं थी पर वो थी, घर के हर कोने में। दुनिया भर की सँजोई हुई किताबों में, महकते, हहराते सुंदर गमलों में, दीवारों के रंग में, सुंदर लाइट्स में, घर के आस्थेटिक में। मैं उस जगह थी जिसे घर के रूप में ढलते देखा है मैंने। पर वो मेरा घर नहीं है। वो एक सुरक्षित स्पेस है। मैं वहाँ थी पर वो मेरे भीतर नहीं है जैसा एक घर होता है। प्रतिभा जब भी बाहर जाती है उसका घर उसके साथ होता है। ऐसा उन सब के साथ होता है जिनके घर होते हैं। मेरे भीतर हरदम कोई यात्रा ठहरी रहती है। गतिमय होना संगीतमय होना लगता है।  

    इस यात्रा का पहला ठौर था किमाड़ी गाँव। छोटी बहन जैसी दोस्त स्वाती संग।    

     स्वाति वो लड़की है जिसने गीत-संगीत को अपनी दुनिया बनाने के लिए एक स्थायी नौकरी को किनारे करते हुए इसी शहर में संघर्ष का रास्ता चुना और आज उसके म्यूजिक बैड “वुमानिया बैंड” की संगीत प्रेमियों के बीच अलग पहचान बन चुकी है। हम दोनों निकल पड़े शहर से दूर एक गाँव किमाड़ी की ओर। तकरीबन आधे घंटे की ड्राइव और दस मिनट के ट्रेक के बाद आता है रकोल गाँव, एक पहाड़ी। उस पर एक मंदिर और एक मैगी पॉइंट, बस। बहुत कम लोग थे। एक जोड़ा पहाड़ी के सबसे आड़ वाले हिस्से में बैठा था। उन पर नजर पड़ते ही शहर मेरे भीतर कौंध गया। मैं चौकन्नी- सी चारों ओर देखने लगी कहीं कोई झण्डा उठाए, नारा लगाते आसान शिकार ढूँढ़ते हुए न आ धमके। चारों ओर देखते हुए मैंने खुद को 360 डिग्री घूमते हुए पाया। रकोल गाँव की नन्हीं सी पहाड़ी चारों तरफ ऊँचे पहाड़ों से घिरी थी। ऐसे, जैसे बड़े से घर के आँगन में जाड़ों की धूप सेंकने आई हूँ। स्वाति से मिलने दुम हिलाते जामी आ गया। पुरानी दोस्ती थी उनकी। उसकी आँखों में शहर की गलियों में डरे हुए घूमते जीवों वाले भाव नही थे। वो उस आबोहवा का प्राणी था जहाँ बेचैनी सुकून पाती है। वही सुकून उसकी आँखों में भी था। प्रेम और डिटैचमेंट दोनों का मिश्रण दिखा। 

    पहाड़ों की धूप भी वहाँ के रहवासियों जैसी बिना मिलावट, निश्छल होती है। ये पेड़ों से पत्तियों के झर जाने का समय है। पहाड़ों के बरक्स खड़े ठूँठ जैसे कह रहे हों “मैं हूँ ना”। दिन चढ़ने के साथ सूरज सिर पर आने लगा। इक्का- दुक्का लोग आकर मंदिर में दर्शन करके, बेस्ट सेल्फ़ी और बेस्ट एंगिल से तस्वीरे निकाल कर इधर-उधर घूम कर “और तो यह कुछ है नहीं” जैसी ऊब के साथ लौट जाते। मैं मानव कौल के उपन्यास “तितली” पढ़ने की कोशिश करने लगी। प्रकृति के आँगन में बैठ, वो किताब पढ़ने की कोशिश कर रही थी जिसका कथानक मृत्यु के आस-पास बुना गया था। वही उपन्यास जब चारदीवारों के भीतर पढ़ने की कोशिश की तो एक उदासी घेरने लगी थी। यहाँ बैठकर पढ़ते हुए लगा मृत्यु, जीवन का विस्तार ही तो है। जादू-सा लम्हा कुछ लड़के, लड़कियों के झुंड, तेज म्यूज़िक, ऊँची आवाजों के बीच गुम हो गया। हालाँकि वे ज्यादा देर नही रुके। पर एक तिलिस्मी पल जेहन में ना सही, स्वाति की खींची तस्वीरों में कैद हो गया था। नाग देवता का मंदिर हाल में ही पुनर्निर्मित किया गया था। दीवारें, आहाता सब नया जान पड़ रहा था। स्थानीय लोगों के अनुसार उस इलाके में सांपों से जुड़ी कथाओं, मान्यताओं के रास्ते चलकर आस्था तक पहुँच कर ये मंदिर निर्मित हुआ। 

    अब दिन शाम की ओर सरकने लगा था। सर्दी के दिनों में ड्राइव करके पहाड़ी रास्तों से वापिस लौटना थोड़ी सावधानी माँगता है। सो लौटने से पहले कुछ यादें और समेटना चाहती थी। अब बारी थी फोटोग्राफी की। आहिस्ता- आहिस्ता रंग बदलते, मद्धिम होते सूरज ने यूँ अपने मोह में बाँध लिया कि किसी भी सावधानी का ख्याल ही न रहा। उजास से पीली, नारंगी, लाल रंगों की छटा हर एक क्लिक के साथ बदलती जाती। ढलते सूरज की हर एक किरण से बतियाते आखिर वापस हो लिए। चाँद पर बादलों का खेल देखा है पर उस रोज बुझते दिन के सुर्ख सूरज संग बादलों के खेल देखे। मानों दहकते गोले पर उछलते-कूदते रुई के फाहे। नीचे उतरते- उतरते चाँद की ताका- झाँकी शुरू हो गई थी। थकान को एक कॉफी की सख्त जरूरत थी।कैफ़े लाटा पहुँच के लगा जैसे कोई पुराना नाता है। हो भी क्यों न अब तक इस जगह को कितने लाइव प्रोग्रामों में देखा जो था। 

    रात उस आशियाने पे लौटी। जिसके दरवाजे पर अब से पहले अकेले नहीं खड़ी हुई थी। खुद कभी लॉक नहीं खोला था। सोच रही थी प्रतिभा, बेटी के दूसरे शहर पढ़ने जाने के बाद रोज ऑफिस से लौट कर लॉक खोलती है। और थक कर बिस्तर में घुस जाती है फिर सुबह होते ही वही रूटीन। मैं भी वही कर रही थी। थोड़ी देर टेलीविजन देखते हुए आँख लग गई। 

    दूसरा दिन -क्लेमेंटाउन 

     दिन निकल आया था। जीवन भर परिवार के लिए खाना पकाते-पकाते लगा था किचन घर का ही नहीं मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। खाना ही जीवन है। जब खाना पकाने वाले को अपने पेट की भूख शांत करनी हो तो किचन घर की सबसे अनावश्यक जगह बन जाती है। तैयार होकर बाईक बुक कर निकल पड़ी। ये अनजान मंजिल थी। बिल्कुल अंदाज नहीं था कितना दूर है। आज का देहरादून किसी भी दूसरे शहर जैसा धूल और थोड़े से कम प्रदूषण वाला मिला। बाईक चालक अभी शहर में नया ही था। उसने दिल्ली के बजाय इस शहर को चुना, काम करने के लिए। क्योंकि यहाँ अब भी हवा-पानी साफ़ है। 

    लगभग 40 मिनट की राइड के बाद मेरे सामने था तिब्बती और बौद्ध धर्मावलंबियों का तीर्थ जैसा टाउन, क्लेमेंटाउन। एक ओर बड़ा चमकता स्तूप का शिखर। दूसरी ओर बुद्ध की विशालकाय मूर्ति। मेरे ठीक सामने झर चुकी पत्तियों, मोटे तने वाले पेड़ पर चढ़ी गाढ़े गुलाबी रंग की बोगेनवेलिया की बेल। बोगेनवेलिया को चहकने के लिए चाहिए चटक धूप। जो उस दिन खूब थी। यूँ लग रहा था नीले कैनवस पर गहरे गुलाबी फूलों का गुलदस्ता उग आया हो।किसी के मजबूत सहारे से आसमान रंगा जा सकता है। 

    करीने से सजी क्यारियाँ, गाढ़े मरून रंग के लबादे में धर्म की शिक्षा लेते युवा भिक्षु। अगले दिन धार्मिक सम्मेलन की तैयारी की हलचल पूरे कैंपस में दिख रही थी। ढेर सारे धर्म चक्रों को खिलौने की तरह घुमाते, अनगिन फूलों से छलकते सतरंगी और उजले दिन को निहारते हुए भूख लग आई थी। एक सुस्त से कैफे में बैठ कर ठीक सामने विशालकाय बुद्ध प्रतिमा के पीछे से चढ़ते दिन की रंग बदलती किरनों की रोशनी में चेहरा नहीं दिख रहा था। सिर्फ उनके होने भर से इस दुनिया को रोशनी मिल रही हो। जैसे राजकुमार गौतम के भगवान बुद्ध हो जाने की यात्रा का कोई पल जब उनके तेज ने सूरज पे ग्रहण लगाया होगा। पेट भर चाउमीन खाने के बाद क्लेमेंटाउन की गलियों में घूमते चीजों के दाम पूछते, वापसी के लिए ऑटो पे बैठते हुए दिन ढल गया था। एक बार फिर भीड़ भरे रास्ते से होते हुए द्वारिका स्टोर (लैंडमार्क) पर उतर कर दिशाभ्रम का शिकार हो गई। ठीहे पर पहुँचने के उद्देश्य से उलटी दिशा में वाक करने लगी। कोई सौ मीटर से ज्यादा चलने के बाद अहसास हुआ कि कालोनी का मोड कहीं गुम हो गया। खुद पे क्रोध आ रहा था।  बीसों बार उस सड़क पर चली हूँ फिर कैसे? फिर हँसी भी आई कि यही तो रोमांच है घुमक्कड़ी का तो लो आनंद । दुकानदार से पूछ कर सही दिशा तो पता चली। पर वो मोड अब भी नहीं मिल रहा था। ऐसे में प्रसिद्ध दुकान के सामने रुक कर फोन किया, फिर एक डिलवरी एजेंट की मदद से आखिरकार पाँवों की अच्छी वर्जिश के बाद लॉक खोल अंदर सीधे बेड पर लुढ़क गई। 

    तीसरा दिन 

    अगले दिन देर स्वाति के फोन से नींद खुली। “कहाँ चलें दी?”

    “जहाँ तुम ले चलो” 

    ठीक। आधे घंटे में आती हूँ पिक करने”

    घुमक्कड़ी का सूत्र है ‘निकल पड़ो’ हालाँकि थोड़ी तैयारी भी जरूरी है। टिकट, और टिकने के ठिकाने का अंदाजा रखना लड़कियों के लिए थोड़ा ठीक होगा। बहरहाल बाइक लेकर स्वाति ठीक टाइम आ गई। मैं भी तैयार थी। तीसरे दिन एक और गाँव की ओर चल पड़े। एयरपोर्ट के रास्ते हर शहर में खूबसूरत बनाए जाते है फिर यहाँ तो पहाड़ों और हरियाली, मौसम और सर्द  हवाओं का साथ भी था। बरसात में जो नदी पुल को बहा जाती है इस मौसम में रेत और पत्थरों के बीच स्लेटी लकीर बनाती दिखी। ढाबे पर चाय की चुस्की लेते बढ़ चले डिंडियाली फार्मस की ओर। जंगलों के बीच पत्तियों से छनती धूप, खिलखिल करती किरणे साथ लिए दोपहर पहुँचे पहाड़ी खान-पान की मौलिकता बरकरार रखने का दावा करने वाले डिंडियाली रेस्त्रां। बाहर से  हरा- भरा, घर जैसे दिखने वाले रेस्त्रां के मुख्य द्वार से अंदर जाने के लिए सिर झुका के प्रवेश करते ही समझ में आता है कि गाँव में शहरी होटल की सुविधाओं जैसी आरामगाह रची गई है। इन दिनों नौजवानों को, मोटी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़कर अपनी जड़ों की ओर लौटने का मोह आकर्षित कर  रहा है। इसी राह पर चलकर फार्म के मालिक ने पैतृक गाँव की जमीन को टूरिस्ट प्लेस में बदल दिया। और खुद ईश्वर और अध्यात्म, की ओर मुड़ गए। पहाड़ की लोकप्रिय भांग की चटनी और पकौड़ियों का रस लेते हुए, जीवन इतिहास देश संस्कृति की बातें करते समय का पता नही चला। सामने खेतों मे छिपते सूरज को एक बार फिर दिल में उतारकर लौट चली। और अवेंजर की पिछली सीट पर मैं सिकुड़ी जा रही थी। पहाड़ी शाम की सर्द हवा कानों को छूती चुभ रही थी। शहर की सीमा में घुसते ही भीड़ और स्ट्रीट लाइट ने घनी रात का भ्रम तोड़ दिया। देहरादून की सँकरी गलियों को देख लखनऊ चौक और बनारस की गालियाँ याद हो आई। भीड़ और जाम से बचने के लिए इनसे गुजर कर हम पहुँचे अपने पसंदीदा जगह सन्बर्न बिस्त्रो कैफ़े। इस तरह एक और दिन सुंदर तस्वीरों-सा मन के फ्रेम में कैद हो गया। 

    घुमक्कड़ी के अंतिम दिन देर से जागने के बाद लगा कोई असाइनमेंट तो है नहीं कि घूमना जरूरी है। पड़ी रहती हूँ बेड पर टी.वी. पर कोई मनपसंद फिल्म लगा कर देखी जाए। रात तक प्रतिभा भी वापिस आ जाएगी। दोनों गप्पे मारेंगे। पर घुमक्कड़ी का नशा जो पिछले तीन दिनों से तारी था उसका क्या? ये तो पानी वाली प्यास है। सिर पर सवार नहीं होती, इसका नशा होश में रखता है, कोई नुकसान नहीं पहुँचाता। और एक बार पानी पी लेने से जीवन भर की प्यास नहीं बुझती। कब तक सुविधाओं की आड़ में पैशन की बलि चढ़ती रहेगी। पैशन का पीछा, बिना जुनून के नहीं हो सकता। ‘अरे वो बहुत घुमक्कड़ है, घर में तो पैर टिकते ही नहीं।’ अचेतन में बैठे ढेर सारे अनर्गल प्रलाप अनिर्णय की स्थिति में ही कौंधते हैं। एक लड़की का दुनिया देखने का सपना ही खारिज कर दिया जाता है। क्यों? क्योंकि समाज की सोच के हिसाब से स्त्रियों की दुनिया उसका घर होती है। ‘अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा’ लड़कों के लिए सही हो सकती है,लड़कियों के लिए ऐसा सोचना भी चरित्र पर सवाल खड़े कर देगा।       

    एक बार फिर मैंने जूते कसे, जैकेट कसी, दस्ताने पहने, आखिर में हेलमेट लगाया, टू व्हीलर स्टार्ट की और चल पड़ी। 

    कालोनी, गली, मेनरोड, बाज़ार, शोरूम, ऊँची इमारतें सब पीछे छूटते जा रहे थे। थोड़ी देर बाद मैं मसूरी रोड पर बढ़ रही थी।मद्धिम उजास का दिन, छोटे -छोटे कैफ़े देख भूख बढ़ती जा रही थी क्योंकि दोपहर हो गई थी।खाली पेट में कुलबुलाहट होने लगी थी। 

    कभी- कभी कोई जगह यूँ ही अपनी ओर खींचती है और आप उसे नजर अंदाज करते हैं क्योंकि खिंचाव के कारणों की एनलिसिस में उलझने लग जाते हैं। ये आकर्षण किसी भी चीज से लेकर इंसान के बारे में भी हो सकती है। प्रेम के बारे में यही कहा जाता है। मसूरी रोड के उस कैफ़े के सामने से पिछली यात्राओं में गुजरते हुए ऐसा ही हुआ था। देर तक पलट कर देखती रही। जब तक मोड मुड़ नहीं गया। रुकने का मन होता था पर मेरे पास कोई कारण नहीं था कि यहीं क्यों रुकना है जबकि अनुभवी यात्री पहले ही बेहतरीन दृश्यों वाले कैफ़े की जानकारी से लैस हों। अभी जब नजरें खाने का ठिकाना ढूँढ़ रही थीं। कितने होटल, कैफ़े पीछे छूटे और उस टूटी-फूटी सी इच्छा की याद भी न रही कि अचानक वही बोर्ड दिखा। इस बार रुकने के लिए किसी को कारण बताने की जरूरत नहीं थी। “इज इट ओपन?”, ‘यस मैम’, उसने जवाब दिया। आज तक उस कैफ़े का नाम भी ठीक से नहीं पढ़ा था। बड़ी-सी जगह, एकदम खुली। कुछ पुरानी गाड़ियों और टायर का इस्तेमाल कर बैठने के लिए सोफ़े जैसा कुछ बना था। सजावट के तौर पर पुरानी बाइक, स्कूटर रखे हुए थे। पीछे की ओर खाली जगह थी जहाँ कुछ लड़के अपनी बाइक को आगे के सफर के लिए दुरुस्त कर रहे थे। कुछ अपने विशाल बैग पैक दुबारा से पैक कर रहे थे। एक प्यारा हस्की, कुछ पर्शियन बिल्लियों से मुलाकात करते हुए चाय और सेंडविच खाते हुए समझ में आया कि ये जगह बाइकर्स की ज़रूरत के मुताबिक बनाई गई है। वो जो बाइक पर लंबे सफर करते हैं, यानी घुमक्कड़ों के लिए। इस जगह के प्रति आकर्षण में कोई तो कॉस्मिक कनेक्शन था जिससे पर्दा उठा। इस कैफ़े का नाम “throttal shrottal” था।

    कुछ दूर ड्राइव कर एक पॉइंट पर रुकी जहाँ से मसूरी 10 किलोमीटर आगे था। कहीं पहुँचने की चाह अब धुंधलाने लगी है। चुपचाप घाटियों, पहाड़ों, पत्तियों से खाली शाखाओं के सौन्दर्य पर रीझती, ताकती ‘मैं’ को ध्वस्त करती। सबकुछ से कुछ नहीं तक के सफ़र के बीच ही रहना चाहती हूँ, कि इच्छा लिए वापिस लौट आती हूँ। 

    कई दिनों के बाद किसी के लिए खाना पकाना भी अच्छा लगता है। अगले दिन लखनऊ वापसी थी। ट्रेन की विंडो सीट पर एक बार फिर ढलते सूरज का साथ देर तक मिला। जानबूझ कर खुद को किसी अजनबी माहौल में ले जाना घुमक्कड़ी है।

     

    परिचय- 

    संक्षिप्त परिचय

    नाम- ज्योति नंदा

    बीते दो दशकों से स्वतंत्र लेखन करते हुए ‘स्वतंत्र भारत, हिंदुस्तान , नई दुनिया आदि में लेखन ।

    कहानी- “मैं सफर में हूँ “(उत्तर प्रदेश साहित्यिक पत्रिका ), “सात बजकर दस मिनट”, “ओ शिट”

    ( नवजीवन साप्ताहिक )

    ‘यात्रा संस्मरण- “शिमला- मनाली (उत्तर प्रदेश साहित्यिक पत्रिका )

     कई शॉर्ट फिल्म स्क्रिप्ट लिखी -फिल्म  “सच माइनस झूठ “( Rangam films- you tube ) के लिए “हिमाचल शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल 2024” में  best experimental script writing से सम्मानित । लखनऊ रंगमंच में सक्रिय  होने के साथ वर्तमान में आकाशवाणी में कैजुअल अनाउंसर ।

    ज्योति नंदा 

    Email—jnanda1006@gmail.com    

         

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