• यात्रा
  • सब्ज़ झीलों के देस में ‘कसप’ वाली कोठी

    अभिषेक कुमार अम्बर दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी हैं। वे अक्सर उपन्यासों-कहानियों में वर्णित स्थलों की तलाश में घूमते रहते हैं। जिन लोगों ने मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास ‘कसप’ पढ़ा होगा उनको याद होगा कि उपन्यास की शुरुआत नैनीताल की एक कोठी से होती है, जहां बेबी और डीडी की पहली मुलाक़ात होती है। इस बार उन्होंने उसी कोठी को खोज निकाला है। आइये पढ़ते हैं कि कैसे- मॉडरेटर

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    नैनीताल की बस भी अभी आकर लगी है जिसमें हम गिनती की 4-6 सवारी बैठी हैं। बस की कंडक्टर एक महिला है। ऐसा दृश्य पहाड़ों पर कम ही देखने को मिलता है जबकि पहाड़ों को महिलाओं ने ही अपने कंधों पर थामा हुआ है। गाँवों में घर-जानवर-खेत सभी उन्हीं को तो संभालने होते हैं। पुरुष तो परदेसी हो जाते हैं और साल-छह महीने में ही दर्शन देने आते हैं। बहरहाल भवाली से नैनीताल महज़ 13 किलोमीटर का सफ़र है जो तक़रीबन आधे घंटे में पूरा हो जाता है। सिर्फ़ चढ़ाई है, खड़ी चढ़ाई। इसी चढ़ाई हो हम चढ़ते जाते हैं और कोहरे से घिरे भवाली शहर को नीचे छोड़ बादलों के ऊपर आ जाते हैं। सूरज सामने पहाड़ के शिखर पर साधू सरीखा ध्यान में मग्न है और अपनी आभा से सम्पूर्ण क्षेत्र को आलोकित कर रहा है। पहाड़ पर सर्दी का सूरज फीका-फीका नहीं एकदम तेज़, चटख निकलता है। ऐसी धूप जो मेहरबान हो तो आपको गर्मी से भर दे और नाराज़ हो तो आपके दाँतों की कड़कड़ी बजवा दे।

    तल्लीताल के चौराहे पर धूप के मोती बिखरे हुए हैं, जिन्हें लोग बापू की मूर्ति के पास खड़े समेट रहे हैं। सुबह सुबह के समय भी शहर में मेले से का माहौल है लोग इधर से उधर भागते से दिखाई दे रहे हैं। विशालकाय झील अजगर सरीखी पहाड़ों के एकदम बीच में लेटी सर्दी का घाम ताप रही है। तल्लीताल का चौराहा नैनीताल का मुख्य चौराहा है। भवाली और हल्द्वानी के रास्ते आने वाली गाड़ियाँ यहीं से होकर शहर में प्रवेश करती हैं। चौराहे के एकदम बगल में ही बस स्टेशन भी है। ऐसे में यहाँ हमेशा चहल- पहल रहती है। चौराहे के पास गाँधी जी की मूर्ति लगी है, जिसके पीछे ताल है और गाँधी जी के दाहिने हाथ की तरफ़ कुछ बैंचें लगी हैं जहाँ बैठकर लोग नैनीताल झील को निहारते हैं। झील के किनारे पर मछलियों का झुंड हमेशा गोते लगाता रहता है और सैलानियों द्वारा चारा खिलाए जाने पर तरह तरह के करतब दिखाता है। झुंड भी कोई छोटा-मोटा नहीं, सैंकड़ों-हज़ारों मछलियों का झुंड।

    याद करता हूँ नवम्बर 2024 की ढलती दोपहर, मैं झील किनारे खड़ा, झील और उसमें तैरती मछलियों को निहार रहा था। रंग-बिरंगी मछलियाँ जिनमें सबका ध्यान एक दूधिया रंग की मछली विशेष रूप से आकर्षित कर रही थी। जिधर भी लोग चारा लेकर खड़े हो जाते, उन का झुंड उसी तरफ़ दौड़ पड़ता। मछलियों के लिए यह उनका पेट भरना और लोगों के लिए मनोरंजन का साधन था। लोग थोड़े-थोड़े मुरमुरे डाल कर देर तक मछलियों का तमाशा देखना चाहते थे। मेरे बराबर में भी 2 लड़के आकर खड़े हुए, वो शायद गाँव से थे और पहली बार इतना बड़ा ताल और इतनी बड़ी तादाद में मछलियाँ देख रहे थे। मछलियों को देखकर एक के मुँह से अनायास निकला ‘कैसे दिन आ गए हैं जिनको हम खाते थे, आज उनको तैरते देखना पड़ रहा है।’ उस लड़के की यह पंक्ति मानो एकदम मेरे दिल में सुईं सी चुभो गई। क्या इस लड़के को पता भी है वो क्या कह रहा है। ख़ैर! इसमें आश्चर्य की कोई ऐसी बात नहीं, दुनिया आज भी ऐसी सोच रखने वाले लोगों से भरी पड़ी है। जिनको जानवर हँसते-खेलते नहीं, थालियों में परोसे हुए अधिक अच्छे लगते हैं। भोजन लोगों की व्यक्तिगत पसन्द हो सकती है मैं उस पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा। यहाँ तो ऐसे लोग भी है लोग आज भी समाज के एक बड़े तबके को या देखें तो स्त्रियों की स्वतंत्रता को भी इसी नज़र से देखते हैं।

    हम नैनीताल पहुँच चुके थे, कुमाऊँ विश्वविद्यालय के सामने उतरे। मोहित नेगी को अपना एनरोलमेंट नम्बर लेना है। यही वह बहाना था जिसकी वजह से हम नैनीताल आये थे। 15 मिनट में हम यह काम निपटा चुके थे। और अब बस दिन भर घूमना था। नैनीताल में हम चारों लोग ही अधिकतर जगह घूम चुके हैं। इस बार मैं सोच कर आया था कि नैनीताल जाऊँगा तो भिसूंणी रानी की कोठी को खोजूँगा। जी हाँ! आपने सही पहचाना, मनोहर श्याम जोशी के ‘कसप’ उपन्यास की कोठी, जिसे आप में से कुछ लोग शायद ‘रांदे वू’ के नाम से जानते होंगे।

    यह काम इतना आसान भी नहीं था। कल रात से ही मन में एक निराशा सी थी कि नैनीताल में ऐसा कुछ नहीं मिलेगा, हो सकता है वो मनोहर श्याम जोशी की कल्पना हो, पर दिल नहीं मान रहा था। मन से एक आवाज़ बार-बार आ रही थी कोशिश तो करके देख!

    जिन पाठकों ने ‘कसप’ उपन्यास नहीं पढ़ा उनको बताता चलूँ। कसप उपन्यास, हिन्दी के सर्वाधिक प्रसिद्ध उपन्यासों में से एक है। इस उपन्यास के मुख्य पात्र डी.डी. और बेबी के मध्य प्रेम के बीज ‘भिसूंणी रानी की कोठी/ रांदे वू’ में ही पड़े थे या दूसरी तरह से कहें तो ‘मारगाँठ जिलेम्बू’ के सफ़र का आग़ाज़ यही कोठी है। उपन्यास को पढ़कर मुझे कुछ ऐसे सूत्र हाथ लगे थे, जिनसे उस कोठी तक पहुँचा जा सकता था। लेकिन इसमें कामयाबी की गुंजाइश पचास प्रतिशत से भी कम ही थी।

    पहला सूत्र थीं यह पंक्तियाँ ” नगरवासी इसे वर्तमान मालकिन के रूप-स्वभाव को लक्ष्य कर भिसूँणी (फूहड़) रानी की कोठी कहते हैं, लेकिन अगर आप, नायक की तरह, कभी बँगले की ओर फूटनेवाली पगडंडी की शुरुआत पर पाँगर’ के पेड़-तले स्थापित पत्थर की काई हटाएँ, तो इस बँगले का वह नाम पढ़ सकेंगे जो इस कथा के अधिक अनुकूल है-‘राँदे वू’- संकेत-स्थल।”

    इससे यह तो जाहिर था कि बंगले का नाम ‘भिसूंणी रानी की कोठी या रांदे वू’ है और अगर इस नाम की कोठी रही होगी तो यह नैनीताल में प्रसिद्ध रही होगी। हम लोग कुमाऊँ यूनिवर्सिटी से नीचे उतरते हुए इको केव से होते हुए हर्मिटेज के रास्ते के पास आ गए थे। जो एक चौराहा ही था। यहाँ से सामने वाली सड़क नीचे ताल की तरफ़ जाती है और दाएँ हाथ वाली हर्मिटेज और बाएँ तरफ़ की सड़क हाई कोर्ट के बराबर से होते हुए ऊपर चली जाती है चीना पीक की तरफ़।

    मैंने चौराहे के पास ही एक दुकान वाले से पता करना चाहा कि यहाँ कोई भिसूंणी रानी की कोठी या रांदे-वू नाम से कोई जगह है? लेकिन मेरे हाथ निराशा लगी। लेकिन तभी मुझे दो सुराग़ याद आए।

    सुराग़ – 1

    ‘मिडिल चीना माल से शॉर्टकट लेकर ऊपर की ओर चढ़ते हुए उसकी चर्चा छिड़ी है’ – पेज 38

    सुराग़ 2

    ‘पानी की टंकी से बँगले की पगडंडी पकड़ते हुए नायक सोचता है, कल सत्यनारायण कथा है और परसों सुबह यह बँगला खाली कर दिया जाना है। सब अपने-अपने घर चले जाएँगे।’ -पेज 40

    अब मेरे पास दो अहम सुराग़ थे कि मिडिल चीना माल से जो शार्ट कट ऊपर की ओर जाता है उसी तरफ़ कोठी होगी और दूसरा सुराग़ यह कि कोठी के पास एक पानी की टंकी भी थी जिससे कोठी के लिए पगडंडी मुड़ती थी। मैंने उस दुकानदार को इनके बारे में बताया।

    ‘अरे साहब! यहाँ पानी की टंकियाँ तो बहुत हैं।’

    ‘फिर भी आप याद कीजिए, जिसके आस-पास अंग्रेज़ों के समय का कोई बंगला या कोठी हो?’

    तभी दुकान में एक सज्जन प्रवेश करते हैं जो हमारी बातों को सुन रहे होते हैं। वो शायद लोकल थे। वह मुझसे कहते हैं टंकी तो यहाँ बहुत हैं पर ‘टांकी रोड’ यहाँ एक ही है। शायद आप उसके बारे में ही पूछ रहे हैं?’

    ‘मुझे लगा हो सकता है वो टांकी रोड ही रहा हो जिसे मनोहर श्याम जोशी ने  टंकी लिखा हो, मैंने उनसे कहा, जी हो सकता है उधर ही वह जगह हो। क्या आप मुझे टांकी रोड का रास्ता बता सकते हैं?’

    ‘ज़रूर! आप ये जो सामने सड़क देख रहे हैं ना, हाई कोर्ट के बराबर वाली उसी से ऊपर चले जाइए, आगे लोगों से पूछ लीजिएगा वो आपको बता देंगे।’

    उनको शुक्रिया कह कर हम हाई कोर्ट के बराबर वाली सड़क से ऊपर चढ़ने लगे। एक सड़क हाई कोर्ट के बीच से भी निकल कर इसी सड़क से मिलती है। मुझे ध्यान आया कि हाई कोर्ट के नीचे वाली सड़क को ही मिडल चीना माल कहते हैं तो शायद हाई कोर्ट के ऊपर आने वाला ये शॉर्टकट ही कोठी

    का रास्ता होगा। अब कुछ कुछ उम्मीद मन में जग रही थी। लेकिन फिर भी मन में यही था कि अगर कोठी नहीं मिलेगी तो ऊपर जंगल में ही कुछ समय बिताकर, फोटो वगैरह लेकर ही संतुष्ट हो जाएँगे।

    बारिश की हल्की-हल्की बौछारें पड़ रही थीं, जो मौसम को ख़ुशनुमा बना रही थी, हाई कोर्ट के बग़ीचे में रंग-बिरंगे फूलों की दर्ज़नों प्रजातियाँ लहलहा रही थीं। जुलाई के महीने में स्वेटर पहले स्कूली बच्चे हमारे आगे पीछे चल रहे थे। बरसात की फ़ुहारों में छाता होने के बावजूद वो भीग रहे थे, उनको देख कर अपने स्कूली दिन याद आ गए। सर्दी के मौसम में हम भी बारिश में भीगने से बाज़ नहीं आते थे। भले उसके बाद बीमार पड़ जाएँ।

    हम थोड़ा ऊपर आये तो नीचे झील का कुछ हिस्सा दिखने लगा। हम फोटो लेने लगे तो तभी एक बंगले के अंदर से सिक्योरिटी गार्ड हमारे पास आया और उसने हमें फोटो लेने से मना किया। इस रास्ते पर सारे बंगले हाई कोर्ट के न्यायाधीशों के हैं इसलिए यहाँ फ़ोटोग्राफ़ी प्रतिबंधित थी। मैंने सोचा इन भइया से ही उस कोठी का पता पूछ लेना चाहिए। मैंने पूछा। शायद वो नैनीताल के स्थानीय निवासी नहीं थे इसलिए वह दरवाज़े के पास जाकर अंदर किसी को आवाज़ देने लगे। एक लड़का बाहर आया। मैंने उससे पूछा कि क्या यहाँ कोई भिसूंणी रानी की कोठी है हमें उधर जाना है क्या आप जानते हैं वो कोठी कहाँ होगी?

    ‘वो कोठी तो उधर है, पहाड़ की चोटी पर दिखते टावर की ओर उसने उंगली से इशारा किया।

    मुझे विश्वास नहीं हुआ, मैंने एक बार फिर पूछा।

    ‘हाँ, हाँ भिसूंणी रानी की कोठी उधर ही है। आप इसी सड़क से ऊपर चढ़ते जाओ डेढ़-दो घण्टे में आराम से घूमते हुए पहुँच जाओगे।’

    अब तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा, अब इस बात की पुष्टि तो हो गई थी कि भिसूंणी रानी की कोठी नाम की जगह नैनीताल में है। अब तक तो मैं बस एक क़यास लगा रहा था और कोठी को लेकर कोई ख़ास उत्साह मन में नहीं आ पा रहा था लेकिन अब तो मानो मुझे पंख लग गए हों और मैं जल्द से जल्द पहाड़ की चोटी पर पहुँच जाना चाहता था।

    हँसी-मज़ाक़ करते हुए हम ऊपर चढ़े जा रहे थे, एकदम खड़ी सड़क थी, तो रफ़्तार मद्धम हो गई थी। मैं सड़क के दोनों तरफ़ बने न्यायाधीशों के बंगलों के बाहर लगी तख़्तियों पर नाम पढ़ते जा रहा था। जैसे ही न्यायधीशों के घर पीछे छूटे, लगा जगह एकदम बदल गई हो। न तो अब सड़क इतनी चौड़ी थी, न ही वैसी सफ़ाई। यह एक छोटा-सा मोहल्ला था। काफ़ी पुराने घर थे। सड़क ख़त्म हो कर अब सीढ़ियाँ शुरू हो गई थीं और सीढ़ियों के बराबर से एक गदेरा(साफ़ पानी का पहाड़ी नाला) बहता था। बरसात अधिक न होने के कारण उसमें पानी न के बराबर था। थोड़ा ऊपर घर के बाहर एक बुज़ुर्ग ध्यान-मग्न से बैठे थे। बुज़ुर्गों के साथ बड़ी विडंबना है कि तन्हाई से दो-चार होते हुए भी ध्यान-मग्न से लगते हैं। बुढ़ापे में तन्हाई से बड़ी कोई सज़ा नहीं होती। उस पर माज़ी भी हमलावर हो जाता है। उन बुज़ुर्ग की तन्हाई तोड़ने के लिए मैंने उन पर सवाल दाग़ दिया।

    नमस्ते! अंकल जी, क्या यही रास्ता ऊपर टांकी रोड की तरफ़ जाता है!’

    अंकल शायद माज़ी की लहरों की तहों में बहुत गहराई में गोता लगा रहे थे। जब तक वह हाल में आते। उनके सामने वाले घर से एक औरत हमसे मुख़ातिब हुई। उन्होंने भीतर अपने पति को आवाज़ दी, जो अधेड़ उम्र के एक शख़्स थे। उन्होंने बताया’ हाँ! टांकी रोड का रास्ता यही है!’

    ‘क्या उधर कोई भिसूंणी रानी की कोठी भी है?’ – मैंने उनसे आगे जानना चाहा।

    ‘यह तो मुझे नहीं पता, लेकिन उधर काफ़ी कोठियाँ हैं?’

    ‘नीचे हमें बताया गया था कि डी-कंट्रोल पता करना, उसी के पास है?’

    ‘अच्छा! ऊपर एक कोठी है तो दूरदर्शन कॉलोनी के पास। लेकिन अब तो वह एक रिज़ॉर्ट में तब्दील हो चुकी है!’

    ‘आप जब इन सीढ़ियों से ऊपर सड़क पर पहुँच जाएँ। तो दाईं तरफ़ कुछ दूर चलने के बाद बाईं तरफ़ एक पगडंडी आपको दिखाई देगी। वो सीधे टांकी रोड जाती है। सड़क के रास्ते जाएंगे तो बहुत समय लगेगा।’

    ‘अच्छा! आपका बहुत शुक्रिया!’

    सीढ़ियाँ चढ़ना काफ़ी दुश्वार होता है ब-निस्बत सड़क पर चलने के। सड़क हमें एक ही तल पर काफ़ी दूर तक ले जाती है उसके बाद उसकी ऊँचाई बढ़ती है। लेकिन सीढ़ियाँ उससे कम समय में हमें अगले पायदान पर पहुँचा देती हैं पर उसमें मेहनत अधिक लगती है। जीवन में भी हमेशा हमारे सामने सीढ़ी और सड़क दोनों रास्ते होते हैं। लेकिन जो व्यक्ति जीवन की पहाड़ियों पर बीच का रास्ता इख़्तियार कर पगडंडी पकड़ लेता है। वह हमेशा कामयाब होता है।

    सीढ़ियों का सफ़र ख़त्म कर हम ऊपर सड़क पर पहुँचे। देवदार के जंगल में सोई नागिन-सी सड़क। जिसके एक तरफ पत्थरों को लोहे के तारों से बाँध कर पुश्ता बनाया हुआ था। कुछ देर इसी पुश्ते पर बैठ कर हमने आराम किया। सीढ़ियाँ चढ़ने से हुई थकान जंगल से आती ठंडी हवा ने पल में छू मंतर कर दी। हवा के भी कितने रूप होते हैं। आज जिस शीतलता के साथ बहते हुए हमें राहत पहुँचा रही है, सर्दियों में यही सुईं सरीखी चुभती है और गर्मी में लू से भरे थपेड़े देती है।

    यह सड़क जो किलबरी रोड के नाम से जानी जाती है नैना देवी / चीना पीक होते हुए आगे पंगोट को निकल जाती है। सड़क पर गाड़ियों की आवाजाही बहुत अधिक थी। सड़क से जब हमने पगडंडी पकड़ ली, तब जाकर थोड़ी राहत मिली। ऐसा लगा जैसे सड़क नहीं हम शहर से ही दूर किसी गाँव में आ गए हों। पगडंडी काफ़ी चौड़ी थी। जिस पर कोशिश की जाए तो गाड़ी भी आराम से चलाई जा सकती थी।

    सावन में पहाड़ पर शबाब आया है, हल्की-हल्की बारिश की फुहारों से भीगे जंगल बरसात में भीगती लड़कियों जैसे खिलखिला रहे हैं। पहाड़ों पर हरे रंग के इतने शेड बिखरे हैं कि इनको नाम देने बैठूँ तो सुबह से शाम हो जाए फिर भी मैं सफल न हो पाऊँगा। हर पेड़-पौधे-घास, शाख़-पत्तियाँ-कोंपलें अपना एक मुख़्तलिफ़ रंग रखती हैं। इसलिए मुझे बरसात में पहाड़ घूमना सबसे अच्छा लगता है। चौमासे में पहाड़ पर यौवन आया होता है। पहाड़ी नदी-नालों-गदेरों में अजब सा अल्हड़पन आ जाता है।

    पगडंडी बहुत ख़ूबसूरत है। इसके दोनों तरफ़ घनघोर जंगल है और जंगल में उगी है बेशुमार जंगली हल्दी। यह सामान्य हल्दी जो हम घरों में प्रयोग करते हैं उससे काफ़ी अलग होती है।  इस हल्दी का पौधा देखने में हल्दी जैसा लगता है लेकिन इसकी जड़ें कुछ-कुछ अदरक जैसी होती हैं। इसका औषधीय प्रयोग होता है। आजकल इसके कुछ पौधों पर सफेद रंग के फूल भी खिले थे। हम मन-मोहक नज़ारों का आनंद लेते आगे बढ़े जा रहे थे। तभी एक मंज़र देख कर मैं ठिठक सा गया। दूर नीचे घने जंगलों के बीच से एक चर्च नज़र आ रहा है। अंग्रेज़ों के समय का  एक ख़ूबसूरत चर्च जिसका नाम है ‘सेंट जॉन इन द वाइल्डरनेस चर्च’। कुछ पल चर्च को निहारा और उसके बाद उसे आँखों के साथ-साथ कैमरे में भी क़ैद कर लिया।

    हम पगडंडी के अंतिम छोर पर पहुँचने वाले थे। कुछ ऊपर फिर वही सड़क घूम कर हमारे सामने आ गई थी जिसे हम नीचे छोड़ आए थे, ठीक उसी तरह जैसे भूले-बिसरे लोग ज़िन्दगी के किसी मोड़ पर हमसे दोबारा टकरा ही जाते हैं। पगडंडी के अंतिम छोर पर कुछ घर बसे हैं। वहीं से शुरू होता है नैना / चीना पीक का ट्रैक। ट्रेक के प्रस्थान बिंदु पर बहुत ही भव्य द्वार बनाया गया है। इस भव्य द्वार से ऊपर चोटी पर जाती पगडंडी पे, मेरी आँखों से निकल कर कुछ लोग चल रहे हैं। महिम भट्ट, मालदार कुंदन सिंह, कुँवर लाल बहादुर, सुंदर जोशी और इन लोगों के बीच फँसा बलि का बकरा गुरुदास शाह। दीवाली की शाम को यह लोग जुआ खेलने चीना पीक जा रहे हैं। गुरुदास को क्या ख़बर आज वो जेब में ठुसे दस हज़ार ही नहीं, अपनी मेवों की दुकान और यहाँ तक कि चन्दो को भी हार जाएगा। हाँ! बुड्ढे गुरुदास की नवयौवना बीवी चन्दो। आज नैनीताल हस्तिनापुर बनेगा और द्रौपदी की जगह चन्दो जुए में हारी जाएगी। लेकिन चन्दो का दुख द्रौपदी के दुख से बहुत बड़ा है। द्रौपदी को तो अपने जुए में हारे जाने की ख़बर बाद में लगी, लेकिन पतिव्रता चन्दो आज रात महिम भट्ट के घर में, महिम भट्ट और अपने पति गुरुदास के बीच बैठकर ताश की रानी बनकर रह जाएगी, जिस पर जीतने वाले का हक़ होगा। कल की सुबह गुरुदास नहीं देख पाएगा। वह पाषाण देवी के मंदिर के पास ताल में कूद कर ख़ुदकुशी कर लेने वाला है। उसे मर ही जाना चाहिए लेकिन वह अगर महिम भट्ट द्वारा उसकी बीवी को जुए पर लगाने की बात सुनकर चीना पीक से ही कूद जाता तो बेहतर रहता। आख़िर आदमी महाभारत काल से लेकर आज तक स्त्री को एक वस्तु ही समझता आया है। गुरुदास ने भी वही ग़लती की। उसने भी अपने रुपये,अपनी दुकान की तरह चन्दो को भी एक वस्तु समझा। चीना पीक की पगडंडी पर चढ़ते गुरुदास को मैं रोकना चाहता हूँ लेकिन वह नहीं रुक रहा। शायद हमारे बीच सदियों की दूरी है। (कहानी – पिटी हुई गोट / शिवानी)

    बहरहाल, यहाँ चीना पीक के शुरुआती पॉइंट पर, छोटी-मोटी चाय की दुकान हैं जिन्हें चाय की टपरी कहना ही उपयुक्त होगा। सड़क पर एक छोटा सा बोर्ड लगा था जिस पर लिखा था ‘टांकी रोड’। तो आख़िरकार हम टांकी रोड पहुँच ही गए। यहाँ दूर-दूर कुछ पुराने बंगले दिख तो रहे थे। मैंने चाय वाले से पूछा।

    ‘आपको पता है ये भिसूंणी रानी की कोठी किधर होगी?’

    ‘नहीं! मैं तो नहीं जानता’

    ‘अंग्रेज़ों के समय की कोठी है, शायद अब उसको रिज़ॉर्ट में तब्दील कर दिया गया है।’

    ‘वो सामने देखिए उधर कुछ कोठियाँ हैं, उनमें से ही कोई होगी।’

    सामने जिधर टांकी रोड का बोर्ड लगा था उससे कुछ क़दम दूर ही एक छोटी सी पगडंडी ऊपर की तरफ़ जा रही थी। हम उसी पर आगे बढ़ चले। थोड़ा ऊपर चढ़ने पर तीनों तरफ़ यहाँ अलग अलग इमारतें थीं। ठीक सामने वाली इमारत के पास बने एक छोटे से क्वार्टर से धुआँ निकल रहा था। मैंने आवाज़ लगाई तो एक महिला बाहर आईं। उनको भी इस संबंध में कोई ख़ास जानकारी नहीं थी। उनके घर के बराबर में जो बिल्डिंग थी वह पुरानी दूरदर्शन कॉलोनी थी, जिसके दिन भी दूरदर्शन के तरह लद चुके थे। यहाँ अब कोई भी नहीं रहता था। पूरी बिल्डिंग ख़ाली पड़ी थी।

    अब हमारे दाएँ और बाएँ दो कोठियाँ थी, उनमें से ही एक

    भिसूंणी रानी की कोठी होनी चाहिए। सबसे पहले हम दाएँ तरफ़ वाली कोठी गए, जो आस-पास से बांज के जंगल से घिरी थी। और देखने में लगता था कि किसी भी समय गिर पड़ेगी। बहुत जर्जर हालत में थी। ग्राउंड फ्लोर के बुरे हाल होने के बावजूद वहाँ पहली मंजिल पर लोग रहते थे। मैंने आवाज़ लगाई तो पहले तो ज़ोर-ज़ोर से कुत्ता भौंका और कुछ देर बाद एक युवक निकल कर बाहर आया जिसकी उम्र तक़रीबन तीस साल के आस-पास होगी। पूछने पर कि क्या यह कोठी भिसूंणी रानी की कोठी है। उसने साफ़ इनकार कर दिया। जब वह हमसे बात कर रहा था तो बाकी परिजन कमरों के बाहर खड़े हमें देख रहे थे। उन्होंने मुझे फोटो लेने की भी अनुमति नहीं दी। वह कोठी कोई जज साहब की थी और यह लोग किराए पर रह रहे थे। शायद हम चारों लोगों को देख कर वो थोड़ा डर गए थे क्योंकि जैसी हालत उस कोठी की थी प्रशासन कभी भी उनसे उसे ख़ाली करवा सकता था।

    अब एक कोठी बची थी जो सामने ही थोड़ी सी चढ़ाई पर थी। मेरी आख़िरी उम्मीद। यह कोठी अब रिज़ॉर्ट में तब्दील हो गई है। इसके बाहर बोर्ड लगा था Fair light Trails, एकदम शांत घने जंगलों की छाँव में बसी कोठी। आजकल ऑफ़ सीज़न होने की वजह से यहाँ कोई गेस्ट नहीं था शायद। बरामदे में गुलाब के फूलों की बड़ी बड़ी झाड़ियाँ थीं जिन पर लाल रंग के गुलाब अंगारों से दहक रहे थे। उनकी सुंदरता में चार-चाँद लगाने के लिए माली ने नक़ली फूल भी झाड़ियों पर चस्पाँ किये हुए थे।

    हमारा स्वागत कोठी में एक बिल्ली ने किया। जो गुलाब की झाड़ियों के बीच एक कमरे के दरवाज़े के बाहर बैठी थी। हमें देख कर उसने अपनी छोटी-छोटी आँखें फैलाईं और धीमे से बोली….म्याऊऊऊऊँ , मानो हिंदी में कह रही हो ‘आपका स्वागत है’ या उर्दू में ‘आपका इस्तक़बाल है’ या फिर फ़ारसी में ‘अज़ दीदन शुमा ख़ुश बख़्तम’ लेकिन ये हमारा भरम था। वह तो पूछ रही थी। तुम कौन हो? यहाँ किसलिए आए हो, किससे मिलना है? अब उसको क्या बताऊँ भिसूंणी रानी की कोठी ढूंड रहा हूँ। भिसूंणी रानी से मिलना है,….कहीं यह बिल्ली ही तो भिसूंणी रानी नहीं जो अपने दूसरे जन्म में फिर इसी कोठी में रहने आ गई हो।

    मैं कयास लगा रहा था कि तभी अंदर से एक छरहरे बदन के व्यक्ति हाथ में दूध का कटोरा लिए आए। उनकी उम्र 50-55 के दरमियान होगी। हमें देखकर उनकी आँखों में प्रश्न उभरने लगा। वो कुछ पूछ पाते उससे पहले ही मैंने प्रश्न दाग़ दिया।

    ‘क्या आप ही इस रिज़ॉर्ट के मैनेजर हैं?’

    ‘जी हाँ! कहिए आपको क्या काम है।’

    ‘हम नैनीताल में एक कोठी को ढूंड रहे हैं, जो अंग्रेज़ों के समय की है, उसे भिसूंणी रानी की कोठी कहते हैं। क्या ये वही कोठी है?’

    ‘जी ये वह कोठी नहीं है।’

    मेरा सारा उत्साह एक पल में ढेर हो गया। जिस कोठी के लिए तब से पैदल घूम रहे हैं, आख़िरी कोठी भी वह नहीं है। खैर! अब आ गए तो मैंने सोचा कुछ देर यही बैठते हैं और मैनेजर साहब से ही कुछ बात कर ली जाए। अपनी थकन भी कुछ कम होगी और इतनी दूर पैदल आने का दुख भी अधिक न होगा। मैंने उन से बातचीत शुरू की।

    ‘यह कोठी भी काफ़ी सुंदर है। पुरानी भी बहुत लगती है!’

    ‘जी हाँ! यह नैनीताल की सबसे पुरानी कोठियों में से एक है। 130 बरस हो गए हैं इस कोठी को, पहले यहाँ अंग्रेज़ रहते थे अब रिज़ॉर्ट में तब्दील हो गई।’

    ‘क्या आपको इसके अंग्रेज़ मालिक के बारे में कुछ पता है?’

    ‘मालिक के बारे में तो नहीं पता, 1960 के दशक के आस-पास सभी अंग्रेज़ यहाँ से अपनी ज़मीन-जायदाद बेचकर अपने मुल्क वापस चले गए। ज़्यादातर कोठियों को उस समय के भारतीय रईसों ने ख़रीद लिया, इस कोठी के किराए का कुछ हिस्सा अभी भी दूतावास को भेजा जाता है।’

    ‘अच्छा! तो आप कबसे यहाँ काम कर रहे हैं?’

    ‘मुझे तो बीस बरस होने को आए?’

    ‘आप लोकल हैं?’

    ‘नहीं! मैं हिमाचल से हूं। मंडी से।’

    ‘बड़ी दूर आ बसे आप’

    ‘अब क्या करें, रोज़ी के लिए तो देस छोड़ना ही पड़ता है!’

    ‘क्या यहाँ और कोई कोठी नहीं अंग्रेज़ों के समय की?’

    ‘ अरे! मैं तो बातों में भूल ही गया। वो सामने एक कोठी है। बहुत पुरानी है, अंग्रेज़ों के समय की, उसे ही भिसूंणी रानी की कोठी कहते हैं।’

    ‘क्या सच में!!’

    मुझे उनकी बातों पर यक़ीन नहीं हुआ। मैंने दो बार उनसे पुष्टि की। आख़िर घण्टों से नैनीताल की ख़ाक छानना बेकार नहीं जाने वाला। ऐसे समय में एक छोटी सी आशा की किरण भी बहुत बड़ा सहारा देती है। यहाँ तो आशा नहीं अब विश्वास हो चला था। मैनेजर ने कहा इधर आइए मैं आपको दिखाता हूँ।  हमने कोठी के आँगन में बनी रेलिंग से खाई की तरफ़ बसे नैनीताल शहर को पहली बार देखा।

    यहाँ से नैनीताल शहर को देखकर कुछ क्षण के लिए तो हम अवाक रह गए। क़ुदरत की शाहकार पेंटिंग, जो देखे देखता ही रह जाये। चारों तरफ़ से पहाड़ों से घिरी नाशपाती के आकार की झील(पर मेरे अनुसार पहाड़ पर होने वाली भट्ट या लोबिया की दाल सरीखी) जिसमें नौकाएँ तैर रही हैं। ऊपर से देखने में लगता है किसी पानी भरे कटोरे में चींटियाँ तैर रही हों। झील का जल हमेशा की तरह-शांत गंभीर, अपनी गहराई का पता देता है। दूर तल्ली-ताल को आधा बादलों ने घेर लिया है तो आधे की परछाईं पर झील का क़ब्ज़ा है। बाईं तरफ़ एक के ऊपर एक घर भुट्टे के दाने सरीखे आपस में गुथे हुए हैं। और दाईं तरफ ठंडी सड़क के किनारे पाषाणी देवी का मंदिर दिखाई दे रहा है। जहाँ कुछ दिल पहले भूस्खलन से पहाड़ का कुछ हिस्सा झील में समा गया था। उसी पहाड़ पर घने जंगल के बीच शेरवुड कॉलेज की इमारत और हमारे बिल्कुल नीचे नैनी देवी मंदिर के पास वाला ग्राउंड नज़र आ रहा है जो बारिश के कारण ख़ाली पड़ा है।

    ‘वह देखिए आप जो सामने पुराना बंगला देख रहे हैं वही भिसूंणी रानी की कोठी है।’ पिछले से जंगल और आगे से कुछ घरों से घिरी एक कोठी की तरफ़ उन्होंने इशारा किया।

    ‘क्या आपको पता है इसको भिसूंणी रानी की कोठी क्यों कहते हैं?’

    ‘यह तो मुझे नहीं पता, शुरुआत से बस यही सुनते आए हैं कि वह भिसूंणी रानी की कोठी है।’

    ‘अच्छा! क्या नीचे वाली सड़क ही कोठी तक जाती है?’

    ‘हाँ! आप बस सड़क पर नीचे उतरते जाइये 10-15 मिनट लगेंगी।’

    ‘आपका बहुत शुक्रिया! आप की वजह से मैं इस जगह को खोज पाया।’

    ‘शुक्रिया की कोई बात नहीं, आप सभी से मिलकर मुझे भी बहुत अच्छा लगा। कभी भी आप नैनीताल आएँ तो इधर ज़रूर आइएगा। आप मेरा नम्बर ले लीजिए…।’

    ‘आपका नाम?’

    ‘विजय ठाकुर!’

    हम सड़क से नीचे उतर रहा थे। हमारे साथ आये अनुराग शर्मा भाई का जज़्बा कमाल का है। अभी दो महीने पहले ही उसके पाँव में फ्रैक्चर आ गया था। अब ठीक है पर चलने पर हल्का सा दर्द कभी कभी होता है, इसके बावजूद वो कितने समय से हमारे साथ पैदल घूम रहा था। उसका कहना था जब इतनी दूर आया हूँ तो कोठी को देखकर ही जाऊँगा। तो बस हम बढ़े जा रहे थे कोठी की ओर। सड़क के मोड़ पर जगह जगह भुट्टे वाले भुट्टे बेच रहे थे और बारिश के मज़े के साथ नैनी झील को निहारते हुए जोड़े, भुट्टे-बारिश को एन्जॉय कर रहे थे।

    आगे सड़क मोड़ ले रही थी और मोड़ पर बाहें टिकाए एक पगडंडी पहाड़ पर लटकी थी।  उसी के ऊपर वो जगह थी जिस को हमें विजय ठाकुर ने दिखाया था। एक बार पुनः पुष्टि करने के लिए मैंने पगडंडी से गुज़रती एक उम्रदराज़ महिला से पूछा।

    ‘आंटी, ये भिसूंणी रानी को कोठी कहाँ होगी?’

    ‘बेटा, ये जो ऊपर कोठी दिखने वाली हुई, वही भिसूंणी रानी की कोठी ठहरी।’

    ‘क्या आप जानती हैं, इसको भिसूंणी रानी की कोठी क्यों कहते हैं?’

    ‘बेटा हम तो बचपन से यही सुनते आने वाले ठहरे, जो कहते होंगे कि’

    ‘क्या आपको पता है यह कोठी कितनी पुरानी है?’

    ‘अंग्रेज़ों के बख़त की कोठी हुई, अब तो कोई नहीं रहता।’

    आंटी से बात करने के बाद मैं कोठी की तरफ़ बढ़ा। रास्ते में अब कोई पांगर (चेस्टनट) का पेड़ नहीं है और न ही वो पत्थर जिसपर रांदे-वू लिखा होगा। आख़िर वक़्त भी तो कितना गुज़र गया इस कहानी को, 1954 की पृष्ठभूमि है। शहर के बदलने पर पुराने वक़्तों के निशान भी कहाँ ठहर पाते हैं।

    कोठी की तरफ़ क़दम बढ़ाते हुए मेरा उत्साह अपने चरम पर था। मानो मैं उसी वक़्त में पहुँच गया हूँ। पगडंडी पर बढ़ता प्रत्येक क़दम मुझे उस दौर में ले जा रहा था। बरसात में हरी घास से भरी पगडंडी। क़दम बढ़ाने पर जो अजब सी आवाज़ करती है, जैसे बदन रौंदने पर कराह रही हो।

    मेरे सामने एक प्राचीन कोठी खड़ी है अपनी भव्यता का ऐलान करती हुई। जिसके शरीर पर वक़्त की खरोचों के निशान हैं जो अपने जवानी के सफ़र को पार करती हुई बुढ़ापे में आख़िरी साँसें गिन रही है। कोठी के बाहर को निकले ख़ुबसूरत छज्जे का भार उठाने वाले दो स्तम्भों में से एक ढह कर मिट्टी में मिल चुका है। दूसरा स्तंभ अकेले दूसरे का भी भार अपने कंधों पर लिए खड़ा है। छज्जा बेहद खूबसूरत है, उसमें कांच की दर्जनों खिड़कियाँ लगी हैं। कोठी की पहाड़ी ढलुआ छत का बेश्तर हिस्सा बुरी तरह जर्जर हो चुका है।

    मैं बरामदे में खड़ा बस उसे निहारे जा रहा हूँ। एक पल को पूरी कहानी आँखों के सामने तैर गई।

    देखता हूँ अचानक रात हो चुकी है, मेरे बराबर में डी.डी. बंगले के बाहर आकर खड़ा है, वह अभी-अभी बम्बई से पहुँचा है। बंगले से लड़कियों की धमाचौकड़ी की आवाज़ें आ रही हैं। शायद कुमाउँनी गीतों की ताल पर बेबी अंदर नाच रही है। अगले दिन फिर तीसरे पहर मंडली जमी है और बब्बन, गुड़िया, बेबी सब गीत गुनगुना रहे हैं। डी.डी. ने भी एक कुमाऊँनी गीत गुनगुनाया “तेरो जूठो मैं नी खाछ्यूँ, माया ले खवायौ सुआ ( तेरा जूठा मैं नहीं खाता, प्रीत ने खिलवा दिया, सुग्गी!)….बेबी उसको देख रही है और खिलखिला कर हँस रही है।

    कोठी के बरामदे को देखता हूँ वह सीन जीवंत हो उठता है।  गोधूलि का समय है, डी.डी. बरामदे में जंगली गुलाब के झाड़ के पास खड़ा हुआ है। बरामदा सूना है। बेबी पीछे से हुँ-हुँ-हुँ करके एक धुन गुनगुनाती आ रही है- ‘छुप-छुप खड़े हो जरूर कोई बात है।’ बेबी को गाता देख डी.डी. भी एक गीत गुनगुनाने लगा है ‘तुम्हारा मेरे साथ यूँ गुनगुनाना। हमें न भुलाना, भुलाना, भुलाना, भुलाना’ और बेबी चुप चाप बस उसे गाते हुए देख रही है और मैं उन दोनों को, यौवन की उर्वर ज़मीन पर प्यार के बीज बोते हुए। प्यार भी क्या चीज़ होती है इसमें जीत-मात, मिलना-बिछड़ना, रोना-हँसना हर चीज़ मज़ा देती है। सिर्फ़ मज़ा ही नहीं देती। जीने का सलीक़ा भी सिखाती है। अपने लड़कपन के दिनों में एक शेर कहा था मैंने –

    जीने का सलीक़ा और अंदाज़ सिखाती है

    सौ जीत से बेहतर है इक मात मुहब्बत की

    सोच रहा हूँ, दोनों के दरमियाँ मुहब्बत की मकड़ी ने जो जाल बुनना शुरू किया है ये दोनों उसमें फँस कर रह भी पाएंगे कि नहीं। ख़ैर अंजाम से तो हम सब वाक़िफ़ ही हैं।

    कोठी के मुख्य द्वार की दीवार एकदम जर्जर हो चुकी है। इतनी जर्जर की अब वह सीधी भी नहीं है ऊपर की तरफ़ उसमें बहुत बड़ी-बड़ी दरारें हैं। डर लग रहा है कहीं गिर न जाए। जर्जर हालत देख अंदर जाने की हिम्मत नहीं होती। मैं बड़ी एहतियात के साथ दरवाज़े तक जाता हूँ और टूटे काँच से अंदर झाँकता हूँ। अंदर एक काफ़ी बड़ा कमरा है। यह शायद बैठक होगी। कोठी अंग्रेज़ों के समय की है तो उसमें आग जलाने के लिए बड़ी सुंदर चिमनी भी बनी है। बिस्तर, सोफ़ा, कुर्सियाँ आदि फर्नीचर पड़ा है जो अब ख़स्ता-हाल है। दीवारों का रंग उतर चुका। लकड़ी के दरवाज़े बेशक़ मजबूती के साथ टिके हैं और उनके साथ टिकी हैं चौखटें।

    आँगन में घास और जंगली कूड़ा उगा हुआ है। कहीं कहीं टूटकर गिरे हुए पत्थर पड़े हैं। सामने एक पिलर / स्तम्भ भी धराशायी है। लेकिन न जाने कहाँ से दरवाज़े के पास एक कैला लिली (Cala lilly) (वैज्ञानिक नाम-ज़ांटेडेशिया) का फूल खिला है। पीले रंग का ख़ूबसूरत फूल। कैसा विरोधाभास है। जर्जर पड़ी इस इमारत के अहाते में ताज़ा-ताज़ा खिला लिली का फूल। मिर्ज़ा ग़ालिब का शेर अनायास ज़बान पर आ बैठता है।

    उग रहा है दर-ओ-दीवार पे सब्ज़ा ‘ग़ालिब’

    हम बयाबाँ में हैं और घर में बहार आई है

    बरामदे से होते हुए मैं कोठी का चक्कर लगाने लगा। कोठी के दाएँ तरफ़ वाले भाग में कुछ कमरे हैं, जो कुछ बेहतर अवस्था में हैं किंतु अंदर प्रवेश करना इधर से भी ठीक नहीं। यहाँ भी मैंने खिड़की के सहारे अंदर का जायज़ा लिया। एक कोने में पलंग पड़ा है वहीं दूसरी तरफ़ एक टेबल है। जिस पर शायद दशकों से धूल जमी है। टेबल के पास एक दरवाज़ा है, जो शायद बाथरूम होगा। मेरे सामने फिर एक फ़िल्म-सी चल पड़ी। कहीं यह वही कमरा तो नहीं। जहाँ बेबी, डी.डी. को सुबह की पहली चाय देने आई होगी और वह बाथरूम में ‘हमें भूल जाना’ गाते हुए स्नान कर रहा था। डीडी के अंदाज़ में कहें तो बेबी ‘मगन चहा /मॉर्निंग टी’ लेकर आई है और अति उत्साहित लाटा डी.डी. ‘मगन चहा’ गिरा देता है। जिससे बेबी के अंगूठे से ज़रा ऊपर एक फफोला उभर आया है और पगला डीडी बेबी की बातों में आकर उसके पाँव का फफोला चूमने को झुका है। सच है प्रेम में पड़ा आदमी क्या क्या नहीं करता, कभी चाँद तारे तोड़कर लाता है, कभी दुनिया से लड़ जाता है, तो कभी प्रेमिका के पाँव चूमने को झुक जाता है। वैसे भी प्यार झुकना या कहें विनम्रता सिखाता है। जो लोग मुहब्बत में झुकना नहीं सीख पाते। उनकी अना महब्बत को उनसे छीन लेती है।

    अब मैं कोठी के पीछे की तरफ़ गामज़न हुआ। जहाँ पिछवाड़े में टाट और बाँस से बनी अस्थायी टट्टी में डी.डी. के पायजामे में मारगाँठ पड़ी थी। और यही वह क्षण था जब नायक और नायिका की पहली मुलाक़ात हुई थी। ऐसी मुलाक़ात सिर्फ़ मनोहर श्याम जोशी ही करा सकते थे जिसमें भदेस की मुख्य भूमिका थी। लेकिन कोठी के पिछवाड़े को देखकर मैं एकदम चौंक उठता हूँ। कुछ क्षण तक तो कुछ समझ नहीं आता। सामने से इतनी ख़ूबसूरत कोठी पीछे से पूरी ढह चुकी है। कमरे के कमरे धराशायी हुये पड़े हैं। मलबे का अंबार लगा है। पत्थर, लड़कियाँ, टूटे दरवाज़े-खिड़कियाँ, आधी ढह चुकी सीढ़ियाँ। मुझे एक ज़ोर का धक्का लगा। इतनी ख़ूबसूरत और प्राचीन इमारत का यह हाल देखकर आँखें नम हो आईं। न जाने हम भारतीय कब अपनी धरोहरों का सम्मान करना, उनका संरक्षण करना सीखेंगे।

    मकान के एक-एक पुर्ज़े को मैं ग़ौर से देख रहा हूँ। जैसे मलबे के ढेर में पड़ा हर पत्थर मुझसे अपनी कहानी कह रहा हो। जैसे वो बरसों से मुन्तज़िर हों किसी की आमद के, जिसे वो अपना हाल-सुना सकें। यह बंगला ईंटों से नहीं पत्थरों से बना है। जैसे पुराने पहाड़ी घर बनाए जाते हैं। जाने कहाँ कहाँ से यह पत्थर इकट्ठे किये गए होंगे। जाने कहाँ-कहाँ से कितने पेड़ काटे गए होंगे, तब यह खिड़कियाँ, दरवाज़ें, सीढ़ियाँ, लकड़ी की छत बनाई गई होगी। तब जाकर नैनीताल के माथे पर यह ख़ूबसूरत बंगला बना होगा और इसमें रहने आई होगी भिसूंणी रानी। सोचता हूँ क्या नाम होगा उसका, कैसी दिखती होगी। उसकी भी कोई कहानी होगी, जैसे इस बंगले के हर पत्थर की अपनी कहानी है। लेकिन कहानी तो दूर की बात उसका नाम तक न रह सका। नैनीताल में अगर कोई उसे याद भी करता है तो भिसूंणी नाम से। भिसूंणी मतलब फूहड़। सोचता हूँ क्यों हमेशा औरतें ही फूहड़ होती हैं,मैंने कभी किसी आदमी को फूहड़ कहते नहीं सुना। कैसी विडंबना है कि रानी मर गई, उसका बंगला भी मिट्टी में मिलने लगा है लेकिन उसके नाम से यह विशेषण नहीं मिटता। वह आज भी फूहड़ है।

    बहरहाल, मैं वापस कोठी के बरामदे में आ गया हूँ मेरे सामने देवदार का एक विशालकाय पेड़ खड़ा है। यह बहुत पुराना पेड़ होगा, शायद इसने कोठी को बनते-बिगड़ते देखा होगा। इसने भिसूंणी रानी को भी देखा होगा, बेबी और डीडी को भी देखा होगा और मनोहर श्याम जोशी को भी। मुझे नहीं लगता कभी बंगले में रहे या आये बिना उन्होंने ‘कसप’ लिख दिया होगा। जिस तरह उपन्यास में उन्होंने कोठी और उस तक पहुँचने का वर्णन किया है, वह बिना यहाँ आये संभव ही नहीं।

    देवदार के विशाल पेड़ के आस-पास बहुत से छोटे-मोटे पेड़ भी उसकी छाँव में पल रहे हैं। वो भी बहुत बड़े हैं लेकिन देवदार के बच्चे सरीखे। कोठी के नीचे घरों का भी अंबार लग गया है। कभी इस रास्ते पर सिर्फ़ बांज और देवदार के पेड़ थे। मिडल चीना रोड से सिनेमा देखने के बाद जब डीडी-बेबी की टोली इस रास्ते से वापस आती है तो घने बांज-बुरांस के जंगल का वर्णन जोशी जी ने किया है।

    इसी रास्ते पर ‘शिबौ शिबौ’ खेल में नायिका द्वारा डी.डी. का मज़ाक़ बनाये जाने पर वह नाराज़ होकर चल दिया था। जिसे बेबी रोकने के लिए आई थी। यहीं उनके प्यार के रास्ते में पहली रुकावट आई, यहीं नैनीताल क्लब से लौटते ठुल’दा ने उन्हें साथ में पकड़ा और आगे की कहानी हम सभी जानते हैं।

    बरामदे में खड़ा मैं देख रहा हूँ पेड़ों के झुरमुटों के पीछे नज़र आती नैनी झील, उसमें तिरती नावें। धीरे धीरे चादर की तरह लिपटते बादल, बदन को स्पर्श करती ठंडी हवा, लम्हा-लम्हा शाम की आग़ोश में समाता शहर और अपने ऊपर फैलता उदासी का  साया।  मैं कोठी को अंतिम बार निहार कर पलट गया हूँ रास्ते पर। उतर रहा हूँ सीढ़ी-दर-सीढ़ी। मेरे आगे-आगे चल रही हैं। गुड़िया-बेबी-दया, तैयार होकर नैनीताल बाज़ार।  पीछे खड़ा रैलिंग पर निहार रहा है हमें, सिगरेट सुलगाए डी.डी.। उतरते उतरते पहुँच गए हैं हम उस मोड़ पर, जहाँ से कोठी हो जाएगी हमारी आँखों से ओझल और हम कोठी के लिए। सिगरेट को रेलिंग से मसलकर बुझा दिया है डीडी ने और गुनगुनाने लगा है…'”हमें भूल जाना, इन्हें ना भुलाना, इन्हें न भुलाना, इन्हें न भुलाना……”।

    – अभिषेक कुमार अम्बर

     

     

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