मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास आया है ‘त्रिमाया’। जंगल, हाथियों की दुनिया को लेकर लिखे इस उपन्यास पर यह टिप्पणी लिखी है युवा लेखिका सोनू यशराज ने। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास की समीक्षा आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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आकाश पिता कहलाता है और धरा, जिस पर हमारा जीवन है,हमारी माँ है। यह हमारा मूल है इस मूल से सारा जग उपजा है।स्वाभाविक रूप से और जन्म से परस्पर निर्भरता के कारण हमारा लगाव माँ से अधिक होता है।पर पितृसत्ता और मातृसत्ता दोनों की अमरबेल विश्वभर में छाई हुई है।दोनों के अपने -अपने परिचय,पराक्रम, परिधियाँ हैं।बहुधा वर्षों से पितृसत्ता का आताताई रूप हमारे समाज के समकक्ष आ रहा है। ऐसे समय में भारतीय मातृवंशीय समाजों पर केंद्रित उपन्यास त्रिमाया पढ़ना सुखद है।वरिष्ठ उपन्यासकार, कथाकार एवं पर्यावरणविद मनीषा कुलश्रेष्ठ की सशक्त लेखनी त्रिमाया के द्वारा मातृवंशीय प्रणाली की सुचिन्तित विराट दुनिया को हमारे सामने बेहद रोचक ढंग से खोलती है। जैसा कि इस किताब के बारे में अपने विचार रखते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और मानव विज्ञान के विशेषज्ञ पीसी जोशी कहते हैं – मातृवंशी प्रणाली ने मानव विज्ञानियों को हमेशा आकर्षित किया है।बाखाफेन ने अनुमान किया था कि मातृसत्तात्मक व्यवस्था का जन्म सामाजिक जीवन में व्यवस्था लाने के लिए हुआ होगा। जीपी मर्डोक ने 250 संस्कृतियों का अध्ययन किया जिसमें 51 मातृसत्तात्मक थी। इस आंकड़े से हैरत होती है कि वे संस्कृतियाँ जो मातृसत्ता का परचम लहराती थी,कैसे पितृसत्तात्मकता में बदलती चली गई। यह उपन्यास इन्हीं विमर्शों पर अपने सशक्त विचार रखता है।
उपन्यास में कथा के मुख्य बिंदु को एक सुंदर विस्तार देते चार अध्याय हैं- विलक्षण माया,मायाविडु,सुनहरे तारों के पुल :माइया मार्गरीटा और त्रिमाया।
उपन्यास के पहले ही अध्याय में जंगल के रहस्यों और उसमें स्वतंत्रता से रहने वाले विशाल गज और उनकी अलबेली दुनिया से हमारा परिचय होता है। लेखिका हाथी समाज के भीतर काया प्रवेश कर जाती हैं और यह जीवंत अध्याय दृश्य से एकमेव कर देता है। यहाँ मातृसत्ता भव्य और विराट रूप में उपस्थित है। खूबसूरत जंगल और उसके अजनबी रास्ते, फारेस्ट ऑफिसर वॉपी, जलदापारा हासीमारा के जंगल, तीस्ता तोरसा नदियाँ,हाथियों के सुंदर नाम, उनकी खुशियाँ, दुःख- संघर्ष,जीने की जद्दोजहद, इंसानी दखल की दास्तां पढ़ते -पढ़ते मेरे जैसे पाठक हाथियों के एक समूह में शामिल हो जाते हैं।लैला और विलक्षण माया इसी समूह में है। नमकचाट, धूलिस्नान जैसे दिलचस्पी जागते उपक्रम और वह कोरस आऊँघ जैसी आवाजों की अनायास आवाजाही किसी मदमस्त हाथी की तरह मन में झूमती बजती है।
“तुम लोगों की तरह हम भी अपने दिवंगतों का शोक मनाते हैं और नव जन्मों का उत्सव। हमारी अपनी खूब समृद्ध भाषा है, हम अपने होने का इतिहास जानते हैं, हम खुद को पहचानते हैं!हम अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य का अंतर जानते हैं।हम याद रखते हैं जीते हैं और आदत निर्धारित करते हैं और उसकी चिंता भी करते हैं।हम मनुष्य जनित खतरे को भाँप रहे हैं। मैं जीवन और जंगल के इस विशाल लैंडस्केप में एक मजबूत खंबा हूँ,मैं माया हूँ।एक प्राचीनतम मातृ सत्तात्मक समाज की जिंदा प्रतीक।”
सघन जंगल से शुरू हुआ ये उपन्यास अपनी सुंदर गति और लय से मूल उद्देश्य मातृसत्ता और इकोफेमिनिज्म के मजबूत पहाड़ पर चढ़ता जाता है। उपन्यास में हैप्पी वैली स्थित लबस्ना कैंपस ( लाल बहादुर शास्त्री नेशनल एकेडमी ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन) की गतिविधियां के सुंदर दृश्य उकेरे गए हैं।अपने शहर को छोड़ने का दुःख हर बार सामने आता है पर जाते समय यही जगह, दोस्त अपने से लगते हैं।आईएएस बनने के पहले की कठिन ट्रेनिंग और उसके मध्य में खूबसूरत पल चुराने की सफल- असफल कोशिशे करते-करते युवा जिंदगी अपने उद्देश्य पा जाती है।माया ने कभी सोचा नहीं था कि वह मेघालय के मातृ वंशीय समाज पर शैक्षणिक प्रेजेंटेशन तैयार करते-करते इस विषय की तह तक जायेगी। और तभी उसे पता लगता है सोपान सर की परनानी एक अल्फा वूमेन थी।थारवाड की अम्माची। इसी क्रम में उसे त्रिशूर में नायर संस्कृति का विराट परिचय मिलता है।
उपन्यास की भावभूमि में विशाल जंगल, विराट हाथी, कुलमाता, खासी समाज,नायर समाज की कद्दावर महिलाएं अमिट छाप छोड़ती हैं, जिसके पदचिन्होँ पर चलते हुए वह अपनी परिणीति पाता है। मायाविड़ु सोपान सर,माया की कहानी के माध्यम से लेखिका केरल की कला -संस्कृति- विरासत के गलियारों में, नायर समाज की उत्कृष्ट परंपराओं के आंगन में ले जाती है।और यहीं मिलता है नायर समाज की उदात्त विरासत का भव्य विराट परिचय। कलानिलयम की धरोहर अजीब से रोमांच से भर देती है।प्रकृति और परिवेश की मादकता को आत्मसात करता सोपान- माया के बीच पनपता प्रेम मातृसत्ता के बीच पल्लवित होता है।
कैसे एक विशाल सत्ता उठ खड़ी हुई और कैसे ढह गई। मातृ वंशीय परंपरा, उसका जगता इतिहास और फिर उसकी उलझनें और फिर पितृसत्ता में एक पूरी पीढ़ी का प्रवेश। यह उपन्यास इसी मोड़ पर याद दिलाता है मातृसत्ता के अंत को दर्शाती 1921 में बनी राजा रवि वर्मा की पेंटिंग जिसमें एक नायर महिला गोद में लिए बच्चों से कहती है -हेयर कम्स पापा!!
तीसरे अध्याय में माइया मार्गरीटा एक नितांत अपरिचित पात्र है जो पाठक को अप्रत्याशित रूप से चकित करता चलता है।वह खासी समुदाय से है जो भारतीय मातृ वंशीय प्रणाली की अंतिम कड़ी है।ज़ब वह अपनी बेबाकी, खुले- सुलझे विचार और परिवार की कुडु को शक्ति सौंपने के सारे जतन करती चलती है तब ऐसे लगता है कि अपने से ऊपर आगे बढ़कर दूसरों के लिये सोचने वाले लोग अभी इस दुनिया में कहीं न कहीं साँस ले रहे हैं।और इन सबके मध्य साँस लेता -खोता है नकुल और माइया का प्रेम।यहाँ एक जगह उपन्यास की लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ की कलम कहती है –
“माइया जानती है इत्मीनान के पैरों के नीचे जमीन नहीं होती। वह जब होता है पर फड़फड़ाता हुआ तो कुछ और नहीं होता,जब वह नहीं होता तो कितने दाने डालो वह नहीं उतरता जिंदगी की छत पर।उसे जाल डाल उतारना होता है। नकुल के लौटने से माइया मार्गरीटा अपनी ही राख से जी उठी थी फिनिक्स की तरह।जीवन के इस ढलते हुए समय में नकुल के आने पर उसे ऐसी अनुभूति हुई जैसे कोई लंबा नाटक समाप्त हो चुका हो और हॉल खाली होने के बाद वह चुपचाप भीतर आ गया हो और उससे पूछा गया हो अब आ गए हो तो कौन सी भूमिका अदा करोगे, लगते तो जाने पहचाने हो।”
चौथा अध्याय प्रस्थान बिंदु है जो उपन्यास के मानीखेज उद्देश्य को अपनी ठसक से संप्रेषित करते हुए नये सवाल जवाब सौंपता है।
सचमुच यह विलक्षण उपन्यास मातृसत्ता और इकोफेमिनिज्म का एक जीवंत दस्तावेज है जो शोधपरक विषय, भाषा और ट्रीटमेंट की कसौटी पर खरा उतरता है।ये बात काबिलेगौर है कि त्रिमाया उपन्यास का तानाबाना,अल्फ़ा हथिनी से लेकर अल्फ़ा वुमेन तक और फिर मार्गरेट और त्रिमाया,प्रत्येक भाग में भाषा के कुशल,नव प्रयोग और वैविध्य इसे रोचक बनाते हैं। जाहिर है मातृसत्ता कोई कमजोर विषय नहीं, यह उपन्यास एक सजग पाठक का आग्रह तो रखता ही है।
सुंदर छपाई के साथ त्रिमाया उपन्यास वाणी प्रकाशन से आया है। आवरण पृष्ठ मनोयोग से रचा गया है, जिसमें जंगल, गज और दो स्त्रियां एक योजक बनाते हैं।एक स्त्री गज के दो प्रमुख अस्त्र लंबी सूंड और दाँत के पास खड़ी है। दूसरी स्त्री निर्मल आँखों वाले गज पर बैठी है,जिसके बाल और आँचल मातृसत्ता के परचम की प्रतीति देते हैं।
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उपन्यास – त्रिमाया
लेखिका- मनीषा कुलश्रेष्ठ
प्रकाशक – वाणी प्रकाशन
आवरण : कनुप्रिया
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सोनू यशराज
कवि – कथाकार, सूचना शिक्षा संचार सलाहकार
प्रमुख उपलब्धियाँ एवं सम्मान :
- जनवरी 2025 में कहानी ‘ उस रात ‘ को मध्य भारत ,इंदौर में डॉ प्रेम कुमारी नाहटा अखिल भारतीय कहानी का प्रथम पुरस्कार
- विमेन ऑफ दी फ्यूचर अवॉर्ड 2023
- कृति पुरस्कार (पहली बूंद नीली थी)
- एक कविता शीर्षक ‘ चोरी’ का छह भारतीय भाषाओं में अनुवाद
- किताब पर लिखी पाँच कविताओं का पंजाबी में अनुवाद(प्रो.नव संगीत सिंह द्वारा)
- ग्वालियर सेंट्रल लाइब्रेरी की डाक्यूमेंट्री में किताब पर लिखी गई कविता शामिल।

