इस साल प्रसिद्ध लोक गायिका मालिनी अवस्थी की किताब आई ‘चंदन किवाड़’, लोकगीतों की दुनिया को लेकर एक शानदार किताब। इस किताब पर आज लिखा है प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी वाणी त्रिपाठी ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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कुछ किताबें पढ़ी नहीं जातीं, महसूस की जाती हैं। कुछ किताबें सिर्फ़ देखी नहीं जातीं, सुनी जाती हैं। मालिनी अवस्थी की चन्दन किवाड़ उन्हीं किताबों में से एक है। इसे पढ़ते हुए लगता है जैसे आप किसी पुराने घर की देहरी पर खड़े हैं—एक घर जिसकी मिट्टी की दीवारों पर वक्त की उँगलियों के निशान हैं, जहाँ बरामदे में चुपचाप बैठा चाँदनी रात का सन्नाटा है। वहाँ एक दरवाज़ा है—चन्दन का दरवाज़ा। आप जैसे ही उसे हल्का-सा धक्का देते हैं, किवाड़ चरमराकर खुलता है, और उस पार से एक हवा का झोंका आता है जिसमें सावन की कजरी की मिठास है, चैती की सादगी है, और दूर कहीं से आती किसी मेले की आवाज़ है।
‘चन्दन’ – सुगंध, पवित्रता, और स्मृति का प्रतीक है। ‘किवाड़’ – एक चौखट, जो अतीत और वर्तमान, घर और बाहरी दुनिया के बीच की रेखा है। मालिनी अवस्थी का यह संस्मरण उस चौखट को पार करने का आमंत्रण है—एक ऐसा आमंत्रण जो हमें उस लोक में ले जाता है जहाँ गीत सिर्फ़ गाए नहीं जाते, जिए जाते हैं। चन्दन किवाड़ के पन्ने एक-एक कर खुलते हैं तो लगता है मानो हर पन्ना किसी नए सुर में ढल गया हो। कभी आप अवध की गलियों में हैं, जहाँ गली-गली से चैती की गूँज आती है। कभी आप बुंदेलखंड की तपती ज़मीन पर हैं, जहाँ कर्मा नृत्य के कलाकार शाम ढलते ही ताल ठोकते हैं। कभी आप शादी-ब्याह के आँगन में पहुँच जाते हैं, जहाँ दादी-नानी की आवाज़ में बधाई गूँज रही है और गीतों में जीवन की सारी खुशियाँ, सारे दुख, सारी कहानियाँ समाई हुई हैं। मालिनी अवस्थी इन गीतों की सिर्फ़ स्मृति नहीं संजोतीं, बल्कि उन्हें शब्दों से जी उठने देती हैं।
मालिनी की लेखनी में वही लय है जो उनकी गायकी में है। उनके वाक्य कभी ठुमरी की तरह धीरे-धीरे उतरते हैं, कभी कजरी की तरह लहराते हैं, तो कभी दादरा की तरह अचानक मन को छू जाते हैं। पढ़ते हुए लगता है कि सरकार की उदासीनता के कारण हमारी इतनी बड़ी लोक कला, धरोहर उपेक्षित होती गई। मालिनी अवस्थी ने उसी को फिर से जीवंत बनाने का प्रयास किया है। धोबिया कलाकारों को केंद्र में लिख कर रचा गया पाठ और निमिया के डार मैया अध्याय में भी करमा के कलाकारों की आर्थिक स्थिति और उदासीनता का वर्णन है। गोदना गोदे गोदनहारी अध्याय में जाति व्यवस्था पर प्रहार है और लोक संस्कृति कैसे समावेशिता की बात करती है, उसे ही रेखांकित करता है। आज जब समाज को तोड़ने की कोशिश है, उस अध्याय में समरसता के सूत्र हैं।
इस किताब की सबसे बड़ी ताक़त यही है कि यह बार-बार हमें याद दिलाती है—लोकगीत सिर्फ़ कला नहीं, जीवन का तरीका हैं। हर कजरी के पीछे सावन की एक बेचैनी है। हर चैती के पीछे खेतों में बोए गए सपनों की महक है। हर दादरा के पीछे किसी स्त्री की वह चुप्पी है जो गीत में आवाज़ बन जाती है। मालिनी अवस्थी इन गीतों को सिर्फ़ संगीत की शैली के तौर पर नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सामने रखती हैं।
चन्दन किवाड़ को पढ़ते हुए लगता है जैसे आप बार-बार उस गलियारे में लौट रहे हैं जहाँ बचपन की आवाज़ें हैं, मेले की हलचल है, और चौपाल की हँसी है। आज लोकसंगीत बदल रहा है। यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर नए लोकगायक, नए प्रयोग सामने आ रहे हैं। किताब इन आधुनिक प्रवृत्तियों को थोड़ी ही जगह देती है—शायद इसलिए कि यह एक नॉस्टैल्जिक गीत की तरह रची गई है। लेकिन पाठक उम्मीद करता है कि मालिनी की आवाज़ भविष्य के लिए भी कोई नई तान छेड़ेगी।
चन्दन किवाड़ किताब से ज़्यादा एक अनुभव है। इसे पढ़ते हुए आप महसूस करते हैं कि हवा में एक कजरी तैर रही है, सावन की पहली बूँद ज़मीन पर गिरी है, और चन्दन का दरवाज़ा धीरे से खुलकर आपको बुला रहा है। यह किताब अतीत की दुनिया का वो किवाड़ खोलती है, जहाँ आवाज़ें धीमी हो गई हैं पर अब भी गूँजती हैं।
और यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है – यह हमें सुनना सिखाती है। वह ध्वनि जो मिट्टी में है, वह तान जो हवा में है, और वह स्मृति जो हमारे भीतर कहीं गहराई में है। ‘चंदन किवाड़’ माहज किताब नहीं धरोहर है, जिसके ऊपर एक प्रसिद्ध गायिका के हस्ताक्षर हैं। जिसने लोक के आलोक को सामने लाने के लिए अपना जीवन लगा दिया।

