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  • कथा-कहानी
  • प्रज्ञा विश्नोई की कहानी ‘मर्सिया–ए–दिल्ली’

    हाल में जिन लेखकों के लेखन ने मुझे बहुत प्रभावित किया है उनमें प्रज्ञा विश्नोई प्रमुख हैं। उनकी कहानियों में शिल्प कथ्य का बहुत अच्छा संतुलन होता है और क़िस्सागोई भी है। जैसे यही कहानी देखिए- प्रभात रंजन
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    मरने के बाद किसी शहर की रूह कहां भटकती है? सारे मर चुके शहर किस कब्रिस्तान में दफन किए जाते हैं?
    मुझे याद नहीं ये पंक्तियां मैंने अपनी डायरी में कब लिखीं? हां, हां! अब आप सोच रहे होंगे कि अस्सी साल के बुड्ढे को तो यह भी याद नहीं रहता कि उसके मां बाप को मरे कितने बरस हो गए, ऐसे में अपनी डायरी में उसने क्या लिखा, कब लिखा कहां याद रहता होगा। और आप सही सोचते हैं। पर इस बुड्ढे की याददाश्त किसी बीस साल के जवान से भी ज़्यादा तेज़ और पक्की है। और वैसे भी मुद्दे की बात यह है ही नहीं मरने के बाद इस नामुराद दिल्ली शहर की आत्मा कहां भटकेगी, क्योंकि मुझे तो अपने मरने और उसके बाद अपनी आत्मा के सुस्ताने के लिए किराए के कमरे की तलाश करनी चाहिए। और कौन सा दिल्ली अभी मरने वाला है? शैतान भी कभी मरते हैं भला?
    खैर अब मुझे अभी दाढ़ी बनाने का काम निबटा लेना चाहिए। आज मंडी हाउस में यूनिवर्सिटी के हम पुरखे प्रोफेसरों का गेट टुगेदर है। गेट टुगेदर क्या, मंडली में से कोई अपने घुटनों के दर्द पर हुए चीता तेल के तेज़ असर का बखान करेगा, दूसरा मोडेस्ट गर्व से यह बताएगा कैसे अमरीका में रह रहे उसके जर्मन–फ्रेंच–कोरियन–इटालियन भाषा फर्राटे से बोल सकने वाले पोते को हिंदी बोलना नहीं आता, कोई अति भावुक (अजी आप इसे कामुक ही पढ़िए) पूर्व प्रोफ़ेसर आज भी संभालकर रखी शेरोन टेट की फोटो देख आहें भरेगा। उनमें से कोई धृष्ट प्रोफेसर आंख मारते हुए मुझसे पूछेगा, “उन दिनों का कोई किस्सा सुनाओ?” जिसे सुनते ही मुझे क्रोध, भय के साथ एक अजीब से खिंचाव (जैसा कि हमें किसी ऊंची इमारत से नीचे झांकते हुए धरती के प्रति अनुभूत होता है) अनुभव होगा।
    यहां उन दिनों का मतलब न किसी हॉलीवुड पिन अप गर्ल से है, न ही वहीदा रहमान सी दिखने वाली कॉलेज की हमारी शर्मीली सहपाठी से। काश कि उन दिनों का संबंध किसी लड़की से ही होता! काश साठ के दशक के उन दिनों में दिल्ली पर शीत का उतना असर न होता!
    खैर दोपहर तीन बजते ही जुलाई की पसीने और धुएं से गंधाई हुई गर्म शाम को मैं कोट पहनकर मंडी हाउस की ओर निकला क्योंकि हम तो लाट साहब हैं। भारत की आज़ादी के बाद गोरा साब हम बौद्धिक ज़मींदारों को ही तो सपेरों के इस देश को सभ्य बनाने की जिम्मेदारी सौंप गए हैं। कैब की खिड़की के उस पार (अपने ड्राइवर को मैंने पांच बरस पहले तभी छुट्टी दे दी थी जब उसने तनख्वाह बढ़ाने की बात की थी) फुटपाथ पर खुद को घसीटता हुआ लंगड़ा व्यक्ति अपनी उंगलियां सिकोड़े हाथ आगे किए था। मेरा हाथ पैंट की जेब की ओर गया ही था तब ही याद आया पंद्रह दिन पहले ही अच्छे भले लोगों का अपहरण कर उनके हाथ पैर काटकर उनसे भीख मंगवाने वाले गिरोह के कुछ सदस्य गिरफ्तार किए गए थे। हालांकि इस खबर के बगल में ही कोल्डप्ले बैंड के कॉन्सर्ट के टिकट न मिल पाने पर जेन ज़ी और मिलेनियल पीढ़ी के विलाप को अखबार के पन्ने की तीन चौथाई जगह मिली थी।
    खैर तो अब पहुंचे हम मंडी हाउस
    मंडी हाउस, १९६६
    “आई वऩ्स मेट अ गर्ल, आॅर शुड आई से, शी वऩ्स मेट मी,”  गिटार पर एक मेरी ही उम्र का लड़का बीटल्स के नॉर्वेजियन वुड की धुन बजा रहा था। यह अपने देहाती स्कूल में गाए जाने वाले ‘मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती’ को पीछे छोड़ मंडी हाउस में अपने बोहेमियन दोस्तों (न दोस्त नहीं, सर्कल कहिए जनाब) के बीच ग्रामोफोन पर बीटल्स, रोलिंग स्टोन्स, बॉब डिलन को सुनने का वक्त था। ६२, ६५ और पड़ोस के वियतनाम युद्ध को भूल अमेरिका और रूस के बीच चल रहे शीत युद्ध पर बहसों का समय था। बिहार में अकाल से होने वाली मौतों से अधिक कलमें स्पेस वॉर के संभावित नतीजों पर दौड़ रही थीं। नए नए आज़ाद हुए युवा भारत की लड़कपन से भरी राजधानी दिल्ली में सर्दियों का समय था। उसी बदलते हुए देश में, एक चश्मा चढ़ाए, नई दुनिया में अपनी एक जगह बनाने को आतुर, एक मैं था और कंधे तक छूते बालों वाला, काला जैकेट पहने, आंखें बंद किए अपनी अंगुलियों को गिटार पर फिराने वाला एक लड़का।
    वर्तमान, मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन
    हमारा गेट टुगेदर हमेशा की तरह ही उबाऊ रहा। पर हर बार क्या नतीजा निकलेगा, यह जानकर भी मैं क्यों इन मूर्खता भरी मुलाकातों का इंतज़ार करता हूँ? अपने इन प्रोफेसर साथियों से तो मुझे कोई प्रेम नहीं। पर प्रत्येक अपराधी के भीतर भय के साथ एक खट्टी सी इच्छा भी दबी रहती है कि कब उसका अपराध पकड़ा जाएगा। मेरे जीवन का मास्टरपीस भी स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी से मिली डॉक्टरेट की उपाधि या मेरी हिप्पी काउंटरकल्चर पर अनेक पुरस्कारों से सम्मानित पुस्तक नहीं, मेरा अपराध ही था।
    आज प्लेटफ़ॉर्म की ओर जाती हुई सीढ़ियों से उतरते हुए लगा जैसे आज पाताल लोक से अतिरिक्त सीढ़ियां प्रगट हो गई हों। क्या मेरी देह की थकान का प्रभाव मेरे मस्तिष्क पर भी होने लगा है? मैं यह सोच ही रहा था कि अचानक से मेट्रो ट्रेन आ गई। पर जैसे ही मैं ट्रेन के अंदर गया, मेरे अलावा ट्रेन में कोई नहीं था। ट्रेन चलने ही वाली थी, तभी ट्रेन का दरवाज़ा एक बार फिर खुला, इस बार ट्रेन पर वो चढ़ा। वो? ज़िंदा? और उतनी ही आयु का? उसी काली जैकेट, कंधों तक छूने वाले बालों के साथ। बस इस बार उसके हाथ में गिटार की जगह एक बैग था।
    “तुम यहां?” मैं उससे इतना भी नहीं पूछ पाया कि उसने बिना कुछ कहे मुझे एक नीला बैग पकड़ा दिया। बैग इतना हल्का था जैसे कि बिल्कुल खाली हो। उसने मेरा हाथ पकड़ा। मैं उसकी आंखों से कुछ समझ पाता यदि उसने उन पर काला चश्मा नहीं चढ़ाया होता। उसके हाथ बिल्कुल ठंडे थे–हमेशा की तरह–मौत की तरह।
    तभी मेट्रो का दरवाज़ा फिर खुला और वो तेज़ी से बाहर निकल गया। मेरे हाथ पसीने पसीने हो रहे थे। जैसे ही मैंने पोंछने के लिए रुमाल निकाला, मैंने देखा मेरी हथेली पर एक कागज़ था–जिसमें लिखा था चावड़ी बाज़ार।
    चावड़ी बाज़ार
    जब ट्रेन चावड़ी बाज़ार स्टेशन पर रुकी, तब एहसास हुआ कि पतझड़ आ चुकी है। भीतर भी, बाहर भी। और पतझड़ के साथ आई इत्र की तेज़ खुशबू। जैसे जैसे मैं बाज़ार के अंदर जाने लगा, इत्र, हंसने की आवाज़ें, तानपूरे, पखावज और घुंघरुओं की ध्वनियां भी तेज़, और तेज़ होने लगीं। ज़रूर खुद को कलाकार मानने वाले यहां कोई हेरिटेज वेरिटेज प्रोग्राम कर रहे होंगे। रिवाइविंग कोठा कल्चर ऑफ चावड़ी बाज़ार! पर इत्र की महक जाने कैसे मेरे गले के भीतर तक जा पहुंची और मेरा मन हुआ जैसे उस जगह से भाग जाऊं। सब मेरे मन का वहम था। वो ज़िंदा कैसे हो सकता है? इतने साल बाद? और उसकी उम्र आज भी उतनी ही जितनी तब थी जब वो मारा, नहीं, मर गया था। सब मेरे मन का वहम ही है। पर। पर ये बैग, जो मेरे हाथ में था, ये तो असली था, न कि कोई वहम। जिस कागज़ में चावड़ी बाज़ार लिखा था वो ज़रूर अब गायब था।
    हमाओ जियरा
    धू धू धधके,
    जरे साउन की आंखन मां
    पियरा के नाम की किरकिरिया।
    कउन दिसा अब भेजूं तोहे लाने पाती,
    मन के घाट बिन बोली बिलखे रैना,
    गावत रहै तोर ही चिरैया।
    मेरे बगल से एक लड़की गाती हुई गुज़री। काली सलवार, नीला कुर्ता, और काला दुशाला सर पर ओढ़े। शायद इन सबके बारे में इसे कुछ पता हो। यह सोच मैं लड़की के पीछे हो लिया।
    लड़की को पता नहीं पता चला या नहीं कि मैं उसका पीछा कर रहा था पर वो आगे चलती रही। हम चावड़ी बाज़ार की गलियों से दूर जाने सुनसान सड़क की ओर जाने लगे।
    “हमाओ पीछे मत आना जनाब,” बिना मुड़े उसने कहा, “आप कौनो सहर के मनसबदार जान पड़े हो। गुलबदन बेगम को मालूम पड़ो तो हमारी खाल खींच लेंगी। हमाओ लानै खाली सिपाही, चाकरों को तफ़रीह कराओ को हुकुम है।”
    ये क्या नौटंकी है? ये लड़की भी रिवाइविंग कोठा कल्चर ऑफ चावड़ी बाज़ार गैंग की सदस्य है। लगता है अपने कैरेक्टर में कुछ ज़्यादा ही गहरी डूब गई है तभी तो अंजान राहगीर के सामने भी अपना किरदार नहीं छोड़ रही। खैर! उसे नहीं पता उसका पाला किससे पड़ा है। इससे भी ज़्यादा गहरे डूबे लोगों को ज़मीन दिखाने का लंबा और पक्का तजुर्बा है मुझे। और गुलबदन बेगम? वो तो सत्रहवीं सदी में चावड़ी बाज़ार की सबसे मशहूर तवायफ थी जिसने वही बिरहा लिखा था जो यह मोहतरमा गा रही थीं। और मुझे यह इसलिए पता है क्योंकि मैंने एक ज़माने में द ग्रेस ऑफ दिल्ली: द तवायफ्स ऑफ चावड़ी बाज़ार लिखी थी जिसे देश से ज़्यादा विदेश में बहुत सराहना मिली थी। उस किताब में कम से कम चालीस पन्ने इन्हीं गुलबदन बेगम पर लिखे थे।
    “जौन बिरहा तुम गात हो, बा तो गुलबदन बेगम लिखे रहीं?” मुझे बुंदेली में जवाब देता सुन वो लड़की पीछे मुड़ी। पर दुशाले का एक छोर उसने अभी भी पकड़ा हुआ था जिससे उसका चेहरा अब भी ढंका हुआ था। पर उसके धूसर रंग के चेहरे पर गहरी भूरी आँखें फब रही थीं।
    “गुलबदन बेगम?” लड़की खिलखिलाई। उसकी खिलखिलाहट में व्यंग्य के तीखेपन से ज़्यादा कौतुक था, “बा काहे बुंदेली में बिरहा लिखेंगी? बा तो फ़ारसी, उर्दू, अरबी सब जानत हैं। और बिरहा? ग्वालियर घराने से मौसिकी सीखन रही बेगम खयाल, ठुमरी गाएंगी या बिरहा?”
    “बताओ कितने सुल्तानों और नवाबों को अपनी बिरहा तुमने सुनाई है?” मैं धृष्ट हो रहा था पर अब मैं जल्द से जल्द  इस नाटक का पटाक्षेप करना चाहता था।
    इस बार लड़की के हंसने में व्यंग्य साफ था, “मौसिकी, अदाएं, नखरे: जे सारी तवायफों के भाग की बातें रहीं आईं। हम डोमनियों के हिस्से तो नाम भी नहीं आते: कछु आत है तो बस नवाबों के नौकरों, सिपाहियों से खुदई को नुंचवाना। कौनो बादसा आए भी रहे, तो तबहईं जौन रात नसा में बा बहुतई जंगली और जंगली हो जात रहे और उन्हें तवायफ और डोमनी को अंतर भी न दिखत हौ।”
    मेरे पेट पर जैसे कोई पत्थर सा उछला। जाने कितनी गुमनाम डोमिनियों, बेड़नियों के गीत और प्रतिभा को हमने तवायफों को हम जैसों ने मशहूर, परिष्कृत तवायफों के नाम कर दिया। सदियों पार चावड़ी बाज़ार के वेश्यालयों में भी हमने अभिजात्य वर्ग ढूंढ उसी से अपना सग़ापन निभाया।
    “तुम्हारा घर कहां है?” ये सवाल मैंने डोमनी से किया था या उसका किरदार निभाने वाली अभिनेत्री से? मैं भी नहीं जानता।
    “अब तो याद न रहौ। न अपनो घर, न अपनो गांव।” लड़की अब मुझसे बहुत आगे निकल गई थी, इतनी कि अंधेरे के पार से सिर्फ उसकी आवाज़ मुझ तक पहुंच रही थी, “पर जौन जे संसार में नियाय रहौ, तो जे अंधे सहर की तेरहवीं खाने मैं जरूर आऊं। उस्ताद जी, हिजड़ों के खानकाह चले जाना।”
    अब न लड़की थी, न उसकी आवाज़। पर मेरे हाथ में काला बाग कुछ भारी हो चला था।
    हिजड़ों का खानकाह, १९६७
    “अपनी कविताएं सुनाने को तुम्हें हिजड़ों की कब्रें ही मिलीं,” मैंने जॉन लेनॉन से चुहल की। जब से मैंने उसे पहली बार मंडी हाउस में नॉर्वेजियन वुड गाते हुए सुना था, तब से मैं उसे जॉन लेनॉन ही बुलाता था।
    “जानते हो ये कब्र कादिर की है?” जॉन की एक घुंघराली लट की छाया उसकी दाहिनी आंख के नीचे से इसके ऊपरी होंठ तक पहुंच रही थी और कैसे भी करके मैं उस छाया को हटाना चाहता था क्योंकि मेरा ध्यान बार बार उसपर जा रहा था। उसने अपनी अंगुलियों के बीच एक सिगरेट फ़ंसा रखी थी।
    “तुम कुछ सुन रहे हो या नहीं?” जब कोई जॉन की बात नहीं सुनता था तो वह खीज उठता था।
    “कादिर कौन?” मैंने सकपकाया।
    “दिल्ली के बादशाह शाह आलम का खूबसूरत गुलाम जिसे दरबार की नौकरी में लगने के एक महीने बाद ही बादशाह ने ख्वाजा सरा के सुपुर्द कर दिया था।”
    “क्यों?”
    “शायद उसकी खूबसूरती हरम में बादशाह की सबसे पसंदीदा बेगम को भा गई थी, या शायद बादशाह को,” जॉन ने सिगरेट से एक लंबा कश लिया।
    “फिर?”
    “गुलाम ने अपना बदला लिया। दिल्ली कब्जाकर शाह आलम की आंखें निकाल लीं। सब खो चुके मजलूम के पास बदले के अलावा उसका अपना क्या होता है?” जॉन ने वही सिगरेट मेरी तरफ बढ़ाई।
    मैंने उससे सिगरेट हाथ में लेकर एक कश खींचा।
    “और सुनो! मैं पार्टी और अखबार दोनों से इस्तीफा दे रहा हूँ ,” जॉन लापरवाही से बोला।
    “पर क्यों? बसु सर तो तुम्हें पार्टी में बड़ा पद देने वाले थे।”
    “क्या करूंगा मैं बड़े पद का? मजदूरों की दुर्दशा पर किताबें लिखकर किसी उद्योगपति की सुंदर बेटी से अफेयर और फिर शादी। जिन पूंजीवादी देशों को अपने भाषणों में कोसूंगा, अपने बच्चों को उन्हीं देशों की यूनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए भेजूंगा। मंडी हाउस में ब्रिटिश बैंड के गीत ग्रामोफोन पर सुनते हुए, महंगी शराब हाथ में लेकर विदर्भ के किसानों की आत्महत्या और बिहार में आए अकाल से हो रही मौतों पर आहें भरूंगा। नहीं जी जाएगी ऐसी दोहरी ज़िंदगी मुझसे।”
    “तो क्या हिप्पी बनोगे तुम?” मुझे जॉन से बेइंतहा जलन थी। इतनी ईर्ष्या कि उससे जले बिना, उससे तुलना किए बिना अपने जीवन की कल्पना कर पाना भी मेरे लिए असंभव था। कि जॉन के बिना अपने अस्तित्व की कल्पना करना भी मेरे लिए बेमानी था, “दुनिया धू धू जलेगी और तुम मशरूम खाए, जंगल में, अपने गिटार पर कोई धुन बजाते हुए अपने ही बनाए किसी नए धर्म का पैगम्बर खुद को ही घोषित कर लोगे। आत्माओं से बातें करोगे, साहित्य के बजाय टैरो कार्ड पढ़ोगे, पर दुनिया जहां थी वहां से एक इंच भी खिसकाने की न ही कोई कोशिश करोगे, न कोई प्रार्थना।”
    “किसने कहा मैं दुनिया को उसके हाल पर छोड़ रहा हूं?” जॉन अपने चेहरे को मेरे करीब लाया। मेरी सांस जहां थी, वहीं अटक गई। उसने एक झटके से मेरे दांतों के बीच दबी सिगरेट को अपने होठों के बीच दबाया और हमारे होठों की परिधियों ने एक दूसरे को छुआ, “मैं विद्रोही बनूंगा। और तुम जैसों को विद्रोह करना सिखाऊंगा। हर उस विचारधारा से जो एक इंसान को कठपुतली बनाती है। हर ताकतवर सिस्टम से जो आम गरीब इंसान को ताकतवर के जूतों के नीचे आने वाली चींटी समझता है। हर उस साहित्य से जहां लेखक खुद की तकलीफ के आगे देख ही नहीं पाता।”
    पर मुझे तो उसी सिस्टम में सबसे ऊपर पहुंचना था। मेरे पास न जॉन की तरह स्वतंत्र विचार थे, न ही करिश्मा। छोटे से गांव के एक गरीब खानदान से कॉलेज तक पहुंचने वाले एकमात्र लड़के के लिए तो एकमात्र स्थायी ढाल आर्थिक हैसियत ही होने वाली थी, और जब तक वो नहीं बन पाती,  उस ऊंचाई तक पहुंचाने वाली मेरी महत्वाकांक्षा। मेरे परिवार की माली हालत इतनी बदतर थी कि कॉलेज की फीस और बीमार बाप के इलाज का खर्च भेजने के लिए मैं ट्यूशन लेने के अलावा, सीआईए और केजीबी के लिए गाहे बगाहे मुखबिरी का काम भी कर लिया करता था। जॉन मेरे लिए एक डिस्ट्रैक्शन था, और जहां मैं चाहता था वहां तक पहुंचने का ज़रिया भी।
    हिजड़ों का खानकाह, वर्तमान
    यह बीच का वक्त था। सच और झूठ के एक दूजे में घुल जाने का वक्त, रोशनी और अंधेरे के एक दूजे के बगल में चुपचाप लेटने का वक्त। मरे हुओं का ज़िंदा लोगों की भीड़ में घुल जाने का वक्त। यहां गुलाब नहीं, घास की सुगंध थी। गीतों का नहीं, सन्नाटे का शोर था। पर यह सन्नाटा भी जल्द ही दब गया।
    अचानक से कौए शोर मचाने लगे और उल्लू की हुहूहू सुनाई देने लगी। अचानक से पदचाप की आवाज़। फिर जैसे लालटेनों की एक नदी ने मुझे चारों ओर से घेर लिया।
    “हमारा बलात्कार हुआ था! हमारा बलात्कार हुआ था!” कहते हुए जाने कैसे पांच, दस, बीस, पचास, सौ, हज़ार बच्चों, किशोरों और हिजड़ों की भीड़ मेरे चारों ओर से गुज़र रही थी। कुछ ने जामा पहन रखा था, कुछ ने चोगा, कुछ ने कुर्ता, कुछ ने शर्ट, पर सभी एक ही वाक्य बार बार बोले रहे थे। तभी उनमें से कुर्ता पहने एक मुझे सूंघने लगा। उसका हाथ मेरी छाती के भीतर जा, मेरे दिल को टटोलने लगा। मेरी ठुड्ढी अपने हाथ में लेकर वह मुस्कुराता हुआ बोला, “तुम बलात्कारी नहीं हो।” यह कहकर वह बाकी भीड़ की ही तरह “हमारा बलात्कार हुआ था! हमारा बलात्कार हुआ था!” बोलने लगा।
    मैं अब पसीने से नहाया हुआ था। हिजड़ों की भीड़ से आमना सामना होने के कारण नहीं, बैग का भार अचानक से बढ़ जाने के कारण भी नहीं। यह याद आने के कारण कि जॉन की बॉडी कभी नहीं मिली थी।
    मंडी हाउस, वर्तमान
    जब मैं मंडी हाउस पर पहुंचा, गिटार पर कोई नॉर्वेजियन वुड की धुन बजा रहा था। तभी किसी ने मेरा कंधा थपथपाया। पीछे मुड़े बिना ही मैं जान गया कि वह जॉन था।
    जॉन मेरे कान में फुसफुसाया, “मैं किसके लिए खतरा था, अमन? अमरीका के लिए? रूस के लिए? या……तुम्हारे लिए?
    “तुम्हें किसने मारा? सीआईए ने? केजीबी ने?” मैंने पूछा, “क्या किया था उन्होंने तुम्हारे साथ?”
    “जो भी था, तुम्हारा ही था, तुम ही जानो,” जॉन की आवाज़ कान से मेरे गले और छाती तक भर गई थी।
    अब मुझसे बैग उठाया नहीं जा रहा था। मेरे हाथ से बैग छूट कर गिर गया और बैग की चेन फटते ही जो बाहर निकला, वह मेरा शरीर था जो अब जलने लगा था। नॉर्वेजियन वुड की धुन जल रही थी, गिटार जल रहा था, मंडी हाउस जल रहा था, दिल्ली जल रही थी। दिल्ली मर रही थी। जॉन मर चुका था।

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