आज मीना कुमारी की जयंती है। मुझे सत्य व्यास की किताब ‘मीना मेरे आगे’ की याद आई। हिन्दी में मीना कुमारी पर लिखी यह अनूठी किताब है। आइये वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब का एक अंश पढ़ते हैं- मॉडरेटर
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बला की रात में ‘वसुदेव’ का निकल जाना
वसुदेव तो अपने बच्चे को बला से बचाने निकले थे।
मगर यहाँ तो पिता ने बच्ची को ही बला मान लिया था । अम्मी बताती थी कि अब्बू अली बख़्श को बेटे की आस थी। सो कुछ उधार और कुछ उपाय लगाकर उन्होंने अम्मी इक़बाल बेगम को डॉक्टर गाद्रे क्लीनिक में भर्ती करवाया था। बेटा आ जाता तो अली बख़्श को खर्च हुए पैसे का ग़म भी जाता रहता । मगर बेटा नहीं आया, बेटी आ गयी। लिहाज़ा ख़र्चे का ग़म और बेटी से नफ़रत इस क़दर बढ़ गयी जैसे बेटी नहीं कोई लाइलाज बीमारी जिस्म को आ लगी हो । गुस्से में बिफरे अली बख़्श जैसे-तैसे जच्चा-बच्चा अस्पताल से घर ले आये । फाकों के दिन थे । सो, यूँ ही ख़र्चा बढ़ जाना था। ऊपर से अली बख़्श तो बेटा चाहते थे। बकौल अली बख़्श, खुर्शीद तो पहले ही सिर पर सवार थी। सौतेली बेटी शमा की भी ज़िम्मेदारी थी । सो, अली बख़्श को एक और बेटी देखकर कोई खुशी नहीं हुई, बल्कि ग़म ही हुआ । मज़ीद ग़म हुआ ।
एक रोज़ बादल और बिजली में होड़ लगी थी। दोनों एक-दूसरे को मात देने पर तुले हुए थे । अँधेरा भी बस्ती को खा जाने पर आमादा था। अली बख़्श रात हुए भीगे तरे घर आए । इक़बाल बेगम नीम बेहोश सोयी पड़ी थीं। अली बख़्श ने साथ ही लग के सोयी मीना को देखा और कुढ़ गये
और उस कुढ़न की शिद्दत इतनी ज़्यादा थी कि उन्होंने मन-ही-मन ख़याल किया । वहशियाना ख़याल । नाल से कुछ दिन की कटी बच्ची को यतीमखाने की सीढ़ियों पर छोड़ आने का ख़याल सो, उन्होंने उस बच्ची
को उस भरी बरसात में भीगे बदन ही उसकी लगभग बेहोश माँ के पास से उठा लिया। एक चादर में लपेटा और निकल गये और …
और क्या कहूँ ! जिसकी ज़िन्दगी की शुरुआत ही किसी को इतना दुखी कर जाये कि वह उस दुधमुँही बच्ची को यतीमख़ाने की सीढ़ियों पर छोड़ आये। जिसका भाग्य उसके आने मात्र से किसी आदम को दरिन्दा बना दे, उसके सितारों में क्या लिखा होगा, यह जानने के लिए भविष्य देखने की भी ज़रूरत नहीं है ।
जिन सरसों के फूलों को अग्नि छू ले
वो सरसों के फूल भला कैसे फूलें
मुझे माफ़ कीजिए, मैंने आदम के बरअक्स दरिन्दे को रखा । नहीं, कोई जानवर, कोई दरिन्दा भी अपने जाये को यतीम नहीं छोड़ता । इसलिए उसे बदनाम करना ठीक नहीं । यह कारनामा भी आदम के सिर ही जाये तो ठीक।
पेटी मास्टर अली बख़्श ने जिन एकाध फ़िल्म में संगीत दिया, उनमें से कन्हैया लाल की फ़िल्म ‘आरती’ भी थी । उसका एक गीत नंगे बदन वस्त्र बिन फिरते तब ठीक-ठाक चर्चित हुआ था। पेटी मास्टर अली बख़्श ने मगर इतनी इन्सानियत दिखायी थी कि बेटी के जिस्म पर एक कपड़ा डाल दिया था। बच्ची नंगे बदन नहीं छोड़ी।
खैर !
बरसात छिटपुट अब भी जारी ही थी और किसी के घर से बाहर होने का अन्देशा भी नहीं था जब अली बख़्श उन्हें यतीमख़ाने की सीढ़ियों पर रख आये। चुपचाप । बे-आहट । बिना यह देखे कि जिस सीढ़ी पर वह उन्हें छोड़ आये हैं, उसी सीढ़ी के कोने में चींटियों की बाँबी आबाद है । जिस बाप को ज़ख़्मी नाल न दिखी हो, जिसे भरी बरसात न दिखी हो जिसे रोती-बिलखती बच्ची का तर्जनी पकड़ लेना न दिखा हो, उस का कलेजे को चींटियाँ कहाँ दिखतीं, बच्ची पाँव पटककर रोती रही। बाप पाँव दबाकर भाग आया ।
अम्मी को होश आया होगा। उन्होंने अपने पास नन्ही जान को न पाया होगा । दरिन्दों, जिन्नातों, बच्चा चोरों जैसे कितने ही ख़यालात उनके मन को डरा गये होंगे । घबराहट और ममता के मिले-जुले भाव से
दूध छाती से छलछला आया होगा। वह पागलों की तरह इधर-उधर ढूँढ़ती भागती रही होगी । और फिर अली बख़्श के घर आने पर उनसे सवालात की झड़ी लगा दी होगी। अली बख़्श ने अपनी करनी उन्हें बतायी होगी । सुनकर अम्मी ने वहशत में अली बख़्श की छाती पर मुक्कों की बरसात कर दी होगी । रो-रोकर आसमान सिर पर उठा लिया होगा और अली बख़्श को उस नन्ही सी जान को दोबारा लेकर आने के लिए मजबूर किया होगा ।
यह सब हुआ होगा, ऐसा सोचा जा सकता है । ऐसा सोचा जा सकता है क्योंकि अली बख़्श मीना को यतीमखाने की सीढ़ियों से वापस घर ले आये। जाने किस मजबूरी में! जाने किस ग़ैरत के हवाले से यह अहसान किया, मगर किया ।
मीना कुमारी उस रोज़ नहीं मरी । मीना उसके बाद रोज़-रोज़ मरी । वह आगे किसी दिन मरने के लिए उस रोज़ ज़िन्दा रही।
बाद के किसी दिन में, अम्मी ने बताया कि जब अब्बा उन्हें सीढ़ियों से उठाने को झुके तो उन्होंने देखा कि मीना के सारे बदन से चींटियाँ चिपकी पड़ी हैं। अम्मी ने यह भी बताया कि अब्बा हुजूर बेटा चाहते थे, मगर तू आ गयी।
मीना ने पूछा- अम्मी! लेकिन उनके बाद भी तो बहन ही आयी, मधु आयी। भाई तो नहीं आया ! फिर अब्बा हुजूर ने यतीमख़ाने की सीढ़ियाँ मेरे लिए ही क्यों चुनीं ?
अम्मी के पास नन्ही मीना के इस सवाल का कोई जवाब नहीं था । वह बर्तनों में लगी चिकनाई हटाने में लग गयीं । ऐसे सवाल का जवाब ईश्वर के पास भी नहीं होगा । अम्मी तो फिर भी हब्बा की बेटी थी ।
सवाल लाजवाब ही रहे । वक़्त बीतता गया । उनके बदन पर मगर हमेशा ही कुछ रेंगता रहा । जाने वे वही चींटियाँ थीं या कि उनके सवाल ! ! !
सवालों का क्या है! अन्धा कुआँ हैं । सवाल तो यह भी है कि अम्मी मीना से कम प्यार क्यों करती थीं? सवाल तो यह है कि खुर्शीद आपा स्कूल क्यों नहीं जातीं ? सवाल तो यह भी है कि अम्मी दिन-रात खाँसी क्यों रहती हैं? और सवाल तो यह भी है कि रूपतारा स्टूडियो के बाहर बैठा पठान चाचा बच्चों को भीतर क्यों नहीं जाने देता?
मीना की दोस्त शम्मी कहती है, जवानी जब आती है तो टूटकर आती है, मगर मीना पर तो बचपना टूटकर आया था। और ऐसा आया कि शैतान की खालाओं ने पनाह माँगी थी । उनके सताये लोगों को तो याद करने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती। जेहन – ओ – दिल पर छपी हुई हैं मीना की सारी बदमाशियाँ ।
सच ही कहते हैं कि अलिफ से लेकर दो चश्मी बड़ी है तक इन्सान गुम ख़याल ही रहा और मीना तो तब भी ख़्वाबों की दुनिया में खोयी रही, जब ख़्वाबों के मायने भी नहीं जानती थी । सो, एक दिन यूँ ही न जाने किन ख़यालों में खोयी एक दुल्हन की डोली में जाकर चुपचाप बैठ गयी । दुल्हन बेचारी बाद में बैठी और रोती – रोती निढाल होकर डोली में ही सो गयी। दुबली-पतली दुबकी मीना उसे राह भर देखती रहीं । उसकी सुर्खी, उसकी चूनर, उसकी लाली, उसके सुरमे बिगाड़ती रही । 1
दुल्हन की मंज़िल भी ज़्यादा दूर न थी । कहारों ने डोली रखी। तो दुल्हन सहमकर बैठ गयी और उसके साथ सहम गयी मीना भी । परदा उठा तो दुल्हन के साथ एक बच्ची को देखकर औरतें दंग! खुसर- फुसर होने लगी। दुल्हन बेचारी भी क्या जवाब दे ! सो, जवाब उसके आँसुओं ने दिया । सख़्ती हुई तो रोने की बारी अब मीना की थी। किसी ने पूछा तो बताया कि उनका नाम महज़बीन है । और वह डोली का मख़मली बिछौना देखकर बैठ गयी थी। एक बुजुर्गवार खाला ने ठिठोली की । कहा – लड़की झूठ बोलती है। दुल्हन मायके से ही बच्चा लेकर आयी है ‘ हँस पड़ीं औरतें। सिमट गयी दुल्हन और मीना ! उन्हें घर पहुँचा दिया गया। हाय रे बचपन !
ख़ैर, बात तो पठान चाचा की हो रही थी ।
मीना का घर रूपतारा स्टूडियो के पास ही था। लिहाज़ा वह स्टूडिया के सामने ही बच्चों के साथ खेलती डोलती रहती थी। लेकिन वह स्टूडियो हमेशा मीना की आँखों में ख़्वाबीदा रहता । आख़िर क्या है लोहे के उस दरवाज़े के पीछे, जिसमें चमचमाती गाड़ियाँ, लकदक कपड़ों में सजे लोग आते-जाते रहते हैं। बाकी बच्चों ने भी यह बात गौर की थी, मगर मीना ने कुछ और भी देखा था । मीना ने देखा था कि जिन गाड़ियों को पठान चाचा सलामी नहीं देकर, गेट पर ही रोककर पूछताछ करता था ।
उन्हीं गाड़ियों से निकलते हाथ पठान चाचा के हाथ में कुछ रखते और फिर पठान चाचा एक कड़क सलामी ठोंककर दरवाज़ा खोल देता । आख़िर क्या था उन बन्द मुट्ठियों में जो दरवाज़े खोल देता था ? ज़रूर कुछ जादुई । जादुई जैसे ?
जादुई जैसे गरमा-गरम पकौड़ी । पकौड़ी से जादुई क्या, जिसके लिए लोग-बाग जमावड़े लगाये रहते हैं। पकौड़ी जो मीना और उसके दोस्तों को भी गाहे-ब-गाहे ही नसीब होती हैं। वो भी तब जब अब्बा खुर्शीद आपा के काम से खुश होकर पैसे देते है । सो, मीना ने भी एक दिन दो पैसे की पकौड़ी उधार ली… और !
और रख दिया पठान चाचा के हाथ पर । पहले तो पठान चाचा कुछ समझे ही नहीं। फिर सबकुछ समझ गये। पूछा- बच्चा, तू अली बख़्श का बेटी है न! शूटिंग देखने आया? अली बख़्श के साथ आना, हम दिखायेगा। मगर फिर भी जब मीना टस से मस नहीं हुई तो पठान ने कहा- अचा! चल, हम ही दिखाता है ।
, और फिर उस दिन पठान चाचा की उँगलियाँ पकड़े – पकड़े मीना ने एक रुपहली दुनिया देखी । तिलिस्मी दुनिया । एन्द्रजालिक दुनिया जहाँ कागज़ी ही सही, बड़े-बड़े महल थे। भाड़े के ही सही, मगर चमचमाते महँगे दिखते कपड़े थे। बड़ी-बड़ी रोशनियों के लट्टू थे । सजते-सँवरते लोग थे। बच्चे के हाव-भाव से सब कुछ रंगीन ही था, स्याह – सफ़ेद कुछ नहीं । कुल जमा मीना के सपनीले गुड्डे-गुड़ियों का खेल यहाँ मूर्त रूप ले रहा था। वह यह लाइट, कैमरा, मेकअप की दुनिया देखते हुए खो सी गयी । वह खुश थी, बहुत खुश । पकौड़ियों के दाम में उसे हयात मिल गयी थी । मगर वह नहीं जानती थी कि जिस हयात का आग़ाज़ आज हुआ है, वह ताउम्र, बल्कि मरने तक उससे चिपका रहेगा। जौक ने न जाने कैसे मीना का नसीब देख लिया था, सो उनके आने से सालों पहले ही पेशनगोई करते हुए लिखा-
लायी हयात आये, कज़ा ले चली, चले अपनी खुशी से आये न अपनी खुशी चले।

