‘अब आपने पूछा है तो बताना ही पड़ेगा, मैं कौन हूँ?’
‘जी आप देख रहे हैं, मैं एक स्त्री हूँ…’
‘क्यों, कपड़ों और बालों से क्या लगा आपको? हैरान होने की क्या बात है…स्त्री हूँ, तो वही कहूँगी, खुद को पुरुष तो हरगिज़ नहीं कह पाऊँगी, लाख पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहूँ। चल भी रही हूँ। पुरुष बन कर नहीं, स्त्री बन कर।’
‘चाहे आप स्त्री को दोयम दर्जे की मानें। उससे क्या होता है? कुदरत का करिश्मा है स्त्री, करिश्मा कभी दोयम नहीं होता। प्रकृति स्वयं नारी है उसे कह पाएँगे दोयम ! कह कर देखिए ! ऐसा पटका मारेगी कि चारों खाने चित हो जाओगे।’
‘अरे अभी तो मैंने कुछ कहा नहीं, आप धैर्य खो रहे हैं। आपने प्रश्न किया और मैं उत्तर दे रही हूँ। अगर धैर्य नहीं है उत्तर सुनने का तो प्रश्न ही क्यों करते हैं? यह क्या बात हुई ! यही तो आज कल हो रहा है, सभी दौड़ रहे हैं, किस ओर दौड़ रहे हैं, किधर दौड़ रहे हैं, कुछ मालूम नहीं, बस दौड़ रहे हैं और इस दौड़ में धैर्य खो रहे हैं। अरे धैर्य जीवन की आधी लड़ाई जीता देता है।’
‘ओह ! मानना नहीं चाहते कि जीवन एक लड़ाई है, आपकी अपनी सोच है, उस सोच पर आपका अधिकार है। मैं वहाँ रहती हूँ, जहाँ रोज़ भूख और पेट में लड़ाई होती है। ग़रीबी, भुखमरी और अन्न के लिए लड़ाई होती है। गर्मीं, सर्दी और ग़रीबी की लड़ाई होती है। इस लड़ाई में कोई गोली नहीं चलती पर लोग मरते हैं।’
‘आप पूछ रहे हैं…बिना गोली कौन मरते हैं !’
‘अरे क्या आप नहीं जानते ? या सब जानकर भी अनजान बनते हैं। भूख, ठण्ड और गर्मीं से कौन मरता है ? अमीर नहीं, ग़रीब मज़दूर मरते हैं। उनकी लड़ाई उनकी ग़रीबी से होती है। उनकी लड़ाई उनके पेट और भूख से होती है।’
‘अच्छा तो आप विषय बदलना चाहते हैं, ठीक है बदलें, पूछें क्या पूछना है !’
‘ओह तो अब आप जानना चाहते हैं, मेरा नाम क्या है?’
‘मेरे कई नाम हैं…बेटी, बहन, पत्नी, बहू, चाची, काकी, ताई, दादी, नानी पता नहीं कितने नामों से पुकारी जाती हूँ, पर फिर भी मुझे कोई इंसान नहीं समझता। इतने नामों के बावजूद सिर्फ स्त्री हूँ, जिसका अपना कुछ नहीं, कोई वजूद नहीं।’माँ’ शब्द सुन कर ही कुछ हो जाती है। जब कोई उसे ‘माँ’ कहता है, तो वह धन्य हो जाती है और उसी रूप में रहना उसे बहुत पसंद है। पुरुष के सहारे के बिना वह कुछ भी नहीं। सदियों से यही होता रहा है और होता रहेगा। जो लड़की परंपराओं और संस्कारों के बेफज़ूल घेरे को तोड़ने की कोशिश करेगी। वह मेरी तरह आपके सामने खड़ी होगी।’
‘अरे छोड़िये साहब, समय बदल गया है, अब स्त्रियों का समय है…जैसी बड़ी-बड़ी बातें मत करिए। यह किताबों में अच्छी लगती हैं, जीवन के संघर्ष में नहीं। अधिकतर महिलाओं की दशा वैसी ही है, शायद आपके पास उनकी ओर ध्यान देने का समय नहीं।’
‘कैसी बातें करते हैं ! जिसने स्वयं सब कुछ भोगा हो, उसे कहा रहे हैं कि आज के परिवर्तन को देखा नहीं ! आज के परिवर्तन में ही मैं रिश्तों और दोस्ती में ठगी गई हूँ…आज के परिवर्तन में ही मैंने अपनी लड़ाई लड़ी है…।’
‘क्या कहा कि मैं समाचार नहीं देखती और पढ़ती। स्त्रियों की स्थिति बहुत बदल गई है…।’
‘जो स्वयं समाचार बनी हो, उसे लोगों ने देखा भी है और पढ़ा भी है… और अपने-अपने नज़रिए से टिप्पणियाँ की हैं और प्रतिक्रियाएँ दी हैं। मिडिया ने पूरी तरह से ज़लील किया, कोई कसर नहीं छोड़ी। किसी ने कहा प्रेमी के साथ मिलकर कंपनी क्यों खोली? खोल ली तो उसे निकाला क्यों ? किसी ने लिखा गरीब घर के लड़के का अमीर घर की लड़की ने शोषण किया। कहीं छपा अमीरज़ादी ने गरीब लड़के का अपमान किया, उससे कंपनी छीन ली…क्या ग़रीबों का स्वभिमान नहीं होता ? इन सबका मतलब, मिडिया ने जायज़ माना कि स्वाभिमान की रक्षा के लिए उसने अपने दोस्तों के साथ मिलकर मेरा बलात्कार किया और कहा कि तुझे सबक सीखा दिया। जो भी महिला पुरुष को पछाड़ कर आगे जाने की कोशिश करेगी उसे सबक सिखाया जाएगा या सीखाना चाहिए। मिडिया में किसी ने उसकी घिनौनी सोच को नहीं कोसा, बस उसकी गरीबी का रोना रोकर सुर्खियाँ बटोरते रहे, सहानुभूति लेते रहे। क्या मिडिया की नज़रों में गरीब घर के लड़के का अमीर घर की लड़की का बलात्कार करना सही था। कोर्ट में जब उसके झूठ, बेईमानी और बाक़ायदा योजना के साथ कंपनी के पैसे का ग़बन, बैंकों के साथ फ्रॉड सामने आया और मैंने अपना रिश्ता क्यों उससे तोड़ा, उससे कंपनी क्यों छीनी तथा मेरा सच सामने आया तो मिडिया गायब हो गया। उसकी बोलती ही बंद हो गई।’
‘अच्छा तो अभी तक आपको मेरा सच नहीं पता चला… आप सही में मेरा सच जानना चाहते हैं… दोषियों को जेल भिजवा कर मैं तो चुप हो गई थी। किसी को बताने का कोई लाभ नहीं था। लोग अंधे और बहरे बने रहते हैं। अपने मतलब और लाभ की बात पर ही आँखें और कान खोलते हैं। मेरी कहानी से उनको कुछ मिलने वाला नहीं था…क्यों सुनते ! आप ने कहा है तो बताती हूँ-
‘मैं देश के एक बड़े व्यापारी परिवार की इकलौती बेटी हूँ और कॉलेज में बिलकुल साधारण तरीक़े से रहती थी । मेरा परिवार बहुत आदर्शवादी थी। मैं भी परिवार की आन, बान, शान में नहीं जीना चाहती थी, स्वयं मेहनत करके कुछ बनना चाहती थी। पढ़ाई में मैं टॉपर थी। कोई जान नहीं पाया था कि मैं समृद्ध परिवार से हूँ। रमन उसका नाम है। पढ़ाई में वह अच्छा था, मैं उसके परिवार के बारे में नहीं जानती थी। उसने बस इतना बताया था कि परिवार गाँव में रहता है। मुझे वह मेहनती और ईमानदार लगा था। मेरी सोच थी कि निम्न मध्यवर्गीय परिवार के बच्चों को अगर अवसर मिलें तो वे अपने दम पर कहीं पहुँच सकते हैं। मैंने अपने पापा की कंपनी में देखा था, उन्होंने जिन’सेल्फ़ सपोर्टेड’लड़कों को मौका दिया, वे अपने-अपने कार्यक्षेत्र में बहुत आगे गए। मुझे वह भी ‘सेल्फ़ सपोर्टेड’ लगा। मैं उससे प्यार करने लगी थी। पर वह एक जोड़-तोड़ वाला, स्वार्थी, शातिर और चालाक युवक निकला ; जिसका मुझे बाद में पता लगा। उसने मेरे बारे में सब कुछ पता कर लिया था। कॉलेज समाप्त करते ही उसने कई परियोजनाओं का एक प्रस्ताव तैयार किया और मेरे साथ मिलकर एक कंपनी खोलने की इच्छा ज़ाहिर की। साथ ही यह चिंता भी जताई कि पैसा कहाँ से आएगा ? मैं भी एक कंपनी शुरू करना चाहती थी, उसे इसका पता चल चुका था। मेरी अपनी भी कई परियोजनाएँ और प्रकल्प थे। मैं मान गई और परिवार को भी मनवा लिया। कहते हैं न प्यार अँधा होता है। उन दिनों मैं ऐसी ही थी, उसके बारे में कुछ जानना ही नहीं चाहा। बस विश्वास करके कंपनी खोल ली। परिवार ने पैसा दिया और पापा की गारंटी पर बैंक से लोन भी लिया।
एक साल के भीतर ही उसकी असलियत मेरे सामने आने लगी। वह मुझे कंपनी की हर परियोजना से परे करता गया और अपने भाई तथा दोस्त उन परियोजनाओं में जोड़ता गया। साथ ही उसने ज़ोर डालना शुरू किया कि मैं उससे शादी कर लूँ, कंपनी वह सँभालेगा और मैं बस उसके परिवार की देख-रेख करूँ। मैं शादी करने के मूड में नहीं थी। मैं अपनी कंपनी को आगे ले जाना चाहती थी, मैंने अपने पापा से कंपनी में बहुत पैसा लगवाया था। कॉलेज में मैं उसके आदर्शवादी और प्रगतिशील विचारों से प्रभावित हुई थी। पर वह उसने एक मुखौटा ओढ़ा हुआ था जो जल्दी ही उतर गया । कंपनी को खोलने के बाद वह मुझे एक आत्ममुग्ध, घमंडी और साथी को दबा कर नियंत्रण में रखने वाले लगा। मेरे पापा को नज़र आ गया था कि वह मेरे आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को प्यार के नाम पर धीरे-धीरे तोड़ रहा है। उन्हें पता चल गया था, उसकी नज़र मेरे परिवार की धन-संपदा पर है; जो वह मुझे अपने काबू में रख कर पाना चाहता है। वह मेरे ‘बेवकूफ़ाना भावनात्मक’ पहलू का लाभ उठा रहा था। प्यार के नाम पर वह मुझे एक ‘सब्जेक्ट’ बना कर अधिकार जमा रहा था और मैं प्यार के नाम पर ठगी जा रही थी । उसके नियंत्रण में आ रही थी। मेरे परिवार ने मुझे बहुत झिंझोड़ा और मेरा मुझ से परिचय करवाया। सब कुछ समझ कर भी मैं उससे अलग नहीं हो पा रही थी । मेरे पापा उसे और उसके साथियों को कंपनी से निकालना चाहते थे। मैं सब कुछ जानते-बूझते भी उसे एक और मौका देना चाहती थी। प्यार शायद ऐसा ही होता है, उसकी मानसिकता से परिचित हो गई थी, फिर भी उससे छूट नहीं पा रही थी। काश ! मैंने उस समय अपने पापा की बात सुनी होती तो इतना कुछ न सहना पड़ता।
पापा मेरी ज़िद के आगे झुक गए, उसे निकाला नहीं, पर उन्होंने कंपनी को दो हिस्सों में बाँट दिया। उसकी परियोजनाओं को वह और उसका ग्रुप सफल बनाए और दो वर्ष के भीतर परिणाम दिखाएँ, वरना वे कंपनी को सँभाल लेंगे। और मेरी परियोजनाएँ मैं सँभालूँ और उन्हें सफल बनाऊँ ।पैसे को भी आधे-आधे हिस्से में बाँट दिया। उसे समझ में आ गया कि मेरे पापा मुझे उसके हाथों की कठपुतली नहीं बनने देंगे और न ही वह आसानी से मेरे परिवार का पैसा हथिया सकता है। वह शादी का ज़ोर डालता रहा, मैं इंकार करती रही… मैंने पापा को निराश किया था। उन्हें ‘प्रूव’ करना चाहती थी कि मैं काबिल हूँ, उनके कामों को सँभाल सकती हूँ। मैं अपने काम में इतना खो गई, उससे दूर होती गई। अब वह मुझे एक ‘बिज़नेस पार्ट्नर’ की तरह लगने लगा। उसकी ‘पोज़ेसिवनेस’ मुझे चुभने लगी। उसके परियोजनाएँ अपना रास्ता नहीं बना सकीं। एक साल के भीतर ही मेरे प्रोजेक्ट्स के साथ बहुत सी कंपनियाँ जुड़ गईं। मैं बेहद व्यस्त होती गई, उससे मिलना लगभग बंद हो गया। उसका अहम् चोटिल हो गया। वह मुझसे और मेरे पापा से बदला लेना चाहता था। उसके साथी उसे हर गलत काम करने के लिए उकसाने लगे। सच कहते हैं कि जब सोच सही नहीं होती तो रास्ते भी गलत मिलते हैं । वे हर तरह से हमें नुक्सान पहुँचाना चाहते थे। ताकि हम मान , इज़्ज़त और सम्मान खो दें और मैं उससे ही शादी करने के लिए मजबूर हो जाऊँ।
उसने एक साल में कंपनी के पैसे का ग़बन किया और बैंकों से कंपनी के नाम पर ख़ूब क़र्ज़ ले लिया। मुझे नहीं पता था कंपनी के चपरासी और सिक्योरिटी वाले मेरे पापा की ख़ास वफ़ादार टीम के थे। उन्होंने पापा को सब जानकारी दे दी थी। मेरे पापा अभी क़ानूनी सलाह ले ही रहे थे। जब एक दूसरी कंपनी के प्रोजेक्ट लीडर ने मुझे एक होटल में मिलने के लिए कहा, वह कुछ डिस्कस करना चाहता था। इस तरह मिलना और डिस्कस करना कॉर्पोरेट वर्ड में काम का एक हिस्सा है। मैं उसे मिलने गई।यह एक योजनाबद्ध तरीके से षड्यंत्र रचा गया था। उस कंपनी के प्रोजेक्ट लीडर के साथ मैं मिली, बातचीत बहुत बढ़िया हुई। मुझे किसी तरह का शक भी नहीं हुआ। उसने हार्ड लिकर लिया और मैंने नीबूं पानी पिया। पानी में नशा मिलाया गया था, इसका एहसास मुझे तब हुआ जब मैं जाने के लिए उठी और खड़ी नहीं हो सकी। बेहोश होने लगी… मुझे शक हो गया…फ़ोन मेरे हाथ में था, मैं अपना फ़ोन पर्स में रखने जा रही थी; तभी अपनी टीम के ग्रुप चैट में लिख दिया- ‘डेंजर’ ‘सेव मी’। बेहोश होते-होते मैंने अपने ‘प्रेमी’ और ‘बिज़नेस पार्ट्नर’ को अपने दोस्तों के साथ वहाँ आते देखा। मेरे भीतर खतरे की घंटियाँ बजने लगीं पर मैं उठकर भाग नहीं सकी। वहीं बेहोश हो कर गिर गई। वे मुझे एक कमरे में ले गए और मेरे एक्स रमन ने मेरा बलात्कार किया। निखिल जिसके साथ मैंने मीटिंग की थी वह वहाँ से निकल कर अपने ऑफ़िस में चला गया। उसके दोस्त वहाँ से गायब हो गए।
ज्योंही मेरे पापा, मेरी टीम पुलिस के साथ पहुँची, रमन मेरा अपमान कर चुका था, उसने अपनी मंशा पूरी कर ली थी; हालाँकि मुझे धुँधला-धुँधला याद है, मेरी उसके साथ हाथा पाई हुई थी। मैंने उसे दाँतों से काटा था, उसे थप्पड़ मारा था। नशा मुझ पर इतना हावी हो गया था कि उसने मुझे निस्तेज- सा कर दिया था। मैं अपना बचाव नहीं कर पाई। पुलिस उसे ले गई और मुझे अस्पताल पहुँचाया गया, दूसरे दिन जब होश आया तो मैंने निखिल, रमन और उसके दोस्तों के बारे में बताया। मेरे दाँतों के निशान अस्पताल के डॉक्टरों ने रिकार्ड में रखे। रमन को विश्वास था कि वह पकड़ा नहीं जाएगा ; क्योंकि मैं बेहोश थी। सुबह तक वह वहाँ से चला गया होता। जब मुझे होश आती या तो मैं चुप रह जाती या पुलिस के पास जाती। उसने होटल के कर्मचारियों के साथ पुख्ता साँठगाँठ की हुई थी। अस्पताल में भी उसके कुकर्म का पता न चले, उसने तो उसका भी इंतज़ाम कर लिया था। उसने अपनी सोच से मेरा अहम् तोड़ा था, मुझे कलंकित कर दिया था। मेरे पापा को सबक सिखाया था। मेरे पापा और मेरे पास कोई चारा नहीं रह जाना था और वह आगे बढ़कर मेरे से शादी कर लेता और उम्र भर मुझे दबा कर रखता। प्यार की वजह से उसने बलात्कार के बाद भी मेरे से शादी की इसका श्रेय लेता। उसके एक दोस्त ने पुलिस के सामने ये सब राज़ खोले। अपनी टीम को भेजे मेरे संदेश ने उसकी योजना ही ख़राब कर दी। वह पकड़ा गया और अस्पताल में भी उसकी तिकड़मबाज़ी चल नहीं पाई। हमारे वकील ने कंपनी में ग़बन और बैंकों के साथ फ्रॉड तथा धोखे के सबूत भी पेश किए। उसके दोस्तों ने खुद को बचाने के लिए उसके कई राज़ खोले। मेरे से शादी करने के बाद मेरे पापा को कैसे ठिकाने लगाना है, इसका राज़ भी खोला।
मीडिया ने कहीं भी उसके धोखे और फ्रॉड का ज़िक्र नहीं किया। बल्कि उसे शोषित और पीड़ित बनाकर पेश किया। यह भी उसकी योजना का हिस्सा था। पर कोर्ट तो सबूत माँगता है, उसका फ़ैसला तो उन पर होता है। मैं जब कोर्ट में बोली और सबूतों के साथ-साथ गवाह पेश किये गए तो मिडिया की बोलती बंद हो गई। मीडिया से पूछना चाहती हूँ , अगर मेरे परिवार ने उसका शोषण किया था, वह पीड़ित था तो पुलिस के पास जा सकता था, कचहरी के दरवाज़े खटखटा सकता था।जिस तरह से मिडिया ने उसका पक्ष लिया जैसे वे मेरा बलात्कार करने को वे परोक्ष नहीं अपरोक्ष जायज़ ठहरा रहे थे…मेरा कसूर यही था कि मैंने एक कम सुविधा संपन्न लड़के को आगे बढ़ने का अवसर दिया। नहीं पहचान पाई उसकी घटिया प्रवृत्ति को और उससे प्यार कर बैठी। शायद यही मेरे जीवन की बहुत बड़ी भूल थी।
‘अफ़सोस है, लड़कियों की परवरिश ही ऐसी की जाती है, उन्हें स्वयं के लिए कुछ होना सिखाया ही नहीं जाता। ऐसी बेलें बना दी जाती हैं; जो पुरुष के सहारे के बिना आगे बढ़ नहीं पातीं। पुरुष सत्ता ने ऐसा जाल बिछाया हुआ है जिसमें स्त्रियों की ‘कंडीशनिंग’ भी पुरुषों ने अपनी इच्छा के मुताबिक की हुई है। जो लड़की स्वयं रास्ते खोजने की कोशिश करती है, सबसे पहले स्त्रियाँ ही उसके खिलाफ हो जाती हैं। पुरुष को क्या दोष देना !’
‘अरे, मैंने ऐसा क्या कह दिया जो आप सोचने लगे कि मुझे स्त्री होने का अफ़सोस है। ओह शायद मैं बहुत स्पष्ट बोल गई, जिससे आपने ऐसा महसूस कर लिया। ख़ैर, मेरे जवाबों के आप क्या अर्थ निकालते हैं, आपके विवेक पर निर्भर करता है। आपकी सोच कैसी है और आप किस मानसिकता के हैं, इसका भी महत्त्व है।’