• कथा-कहानी
  • किस्से काशी के चौकीदारों के: मृणाल पाण्डे

    आज पढ़िए प्रसिद्ध लेखिका मृणाल पाण्डे का लिखा काशी के चौकीदारों का क़िस्सा। काशी सनातन नगरी है और उसके क़िस्से भी सनातन हैं। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर

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    काशी हिंदुस्तान की प्राचीनतम नगरियों से एक है। बौद्ध जातक कथाओं में बताया जाता है कि बहुत पहले यहाँ यक्ष पूजे जाते थे। इस नगरी के पुराने चौकीदार भी यक्ष हुआ करते थे। निश्चल आँखों वाले यह यक्ष निडर, क्रूर और तबीयतन घुमक्कड़ जीव थे। भेस बदलने में माहिर और अक्सर पीछे से घात लगा कर हमला करने की वजह से इनका एक नाम गुह्यक भी था। जनता उनसे खौफ खाती थी।

    जैन ग्रंथ उत्तराध्ययन गंडितिडुंग नाम के यक्ष चौकीदार की बात बताता है जो मातंग ॠषि के आश्रम का चौकीदार था और संदिग्ध चरित्रवाली महिलाओं की पकड़-धकड़ करता रहता था। बदला लेना उसकी फितरत में था यहाँ तक कि कई बार वह नाखुश हो गया तो जैन यतियों को रात में खाना खिलाकर उनका व्रत भंग करा देता था।

    बाद को यक्षपूजकों और शैवमत में गठजोड़ होने पर, मत्स्यपुराण में ज़िक्र है कि हरिकेश नाम के एक यक्ष की भक्ति से खुश शिवजी ने उसे काशीक्षेत्र का चौकीदार बना दिया था। हरसूबरम नाम से आज भी भूत या पिशाच से बचने को आमजन उसकी पूजा करते हैं। शिवमंदिरों के बाहर अब हाथ में मुद्गर लिये (मुद्गरपाणि) चौकीदारों की मूर्तियाँ भी लगाई जाने लगीं।

    7वीं 8वीं सदी तक वाराणसी बहुत समृद्ध शहर बन गया था। शहर का कोतवाल (नगरगुत्तिक) चोर डाकुओं की पकड़-धकड़ तथा नगर के अमीर लोगों की चौकीदारी करता था। वाराणसी की वेश्याओं की बडी ख्याति थी। उनमें से एक प्रतिरात्रि 1000 कार्षापण की फीस लेनेवाली सामा नामक गणिका ने अपने एक डाकू प्रेमी को नगरगुत्तिक को 1000 कार्षापण की घूस देकर छुड़वाया था। 18वीं सदी में काशी में अराजकता बहुत बढ गई थी। राजा चेतसिंह की ईस्टइंडिया कंपनी से ठनी हुई थी और गुंडों, पंडों, चोरों, बटमारों, उचक्कों की बन आई थी। जब गाँवों से लोग पलायन करने लगे तो 1781 में कंपनी अफसर वारेन हेस्टिंग्स ने दीवानी और फौजदारी मामलात के दो विभाग बनवाये और रेसिडेंट की मार्फत हर गाँव में चौकी बिठाकर वहाँ कंपनी के ‘अपने’ चौकीदार बिठवाये थे। कोतवाल मिर्ज़ा बांके बेग खां को हुकुम मिला कि वाराणसी में 5 चबूतरे बनें। हर चबूतरे पर कुछ हथियार बंद जांनशीन, कुछ चपरासी और एक भौंपेवाला हो। हर रात सदर मुसद्दी में सारे मुसद्दी चौकीदार जमा होकर फिर अलग अलग गलियों में गश्त को निकलें। इन मुसद्दियों का काम था कि वे अपराधियों की पकड़-धकड़ के अलावा सराय मालिकान से शहर में आने-जाने वालों की बाबत सरकार हुज़ूर के लिये जानकारियाँ इकट्ठी करें। दिन में जुए के शराब के अड्डों पर छापे मारें। और इलाके में जनम मृत्यु का हिसाब रखें।

    पर लगता है यह व्यवस्था भी शहर के अमीरवर्ग के लिये पर्याप्त नहीं थी, लिहाज़ा इसी बीच उनके लिये भाडे पर रक्षा तथा मारपीट की सेवायें देने को उपलब्द हथियारबंद बाँकों के चौकीदार दलों का उदय हुआ जो ज़रूरत हुई तो ज़मींदारों रजवाड़ों के लिये लूटपाट भी कर देते थे। इनमें हर जाति के नौजवान थे जो सजीली पोशाकें पहिने अकड़कर चलते थे और खूनखराबे को तत्पर रहते थे। शहर के महाजन उनके निशाने पर रहते थे जिनको डरा धमकाकर वे वसूली करते थे। उनका एक नेता शिवनाथ बडा मशहूर हुआ। कोई मिर्ज़ा पांचू थे जो कंपनी के अमले और बाँकों के बीच का पुल थे। एक लावणी उनके नाम की भी बनी :

    “दो कंपनी, पांच सौ चपरासी चढकर आया, गली गली कूचे से बाँकों को बंधवाया,

    मिर्ज़ा पांचू कसम खाय कुर्रान उठाया, पैगंबर औलिया बीच उनको समझाया”..

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