• कथा-कहानी
  • उदयन वाजपेयी की कहानी ‘दरवाज़ा’

    पिछले दिनों वरिष्ठ लेखक उदयन वाजपेयी की कहानी ‘कथादेश’ में पढ़ी थी। एक वृद्ध लेखक को केंद्र में रखकर लिखी गई इस कहानी में व्यक्त-अव्यक्त का अद्भुत द्वंद्व है। कहानी अपनी तरफ़ से कुछ भी नहीं कहती फिर भी बहुत कुछ कहती लगती है। सोचा आप लोगों से साझा किया जाये- मॉडरेटर

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    कोई इस आदमी के साथ दो महीने रह ले, वो पण्डित हो जाये।

    जब उसे लगा, वह समझ नहीं पाया है, वह चुप हो गयी।

    हवा पर गन्ध की तरह सवार कुछ पल यूँ ही गुज़र गये। कहीं दूर से आती कठफोड़वे की आवाज़ मानो हर पल पर चोंच मार रही हो। अहाते के बाहर के बरगद की झूलती जड़ से सरसराकर गिलहरी नीचे उतर गयी। उसके पीछे भागती हुई दूसरी गिलहरी आयी और ज़मीन से कुछ उठाकर वापस ऊपर चढ़ गयी।

    ‘‘हमेशा ‘दरवाज़ा’, ‘दरवाज़ा’ कहते रहते हैं।!’’

    इस बार उसने वाक्य बदल दिया। बड़े बेटे ने घर के अहाते में आते ही उससे उनका हाल पूछा था। उसकी आँखें देर तक हवाई जहाज में बैठने की थकान से बोझिल थीं। ढीला-सा कत्थई बैग किसी शिकार किये जानवर-सा हाथ में डोल रहा था। कोहरे के रेशे हवा के पारदर्शी धागों में बुन गये थे।

    बड़ा बेटा कनाडा के चिकित्सा स्कूल में लिवर की एक विशेष जानलेवा बीमारी पर शोध कर रहा था। वह पहले भी लिवर की ही तीन-चार बीमारियों की दवाएँ खोज चुका था। ये दवाएँ शुरू में कारगर रही थीं पर धीरे-धीरे बेअसर होती गयी थीं। बड़े बेटे को सालों तक यह समझ में नहीं आ पाया था कि उन रोगों में ऐसा क्या बदलाव आ गया था कि उन्होंने इन दवाओं के विरुद्ध किलेबन्दी कर ली थी। वह जब भी अकेला होता, उसके दिमाग में या तो अपनी ये निष्फल दवाएँ चक्कर काटती या अपने पिता की बिगड़ती हालत।

    ‘क्या इसके अलावा कुछ नहीं कहते?’

    बड़ा बेटा बिमला बाई से लगभग फुसफुसाकर बोला। वह एकटक घर के बन्द दरवाज़े को देख रहा था। उसके दोनों ओर जासौन की झाड़ी पर लगे पीले और बैंगनी फूल झुके हुए सिर की तरह हिल रहे थे। उसे डर था कि वे कहीं अचानक बाहर न आ जाएँ। वे सब कुछ अचानक करते थे। वह मन ही मन बड़बड़ाने लगा, ‘अचानक, अचानक …’। रात में बिस्तर पर उठकर बैठ जाते और उसी हालत में अपनी मेज़ की ओर भागने लगते। वह और उसका छोटा भाई अगर अँधेरे बिस्तर को टटोलते, वे वहाँ नहीं होते। मैं डरते-डरते बिस्तर से उतरकर पाँवों से ठण्डे फर्श को टटोलता दूसरे कमरों में जाता। रात के गहराये अँधेरे में घर फैल कर बहुत बड़ा हो जाता। हर कमरा किसी खुरदुरे काले मैदान में बदल जाता। एक से दूसरे कमरे में जाते हुए महसूस होता मानो मैं जंगल में कहीं भटक गया हूँ। अब कभी भी कहीं से कोई भालू या बन्दर या बाघ आ सकता है। मुझे भालू का ‘हुआ, हुआ’ और बन्दर की ‘चीं, चीं’ सुनायी देने लगती। धड़कन बढ़ जाती। उनके कमरे से बाहर झरती किरणों की फ़ीकी उजास में जंगल कोहरे में घुल जाता, भालू और बन्दर मद्धिम रोशनी की दूसरी तरफ हो जाते। घर सिकुड़ कर उतना हो जाता जितना वह था। वे मेज़ पर झुके लैम्प की पीली, गाढ़ी और संकरी रोशनी में तेज़ी से कुछ लिखे जा रहे होते। उन्हें डरे हुए अपने बड़े बेटे के पीछे खड़े होने का बिल्कुल पता नहीं चलता। मैं वहाँ देर तक चुपचाप खड़ा रहकर सर्दी में काँपता रहता और फिर वैसे ही अँधेरे घर का जंगल चुपचाप पार कर बिस्तर पर लौट आता। अब फीके पड़ गये अँधेरे में खुली मेरी आँखों के सामने रह रहकर उनकी झुकी हुई पीठ डोलती रहती। कार को अचानक सड़क किनारे रोक देते और दोनों बेटों को लेकर फुटपाथ पर तेज़-तेज़ चलने लगते। एक हाथ से बड़े बेटे का हाथ पकड़े रहते, दूसरे से दूसरे का। हम दोनों कभी सामने देखते कभी कनखियों से एक-दूसरे को। फिर हिम्मत करके छोटा बोलता,

    ‘हम कहाँ जा रहे हैं?’

    वे उसकी ओर इस तरह मुड़ते मानो उसने कोई ऐसी बात पूछ ली हो जो उसे मालूम होनी चाहिए थी। वे इन्तज़ार करते कि उनकी कहीं पीछे छूट गयी मुस्कुराहट लौट आये और कहते, ‘पार्क। तुम्हें पसन्द है न!’

    छोटा कुछ बोल पाता, इससे पहले ही मैं बोल पड़ता, ‘है पापा, बिल्कुल है, इसे भी, मुझे भी!’

    वे कुछ चौंक कर मेरी ओर मुड़ते मानो अब तक वे यह भूल ही चुके हों कि उनके दूसरे हाथ से बँधा उनका बड़ा बेटा भी साथ चल रहा है।

    ‘इसके अलावा भी कुछ बोलते हैं!’ बिमला बाई की आवाज़ से उसकी तन्द्रा में दरार उत्पन्न हो गयी। वह बोलती गयी,

    ‘बहुत कुछ बोलते हैं, बाबू। मैं गँवार जितना समझ पाती हूँ, उतना ही है। इतना पढ़ा-लिखा होना उलझा देता है, बाबू। लगता है वे अपने भीतर कहीं उलझ-से गये हैं। उससे बाहर आने छटपटाते रहते हैं।’

    ‘उलझ गये हैं, अपने भीतर? क्या यह बाहरी उलझाव से अलग है? अलग और ज़्यादा मुश्किल? या यह कुछ और ही है जिसे बिमला ने अनायास ही भाँप लिया है।’

    ‘अभी कल की बात है, वह बोलती गयी,’ मेरी तरफ देखकर वे बोले – ‘उस शहर की सारी स्त्रियाँ-लड़कियाँ उदास हैं। उन पर विषाद छाया है, एक तरह की गहरी उदासी जो बर्फ़ की चट्टान-सी उनके सीने पर रखी रहती है, पिघलने का नाम नहीं लेती।’

    ‘यह सब वे इतनी बार बोल चुके हैं कि मुझे याद हो गया है। बाबू, यह है क्या?’

    बड़े बेटे के हाथ से बैग छूट गया। वह धप्प से बगीचे के फर्श पर फैल गया। मैंने बड़ी मुश्किल से आँसुओं को आँखों में ही सोख लिया। मुझे पता नहीं था, मेरा मन अचानक उदासी से क्यों भर गया है। बिमला के कहे पापा के वाक्य न कभी सुने थे, न पढ़े थे। मैं साहित्य या दर्शन की किताबें पढ़ता ज़रूर था पर छोटे की तरह पूरे समय यही पढ़ता नहीं रहता था। वह बचपन से ही इन का दीवाना था – इतिहास भी खूब पढ़ता था। उसके बस्ते में स्कूल की किताबें-कॉपियाँ कम, दर्शन की पुस्तकें, इतिहास की, उपन्यास, कहानियाँ ज़्यादा होती थीं। मैं उससे बातें ज़रूर करता था जिसमें वह यही सब बताया करता। उसने विज्ञान नहीं पढ़ी थी। पर उसे विज्ञान के दर्शन की गहरी समझ थी। वह कहता भी था, बार-बार कहता था,

    ‘तुम कुएँ के मेंढक हो, विज्ञान की प्रयोगशालाओं में तैरते रहते हो। मुझे देखो, मैं तुम्हारी लैब में भी आ सकता हूँ, खुले मैदानों में, पहाड़ों पर, नदियों में या ब्यूटी पार्लर में भी अपना कैमरा लेकर पहुँच सकता हूँ।’

    बड़े बेटे को सोच में डूबा देख बिमला बाई घर के अन्दर जाने लगी। उसने सामने का दरवाज़ा धकेल कर खोलने के लिए उसपर हाथ रखा। वह हिला तक नहीं। उसने फिर कोशिश की। इस बार भीतर से कराहने की हल्की-सी आवाज़ आयी मानो वह कहीं बहुत दूर से आ रही हो। बिमला मुड़ गयी। बड़े बेटे की आँखों में देखते हुए बुदबुदायी,

    ‘लगता है, वे दरवाज़े के ठीक पीछे खड़े हैं!’

    बड़ा बेटा फटी-फटी आँखों से उसे देखने लगा। उसे पिता की हालत के इतने ज़्यादा बिगड़ जाने की कल्पना नहीं थी। उसे घबराया हुआ देखकर बिमला बाई सहम गयी। वह सफ़ाई देती हुई बोली,

    ‘कहीं भी खड़े हो जाते हैं। बिल्कुल चुपचाप मानो वे पत्थर के बन गये हों। अभी नीम के पेड़ के नीचे खड़े रह गये थे। मैंने हर कमरा खंगाल डाला। उन्हें न पाकर डर गयी। कहीं बाहर न निकल गये हो। सड़कों पर हरदम बड़ी-बड़ी फौजी गाड़ियाँ भागती फिरती हैं। कहीं कुछ हो गया तो आपको और छोटे बाबू को क्या जवाब दूँगी…’

    वह बोलती रही, बड़े बेटे ने बीच में ही कहीं सुनना बन्द कर दिया। उसकी धड़कनें बढ़ गयीं मानो वे आज भी गुम हो गये हों। मैं घबराहट में गुज़रे हुए वक़्त को अभी का समय क्यों मान बैठता हूँ। क्या मेरे लिए समय गुज़रता ही नहीं है। या मैं जीते-जी समय के हर कतरे में बिंधा रह जाता हूँ? याकि पापा के जीवन से लिथड़ा हर क्षण मेरे आस-पास इस तरह बिखरा रहता है कि वह कभी भी यकबयक उठ खड़ा होता है। बिमला बाई दरवाज़े के सामने की सीढ़ियों पर बैठ गयी। उसके आधे चेहरे पर धूप बिछ गयी। नीम की पीली पत्तियाँ उसके चारों ओर फैली थीं। वे रह रहकर हवा में तैर जाती थी। वह चिन्तित नहीं थी। वह बड़े बेटे को नहीं देख रही जो घर के अहाते में धीरे-धीरे टहल रहा था।

    ‘क्या तुम अगले कुछ दिनों में घर आ सकोगे?’ फ़ोन पर उनकी आवाज़ काँप रही थी।

    ‘नहीं पापा, अभी मुश्किल है, मुझे खुद नहीं पता कि मेरा यह नया प्रयोग और कितने दिनों तक चलता रहेगा? आप परेशान क्यों लग रहे हैं?’

    ‘वे जा रही हैं’ वे लगभग फुसफुसा रहे थे।

    ‘उन्हें क्या हुआ है?’ मैंने पूछा। देर तक फ़ोन पर चुप्पी रही आयी, फिर हिचकी लेने की आवाज़ आयी। फ़ोन पर सन्नाटा छा गया।

    ‘वे जा रही है!’

    बरसों पहले वे पापा से किसी पत्रिका के लिए बातचीत करने घर आयी थीं। मुझसे छोटी ही रही होंगी। मैं उनके लिए चाय लेकर पापा के कमरे में गया था। वे कुछ सुनते हुए अवाक् रह गयी थीं। वे मुझे देखते ही उठ खड़ी हुईं।

    ‘आप क्यों ले आये, मैं खुद ले आती!’ वे बोली थीं।

    मेरे मुँह से तभी निकले ‘क्यों?’ को सुनकर पापा का चेहरा मेरी ओर मुड़ गया था। ट्रे से कप उठाकर वे कुर्सी में धँस गयी थीं। पापा का कप मेज़ पर रखकर, मैं बाहर भागा था। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैंने उनके साथ वैसा व्यवहार क्यों किया था। ढेरों लोग पापा से मिलने घर आते थे। हम उन्हें देखते थे, कई बार वे हमसे बातें भी करते थे। कुछ हमारे लिए तोहफ़े भी लाते थे। कुछ ऐसे भी थे जो हमारे साथ बाहर घास पर खेलते थे। वे हमारा पीछा करते, हम उन्हें यहाँ से वहाँ दौड़ाते। उनका दोस्त फिनलैण्ड से आया था। उसका नाम कुछ अटपटा-सा था। वह पापा की कहानियाँ पढ़कर यहाँ आया था। वो हमारे साथ ही रुका था। हम दोनों को साथ बिठाकर वह हाथों के इशारों और कुछ शब्दों के सहारे हमें कहानियाँ सुनाता था। घर के पिछवाड़े के झूले पर वह कहानी सुनाता रहता, पापा चुपचाप अपने कमरे में उसका इन्तज़ार करते रहते। आज ही क्यों मैं ऐसा कुछ बोल गया था। आज ही क्यों मैं उनकी किसी दोस्त से इस बद्तमीज़ी से बोला था। उनका चेहरा तुरन्त ही फीका पड़ गया था। इससे पता नहीं कैसे मुझे अच्छा लगता रहा था। अपनी माँ या पिता के नये खूबसूरत रिश्ते पता नहीं क्यों हमें डरा देते थे। हम तुरन्त उन्हें तोड़ने की कोशिश में लग जाते थे। पता नहीं कैसे, हमें उनके नये रिश्तों की छाया अपने उन रिश्तों में पड़ती महसूस होने लगती थी जिनके होने में हमारी कोई भूमिका नहीं थी। इन जगहों पर नैतिकता की दुहाई हमेशा की तरह उन नये रिश्तों की खूबसूरती को नष्ट करने का बहाना भर होती।

    ‘वे कहाँ जा रही हैं, कहाँ जा रही हैं?’ मैं बार-बार फ़ोन पर दोहराता रहा।

    ‘वे कहाँ जा रही हैं?’ मैं इस बार चिल्लाया, कुछ गुस्से से, कुछ हताशा से।

    वे चुप रहे आये। फ़ोन पर केवल उनकी तेज़ साँसों की आवाज़ आती रहीं। ‘पापा… पापा…’, बड़ा बेटा बार-बार बोलता रहा। हर बार उसे केवल साँसों की आवाज़ें आती रहीं। तभी उस ओर से बिमला बाई चीखने लगी,

    ‘साहब मुझे फ़ोन पकड़ा कर बाहर गये हैं। मैं पीछे भागती हूँ।’

    …बिमला बाई ने फ़ोन छोड़ दिया। उसकी चीख के शान्त होते ही फ़ोन पर अचानक खुरदुरी-सी खामोशी फैल गयी, एक सनसनाहट जो मेरे भीतर दूर तक रेत की तरह फैल गयी।

    ‘वे कहाँ निकल गये होंगे? कहीं कोई दुर्घटना न हो जाए?’

    मेरे पाँव काँपने लगे। हाथ में अटका फ़ोन फर्श पर टूटकर बिखर गया।

    फाटक पर कार रुकी। वह पुराने माडल की तेज़ आवाज़ करने वाली काली कार थी। ड्रायवर के चेहरे पर थोड़ी-सी थकान और ढेर-सी उदासीनता थी। कन्धों पर बैग उठाये छोटा बेटा कूद कर बाहर आया और तेज़ी से घर के दरवाज़े की ओर जाने लगा। पुरानी लकड़ी के दरवाज़े के सामने की सीढ़ियों पर बैठी बिमला बाई ऊँघ रही थी। उसने बड़े बेटे के बारे में पूछने मुँह खोला ही था कि बिमला बाई ने अहाते के बाँयें कोने की ओर इशारा कर दिया। लकड़ी के झूले पर लेटा बड़ा बेटा डोल रहा था। उसका बैग झूले के नीचे लुढ़का पड़ा था।

    ‘यह बाहर क्यों लेटा है? बिमला भी बाहर बैठी है!’ छोटा बेटा झूले के पास पहुँच पाता कि उसे पीछे से बिमला बाई की लगभग चीखती हुई आवाज़ आने लगी।

    ‘दरवाज़ा खुल गया!’

    बड़ा बेटा झटके से झूले पर उठकर बैठ गया। झूला कुछ तेज़ डोलने लगा।

    छोटा बेटा हठात् पीछे सरक आया। उसने सिर घुमाकर पीछे देखा। घर का दरवाज़ा खुला हुआ था। बिमला दिखायी नहीं दे रही थी। बड़ा बेटा कूद कर झूले से उतरा और दरवाज़ा की ओर भागने लगा। छोटे बेटे ने झुक कर ज़मीन पर गिरे उसके बैग को उठाया। थोड़ा-सा हिलकर पीठ पर टंगे अपने डफल बैग को ठीक किया और घर के भीतर जाने के लिए आगे बढ़ गया। उसने पलटकर देखा, बाहर का फाटक खुला हुआ था। पास का बरगद का वृक्ष धुँधला पड़ गया था। उसके पत्तों की हरितिमा पर अँधेरे की छाया बढ़ने लगी थी। दूर कहीं आकाश में शाम का सितारा चमक रहा था। उसने तेज़ चलकर फाटक बन्द कर दिया। अटपटी-सी आवाज़ करता वह बन्द हो गया। उसका हैण्डल जंग से ढंक गया था। दोपहर की धूप लम्बी होकर शाम को टटोल रही थी। किरणों के चारों ओर हल्के अँधेरे का आवरण लिपटने लगा था। ‘धीरे-धीरे अन्धकार का आवरण अपने भीतर की किरणों को लील लेगा!’ उसने पहली सीढ़ी पर जैसे ही कदम रखा, सामने अन्दर के झीने अँधेरे में वे फर्श पर बैठे थे। बड़ा बेटा उन्हें उठाने की कोशिश कर रहा था। बिमला फुसफुसाते हुए कह रही थी, ‘आप परेशान मत हो, बड़े भैया। ये कुछ देर में खुद उठ जायेंगे।’ छोटा बेटा सीढ़ी पर ही ठिठका रह गया। उसे समझ में नहीं आया कि वह बड़े बेटे का साथ दे या बिमला बाई की सलाह मानकर वहीं खड़ा रहकर कुछ न करे। उसने हाथ और पीठ के दोनों बैगों को नीचे उतारा और उन्हें दरवाज़े के क़रीब ही रख दिया। फिर वह मानो नींद में चलता हुआ-सा उनके सामने बैठ गया।

    बिमला बाई चुपचाप रसोई की ओर चली गयी। वे तीनों देर तक फर्श पर बैठे रहे। कोई किसी से एक शब्द भी नहीं बोला। दोनों बेटे पिता पर नज़रें खड़ाये थे और वे उन दोनों के बीच से सामने की दीवार को, बल्कि उसे भी नहीं, उसके परे के अँधेरे से भर रहे आकाश के शायद किसी कोने पर अपना ध्यान लगाये थे। बड़ा बेटा सोच रहा था, ‘इनके भीतर की ओर खुलते सारे दरवाज़े बन्द होते चले गये हैं। क्या ये खुद भी इन्हीं दरवाज़ें के पीछे बन्द हो गये हैं? इन बन्द होते दरवाज़ों में हो न हो ऐसे भी कुछ है जिन्हें मैंने और छोटे ने बन्द किया है। हे ईश्वर हम यह जान भी नहीं पाते कि हमारी बोले लापरवाह शब्दों से किस तरह खुद हमारे क़रीबी लोगों का जीवन सिकुड़ता चला जाता है और उससे बाहर आने का रास्ता खोजते, वे उसी तरह निढाल हो जाते हैं जैसे मेरे सामने बैठा यह बूढ़ा जो काँपते हाथों से अपनी छड़ी को पकड़ नहीं पा रहा, जीवन को क्या थामेगा।’ यह बात मन में आते ही बड़े बेटे के कानों में वही सन्नाटा फैल गया जो तेज़ धमाके बाद अनायास ही हर ओर धुएँ की तरह छा जाता है। उनके सामने बैठा छोटा बेटा उन तमाम बातों को दुहरा रहा था जो वह उन्हें सुनाना चाहता था,

    ‘…पापा, आपने ओरहान का नया उपन्यास पढ़ा है? क्या अद्भुत गद्य उन्होंने लिखा है, उसे पढ़ते हुए लगता है जैसे गद्य की शराब पी रहे हों, प्रेम के अन्तरतम में छिपी बैठी घृणा को वे किस खूबसूरती से बाहर ले आये हैं। मैं आपको वह किताब भेज दूँगा।…’

    ‘आपको वह फ़िल्म देखनी चाहिए पापा, उसमें लैण्डस्केप से चरित्र की तरह बर्ताव किया गया है मानो अभिनेता खुद को नहीं, समूचे भू-दृश्य को व्यक्त कर रहा हो। मैंने पिछली बार भी तुमसे कहा था, हम घर में ही छोटा-सा सिनेमाघर बना सकते हैं। इस बार बनवा कर ही जाऊँगा।… क्या पापा तुमने आज तक जंगल में भटकती एक भी गाय देखी है? गायें हमेशा से ही मनुष्यों के पास रही हैं। हम मनुष्यों ने उन्हें कभी स्वतन्त्र नहीं रहने दिया। हमेशा उनसे अपनी चाकरी करायी है। उन गायों को छोड़ो जिन्हें बूढ़ी जानकर लोग सड़कों पर बूढ़े आदमियों की तरह छोड़ देते हैं, वे तो मजबूर जानवर हैं, स्वतन्त्र नहीं। मैं स्वतन्त्र यानी जंगलों में भटकती गायों पर फ़िल्म बना रहा हूँ…। पापा जानते हो, मुझे आज तक एक भी ऐसी गाय नहीं मिली जो अपनी तरह से जी रही हो। कहीं कोई गाय के गले में मोटी रस्सी डालता है, कोई उसकी नाक छेद देता है, कभी उसके पाँव बाँधे जाते हैं।… पापा… पापा…’

    छोटे बेटे के शब्द मन से मुँह तक आ गये। बड़ा बेटा उसके मुँह से निकलते शब्दों को सुन चौंक कर उसकी ओर मुड़ गया। मानो कह रहा हो कि तुम्हें दिख नहीं रहा कि ये न बोल रहे हैं, न सुन रहे हैं। छोटा बेटा एकबारगी सहम गया। वह एकटक उन्हें देखता चला गया। अब तक उनकी नज़रें झुक गयी थीं। चेहरा सीमेण्ट के हल्के हरे फ़र्श की ओर लटक-सा आया था, कुछ-कुछ सूजा हुआ चेहरा जिस पर हर ओर सफ़ेद बाल उगे थे। ठोड़ी के एक ओर छोटा-सा पीला धब्बा था। शायद खाने के बाद वहाँ दाल लगी रह गयी थी।

    ‘ये बहुत थक गये हैं!’ छोटे बेटे ने सोचा, क्यों इतना थक गये हैं? क्या इस उम्र में इन्हें इतना अधिक थक जाना था? अभी कुछ सालों पहले तक देर तक लिखते रहते थे और अब इनमें कुछ भी करने की ऊर्जा बाक़ी नहीं है। कहाँ गयी वह सारी ऊर्जा? ये क्यों अचानक इतना थक गये हैं? क्या इनकी थकान में हमारा हिस्सा भी है? हम दोनों ने ही इनसे कितना झगड़ा किया है, कितनी खरी-खोटी लगातार सुनायी हैं। ये कभी प्रतिवाद करते, कभी चुपचाप सुनते रहते मानो हमारे आरोप, हमारे ताने, हमारी गालियाँ केवल सोख रहे हों। उन सबसे कहीं न कहीं ये टूटते ज़रूर होंगे। हम कभी जान नहीं पायेंगे कि हमारे कौन से अपशब्द ने इन्हें कहाँ से तोड़ा है? हम कभी समझ नहीं पायेंगे कि पिता भी टूटते हैं, भले ही उनकी टूटन दिखायी न दे। यह कैसे मुमकिन है कि उन टूटे हुए हिस्सों से बहता खून उनके भीतर न फैला हो, उसके थक्के यहाँ-वहाँ न बिखरे हों? छोटे बेटे की आँखें झरने लगी। आँसू की हर बूँद में समूचा कमरा कुछ देर हवा में लटका रहता फिर फर्श से टकरा कर इधर-उधर बिखर जाता।

    यहाँ तक तो हम आ गये। इसके आगे की कहानी या तो उन बेटों के पिता सुना सकते हैं या वे जो उस रात उन्हें छोड़कर चली गयी थीं जब उन्होंने बड़े बेटे को फ़ोन किया था। बेटों के पिता अब कुछ भी सुनाने की हालत में नहीं हैं, वे चुपचाप फर्श पर अपने दोनों बेटों के पास बैठे फर्श पर फैलते आँसुओं को घूर रहे हैं या शायद उस ओर सिर्फ़ उनका चेहरा मुड़ा हुआ है और वे कहीं नहीं देख रहे। मानो उनकी आँखें ऐसी खिड़कियाँ हो जिनसे कुछ भी गुज़र नहीं रहा, न हवा, न रोशनी। सुनसान आँखें जो खुलती ज़रूर है पर सिर्फ़ खुलती हैं, देखती कुछ नहीं। न अन्दर, न बाहर। अब उम्मीद सिर्फ़ उनसे हैं जो उनके साथ रहती थीं। वे कौन थीं? वे हैं भी या नहीं? हम सिर्फ़ इतना जानते हैं कि एक दोपहर वे दो बेटों के लेखक पिता से बातचीत करने उनके घर आयी थीं। बाद में कभी वे उनके साथ रही भी थीं। वे उनके साथ क्यों रही थीं?

    ‘मुझे ख़ुद नहीं मालूम कि मैं उनके साथ क्यों रहने लगी थी? शायद मेरी जानने की इच्छा इतनी तीव्र थी कि मुझे उसके आगे कुछ भी नहीं दिखता था। मुझे जानना था। सिर्फ़ जानना था। जानने का कीड़ा भीतर ही भीतर मुझे काटता रहता था। मुझे चैन नहीं लेने देता था। वैसे तो यह कीड़ा हर मनुष्य को तंग करता है, पर मेरा तो उसने जीना ही दुश्वार कर रखा था। मुझे यह भी ठीक-ठीक पता नहीं था कि मुझे क्या जानना है। सिर्फ़ इतना भर सच था कि मुझे जानना था। शायद मुझे वह सब जानना था जो जाना जा सकता है बल्कि वह भी जो शायद जाना नहीं जा सकता। जानने की भूख शायद संसार की सबसे पुरानी और सबसे अनोखी भूख है। इसके आगे बाकी सब भूखें बौनी हैं। बाकी सब भूखें मिट जाती हैं जैसे खाने की भूख खाने पर। सोने की भूख सोने पर, पीटने की भूख पीटने पर, अधिकार पाने की भूख अधिकार पा जाने से। लेकिन जानने की भूख जानने पर भी बढ़ती है। प्रेम की भूख जानने की भूख की तरह प्रेम होने पर और अधिक प्रेम पाने की ओर बढ़ती जाती है। बढ़ती ही जाती है।

    मैं जानने की भूख से निरन्तर बेचैन बनी रहती थी। उन्हें क्लास में पढ़ाते सुना था। वह क्लास भी क्या थी? महाविद्यालय की इमारत के बाहर के घेरदार इमली के पेड़ के नीचे लड़के-लड़कियाँ बैठे थे और वे छाँव में मज़ार के पास सीमेण्ट के प्लेटफार्म पर पालथी मारे थे। हवा धीमी बहती थी, इमली के पत्ते उनके और हम सब के ऊपर गिरते। वे बोलते जाते और मैं उसे पूरी लालच के साथ सुनती जाती। वह महज सुनना नहीं था, बचपन के बाद दोबारा चमत्कृत होने को जानना था। वे जैसे-जैसे बोलते, मुझे लगता, मैं ऐसी जगह पहुँच रही हूँ जहाँ सब कुछ मेरी जानने की भूख को मिटाने तैयार बैठा है। मैंने सुना अचार, तुरन्त ही मुझे लग गया कि यह खाने को देर तक सुरक्षित रखने का ऐसा नायाब ढंग है जिससे खाने के स्वाद में भी बढ़त हो जाती है। मैंने सुना गहना, तुरन्त ही मुझे सुनायी दे गया है कि फ़ारसी साहित्य में अलंकरण के छह तत्त्व माने गये हैं, उनमें से केश-विन्यास, मेंहदी, मसूड़ों को रंगना, सुन्दर पोशाक पहनना आदि के अलावा गहनों की भी जगह है। यानी जब भी पुरानी फ़ारसी कविता में कोई स्त्री सिंगार करेगी, वह इन छह तरहों की तैयारी करेगी। मैंने सुना मौत, तुरन्त ही मुझे सुनायी दिया, जब कोई तुम्हारा इन्तज़ार नहीं करता, मौत करती है। वही हर मानवीय इन्तज़ार के पीछे अदृश्य खड़ी रहती है। मैंने सुना मोक्ष, तुरन्त ही मुझे समझ में आ गया कि इसे इच्छा करने से नहीं पाया जा सकता, यह अपने आप हासिल होता है। मैं पहली बार ऐसा कुछ सुन रही थी जो मेरी जानने की गहरी भूख को अनायास ही मिटाए जा रहा था। क्लास के बाद मैंने अपनी सखियों से इनके बारे में पूछा। किसी को कुछ भी ठीक से मालूम नहीं था। वे सब के लिए अजूबे थे। अटपटे से आदमी। यहाँ से वहाँ मानो बेवजह भागते शख्स। मैं गुपचुप उनकी खोज करती रहती। वे कभी दिख जाते, कभी हफ़्तों तक ग़ायब रहे आते उन्हें समझने की कोशिश में सालों लग गये। वे आते-जाते अगर कहीं दिख जाते, हमेशा ही रुक कर बात करते। मुझे कई बार लगा कि वे यह जान गये हैं कि मुझे जानने की भूख है। पर तुरन्त ही यह भी लग गया, यह मेरा भ्रम है। वे क्यूँकर यह जान पायेंगे कि मैं जानने की इच्छा में लिपटी हुई बेचैन जीवन जी रही हूँ। मैंने न कभी उनसे कुछ पूछा, न अपनी ओर से कुछ कहा।

    वे तब उतने भारी भरकम नहीं थे। खूब तेज़ चलते थे, चलते क्या थे, दौड़ते थे। हमेशा जल्दी में रहते मानो उनके पैरों में पहिये लगे हों। मेरे पास रुकते, तब सचमुच रुक जाते थे। मुझसे इस तरह बातें करते मानो उनके पास ढेर सारा समय हो। उनकी सारी तेज़ी जाने कहाँ ग़ायब हो जाती। एक अजीब-सा ठहराव उनकी आँखों में, हाथों के चलने में आ जाता। सखियाँ कहतीं, उन्हें तुममें ख़ास दिलचस्पी है। मुझे ऐसा नहीं लगा। मैं आज तक नहीं समझ पायी कि वे मेरे पास क्यों ठहर जाते थे। शायद हमारे भीतर ऐसा कुछ होता है जो हमसे अलग होता है, ‘हमसे अलग’ किसे क्यों बाँध लेता है, हम कैसे जान पायेंगे। मुझे कैसा भी नहीं लगता अलावा इसके कि उनके साथ खड़े रहकर मुझे महसूस होता रहता, मैं कुछ न कुछ जान रही हूँ। पूछने पर शायद बता न पाती, क्या जान रही हूँ। बिल्कुल भी नहीं बता पाती कि क्या जानती चली जा रही हूँ। भीतर ही भीतर जानने का आनन्द बूँद-बूँद टपकता रहता, ठीक वैसे ही जैसे अभी आँसू, धार में बँधे बिना, गालों पर टपक रहे हैं, बूँद-बूँद, बूँद-बूँद।

    वे महाविद्यालय में कम नज़र आने लगे। शायद उन्होंने पढ़ाना छोड़ दिया था। कभी-कभी शहर के किसी पार्क में अकेले बैठे दिख जाते। कभी किसी रेस्तराँ में। कभी वे पुस्तकालय के कोने में बैठे रहते, उनके हाथों में किताब खुली रहती पर मुझे लगता वे पढ़ नहीं रहे, किताब पर आँखें गड़ाए, वे अपने ही भीतर कहीं झाँक रहे हैं। या कभी वे खुली आँखों से सो रहे होते घोड़ों की तरह। पार्क में एक बार मैं उनकी बगल में जाकर बैठ गयी, डरते-डरते कि कहीं वे मुझे भगा न दें। तभी तेज़ हवा चलने लगी, आसपास के आम के पेड़ों की शाखों ने ज़ोर-ज़ोर से झूमना शुरू कर दिया। घबरायी चिड़ियाँ शायद पत्तों के पीछे दुबक गयी थीं या कहीं दूर उड़ गयी थीं। उनके पास की बेंचों के लोग भाग-भागकर फाटक के बाहर दौड़े जा रहे थे। वहाँ धक्का-मुक्की होने लगी थी।

    ‘क्या घर जायेंगे?’ मैंने चिल्लाकर उनसे पूछा। मेरी आवाज़ तेज़ हवा में उन तक पहुँचने के पहले ही बिखर गयी। मैं उनके पास सरक आयी। उनके हाथों को झकझोर कर फिर वही वाक्य बोला,

    ‘क्या घर जायेंगे?’

    ‘चलो’ वे उठ खड़े हुए। वे आगे, मैं पीछे चलने लगी। हम सड़कों पर गिरती शाखों से बचते हुए उनके घर पहुँच गये। वह कुछ ऐसा बना था कि छत से नीचे बहते पानी की धाराओं से दीवार जैसी बन गयी थी।

    ‘हमें पानी की दीवार के उस ओर जाना है।’ वे मेरे कान में फुसफुसाये। हम उस दीवार को चीरकर बाहरी बरामदे में आ गये।

    उस दिन देर शाम तक आँधियाँ चलती रहीं। धुआँधार बारिश ज़मीन को भीतर तक भिगा गयी। बिमला ने मुझे घर से बाहर नहीं निकलने दिया। मैं बाहर जाती भी कैसे? बिगड़ते मौसम ने शहर को अलग-अलग मकानों में विभक्त कर दिया था। पानी की तेज़ धाराओं ने मकानों के दूसरे मकानों से रिश्तों को तार-तार कर दिया था। वह मुझे घर के सुदूर कोने के कमरे में छोड़ आयी। बड़ी-सी ख़ाली जगह के बीच के तख़्त पर साफ़ हल्की नीली चादर बिछी थी। मानो बादलों के पीछे छिपे आकाश का एक छोटा-सा टुकड़ा कुछ घड़ी सुस्ताने पलंग पर पसर गया हो। बायीं दीवार से सटकर मेज़ और कुर्सी रखे थे। मेज़ पर कुछ किताबें करीने से जमी थीं। इनमें अरेबियन नाइट्स के अंग्रेज़ी अनुवाद की तीन मोटी काली ज़िल्दें भी थीं। उनके पीले पन्नों से पता लग रहा था कि वे बरसों पहले प्रकाशित हुई हैं। मेज़ के ठीक ऊपर बन्द काँच की खिड़की पर भाप जम गयी थी। बारिश की आवाज़ बहुत मद्धिम होकर भीतर आ रही थी। मानो वह किसी दूर की पहाड़ी के पीछे हो रही हो। इस कमरे में आकर महसूस हुआ कि यहाँ कोई मौसम आ नहीं सकता। सर्दी, गर्मी या बारिश खिड़की तक आकर ख़ाली हाथ लौट जाते हों।

    अगले सात दिन फुटपाथ के पेड़ उखड़कर सड़कों के आर-पार बिछते रहे। साईकिलें, कारें, बसें इन टूटे पेड़ों के बीच फँसी रह गयी थीं। गँदले बहते पानी से उनके इंजिनों पर मिट्टी की बारीक परतें चढ़ती जा रही थीं। पास की दोनों नदियों के उफ़ान से हज़ारों मवेशी रस्सी से बँधे होने के कारण डूबे रह गये थे। कुछ दिनों बाद उनकी लाशों की पिछली टाँगे और फूले हुए पेट पानी के ऊपर आकर डोलने लगे थे। कुछ की गलती लाशें तेज़ भागते पानी में तैरती हुई सड़कों पर बहने लगी थीं। कभी वे सड़क के किसी मोड़ पर उलझ जातीं तो उनके चारों ओर सड़ांघ फैल जाती और पास के घरों के बच्चे उल्टियाँ करने लगते या बेहोश हो जाते। ज़रा-सा भी खराब मौसम कैसी बेरहमी से हमारे शहरों के ढँके-मुँदे घावों को उजागर कर देता है। तभी हम समझ पाते हैं कि हम ठोस ज़मीन पर नहीं, मृत्यु के ऊपर बिछी बर्फ़ की पतली-सी परत पर जीवन गुज़ार रहे हैं।

    हर सुबह जागकर मैं बिमला के पास रसोईघर चली जाती। वह मुस्कराकर काम करती रहती। वह बिना कुछ बोले चाय की प्याली मेरी ओर बढ़ा देती। उनके बारे में पूछने पर उनके कमरे की ओर इशारा कर देती। मेरी जिज्ञासा पैरों को उनके कमरे की ओर ठेलने लगती पर उनकी उपस्थिति का डर उन्हें थाम लेता। मैं उनके कमरे के दरवाज़े पर हिलते पर्दे की पीली धारियों में उलझ कर रह जाती। एक बार घर में गूँजती पानी की बूँदों की आवाज़ों के बीच पर्दे की पीली धारियों को देखते हुए मेरे हाथ से प्याली छूटकर गिर गयी। ख़ाली प्याली के फर्श पर टूटने की आवाज़ बूँदों की आवाज़ों को चीरकर हर ओर फैल गयी। मैं टुकड़े उठाकर जैसे ही सीधी खड़ी हुई, वे सामने खड़े थे। ठीक उसी समय छत पर बरसती बारिश थम गयी। देखते ही देखते घर के हर कोने में सहमी पड़ी खामोशी पूरे घर में गन्ध के अणुओं की तरह फैल गयी।

    उन्होंने बिमला को कुछ इशारा किया और मेरी ओर मुस्कराकर देखते हुए अपने कमरे की ओर मुड़ गये। मैं मानो किन्ही अदृश्य धागों से बँधी उनके पीछे-पीछे जाने लगी। उन्हें यह पहले से ही पता था। उन्होंने ख़ाली कुर्सी की ओर अपनी कुर्सी मोड़ ली थी। मैं लगभग गिरते हुए ख़ाली कुर्सी पर बैठ गयी।

    ‘आपके पास ओढ़ने को पर्याप्त चादरें हैं?’

    वे मेरे पीछे खुली खिड़की से बाहर देखते हुए बुदबुदाये। मैंने घबराहट में कुछ इस तरह सिर हिलाया कि उसका कुछ भी अर्थ निकल सकता था। मुझे पता नहीं चल पाया कि उन्होंने मुझे देखा भी या नहीं।

    उनकी कुर्सी के पीछे की बहुत बड़ी मेज़ पर हर ओर काग़ज़ बेतरतीबी से बिखरे थे। वे कहीं पेपर-वेट, कहीं किताबों से दबे थे।

    ‘आप क्या लिख रहे हैं!’

    मेरे मुँह से यह वाक्य मानो अपने आप निकल गया। उनकी आँखें खुली खिड़की से नीचे आकर मुझ पर ठहर गयीं। कुछ ही देर में वे तेज़ी से ऊपर-नीचे होने लगीं। मानो चाहकर भी मुझ पर ठहर न पा रही हों। बाहर अचानक तेज़ बारिश दोबारा शुरू हो गयी। पड़-पड़-पड़ के शोर ने पूरे घर को हर ओर से घेर लिया।

    इन आवाज़ों के बीच उनकी बुदबुदाहट कहीं खो गयी। पर मुझे लगा कि मैंने उनका कहा सुन लिया है। वह क्या था, यह मैं नहीं बता सकती थी क्योंकि वह ऐसा कुछ था जो शब्दों में होता हुआ भी शब्दों से परे था। वह शायद उनके होंठों के कम्पन में था या शायद उनके हाथों में स्पन्दन में या शायद पानी की पतली-सी परत से ढँकी उनकी आँखों की गहराई की थरथराहट में, मैं बता नहीं सकती और मैंने यह खोजने की कोशिश भी नहीं की। या शायद उनके साथ रहने की अपनी इच्छा में इतना ही खोज सकी थी। इसके आगे का रास्ता बन्द था। मैं इतना ज़रूर कह सकती हूँ कि मैंने संसार और अपने बारे में, अपने से बाहर निकलने और अपने में वापस लौटने के बारे में जो भी जाना, इन्हीं रास्तों से जाना था। महज उनके क़रीब रहने भर से उनकी समझ मेरे मन के जाने किस खिड़की या रोशनदान से भीतर आकर मेरी अपनी समझ को जगा देती। ऐसे लम्हों में मुझे इतना ज़रूर महसूस होता कि मेरे भीतर कुछ घट रहा है, कुछ ऐसा घट रहा है जो मुझे समझ में नहीं आ रहा पर उसके घटने के स्पन्दन मुझे हर ओर अनुभव हो रहे हैं। मैं जब भी उनके पास से उठकर अपने कमरे की ओर बढ़ती, मुझे अपनी जानने की बेचैनी कुछ देर के लिए थोड़ी-सी कम लगने लगती। लेकिन साथ ही उस कम होती बेचैनी के चारों ओर और अधिक जानने की इच्छा अंकुरित होने लगती।

    काले बादलों और बारिश के बीच मैं उन्हें छोड़ने उनके घर आयी थी पर मैं यहीं रही आयी। सालों तक उनके घर के कोने के कमरे रही आयी। कभी-कभी उनके साथ घर के बाहर भी निकलती, वे मुझे फूलों के पौधों, पेड़ों, बीज़ों के बारे में बताते चलते। कभी वे शहर की बसावट के इतिहास के बारे में बताते।

    ‘पहले यहाँ शाल के पेड़ों का जंगल था। उन्हें काट लिया गया। आप शाल के पेड़ों के बारे में जानती हैं? उन्हें इन्द्र के क़रीब माना जाता है। क्या आपने कभी ‘शाल-भंजिका’ की मूर्ति देखी है। …’

    उनका बोलना भाषा की गलियों में विचारों का भटकाव था।

    ‘आप चाहें तो यहाँ बैठकर पढ़ें या पास के कॉफ़ी हाउस चली जाएँ।’

    वे चलते-चलते तालाब के किनारे की बेंच पर बैठकर, कुछ दूर पहाड़ पर बनी इमारत की ओर इशारा करते। घने पेड़ों से ढँके पहाड़ पर लहराती लकीर जैसी पगडण्डी नीचे भागी चली आती थी। कई बार उसके आसपास बकरियाँ चरती रहतीं। काॅफ़ी हाउस की खिड़की से उनकी पीठ और सिर दिखायी देते। वे घण्टों हवा में लहराते पानी की ओर ताकते रहते। ऐसे अवसरों पर मैं भागकर उनके पास जाना चाहती कि उनके मन में चल रहे विचारों के आवागमन को सुन सकूँ। पर मैं जानती थी, वे कैसे भी सान्निध्य की कीमत पर अकेलेपन का विनिमय नहीं करते थे। वह उनके लिए सान्निध्य का अभाव नहीं था, वह ऐसी जगह थी जहाँ हर सान्निध्य उन्हें चुपचाप छोड़ आता था। मैं उनके विचारों की कल्पना करते-करते खुद किन्हीं विचारों में डूब जाती। शाम घिर आती। तालाब के पानी में आकाश की हल्की कालिमा उतरने लगती। लहरों पर तारों की छायाएँ डोलने लगतीं। उनका सिर धीरे-धीरे झुकने लगता। मानो थकान से भारी पलकों ने उनके सिर को भारी कर दिया हो।

    मैं भागकर उनके पास पहुँच कर उनका हाथ थाम कर कहती, ‘चलें’, और वे सावधानी से एक के बाद दूसरा कदम फुटपाथ पर रखने लगते।

    घर के कोने के कमरे में बड़ा बेटा छोटे बेटे से बोला,

    ‘क्या तुमने बाद के बरसों में कभी उन्हें उनके बारे में कुछ कहा था?’

    ‘मैंने जो भी कहा, तुम्हारे सामने कहा।’

    बड़े बेटे को याद आ रहा था कि कैसे खिड़की के बाहर पेड़ पर बैठे ढेरों तोते अपनी लाल चोंचों से अमरूदों पर ठोकरें मारते थे। हर ठोकर के बाद तेज़ी से उनकी जीभ बाहर निकलती और अमरूद का कुछ हिस्सा लेकर गायब हो जाती। शाम के पीछे आती रात ने खिड़की के बाहर के पेड़ों को गहरे काले रंग से रंग दिया था। कभी कोई जुगनू अचानक चमक कर अँधेरे में दरारें उत्पन्न कर देता। दोनों भाई चुप बैठे बाहर से आती झीगुरों की आवाज़ों के जाल में उलझे रहे। कुछ समय बीता और चाँद खिड़की पर उतर आया। पेड़ों की पत्तियाँ हल्के नीले प्रकाश में भीगने लगीं। बड़े बेटे के दिमाग में रह-रहकर उनके साथ हुई छोटी-सी बात चक्कर काट रही थी। उसने सर्दियों की दोपहर में कनाडा से कुछ साल पहले, उनसे पूछा था,

    ‘आप हमारे घर में क्या कर रही हैं?’

    मेरे घर की खिड़की के बाहर बर्फ़ गिर रही थी जिसकी बेहद हल्की खुश्बू कमरे में फैली थी। सामने का सारा दृश्य सफ़ेद हो चला था। उस पर पैदल से भी धीमी एकाध कार सरक रही थी। उसके सामने बिखरा प्रकाश मानो बर्फ़ पर फिसलता-सा कार के आगे-आगे सरक रहा था। फ़ोन के उस ओर से आयी आवाज़ मेरे कानों में तैरने लगी। वह सकुचाती-सी आवाज़ थी जो खुलने से कहीं अधिक अपने आप में सिमटी जाती थी।

    ‘मुझे सचमुच… सचमुच नहीं पता… … तेज़ बारिश में… हर ओर पेड़ उखड़ कर गिर… उन्हें छोड़ने… फिर लौट नहीं…

    मुझे लगा कि फ़ोन पर आवाज़ कट-कटकर आ रही हैं। यह भी लगा कि वे बोल नहीं पा रही हैं। ‘हमारे साथ कितना कुछ घटता रहता है जिसे हम चाहते हैं पर कह नहीं पाते…’, वे एक बार मुझसे बोले थे।

    उनके साथ ऐसा क्या घटा है? ऐसा क्या था जो वे बोल नहीं पा रही हैं? क्या मैं यह कभी जान पाऊँगा? उसी फ़ोन कॉल के कुछ दिनों बाद वे यह घर छोड़कर चली गयी थीं। छोटा बेटा कुर्सी पर बैठे-बैठे सो गया है। बड़ा बेटा उठा, बिस्तर पर झुका और उसने मोटी-सी शॉल लाकर उसके ऊपर डाल दी। पलकों के पीछे से छोटे बेटे की आँखें बाहर आने को हुईं पर आयीं नहीं। झींगुरों की आवाज़ें तेज़ हो गयी थीं, बीच-बीच में उन्हें दूर से आती मोर की चीख चीर देती थी। वह खुद पास के बिस्तर पर लेट गया। काश, मैं उन्हें वापस बुला सकता। काश, हम उन्हें बुला सकते। काश, हम उन्हें बुला…। उनके जाने के बाद से ही पिता की हालत बिगड़ती गयी है। वह लेटे हुए ही बुदबुदाने लगा, ‘काश, हम उन्हें…। काश… काश… का… श… का… आ…।’ उसकी बन्द आँखों में दूर तक बर्फ़ की चादर बिछ गयी। दीवार घड़ी की टिक-टिक उसके कानों में भटकती रही। फिर वह खो गयी।

    बिमला बाई के चीखने से बड़े बेटे की नींद खुली। वह रह-रहकर चिल्ला रही थी,

    ‘कहाँ गये साहिब, ‘कहाँ गये साहिब…।’

    बड़ा बेटा कमरे से बाहर भागा, बिमला की चीख ने छोटे को भी नींद से झटके से बाहर खींच लिया था।

    ‘कहाँ गये साहिब… कहाँ गये साहिब…’ वह चिल्लाये जा रही थी। उसने देखा बड़ा बेटा उनसे पूछ रहा था,

    ‘कहाँ चले गये? आपको बताया नहीं। आपने देखा नहीं’

    छोटा बेटा काँपती आवाज़ में बोला। बिमला की आँखों में आँसू भर आये थे। गले रुँध गया था। वह आश्चर्य, डर और दुख में डूबी हर ओर चेहरा घुमा रही थी। वह लगभग फुसफुसाते हुए बोली,

    ‘सारा घर भीतर से बन्द था। वे कहीं भी कैसे जा सकते हैं?’

    यह कहते ही वह सुबकने लगी। दोनों बेटे भी भाग-भागकर घर के हर कमरे बल्कि हर कोने में झाँकने लगे।

    वे कहीं नहीं थे।

    तभी बड़े बेटे को बिमला बाई ने रोक लिया। उसने आँसुओं भरी आँखों से उसे देखते हुए कहा,

    ‘शायद वे जो दरवाज़ा घर में ढूँढ रहे थे, वह उन्हें मिल गया… हाँ बड़े बाबू लगता है, वह उन्हें मिल गया।’

    बड़ा बेटा स्तब्ध रह गया। बिमला ने उसे कल ही बताया था कि ‘वे हमेशा दरवाज़ा, दरवाज़ा कहते रहते हैं।’ छोटा बेटा जैसे ही उसके पास आकर खड़ा हुआ, बड़ा बेटा बोला,

    ‘वे उस दरवाज़े से बाहर निकल गये जिसे वें ढूँढ रहे थे।’

    ‘मैं कुछ समझा नहीं’, उसके मुँह से निकल गया।

    बड़े बेटे के दुख भरे चेहरे पर बेहद हल्की-सी मुस्कान आकर लोप हो गयी,

    ‘समझा तो मैं भी नहीं हूँ।’

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