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  • यात्रा: अतिरापल्ली से ऊटी

    पश्चिमी घाट के जंगलों की यात्रा पर युवा लेखक साकेत बिहारी पाण्डेय का यह रोचक संस्मरण पढ़िए। साकेत ने हैदराबाद विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। उनका यह यात्रा-संस्मरण पढ़िए- मॉडरेटर 
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    अतिरापल्ली से जंगल आरम्भ हो जाता है। हाथियों का प्यारा घर। कुछ दिन पहले ही मनुष्य के कारण हाथी के साथ दुर्घटना भी हुई थी। पश्चिमी घाट की रमणीयता सघन वर्षा के साथ मिलकर हरीतिमा का अनुपम संसार सृजित करती है। सबसे विशाल भारतीय गिलहरी, जो देखने में आधी बंदर आधी गिलहरी दिखती है, थोड़े थोड़े चमगादड़ जैसा भी, का घर है। ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल आपको पेड़ों पर उड़ते, स्थान बदलते दिख जाएंगे। लेकिन इतने छुपे हुए कि आप उनकी तस्वीर नहीं खींच पाएंगे। कैमरा एडजेस्ट करते ही ये पुनः स्थान बदल देते हैं। पूरी तैयारी के साथ यदि जंगल में जाते हैं तभी एक दो दिन की प्रतीक्षा के बाद इनसे आराम की भेंट हो सकती है कि आप उनकी फोटो खींच सकें। आवाज इनकी कुछ कुछ सारस जैसी होती है। सागवान, महोगनी, कटहल, कहीं कहीं चीड़, बाँस, एवं कुछ मसाले के वृक्षों से आभरित यह वन स्वयं में महाकाव्य है। सागवान और महोगनी की लंबाई बादलों को छूती है। बादलों से पानी निचोड़ कर पीते हुए इन वृक्षों के उर्ध्वमुख से टपक नीचे गिरती हुई वर्षा बड़ी रहस्यमय लगती है। कभी कभी तो मन में भय भी भर देती है। जंगल के सन्नाटे में केवल जंगल बोलता है। निविड़ जंगल की भी ध्वनियाँ होती है। तानपुरे के समान लगातार एक सम पर तरंगित। चिड़–चिड़ि –सन–सन  उस निर्जन में हृदय में आदि संगीत भरते हैं तो डराते भी हैं। 
    रास्ते में चलते हुए हरेक दो सौ मीटर या बहुधा दो किलोमीटर पर बोर्ड लगा हुआ मिल जाएगा: हाथी क्रॉसिंग क्षेत्र, कृपया उन्हें पहले जाने दें। उन्हें प्रतीक्षा नहीं करना पड़े। सत्य है। कोई अपने घर में प्रतीक्षा क्यों करे। कुछ इसी कारण से भड़का हुआ एक हाथी ट्रक को धकेल दिया होगा। दुर्घटना घट गई।  सड़क पर हाथी के मलपिण्ड बिखरे हुए थे। जैसे अभी कुछ देर पूर्व ही निवृत्त होकर गए हों। विराटपशु की उपस्थिति का संकेतमात्र रोमांचित कर रहा था। सूखी और गीली, ताजी और पुरानी सभी प्रकार की टट्टियाँ। परन्तु गजराज कहीं दिखे नहीं। हमने मार्ग पार किया। 
    अतिरापल्ली झरना के आगे बढ़ने पर एक और झरना है; वायाचल(vazhachal). हम आगे बढ़े। शाम के लगभग छः साढ़े छह बज रहे थे। गुरुवायूर से दर्शन करके हम लगभग तीन साढ़े तीन बजे निकले थे। वायाचल झरने के पास चेक पोस्ट पर हमें रोक लिया गया। हमें इस बात की सूचना थी कि मलक्कपारा चेक पोस्ट पर छह बजे के बाद रोक लेते हैं। हमने मलक्कापारा को मलक्कापारा मान लिया था जबकि मलक्कापारा चेकपोस्ट का अर्थ था मलक्कापारा जंगल में प्रवेश करने पर जो चेकपोस्ट है। शाम के साढ़े छह बजे हमें रोक दिया गया। हम वापस अथिरापल्ली के पास आ गए और वहीं रुकना निश्चित किया। कमरे ठीक ठाक हैं। बाहर से देखने में अच्छे लेकिन भीतर कुछ सुविधाओं का अभाव होता है। जाएं तो एक बार होटल में कॉल करके पूछ लें। ऑनलाइन महंगा होता है। बात करने पर रेट कुछ कम हो पड़ता है। और आप अपने अनुसार कक्ष का चयन कर सकते हैं तथा प्रदत्त सुविधाओं में घटा बढ़ा सकते हैं। होटल बुकिंग का एक सिद्धांत निश्चित कर लिया जाना चाहिए कि एक बार ऑनलाइन शुल्क देखकर होटल में कॉल करके ऑफलाइन दर भी पर कर लें। डेढ़ हजार से दो हजार तक में अतिरापल्ली में अच्छा कमरा मिल जाता है। थोड़ा एकाध घंटे समय खर्च करें तो इतने में ही आपको बेहतर सुविधाएं भी मिल जाएंगी। जरा भीतर जाकर खोजना पड़ेगा। भोजन की समस्या रहेगी। यह त्रिवेंद्रम छोड़कर लगभग पूरे केरल के लिए सत्य है। शाकाहारी होने के बाद तो समस्या और भी बढ़ जाती है। शाकाहारी भोजन के लिए केवल त्रिवेंद्रम। 
    हम अगली सुबह साढ़े आठ बजे निकले। वायाचल झरने के पास चेक पोस्ट पर हमने ऑफलाइन पास लिया, जहाँ मुझे यह बताया गया कि नेटवर्क मलक्कापारा बसावट के पास आयेगा वहाँ तमिलनाडु के लिए e pass लेना होगा, क्योंकि राज्यसीमा बदल जाती है। तमिलनाडु पुलिस से जितना बच सकें बचें। यह समाजवादी सरकार कालीन उत्तरप्रदेश की सरकार है। भ्रष्टतम। केवल प्रदूषण प्रमाणपत्र नहीं होने के कारण हजार रुपए का घूस देकर आया हूँ। पुलिस ने मुझे अपने फोन पर दस हजार रुपए ऑफिशियल बिल दिखाया ।  मेट्टुपलायम से ऊटी प्रवेश मार्ग पर नीचे के चेक पोस्ट पर हमें जाने दे दिया गया और उन्होंने मेरी स्कूटी का नंबर आगे के चेक पोस्ट पर भेज दिया। जो पूरी तरह से तैयार थे। शाम के साढ़े सात बजे के धुंधलके में आंधी और पानी का पूरा मजमा शुरू हो गया था। पुलिस ने डरा रखा था। दूसरा प्रदेश, भाषा की समस्या, पुलिस का डर, ढलती रात, आंधी पानी, और ढाई सौ किलोमीटर लगातार ड्राइविंग से थका हुआ दिमाग। हमने हजार रुपए उन्हें सधन्यवाद दिया और आगे बढ़े। अतः तमिलनाडु पुलिस से सावधान। यह समस्या मुझे केरल में कहीं नहीं हुई। केरल पुलिस समस्या खड़ी नहीं करती है। थोड़ी सभ्यता और शिष्टाचार वहाँ के समाज में है तमिलनाडु में जिसका अभाव पाएंगे। 
    मलक्कापारा बसावट के पास नेटवर्क आया और हमने तमिलनाडु के लिए e pass लिया। यह पास जंगल में आवागमन के लिए लगता है, जो कि फ्री है।  गाड़ी का रजिस्ट्रेशन नंबर, मैन्युफैक्चरिंग डेट आदि सब भरवाते हैं। कहाँ जा रहे हैं, होटल में रुकेंगे या संबंधियों के यहाँ। संबंधियों का एड्रेस लाइन तक भरवाते हैं। तो तैयार रहें। वायाचल से मलक्कापारा बसावट तक जाने में मलक्कापारा आरक्षित वन का सौंदर्य केवल अनुभव किया जा सकता है, अभिव्यक्त नहीं। बीच बीच में वनवासियों के दो चार दस घर और वन अधिकारियों के कार्यालय या आवास के अलावा कुछ चाय की दुकानें। गुणवत्ता की आशा नहीं रखिए। गुणवत्ता यहाँ बस जंगलों के सौंदर्य में है। शत प्रतिशत मनुष्यता के आरंभ काल की प्रकृति मन को समाधिस्थ करती है। लेकिन आप समाधिस्थ हो नहीं सकते हैं। चलना है । लगातार चलना पड़ेगा क्योंकि आरक्षित वन क्षेत्र में कहीं भी गाड़ी रोकने की मनाही है। कहीं पेट्रोलिंग पार्टी के हत्थे चढ़ गए तो लेने के देने पड़ जाएंगे। निर्धारित स्थलों पर हो आप कुछ देर रुक सकते हैं। धीरे धीरे वाहन बढ़ाएं, प्राणवायु भरते जाएं। 
    मलक्कापारा से आगे बढ़ते हुए हम मलक्कापारा तथा वालपारा के बीच चाय बागानों का सौंदर्य लाभ किया। पुनः वालपारा नगर पार करने के बाद वालपारा का प्रसिद्ध चालीस कर्व वाली घाटी पार की। हरेक मोड पर एक वन्यजीव का सुंदर सा बड़ा चित्र और मोड की संख्या अंकित थी। खतरनाक घाटी का सौंदर्य उतना हो अनुपम था। मलक्कापारा केरल तमिलनाडु सीमा पर है। वालपारा तमिलनाडु में है। इधर आपको रास्ते में हिंदू मंदिरों की संख्या में वृद्धि दिखेगी जो त्रिशूर–अतिरापल्ली मार्ग में दिखते चर्चों के दर्शन से उत्पन्न व्यथा से मुक्ति देंगे। कुमार कार्तिकेय का क्षेत्र प्रतीत होता है। सर्वश्री धर्म शास्ता कहते हैं इधर कुमार को।
     वालपारा की घाटी पारकर हम समतल पर आ गए। वहां से पोल्लाची से कोयंबटूर होते हुए मेट्टुपलायम। जहां से हमने आठ बजे रात में ही ओटी जाने का निश्चय किया । आंधी पानी का माहौल बना हुआ था। भीगता हुआ अनुमान पर स्कूटी बढ़ाता रहा। वर्षा तीव्र हो गई थी। हवा भी तेज। हम रात में स्कूटी की क्षीण रोशनी में बढ़ते रहे। व्यस्त सड़क और मोड़दार घाटी। आश्वस्ति इस बात की थी कि अंग्रेजों के बाद भारतीय सरकारों ने भी पर्यटन के मद्देनजर चौड़ी सड़कें बना रखी हैं। ठंड भी बढ़ती जा रही थी। हाथ अकड़ रहा था। उंगलियां केवल हैंडल पर जकड़ी ही थी। बस तंत्रिका के कतिपय संकेत पर एक्सीलरेटर बढ़ घट रहा था, ब्रेक लग रहा था और हैंडल मुड़ रहा था। बीच में रुकने का कोई कारण नहीं था। वर्षा रुकने की प्रतीक्षा में हम और भी अधिक घनघोर वर्षा को निमंत्रण दे देते अतः हमने आगे बढ़ने का ही निश्चय किया। अंततः कन्नूर आकर हमने रात्रि विश्राम किया।
    कन्नूर, ऊटी एक अतिव्यस्त, और भीड़भाड़ वाला नगर है, जहाँ देखने के लिए कुछ नहीं है। बस शोरशराबा। टॉय–ट्रेन पर्यटकों का परंपरापालन जैसा है। यहाँ सौंदर्य मर चुका है। चित्तीदार संरचना में होटलों और सड़े हुए दुकानों की भरमार देखने यदि आप हिल स्टेशन जाना चाहते हैं तो ऊटी जा सकते हैं। जो मानसिक शांति मैने पाश्चिमी घाट के जंगलों में अर्जित किया था वो सब खत्म हो गया। जैसे बचपन के बाद एकाएक बुढ़ापा आ गया हो। मानसिक दशा एकदम बदल गई। मन चिड़चिड़ा हो गया था। तभी निश्चय किया कि अब और हिल्सटेशन नहीं ।

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