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  • चुनार: वर्तमान के पीछे छिपा अतीत

    चुनार शहर के इतिहास-वर्तमान को लेकर यह यात्रा-संस्मरण लिखा है प्रियंका नारायण ने। प्रियंका किन्नरों पर एक किताब लिख चुकी हैं। आप उनका यह संस्मरण पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    चुनार मिर्जापुर जिले का एक ऐसा ही कस्बाई जगह है, बनारस से लगा हुआ लेकिन दिलचस्प।  बनारस से 62.4 किमी कि दूरी पर स्थित गंगा पार का चुनार हमेशा मेरे अंदर एक रहस्यमयी आभा को जगाता था। कुछ तो है वहाँ जिसे चाहकर भी पकड़ न पाओ। और इसका बहुत बड़ा आधार डॉ. शिवप्रसाद सिंह का “नीला चाँद”– नीलमणि–सा रहस्यमयी लोक था। चुनार और चुनार का किला दोनों एक ही साथ स्थापित माना जाता है। इसलिए चरणाद्रि नाम भी दोनों का पर्याय है- चरणाद्रि दुर्ग का सम्बोधन और उसके आस-पास बनी व्यवस्था। वाराणसी की एक ऐसी ही व्यवस्था का हिस्सा है मेरे लिए; मोतिहारी-दिल्ली से बिल्कुल ही भिन्न वातावरण। सतही तौर पर यह मोतिहारी- मुजफ्फरपुर जैसा ही अहसास कराता है लेकिन जब यहाँ रहना शुरू करेंगे और गौर से देखेंगे तो यहाँ सब कुछ आधा-आधा है।  केदारनाथ जी के शब्दों में

    “घुस जाओ इस शहर में,

    कभी आरती के आलोक में

    इसे अचानक देखो,

    अद्भुत है इसकी बनावट

    यह आधा जल में है

    आधा मंत्र में

    आधा फूल में है

    आधा शव में,

    आधा नींद में है

    आधा शंख में।”  

     और इसी बनारस से लगा हुआ है- मिर्जापुर और चुनार|  सच पूछिए तो ‘नीला चाँद’ काशी के साथ- साथ इस समूचे परिवेश का ऐसा चित्र खींचता है जो रहस्य को अनकहे ही ओढ़ लेता है और यह भी सच है कि जब आप चुनार पहुंचते हैं तो वहीं कुछ छूट गया, कुछ अनकहा, जो कहे जाने के बाद थोड़ा और अनकहा जोड़ लेता है।  

    यह छोटी-सी शुरुआत बस से हुई थी। अभी तक मैं केवल मोतिहारी से बनारस, बनारस से मोतिहारी करती रही थी। इससे छूटे तो कभी दिल्ली के घर पर ठहर गई तो कभी पटना। दिलचस्प लगेगा कि इतनी बार दिल्ली जाने के बाद भी लाल किले को देखा 2023 में। दरअसल, कभी विश्वविद्यालयों की लाइब्रेरी या आर्काइव छानने के अतिरिक्त घूमने में दिलचस्पी ही नहीं जगी और अब कहाँ तो मैं कई राज्यों की सैर पर थी। नियति शायद इसे ही कहते हैं।

    चुनार में ग्रैजुएशन के दिनों की एक मित्र प्रीति चंद्रा रहती थी। उसने अनगिनत बार बुलाया था। यह दूसरी बात थी कि हमें ऐसी किसी भी यात्रा या किसी के यहाँ जाकर रहना है, इसकी अनुमति कभी नहीं दी जाती थी। तब बिहार के बंद समाज से होने का अपना अलग ही अनुभव था दूसरी तरफ़ सामंती परिवार के साथ सोने पर सुहागा यह कि यह परिवार नब्बे के दशक में राजनीति में अत्यधिक सक्रिय परिवार था। एक ऐसा परिवेश जहाँ जीवन नहीं होता है, बल्कि एक खास तरीके की संरचना होती है। यहाँ जन्म के साथ ही आपको एक अलग तरीके के साँचे में ढालने के अबोले सक्रिय नियम काम कर रहे होते हैं, समूचे वातावरण में यह इस कदर घुला-मिला होता है, कि आप समझ ही नहीं पाते कि आपकी निर्मिति थोड़ी दूसरे तरह की हो रही है और उसका आधार गंभीरता के साथ-साथ समय पर कड़े रुख अपनाने पर टिका होता है। आपका परिवेश अनजाने ही पहनने, ओढ़ने से लेकर, उठने-बैठने, बोलने से लेकर कितना और कितनी देर हँसना है, इसकी भी समझ विकसित करता है आपके अंदर। यहाँ अलग से कुछ नहीं होता है, बस होता है।          

    ऐसे वातावरण में बाहर अकेले निकलना ही चुनौती होती है, घुमक्कड़ी और फक्कड़पने का तो ख्वाब भी नहीं देखा जा सकता कि कभी यूं ऐसे निकल पड़ूँगी और फिर ये दिल मांगे मोर वाली स्थिति होगी, सोच भी नहीं सकती थी। लेकिन होना था यही तो हुआ।

    बिहार के समाज और राजनीतिक स्थितियों का असर ये था कि छ:-सात वर्षों के बाद भी यही लगता रहा कि ‘अकेले जाना ठीक नहीं।’ निर्भीक स्वभाव के बाद भी मेरे दिमाग में उमड़ रहा था- माँ का गुस्सा। और पिताजी के बारे में तो कुछ सोचना ही नहीं था। लगातार अपनी सहेलियों के घर अकेले आने-जाने का ज़िक्र भी मुझे तसल्ली नहीं दे पा रहा था। असल में घर जाना एक बात है और घूमना दूसरा। बार-बार मन में अंदेशा होता कि सही जगह पहुँच तो जाऊँगी न? कुछ होगा तो नहीं, नहीं तो घर कहना पड़ेगा और यह घर कहना तब सबसे पहाड़ काम था- यह जानते हुए भी घर से कुछ भी छिपता नहीं चाहे मैं कहूँ या नहीं| इन्हीं तितर-बीतर कशमकश और भय मिश्रित मन: स्थिति में मैं चुनार पहुँच गई।

    बस स्टैन्ड पर प्रीति लेने आई थी। उसे देखते ही मुझे एक तरह की आश्वस्ती हुई।  

    नीले रंग से पुते प्रीति के घर का बाहरी हिस्सा खपड़ैल था जबकि अंदर की तरफ़ का हिस्सा छत का। बीच में बड़ा-सा आँगन था जो कमोबेश मैदानी क्षेत्र के कस्बों और गांवों में हुआ करता है लेकिन इस घर की सबसे खूबसूरत बात यह थी इसके अंदर आँगन वाले हिस्से में तीन तरफ़ से दीवाल या बॉउन्ड्री नहीं था सामान्य घरों की तरह, बल्कि पूरा का पूरा पहाड़ था… ‘विंध्य’! एक पुलक भरी आवाज मेरे मुंह से अपने आप निकल गई। घर का ऐसा सुंदर और आश्चर्य से भर देने वाला रूप तो मैंने कभी सोच ही नहीं था|  हँसते हुए मैंने कहा– अरे! ये क्या? साथ में प्रीति और प्रीति की माँ और बहनें सब जोर से हँस पड़ीं।  आँगन का एक हिस्सा विंध्य पर उगे जंगलों के हरे छितराए पत्तों से भरा हुआ था। पुलक भरी स्तब्धता के साथ मैं देखती रह गई– इतना सुंदर भी घर हो सकता है? यह आदमियों का घर था या विंध्य का अपना घरौंदा और प्रीति का परिवार इसके सगे-संबंधी…  

    चट्टानों से घिरा आँगन रात के टिमटिमाते तारों के बीच कितना सुंदर लग सकता है, ये मैंने उस दिन जाना। टिमटिमाते तारों के चंदोवे तले लालटेन की रोशनी में हमने खाना खाया- लौकी की सब्जी, पराठे और तली पकौड़ियाँ। रोटी की जगह पराठे और पकौड़ियाँ- यह निश्चित ही एक मेहमान का स्वागत था। लेकिन मेरा सारा ध्यान विंध्य की दीवाल पर था।  

    गोद में बैठा घर…  विंध्य पर जड़ें जमाए पौधों और लतरियों पर टिमकते जुगनू भूक-भाक कर रहे थे और मैं उन्हें टुकुर-टुकुर देख रही थी। बचपन में एक बार देखा था- पीपल के पेड़ और पत्तों को घेरे जुगनू। उसके बाद कोई वैसा दृश्य देखा हो, मुझे याद नहीं। शहर की चकाचौंध के बीच तो बाजारू रोशनियाँ दीखती हैं, वहाँ जुगनुओं का क्या काम? प्रकृति के चिर साथी जुगनू खुद ही विदा हो लेते हैं…।  और इस आँगन दीवाल और लतरियों पर ऊपर से नीचे तक जुगनू छाए थे और अद्भुत सौंदर्य भर रहे थे उस वातावरण में- बड़े-से आँगन के ऊपर आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे और नीचे जुगनू, बीचों-बीच लालटेन की रोशनी थी और इस रोशनी में घर के सारे सदस्य बातचीत और हंसी-ठिठोली, कहकहे  में मग्न। उछाह से भरा था आँगन और घर।          

    जीवन क्या है– इसकी खनक पहली बार मुझे उस दिन सुनाई पड़ी।

    अगली सुबह तड़के उठकर देखा तो तीन तरफ़ से घेरे विंध्य के वही दीवाल अपनी रंगीनी काला, हरा, कहीं पीले पड़ रहे पत्ते, तना, जड़ें और ठंढ़ी हवा के साथ सूरज से बातें करने में मशगूल थे- स्वर्ण किरणों से नहाया, पक्षियों के कलरव के साथ अद्भुत संगीत बिखरा था समूचे घर-आँगन में। एकमात्र सड़क पर निकलने के रास्ते को छोड़ दें तो सच में विंध्य का घर था, प्रीति का नहीं- है न मजेदार बात। पहाड़ आपके जीवन का कुछ यूं भी हिस्सा हो सकते हैं, हम गंगा किनारों वालों  के लिए सौंदर्य का सबक ही था।  

    धीरे- धीरे सब जगे और गोबर से पुते मिट्टी और पत्थर के आँगन की सफाई के साथ-साथ विंध्य से बनी दीवालों की भी थोड़ी बहुत सफाई कर रहे थे। आँगन का कुछ हिस्सा पत्तों, बीज, बेहद पतली टहनियों से भरा था। कभी हरे, कभी पीले पत्ते, कहीं ताजे, कहीं सूखे जैसे आँगन में रंगोली बनी हुई हो। इतने सारे रंग एक साथ- सुबह की धूप में उछाह से भरा आँगन प्रकृति द्वारा की जाने वाली अविस्मरणीय कला को सँजो रहे थे। जैसे चुनौती दे रहे हो समूचे मानव प्रजाति को कि रच सकते हो मेरे जैसे कैनवस? मेरे बिना तो तुम्हारी चित्रकारी तो क्या कला का हर पक्ष सौंदर्य-विच्छिन्न हो जाया करते हैं, रंग और विचार, शब्द, सब मुझसे ही कर्ज लेते हैं और अंतत: मुझमें ही सब लौट आते हैं। कहते हैं ‘संसार इसीलिए तो ‘अपूर्णता’ की नियति जीने को विवश है।

    अभी मैं खोई-खोई सोच ही रही थी कि प्रीति चाय का ग्लास लेकर मेरे पास आई। हौले से पूछा- कैसा लगा मेरा घर, हमलोग तो सामान्य लोग हैं। औरों की तरह वेल फर्निश्ड घर नहीं है। मैंने बात काटते हुए कहा- सचमुच; औरों की तरह हो भी नहीं सकता है, कहाँ तो ईंटों और कृत्रिम रंगों से पुते घर और कहाँ यह प्रकृति की चित्रकारी… औरों की तरह फर्निशड तो नहीं लेकिन विशुद्ध प्रकृति का यह घर औरों से इतना सुंदर और इतना अलग है कि मैं बता भी नहीं सकती। प्रीति के चेहरे पर मुस्कान तैर गई।

    चाय अब तक पीने लायक हो चली थी। मैंने पूछा- माँ–पापा कहाँ हैं?

    प्रीति- वो तो मुंह अंधेरे निकल गए हैं काम पर। काम पर?

    हाँ! मूर्तियाँ बनतीं हैं न वहाँ…

    मूर्तियाँ?

    असल में मेरी यात्रा तब सोची- समझी रिसर्चर की यात्रा नहीं थी और न ही बनारस की मूल निवासी, जो मुझे बातें पहले से पता होतीं। छात्रावास की चार दीवारियों से घिरी मैं, बिहार से आने और दिन भर किताबों और लाइब्रेरी में बैठी रहने वाली लड़की को यह बेहद सामान्य बात भी पता नहीं थी कि चुनार पत्थरों और मूर्ति निर्माण का जीता-जागता कारखाना है, जहाँ कमोबेश हर दूसरा-तीसरा घर मूर्ति और मिट्टी के तरह-तरह के खिलौने के निर्माण काम में लगा हुआ और पूरे देश को अपनी मूर्तियाँ भेजता है। खासकर दीवाली की मूर्तियाँ। होली खत्म होते ही अगले साल भर मूर्ति निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो जाती हैं और बरसात खत्म होते-होते यह रफ़्तार पकड़ने लग जाता है।

    सही मिट्टी की खोज, खुदाई, उन्हें मंगवाना, मिलाना, मूर्तियों के हिसाब से तैयार करना, अलग-अलग निकालकर धूप में सुखाना और जब सुख जाए तो स्तर करके फिर से सुखाना। बहुत ही श्रम का काम है ये। नन्हीं मूर्तियों के नाखून पर पेंट लगाना– लाल-गुलाबी, सुनहले मुकुटों को सजाना और फिर रंग के हिसाब से मूर्ति के कपड़ों को रंगना। अगर ज्यादा सजाना हो तो मूर्ति को चमकीले गोट-पट्टे और रेशमी कपड़ों से सजाया जाता। कुछ मूर्तियों को गोंद में डुबो कर लाल, पीली, हरी, सुनहरी, चिमचिम में डुबोया जाता। इससे मूर्तियाँ चमकीली बन जातीं। अब इन सजीली मूर्तियों पर कई बार छोटी-छोटी बिंदी चिपका दी जाती। साल भर और सुबह से शाम तक चलने वाले इस काम में कई परतें होतीं हैं।  

    हालांकि प्रीति ने आज मुझे कारखाने की जगह चुनार के किले को देखने जाने को कहा। चाय का ग्लास हाथ में पकड़े भले ही मैँ बातें प्रीति से कर रही थी लेकिन नज़र अभी भी विंध्य की दीवाल पर ही लगी हुई थी, जो सूरज के उगने, चलने, उसके आगे बढ़ते जाने पर एक-एक पल अपनी रंगत बदलता जाता। पूरा दीवाल,पेड़-पत्तियों से छनकर आती धूप में काले-हरे और स्वर्ण का चमकीला- चटख रंग सजा रही थी।             

    प्रीति ने झटके-से कहा अब नहाकर जल्दी से तैयार हो जाओ और गरमागरम पुड़ियाँ खाओ और किले के लिए निकलो। मैंने इस मेहमाननवाजी की औपचारिकताओं को रोकने की भरसक कोशिश की लेकिन हम सबको पता है कि हमारा घर होने पर हम भी यही कर रहे होते और ऐसे में कोई दूसरे पक्ष की बात नहीं ही सुनता है। प्रीति के यहाँ मुंह अंधेरे से ही सब वहाँ किसी न किसी काम में व्यस्त थे इसलिए तड़के सुबह उठने पर भी मुझे प्रीति और उसकी बहन के अलावे कोई नहीं मिला और बहन भी थोड़े समय में स्कूल पढ़ाने के लिए जाने वाली थी। घूमने मुझे अकेले ही जाना था भले ही लेने के लिए प्रीति और पापा को आना था| आज उसे दोस्त के लिए उसकी मनपसंद खाना बनाने की जिम्मेदारी मिली थी।  

    चुनार के वर्तमान किले की नींव 1029 ई. में राजा सहदेव की तरफ से रखा गया। बाद में 1575 ई. में अकबर के अधीन आने पर इसमें कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए गए। इस किले के निर्माण और संदर्भ में कई  किवंदतियाँ प्रचलित है। एक किंवदंती के अनुसार इसका निर्माण राजा विक्रमादित्य ने राजा भर्तृहरि के सम्मान में करवाया था। वर्तमान में हम राजा भर्तृहरि की समाधि यहाँ देख सकते हैं, साथ में बाबर व औरंगजेब का हुक्मनामा। एक पौराणिक कथा है भगवान विष्णु के वामन अवतार से भी जुड़ा हुआ है।  

    कहते हैं भगवान विष्णु ने राजा बलि के व्यापक साम्राज्य के कारण देवताओं को हो रही दिक्कत को देखते हुए वामन अवतार लिया था। उस समय राजा बलि ने आकाश, पाताल, पृथ्वी सबको अपने अधीन कर लिया था। ऐसे में विष्णु लोक और दैव कल्याण के लिए वामन रूप राजा बलि के यज्ञ में दान लेने के लिए पहुंचे और तीन पग भूमि दान की याचना की। दो पग में ही उन्होंने सारी पृथ्वी, आकाश-पाताल सबको माप लिया और तब तीसरा पग राजा के सर पर रखना पड़ा और बलि हमेशा के लिए विष्णु भक्त और दान की महिमा के लिए विख्यात हो गए। कहते हैं विष्णु के इस अवतार ने अपना पहला चरण चुनार में ही रखा था, जिससे इसका नाम ‘चरणाद्रि’ पड़ गया।    

    इस किले के बारे में एक मान्यता यह भी है कि  कहते हैं यहाँ कई रहस्यमयी तहखाने और सुरंगे हैं और उन तहखानों में खजाने भी हैं। रहस्यमयी सुरंगे कहाँ तक जाती हैं, आज तक ठीक-ठीक नहीं पता। वर्तमान में इस किले के कई भाग पर्यटकों के लिए बंद हैं और हमें कुछ ही भाग को देखकर संतोष करना पड़ता है। मुझे लगता है किले के आधे से अधिक भाग का बंद होना भी इसकी रहस्यमय कहानियों को और बल देता है। साथ ही देवकीनंदन खत्री की लिखी ‘चंद्रकांता’ भी जिम्मेदार है, जिसे पढ़ने के लिए एक दौर में लोगों ने हिन्दी सीखनी शुरू की थी। वर्तमान में भारतीय सेना के अधीन इसके रख-रखाव की जिम्मेदारी है।   

    चुनार की कहानी एक तरफ़ मुगल शासनकाल से भी जुड़ती हैं तो इससे जुड़ी एक कहानी चंदेलों की अंतिम कीर्ति रानी दुर्गावती से भी जुड़ती है। चंदेलों के प्रशासन के अंदर होने के कारण एक नाम ‘चन्देलगढ़’ भी मिलता है। कहते हैं, चुनार के समकालीन राजकुमार को रानी दुर्गवाती से प्रेम हो आया था वही दुर्गावती गोंड राजकुमार को चाहती थीं और उसी से ब्याह भी किया। तब चुनार का  राजकुमार छल से दुर्गावती को नष्ट कर देने के प्रयासों में लिप्त हो गया और अकबर से जा मिला। इसका विस्तृत ज़िक्र आचार्य चतुरसेन शास्त्री जी की ‘रानी दुर्गावती’ में मिलता है। दुर्गावती अंत में युद्धभूमि में अकबर से पराजित होती हैं और अपनी ही कटार से अपना अंत कर लिया। 1572 ई. में चुनार मुगलों के अधीन हो गया।    

    ऐसी कई अलग-अलग कहानियाँ आपको लोक में फैले मिलेंगे। इनमें कई सच्चे भी हैं। शीलापट्ट पर पाए गए विवरण के अनुसार यह किला अपने-अपने समय पर उज्जैन के राजा विक्रमादित्य, पृथ्वीराज चौहान, शहाबुद्दीन गौरी, शेरशाह, हुमायूँ आदि से भी सम्बद्ध रहा है। यह भी मान्यता है कि शेरशाह सूरी ने इस किले का पुनर्निर्माण कराया था।

    महल में वारेन हेस्टिंगस का बंग्ला और बाहर ईसाई कब्रिस्तान एक जमाने में चुनार और चुनार के किले पर ब्रिटिश आधिपत्य की सूचना देता हैं। अंग्रेजों से पूर्व यह काशी नरेश के आधिपत्य में भी रहा। 1740 ई. में बनारस के महाराज बलवंत सिंह ने इसे अवध के नवाब से जीता था। 1767 ई. हेक्टर मुनरों के काल में यह अंग्रेजों के अधीन चला गया। वैसे भी चुनार अपनी भोगौलिक स्थिति के कारण बिहार और बंगाल का प्रवेश द्वार भी माना जाता रहा है। ऐसे में किले पर आधिपत्य स्वभाविक है।

    इसके अलावे इस किले में राजा भर्तृहरि का मंदिर राजा भर्तृहरि से जुड़े होने का प्रमाण है। कहते हैं कि संन्यास लेने के बाद वो इसी स्थान  पर तपस्यारत थे। किवदंतियों के अनुसार वो भूमि के नीचे तपस्या करते थे। एक बार उन्हें राजा का बुलावा आया । तब उन्होंने परिसर में ही एक छिद्र दिखाकर कहा कि अगर तुम लोगों ने इस छिद्र को तेल से भर दिया तो मैं तुम्हारे साथ चलूँगा अन्यथा नहीं। यह चुनौती पाकर बुलाहट वाले उस छिद्र को तेल से भरने लगे। कहा जाता है कि वह छिद्र कभी नहीं भरा और भर्तृहरि भी कहीं नहीं गए। राजा को अपनी ज़िद छोड़नी पड़ी। तब से सल्तनत की तरफ़ से भी वहाँ तेल का दीप जलाने की प्रथा चल पड़ी।     

    महल के बीच में(वर्तमान खुले भाग के अनुसार) सोनवा मंडप है। सोनवा मंडप और झरोखे अपने-अपने समय की रानियों और स्त्री उपस्थिति के परिचायक हैं। सोनवा मंडप हिन्दू वास्तुकला के साथ 28 खंभों के साथ निर्मित चुनार किले का एक महत्वपूर्ण आकर्षण है। इस मंडप में चार दरवाज़े और एक गुप्त सुरंग है। इसके बारे में ख्याति है कि या राजकुमारी सोनवा के नाम पर बना हुआ एक पृथक मंडप है जिसके मेहराबों में पहले स्वर्ण भरा हुआ था, बाद में युद्ध और अलग-अलग शासन के अधीन इसमें कई बदलाव हुए।

    इन सब जगहों पर मैं अकेले ही घूमने में लगी थी कि एक गाइड ने न्योता दिया घूमाने का। जानकारियों के लिए तो नहीं लेकिन साथ के लिए मैंने थोड़े समय के लिए उनको ‘हाँ’ बोल दिया। नतीजा उन्होंने जानकारी तो दी ही, समय-समय पर तस्वीरें भी उतारते रहे। उन्होंने ही इस किले के पश्चिमी भाग में गंगा से सटे एक हिस्से की तरफ़ इशारा किया और कहा कि ‘वो छोटा वाला कमरेनुमा हिस्से को देख रही हैं?, हालांकि उसका ऊपरी हिस्सा खुला हुआ था, मैं- हाँ। वो अंग्रेजों के समय में फांसी देने के लिए उपयोग में आता था। ऐसे ही किले में स्थित भयावने और बेहद गहरे कुएं के बारे में बताया कि पहली जनवरी को सीढ़ियों से उतरकर दो बच्चे कुएं के गहरे काले पानी के पास पहुँच गए और सेल्फ़ी उतारने के चक्कर में एक का पैर फिसला और उस काले पानी में गिर गया। बाद में कितना खोजा गया, लाश तक न मिली। तीन-चार दिनों में लाश जब पूरी तरह फूल गई तो पानी के ऊपर तैरने लगा। किसी की हिम्मत भी नहीं हो रही थी कि लाश को निकालने के लिए सीढ़ियों से उतरकर कुएं के पानी तक जाए। जैसे-तैसे ऊपर से रस्सी डालकर निकालने कि कोशिश हुई लेकिन जब तक निकला तब तक कुछ भाग को कुएं के काले पानी की मछलियों ने नोच डाला था। यह सुनकर अभी तक का खुश मन कुछ अजीब हो आया। कहाँ तो किला घूमने आई थी, मुश्किल से 10-12  जनवरी की तारीख होगी और यह सब सुनने को मिल रहा है। एकबारगी लगा कि रोमांचित करने वाली चीजें भी कितनी खतरनाक हो सकती हैं। इस कहानी के बाद मैंने गाइड महोदय को पैसे देकर विदा किया और खुद जाकर किले के पश्चिम वाले दीवाल पर बैठ गई जहाँ से गंगा का चौड़ा पाट और घिरते बादल और उठते बवंडर को देखती प्रीति के आने का इंजार करने लगी।    

    थोड़े समय बाद वो आते दिखे।

    चुनार का अगला दिन मूर्तियों के कारखाने घूमने के नाम रहा। एकबारगी मैं आश्चर्य में पड़ गईं और प्रीति के मम्मी–पापा, दादाजी सब मेरे आश्चर्य पर हँसने लगे। असल में एक साथ लाखों में छोटी-छोटी मूर्तियाँ देखने का यह पहला मौका था। यह अगले वर्ष दीवाली की तैयारी चल रही थी, जब सारे देश में ट्रकों से मूर्तियाँ भेजी जाती हैं। हम बस दीवाली पर एक मूर्ति खरीदकर घर चले आते हैं लेकिन ये मूर्तियाँ कौन बनाता है, कैसे बनती हैं मूर्तियाँ, यह जानने समझने का मेरा यह पहला ही मौका था। ऐसा नहीं है कि छोटे कुम्हारों को मैंने पहले नहीं देखा था, सरस्वती पूजा की मूर्तियाँ, दुर्गा पूजा की मूर्तियों की तैयारी कभी नहीं देखी हो लेकिन लाखों में लक्ष्मी पूजा की मूर्तियाँ बनते आज पहली बार देख रही थी। साथ में आने वाले सरस्वती पूजा की मूर्तियाँ भी बन रही थीं लेकिन उनकी संख्या लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों से बहुत कम थी।

    वास्तव में हमारे शुभ-मंगल और घरों में स्थापित होने वाली लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों के पीछे कितना श्रम होता है और कितने जतन और नज़ाकत से मूर्तियों को संवारा, संभाला जाता है, यह उस दिन समझ आया। गोंद से भींगी मूर्तियों को चिमचिमी में डुबोना, बिंदियाँ चिपकाना और सब बिलकुल ठीक जगह पर, क्योंकि थोड़ी-सी भी खराबी या आकर्षण में कमी मूर्तियों को बिकने कहाँ देती है। इन नाजुक मूर्तियों पर होने वाली कारीगरी को देख कर मुझे जीवन में पहली बार वास्तविक श्रम का मतलब समझ आया। ऐसा नहीं है कि श्रम का मतलब मुझे नहीं पता था लेकिन कारखाने के मालिक-मालकिन को भी इस श्रमसाध्य कार्य में जुटा देखकर मेरा मन भींग गया। हमारे घरों में शुभ-लाभ स्थापित करने वालों का अपना जीवन कितनी कठिनाइयों से भरा हुआ है। पाँच-पाँच बच्चों की उच्च स्तरीय शिक्षा, उनका शादी-ब्याह सब। अधिक से अधिक संख्या में मूर्तियाँ नहीं बनेंगी और नहीं बिकेंगी, तो घर का खर्च कैसे चलेगा और सारे काम कैसे होंगे? एक मूर्ति के पीछे मुंह-अंधेरे उठकर बकायदे नहा- धोकर, साफ-सुथरा होकर भगवान को बनने जाना। ‘प्रजापति’ होना शायद इसे ही कहते हैं, स्वयं ब्रह्म के कुल से होना और दुनिया के लिए शुभ-लाभ उत्पन्न करना।           

    खाने का समय होता देख प्रीति और प्रीति की बहन मधु ने चलने को कहा। भींगा मन अचानक से स्थिर हो आया। वैचारिक गुंजलक से निकल अब मुझे घर पर जाना था – स्वादिष्ट चावल, कढ़ी और आलू चौप खाने। आज मेरे लिए और सबके लिए यही स्वादिष्ट भोजन बना था।     

    मूर्तियों के अलावे प्राचीन काल से लेकर अब तक चुनार अपने पत्थरों के लिए बहुत प्रसिद्ध रहा है। देश के कई किले, घाट, बनारस के घाट और घाटों पर बने महलों, सारनाथ में भी चुनार के पत्थरों का वृहद पैमाने पर उपयोग किया गया है। मौर्य काल में बने ‘अशोक स्तम्भ’ में भी इन पत्थरों के लगे होने के प्रमाण मिलते हैं| ऐसी ही कई कही अनकही कहानियाँ हैं, फिर कभी। चुनार के पत्थरों और उनसे बने महलों, इमारतों पर बात करना, मतलब एक स्वतंत्र किताब लिखना है। मसलन रामकृष्ण बेलुड़ मठ के लिए पत्थर चुनार से गए थे, यह जानना मेरे लिए आश्चर्य और पुलक से भी भरा था, दूसरी तरफ़ ठोस तथ्य न जानने पर अविश्वास भी बना रहा मेरे अंदर।

    अगली सुबह हम चुनार से लगे दुर्गा मंदिर गए। यह बादल भरा दिन था। ठंढी हवा बह रही थी। नाश्ता करके हम बस पकड़ने निकले। प्रीति के पिताजी ने मोटरसाइकिल से हमें बस तक पहुंचाया। बस से हम दुर्गा मंदिर तक गए जो चुनार से मात्र 7-8 किमी की दूरी पर है।  कहते हैं इस मंदिर के कुछ भाग गुप्त काल के बने हुए हैं। आकृतियों को देखकर प्राचीनता झलक रही थी लेकिन गुप्त काल, यह मुझे थोड़ा ज्यादा लगा। एक तो इसका कोई प्रमाण मुझे न मिला और दूसरी तरफ़ ऐसी सामान्य बनावट पिछले 100-200 सालों में बहुत मिल सकते हैं। गुंबदों में इस्लामी झलक थी जो चुनार और आस-पास मुस्लिम जनसंख्या के होने के प्रमाण थे और गुप्त कालीन न होने का प्रमाण था। खैर यह तो हुई इतिहास की बात। क्या सच है, क्या गलत यह तो कोई इतिहासकार ही बता सकता है। हम तो बस घुमक्कड़ी को निकले थे। 

    मंदिर से लगा क्षेत्र बारिश के दिनों में पानी से लबालब भर उठता है तब यहाँ हम झरनों का संगीत और पानी का शोर दोनों एक साथ सुन सकते हैं। चुनार का समूचा परिवेश बारिश की बूंदों में नहा उठता है और तब चुनार का मुख्य स्थल चौतरफा पेड़ों, जंगलों से घिरा हुआ झरनों वाले प्रदेश में बदल जाता है। विंध्य की गोद में बसे चुनार की खूबसूरती तब निखार पर होती है। सोये पहाड़ के ऊपर से गुजरती बसें और गाड़ियां… सड़कों का भींग कर काला और चिकना हो जाना और उस पर बिछी हुई हरी पत्तियां… काले हरे का मोहक रचाव रचते हैं। पठारनुमा विंध्य की गोद में बसा छोटा-सा हरा कस्बाई शहर, जिस पर रहस्य के आवरण में मैदानी भाग और गंगा किनारे होने की छाप थी।

    बारिश के दिनों में गंगा जब उफान पर होती तब चुनार को बनारस से जोड़ने वाले पुल पर खड़े होकर बारिश की बूंदों के बीच गंगा को देखना अलग ही रूमानियत से भर देता है। दूर तक सिर्फ गंगा ही गंगा, और सफेदी। जोर की हवाओं के बीच भींग कर भी लहराता दुपट्टा, और शरीर को छूती मोटी बौछारें देह में कंपकंपी भर देती। बूंदें सुकून तारी करतीं और ठंडी हवाएं सुइयों से चुभती पार निकल जाती… जहां तक नजर जाए सफेद झालरनुमा बरसती बूंदें और गंगा का सौंदर्य। उजली कमीज और गुलाबी दुपट्टा बस  परिदृश्य में रंग भर बारिश से लिपटती जाती, ज्यों प्रेमी से मिलकर वो और ही निखरी जाती हो।      

    ऐसा ही दृश्य कमोबेश चुनार के किले से भी दिखता, जिसकी पश्चिमी और उतरी भाग नदी को छूता था। जोर का उठता बवंडर गोल-गोल घूमता हुआ किले की पश्चिमी दीवार से टकराता और साथिन बौछारें सारे दृश्य को धुंधला बनाती, किले की ऊंचाई, आकाश और गंगा एकाकार हो आती। किले के बंद भागों पर फैले जंगलनुमा पेड़ और पौधे बाँछे खोलकर डोलती और पूरा किला हहाती हुलास से भर जाता। पौधे कभी बाईं तरफ़ झुककर गुड़ी-मुड़ी करते कभी बाईं तरफ़। समूचे परिवेश में बादल, बूंद, गंगा, हवाओं की झमझमाती लुका-छिपी सौंदर्य का पसारा पसार देते। कितना भी देखो, आँखों का जी न भरता।         

    दुर्गा मंदिर से लगभग 15-20 किलोमीटर की दूरी पर ही शक्तेषगढ़ है। बस से हम वहाँ पहुंचे। वहाँ अड़गड़ानन्द का बड़ा आश्रम है। माना जाता है कि उस आश्रम जाने वाले लोगों को समस्याओं का समाधान मिलता है। पहाड़ी और झाड़ीनुमा पौधों और पेड़ों से घिरा यह भव्य और शांत आश्रम था। थोड़ी देर आश्रम में हमने वक्त बिताया। सुबह का नाश्ता भक्तों को दिया जा रहा था। इसी क्रम में हमने भी केले और सेब खाए। दोपहर के समय खाने के लिए भी हमें कहा गया। यहाँ आने वाले भक्तों के लिए यह प्रतिदिन का नियम था। आश्रम आने वालों को नाश्ता और भोजन प्रसाद रूप में दिया जाता है लेकिन आश्रम देखने के बाद हम भोजन की बजाए दुर्गा मंदिर की ओर लौट आए और वहाँ के पेड़- पत्थरों के बीच अपना दिन बिताया। बूंदें तारी थीं और हवाएं हुलस रही थीं… शाम ढल रही थी। दृश्य मद्धिम हो रहे थे। नए दृश्य को रचने से पहले प्रकृति अपनी कूची साफ कर रही थी…   

    अगला दिन मेरे बनारस लौटने का था।       

                 

    हालांकि आधुनिक तकनीक से अटे पड़े वर्तमान भारत में इस तरह का दावा लेखक या लेखिका होने के नाते पेश करना आपकी कमजोरी ही जाहिर करेगा। इसे लोक या जनमानस में पैठे कहानियों की तरह लेना होगा। उपन्यास होता तो बात कुछ और होती। उधर कई बातें ‘चंद्रकांता’ मी भी उल्लेखित है जो “रहस्य कथाओं को जीवन देता है।     

     

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