
आज पढ़िए अयान की कहानी। अयान अयान अशोका यूनिवर्सिटी में राजनीति और मीडिया में स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं। जेंडर और राजनीति से जुड़े विषयों पर लिखते हैं। साथ में कहानियाँ और कविताएँ भी लिखते हैं- मॉडरेटर
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मैं दिल्ली से वापस आते हुए थोड़ी सी दिल्ली अपने साथ ले आई थी। मैं हमेशा चीज़ों में से कुछ न कुछ अपने साथ ले ही आती हूँ। मेरा पूरा कमरा म्यूज़ियम के जैसा बन चुका है और मुझे लगता है किमैं भी अपने कमरे की तरह ही लोगों, जगहों और ख़यालों के हिस्सों से बना हुआ म्यूज़ियम हूँ। कभी-कभी लोग मेरे भी थोड़े-थोड़े हिस्से अपने साथ ले जाते हैं और अपने-अपने म्यूज़ियम में लगा लेते हैं और कुछ लोग कभी गुम भी देते हैं।
लेकिन हाँ मैं दिल्ली से वापस आई थी। दिल्ली तो वैसे हमारे यहाँ सब लोग काम से जाते हैं, लेकिन मैं दिल्ली काम से नहीं गई थी। मैं तो कभी दिल्ली जाती भी ना। लेकिन मेरा एक दोस्त वो दिल्ली में था। उसे भी दिल्ली में कोई काम नहीं था। लेकिन दिल्ली को उससे काम था। उसे वहाँ रखा हुआ है। दिल्ली में बहुत सारे म्यूज़ियम हैं। लेकिन उसे म्यूज़ियम में नहीं रखा है। उसे अगर म्यूज़ियम में रखते ना, तो वो शायद ऐसे किसी पेंटिंग के कोने में जाकर बैठ जाता। उसे बहुत शौक है ना पेंटिंग का। वो पेंटिंग बनाता भी था। उसने मुझे बनाकर भी दी थी एक पेंटिंग। सफेद रंग के कैनवास पर लाल और पीली लाइन सी बनी हुई थी। मुझे वो वाली इतनी पसंद नहीं आई थी, मैंने बता दिया था उसको। मुझे तो कैनवास पर ऐसे चमकता हुआ सूरज, बहते हुए झरने, उड़ती चिड़िया, ये सब पसंद आता है। लेकिन वो ये सब कभी बनाता ही नहीं है। वो बस अपनी आड़ी-तिरछी लकीरें बनाता है। लेकिन उसकी वो पेंटिंग भी मैंने एकदम दीवार पर टांग रखी है। रोज़सुबह उठते दिख जाती है वो। लाल और पीली लाइनें।
मैं जब उससे दिल्ली मिलने गई तो इस बार लाल-पीली लाइनों की जगह काली लाइनें थीं। और उन काली लाइनों के पीछे था वो। हँस रहा था लाइनों के पीछे से, पहले तो बहुत कम हँसता था, आज बहुत दिनों बाद हँस रहा था। कह रहा था अच्छा लगा इतने दिनों बाद मिलकर, तो मुझे याद आया किउससे मिले सच में बहुत वक्त हो चुका था। फोन पर मैसेज पर बात हो जाती थी पहले, लेकिन अब उसके पास फोन नहीं है। उसने बोला भी किफोन के बिना अब और सोचने का वक्त मिल जाता है। बस जो सब सोचता हूँ वो पेंट नहीं कर पाता, क्योंकिये लोग कैनवास और पेंट नहीं देते। लेकिन उसके हाथ पूरे कैनवास के जैसे लग रहे थे। उसके हाथों पर बहुत सारे लाल, पीले और गहरे नीले निशान से थे। मैंने वो निशान देखकर पूछा किये कैसे हुआ, तो हँसते हुए बोला कि, इन लोगों को भी पेंटिंग बनाने का बहुत शौक है, तूने तो सिर्फमेरे हाथ देखे हैं, इन्होंने मेरे पूरे बदन पर बनाई है। उसके बाद हम दोनों थोड़ी देर के लिए बिल्कुल चुप हो गए और थोड़ा सा रोए भी। उसके बाद हम फिर हँसने लगे। उन काली लाइनों के बीच इतनी जगह नहीं थी किहम हाथ मिला पाते तो बिना हाथ मिलाए वापस जाना पड़ा। उसके कैनवास जैसे हाथों को काली लाइनों के अंदर ही रखना होता था।
उसको दिल्ली क्यों बुलाया था। वो तो बस पेंटिंग ही बनाता था। हाँ कुछ वक्त से उसने सफेद कैनवास की जगह लाल कैनवास पर पेंटिंग बनानी शुरू कर दी थी। मुझे पसंद तो वो भी नहीं आई थी, मुझे तो अपनी सूरज, चिड़िया और झरने वाली ही पेंटिंग पसंद आती है, लेकिन क्या लाल कैनवास पर पेंटिंग बनाना कोई गलत बात है। हाँ अब लकीरों की जगह वो कैनवास पर पूरे-पूरे लफ्ज़लिखने लगा था। कुछ पेंटिंग्स में आज़ादी भी लिखा था उसने। लेकिन वो पेंटिंग तो आज़ादी का दिन मनाने के बाद बनाई थी, फिर तो आज़ादी लिखने में क्या परेशानी हो सकती है। तब भी, उसे दिल्ली बुला ही लिया।
मैं उससे मिलकर वापस आई तो मैं कैनवास और पेंट लेकर आई। मैंने कभी कैनवास पर पेंटिंग नहीं बनाई थी, मैंने तो स्कूल में बस पेंसिल कलर से सूरज, चिड़िया और झरने बनाए थे। लेकिन उससे मिलकर वापस आने के बाद मुझे सूरज, चिड़िया और झरने वाली पेंटिंग अब एकदम से बुरी लगने लगी थी। उन पेंटिंग्स में तो सब कुछ कितना शांत होता है तो मेरा मन तो इतना बेचैन था। पहले मैंने सोचा किमैं उसके हाथ की पेंटिंग बनाऊँगी—लाल, पीले, गहरे नीले निशानों वाले हाथ। पर उसने तो कहा था किउसके पूरे बदन पर ऐसे निशान हैं। नहीं मैं उसकी बॉडी तो नहीं बना सकती, इतनी पेंटिंग सीखने के लिए तो मुझे बहुत वक्त लगेगा। इतना वक्त कहाँ है उसके पास। बिना सीखे तो मैं बस वो सूरज, चिड़िया और झरने ही बना सकती थी तो फिर मैंने वही बनाए।
इस बार मैंने सूरज तो काले रंग से बुझा दिया, झरने को नीला ही रहने दिया, और चिड़िया के पंखों को लाल रंग से ज़ख्म दिए। पेंटिंग बहुत गंदी लग रही है। उसकी लाल-पीली लाइनों वाली पेंटिंग से भी खराब। मैंने उसे ठीक उसकी पेंटिंग के बगल में लगा दिया है।
दिल्ली जाते हुए मैंने कभी नहीं सोचा था किदिल्ली मेरे कैनवास को इतना बदसूरत कर देगी। लेकिन हाँ इस बार दिल्ली से वापस आते हुए मैं अपनी बहते हुए झरने और आज़ाद पंछी वाली पेंटिंग के ख़्वाब को दिल्ली को दे आई और साथ लाई बुझा हुआ सूरज और ज़ख्मी चिड़िया। शायद दिल्ली मेरी सीनरी वाली पेंटिंग को संभाल रख ले या फिर उसे गुमा दे, इस बारे में, मैं ज़्यादा नहीं सोचती हूँ।

