
आज पढ़िए वरिष्ठ कवि बोधिसत्व की सात हिन्दी कविताएँ और एक अवधी से अनूदित कविता। ये कविताएँ भारत की साझा संस्कृति की याद दिलाने वाली हैं- मॉडरेटर
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1-
मारे जा रहे हैं ताजियेदार!
वे बहुत सारे लोग
घेर कर कुछ ताजियेदारों को पीट रहे थे
ताजिया रास्ते में रुका था
एक पीपल की नीची डाल टूट गई थी
ताजिए के शिखर से टकरा कर
काँपते पत्तों वाली डाल जो रास्ते में झुकी थी!
और कोई रास्ता नहीं था
कर्बला तक ताजिया पहुँचने का!
पीपल में महादेव होते हैं
और उनकी डाल टूट गई थी
ताजिये के शिखर पर टंके चाँद से
और चाँद भी तनिक झुक गया था!
घंटे भर रुका रहा ताजिया
कुछ स्त्रियाँ दाहा रोने का गीत गाती रहीं
ताजिये को घेर कर!
ताजिया रुका रहा लेकिन गीत जारी रहा!
फिर कुछ देर में कुछ लोग आये
जिन्होंने मनौती मानी थी ताजिया से
उन्होंने मार पीट के बीच साफ साफ
कहा ताजिया जाना चाहिए कर्बला
पीपल की डाल तो हाथियों के खाने के लिए काटी गई थी
पिछले महीने भी!
मार खाये लोग भूल कर यातना और अपमान
या हुसैन हम न हुए कहते ले गये ताजिया!
मैं तब देखने वालों में था
जैसे देख रहा हूँ लिंच होते सब कुछ आज भी!
रुका है ताजिया
घर कर पीटे जा रहे हैं ताजियेदार
मारे जा रहे हैं ताजियेदार
दाहा रोने का गीत गा रही हैं हजारों स्त्रियाँ सुरहीन!
दर्शक बहुत हैं अब
लेकिन ताजिया को देवता मान कर
मनौती मानने वाले
उनको कंधा लगाने वाले खो गए हैं कहीं!
यह एक नई बात है!
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2-
रशीद की बकरियाँ नहीं जानती थीं!
रशीद के पास खेत नहीं था
कुछ बकरियाँ थीं
बकरियाँ खेत और हरियाली पहचानती थीं
लेकिन उनको समझा नहीं सकता था रशीद कि
खेत उसका अपना नहीं
फसल भी उसकी नहीं!
रमजान के महीने में
रशीद रोज़े से था
बकरियाँ नहीं थीं रोज़े से
और आदतन उन्होंने फसल में मुँह मारा!
फिर कई पुलिस वाले आये
रशीद को खेत स्वामी के दरवाज़े पर उकड़ूँ बैठा कर
चरी हुई फ़सल के अनुपात में पीटा गया!
धूप बहुत थी लेकिन उजाला न था
रोजा तब भी नहीं तोड़ा रशीद ने।
रशीद ने इतना ही कहा कि मैं बकरियों को बेच दूँगा
क्योंकि उनको समझा नहीं सकता!
उसके इस कथन को ढिठाई कहा गया
और फिर पीटा गया!
जब पिटा हुआ रशीद उठ कर गया तो ऐसा लगा कई मुर्दे उठाये हैं उसने कंधे पर!
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3-
मस्जिदों से अपील!
ओ भारत की मस्जिदों
तुम स्टेशनों से हट कर कहीं चली जाओ
आखिर तुमको कहीं जाना नहीं है तो
स्टेशनों बाजारों और
चौराहों पर क्यों खड़ी हो?
लोग स्टेशन आते हैं तो
ऐसा लगता है मस्जिद आए हैं।
मैं बांद्रा आता हूँ तो लगता है
मस्जिद आया हूँ!
तुम्हारी जगह मंदिर होते तो यह डर न होता!
लोगों के लिए सुविधा होती
दर्शन करके यात्रा आरंभ करते!
जैसे दादर स्वामी नारायण का मंदिर है
वहां भीड़ लगे तो अच्छा लगता है!
भीड़ केवल मस्जिद के सामने डराती है
भीड़ केवल शाहीन बाग में डराती है!
भीड़ केवल जमात की डराती है!
बाकी सब जगह की भीड़ ठीक है!
अभी तुम कहीं और चली जाओ!
स्टेशनों से हट जाओ
रास्तों से हट जाओ
चौराहों से हट जाओ
बस अड्डों से हट जाओ
हवाई अड्डों से हट जाओ
ओ मस्जिदों!
तुम कहीं छिप जाओ!
समेट लो खुद को!
तुम दिखती क्यों हो
तुम्हारी मीनारे भी दूर से दिख जाती हैं!
और अज़ान कितनी दूर तक सुनाई देती है
अपनी मीनारों
हरे गुम्बदों
सबको
अजान की आवाज के साथ छिपा लो
चुप हो अदृश्य हो जाओ
और कहीं चली जाओ!
4-
मैं ताजिए की लकड़ी
अपने ही बाग से कट कर गई
ताजिए की लकड़ी हूं।
ताजिए में जुड़ कर इस्लाम हो गया मैं
मेरी कहानी मुहम्मद साहब के नवासों से गुंथ गई
हसन हुसैन मेरे हो गए
मैं उनका हो गया
रात की रात मैं ताजिया हो गया।
वैसे बहुत दूर है मक्का मदीना
बहुत दूर है आमना का आंगन।
वो चरवाहों की बस्ती
वो पानी के लिए हुआ खून खच्चर
वो सलीबें धूप में सूखती लाशे
हसन हुसैन के बाग में पता नहीं
महुए के बिरिछ होते हैं कि नहीं!
पहले मैं एक पंडित का पेड़ था
एक पंडित के बाग में
पंडित को देता फूल फल पत्ते छाया!
अब जब पुराना हो जाएगा ताजिया
सब चमकदार नक्काशियां जब उतर जाएंगी
एक ढांचा भर रह जाएगा ताजिया
मैं ताजिए से फिर काठ हो जाऊंगा
फिर पता नहीं कहां जाऊंगा।
कितनी प्रतीक्षा करनी होगी
कहीं और जुड़ने जुड़ाने में
पंडित के बाग के सब पेड़ अब भी पंडित हैं
सारे फल सारे फूल सारे पात
सारी जड़ें
सब पेड़ो की परछाइयां भी
मैं भी पंडित हूं
ताजिए में जुड़ा पंडित का पेड़ हूं
जो हसन हुसैन के आंगन की छाया है अब!
भदोही के एक गांव में।
फिर मैंने पाया हमारे
पंडित जी ने ताजिया उठाया जिनका मैं पेड़ था
उन्होंने मुझे कांधा लगाया
करबला पहुंचाया
हसन हुसैन की याद में आंसू बहाया
भदोही के एक गांव में।
ताजिया अपने बाग की बगल से गुजरा
कुछ दूसरे पेड़ो की छाया में सुस्ताए
ताजिएदार
और बाग के बगल वाले करबला में मुकाम पाया।
कई बार सोचता हूं तो रुंध जाता है गला
मन धुंआ धुंआ हो उठता है कि
अगर मैं कभी गलती से भी जला
तो पंडित का पेड़ जलेगा या ताजिया की लकड़ी?
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5-
निजामुद्दीन अंसारी
निजामुद्दीन और हम साथ-साथ जाते थे स्कूल
हम पहली कक्षा से साथ पढ़ते थे
जब कक्षा छः में गये तो दूसरे गाँव के स्कूल जाना हुआ!
दो किलोमीटर का रास्ता दौड़ते-हँसते
पार कर लेते थे हम
कभी-कभी निजामुद्दीन आता था अपने अब्बा की
सायकिल लेकर!
सायकिल में टँगते हमारे बस्ते, निजामू चलाता सायकिल हम धक्का लगाते और पीछे कैरियर पर उछल कर बैठ जाते!
निजामुद्दीन जब सातवीं में गया हम भी गये पीछे-पीछे निजामू मानीटर था सातवीं में!
गणित में अव्वल
संस्कृत में तेज
सैकड़ों रूप और सूत्र श्लोक याद थे उसे!
हर सुबह की प्रार्थना कराता वह स्कूल में
एक दिन निजामुद्दीन के अब्बा ने कहा हिसाब-किताब भर का पढ़ लिया, बहुत है।
फिर निजामुद्दीन टपका काटने लगा गलीचे का और मैं मानीटर हो गया।
हमारा मानीटर निजामुद्दीन अंसारी
ऊन के गोलों धागों और गुल तराशी में खो गया!
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6-
सुनो कय्यूम, सुनो
सुनो कय्यूम, सुनो तुम वर्षों पहले
तब भी बनाया करते थे सायकिल
जब मैं सायकिल चलाया करता था।
तुम अब भी बनाते हो सायकिल
लेकिन अब मैं सायकिल नहीं चलाता।
लेकिन संकट है यह कि यह सब जानने से
क्या है होता जाता!
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7-
ताजिया बाबा की मनौती!
दसवीं में फिर फेल हो जाने का डर था मंगल मिसिर को
उसने पास होने की मनौती मानी ताजिया बाबा की!
पास हुआ तो सिरनी चढ़ाई
फिर ताजिया को कंधा लगाया!
उसकी माँ ने कहा उसने मनाया था बरमबाबा को
उनकी वजह से सधे तुम्हारे काम!
अंत यहाँ पर नहीं हुआ!
आगे जब मंगल के
शुभ विवाह का कॉर्ड छपा तो उसे
ताजिया बाबा पर चढ़ाया मंगल ने
और माँ ने बरम बाबा पर!
विवाह के बाद नव वधू ने पहली रसोईं में सिरनी बनाई
जो उसने मंगल के साथ ताजिया बाबा पर चढ़ाई!
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दाहा रोने का गीत (मूल अवधी)
हसन बैठे चउकवा रे हाय, उपराँ भँवर भहनाय,
पाँच मुसाफिर बगिया म उतरे, दादी ओनसे पूछें बात,
कह मुसाफिर करबले हलिया,
किछु हाल खबर नाहीं मिली ।
बहुत लम्मा बा करबला!
का कहैं दादी करबले की हलिया,
लासन के ढेर लागी,
हम तो खबर बताय रहे दादी
तीर चली हे तरवार चली हे,
मूड़ी कटी मट्टी पड़ी है
बरछी चलीं है सिर कटे हैं।
करबला के हाल सुनि के दादी रोय पड़ी,
दसइ दिनवाँ के नान्हीं दुलहिनियाँ,
नवेली दुलहिनियाँ रे अल्लाह,
नन्हवइ से परिगै बिपतिया रे हाय ।
बार न बान्हि पाये तेल न लगाय पाये
आई आई काफिर से खबरिया रे हाय!
सेन्हुरा न लगावै पायो, मँगियौ न भरै पायौ!
आई गई मरन कै हवलिया रे हाय!
आई गई चूरी तोरन कै हलिया रे हाय!
हिन्दी कवितांतरण
ताजिया रोने का गीत!
हसन चौक की बड़ी वेदी पर बैठे हैं
ऊपर काले काल भौरे भहना रहे हैं!
पाँच मुसाफिर आते हैं बाग में
दादी उनसे पूछती हैं करबला की खबर!
कब से कोई खबर नहीं मिली करबला की!
करबला दूर है अजोध्या से करबला!
क्या कहें दादी करबले का हाल
लाशों पर लाशें हैं
हम बस खबर बता रहे हैं दादी।
करबला में
तीर चले हैं तेग तलवारें चली हैं
सिर हीन लोथ पड़ी हैं करबला में
वहाँ बरछी चली है
वहाँ नेजे चले हैं
लाशें पड़ी हैं वहाँ
करबला की खबर सुन कर रोने लगीं दादी!
दस दिन की नई नवेली नन्हीं दुल्हन हे अल्ला
बालपन में पड़ गई विपति रे अल्ला
न कंघी कर पाई न तेल लगाकर चोटी गूँथ पाई
न कर पाई मन भर कर साज सिंगार
आ गई काफिर के किए की खबर
हे अल्ला हे अल्ला!
सेंदुर न लगा पाई
माँग न भर पाई
आ गई मौत की खबर हे अल्ला
आ गई चूड़ी तोड़ने की नौबत हे अल्ला!

