• रपट
  • दो दिवसीय ‘दिल्ली नालंदा डायलॉग’ का शुभारम्भ

    कल यानी 9 मई को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में ‘दिल्ली नालंदा डायलॉग 2026’ का शुभारंभ हुआ। पहले दिन के कार्यक्रम की रपट पढ़िए- मॉडरेटर 

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    नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल के अंतर्गत आयोजित  “दिल्ली नालंदा डायलॉग 2026” का इंडिया इंटरनेशनल सेंटर  में आज शुभारंभ हुआ। धनु बिहार द्वारा आयोजित ,कला, संस्कृति एवं भाषा विभाग, दिल्ली सरकार, एवं इंडिया इंटरनेशनल सेंटर द्वारा  समर्थित यह संवाद दो दिन तक चलेगा जिसमें देशभर से 100 से अधिक वरिष्ठ सरकारी प्रतिनिधियों, नीति-निर्माताओं, विद्वानों, लेखकों, राजनयिकों, युवा सिविल सेवकों एवं उभरती प्रतिभाओं को एक मंच पर सुनेंगे।

    उद्घाटन समारोह  में नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल की अध्यक्षा पद्म विभूषण डॉ. सोनल मानसिंह, नीति आयोग के पूर्व सीईओ श्री अमिताभ कांत,प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी , इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के निदेशक श्री के. एन. श्रीवास्तव,प्रोफ़ेसर सिद्धार्थ सिंह , प्रो. सच्चिदानंद जोशी, नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल की फेस्टिवल चेयरपर्सन सुश्री डी. आलिया,डॉ.के महेश.श्री संजय कुमार एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर एनएलएफ़ उपस्थित थे।

    नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत ने साहित्य को एक ऐसी परिवर्तनकारी शक्ति बताया, जो दुनिया भर के समाजों को प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि भारत की साहित्यिक परंपराएँ उसकी सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक विरासत से गहराई से जुड़ी हुई हैं.कांत ने कहा कि नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल जैसे आयोजन भारत की विरासत, संस्कृति और इतिहास के संरक्षण एवं पुनर्स्थापन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनका मानना है कि साहित्य वैश्विक सांस्कृतिक संबंधों को सशक्त बनाने, पारस्परिक समझ को बढ़ावा देने और भारत को ज्ञान, मूल्यों तथा सभ्यतागत बुद्धिमत्ता से समृद्ध राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखता है। इससे वैश्विक मंच पर भारत की सांस्कृतिक उपस्थिति और ‘सॉफ्ट पावर’ को भी मजबूती मिलती है।

     नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल की अध्यक्ष एवं पद्म विभूषण डॉ. सोनल मान सिंह ने कहा कि नालंदा में उठती मूल ध्वनि आनंद की तरह है। यह  ध्वनि ज्ञान , पराक्रम और भक्ति की धारा बनकर आनंद गोमुख से निकलती गंगा की तरह निरंतर प्रवाहित होती है. सोनल मान सिंह ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा सदैव संवाद, विचार-विमर्श और मतभेदों के सम्मान पर आधारित रही है। बौद्ध, जैन और सनातन परंपराओं में वाद-विवाद को ज्ञान का आधार माना गया है। केवल ग्रंथों से नहीं, बल्कि गुरु और संवाद से ही सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है। यही कारण है कि  नालंदा डायलाग आज के समय में इस बौद्धिक परंपरा को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है।

     

    सुश्री डी. आलिया (फेस्टिवल चेयरपर्सन) ने कहादेश में अनेक लिटरेचर फेस्टिवल आयोजित होते हैं, लेकिन  नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल के अंतर्गत आयोजित  दिल्ली नालंदा डायलॉग 2026 का उद्देश्य केवल साहित्यिक आयोजन तक सीमित नहीं है। हमारा प्रयास है कि शासन, नीति-निर्माण, कला, संस्कृति और साहित्य से जुड़े लोगों के बीच एक सार्थक संवाद और मजबूत सहभागिता स्थापित हो। हम इस मंच को और व्यापक बनाना चाहते हैं, ताकि विद्यार्थियों, युवाओं और उभरते लेखकों को मार्गदर्शन, अवसर और सही दिशा मिल सके। यह संवाद एक ऐसे सेतु की तरह कार्य करे, जो साहित्य, आम जन और युवा रचनाकारों को आपस में जोड़े, ताकि नई प्रतिभाएँ अपनी बात सही मंच तक पहुँचा सकें, अपनी पहचान बना सकें और समाज में सकारात्मक योगदान दे सकें।”

    संजय कुमार ने इस मौके अपनी बात रखते हुए कहा “नालंदा” शब्द की अनेक व्याख्याएँ मिलती हैं, जिनमें एक अर्थ है — ‘ना अलम दा’, अर्थात ऐसा दान जो कभी समाप्त न हो। प्राचीन नालंदा यूनिवर्सिटी इसी निरंतर ज्ञान-दान की परंपरा का प्रतीक था। यहाँ लगभग 10,000 छात्र और 1,500 आचार्य अध्ययन-अध्यापन करते थे, जिनके पोषण हेतु 200 गाँव संसाधन उपलब्ध कराते थे। पाँचवीं शताब्दी में अपने उत्कर्ष पर पहुँचा यह विश्वविद्यालय लगभग 700 वर्षों तक वैश्विक ज्ञान का केंद्र बना रहा। ह्वेनसांग और  इत्सिंग के यात्रा-वृत्तांत बताते हैं कि चीन, कोरिया सहित विश्वभर से विद्यार्थी यहाँ शिक्षा प्राप्त करने आते थे।

    उद्घाटन सत्र में “गवर्नेंस एंड सिविलाइजेशनल विज़डम” विषय पर एक विशेष उद्घाटन संवाद आयोजित किया गयाजिसका केंद्र नालंदा को वैश्विक ज्ञान मॉडल के रूप में स्थापित करने की अवधारणा थी। इस सत्र में श्री पुरुषोत्तम अग्रवालश्री त्रिपुरारी शरण एवं प्रो. सचिन चतुर्वेदी मंच पर उपस्थित थेजबकि चर्चा का संचालन श्री गौरव सावंत ने किया।

    पुरुषोतम अग्रवाल ने गवर्नेंस एंड सिविलाइजेशनल विज़डम सत्र में अपने विचार रखते हुए कहा कि “मुझे लगता है कि दिल्ली नालंदा डायलॉग जैसे आयोजनों में उत्सव के साथ-साथ गंभीर शोध के प्रश्नों पर भी ध्यान देना आवश्यक है। नालंदा विश्वविद्यालय भौतिक रूप से भले ध्वस्त हो गया, लेकिन वहाँ से शिक्षा प्राप्त कर निकले विद्वानों ने अपने-अपने देशों और समाजों में उस ज्ञान परंपरा को किस रूप में आगे बढ़ाया, इस पर पर्याप्त शोध नहीं हुआ। हम जानते हैं कि अनेक विद्यार्थी दूर-दूर देशों से नालंदा आते थे; ऐसे में यह मानना कठिन है कि उसकी परंपरा केवल परिसर तक सीमित रही होगी।किसी भी विश्वविद्यालय की निरंतरता केवल उसकी इमारतों से नहीं, बल्कि उसके विद्यार्थियों, उनके विचारों और समाज पर पड़े प्रभाव से मापी जाती है। आज भी हम विभिन्न शिक्षण संस्थानों को उनके विद्यार्थियों और बौद्धिक विरासत के माध्यम से याद करते हैं। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि हम नालंदा की उन छापों और प्रभावों की खोज करें, जो समय के साथ विभिन्न समाजों में जीवित रहे होंगे।अक्सर प्राचीन गौरव के आकर्षण में हम निरंतरता की प्रक्रिया को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। यदि हम पाँचवीं शताब्दी की चर्चा आज 2026 में कर रहे हैं, तो यह भी समझना होगा कि इन पंद्रह सदियों में केवल विनाश ही नहीं हुआ, बल्कि अनेक सकारात्मक बौद्धिक और सांस्कृतिक प्रक्रियाएँ भी विकसित हुईं। उन पर गंभीरता से विचार और अध्ययन किए जाने की आवश्यकता है।”

    इसी सत्र में संचालक  गौरव सावंत के एक प्रश्न का उत्तर देते हुए त्रिपुरारी शर्मा ने कहा कि नालंदा ने लोगों को विजय या साम्राज्य विस्तार से नहीं, बल्कि विचारों की शक्ति से आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि नालंदा ऐसी परंपरा का केंद्र था, जहाँ विभिन्न संस्कृतियों और ज्ञान-विधाओं के बीच संवाद बिना किसी संचार बाधा के संभव हुआ। उन्होंने नालंदा की खुली बहसों, अद्वैतमूलक शिक्षण दृष्टि और सामूहिक सह-अस्तित्व की परंपरा को रेखांकित करते हुए ह्वेनसांग के लेखनों का उल्लेख किया, जिनमें नालंदा की वाद-विवाद संस्कृति का विस्तार से वर्णन मिलता है।

    प्रो. सचिन चतुर्वेदी  ने नालंदा और उसके आसपास के गांवों के बीच गहरे संबंधों को रेखांकित करते हुए इसे समाज और शिक्षा के बीच एक सहजीवी संबंध बताया। उन्होंने विश्वविद्यालय के ‘सहभागिता’ कार्यक्रम, किसानों और ग्रामीण समुदायों के साथ सहयोग, तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंतर्गत बहुविषयक शिक्षा को बढ़ावा देने और अंतरराष्ट्रीय छात्रों को आकर्षित करने के प्रयासों पर प्रकाश डाला।

    दोपहर के सत्र में “सिविलाइजेशनल नॉलेज एंड इंडिया गवर्नेंस एथोस” विषय पर चर्चा आयोजित हुई, जिसमें नीति-निर्माण के ढांचे में शासन और सांस्कृतिक नेतृत्व के अंतर्संबंधों पर विचार किया गया। इस चर्चा में श्री अमरजीत सिन्हा, प्रो. कविता शर्मा एवं सुश्री मुग्धा सिन्हा सहभागी रहे, जबकि संचालन सुमित टंडन ने किया।

    अमरजीत सिन्हा ने नालंदा की शासन व्यवस्था, भूमि अनुदान प्रणाली और वैश्विक ज्ञान पर भारत के योगदान पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने 1961 के आईआईटी अधिनियम 1961, एन. आर. माधव मेनन तथा राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों का उल्लेख करते हुए विकेंद्रीकरण, महिला शिक्षा, नागरिक समाज की भागीदारी और सहयोगात्मक शासन की आवश्यकता पर बल दिया। सिन्हा ने शासन व्यवस्था पर शैलेन्द्र राज मेहता के अकादमिक कार्यों का भी उल्लेख किया।

    कविता शर्मा ने नालंदा को राजगीर केंद्रित एक व्यापक शैक्षिक पारिस्थितिकी तंत्र बताया, जिसकी विशेषताएँ अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण, अनुशासित शिक्षण, गुरु-शिष्य के निकट संबंध और समृद्ध वाद-विवाद परंपरा थीं। उन्होंने कहा कि नालंदा की प्रवेश प्रक्रिया में केवल 20 प्रतिशत अभ्यर्थी ही सफल हो पाते थे। उन्होंने यह भी कहा कि बख्तियार खिलजी के आक्रमण से पहले ही शासन संबंधी कमियों और भूमि अनुदान से जुड़े विवादों के कारण विश्वविद्यालय का पतन प्रारंभ हो चुका था।

    मुग्धा सिन्हा ने कहा कि नालंदा का पतन भ्रष्टाचार, जड़ता और शिक्षा से विमुख होती सोच का परिणाम था। उन्होंने ‘धर्म’ को शासन में संतुलन और सामंजस्य का दर्शन बताते हुए कहा कि वाद-विवाद, संवाद और विभिन्न हितधारकों की बात सुनना भारत की शासन परंपरा के मूल तत्व रहे हैं।

    इसके पश्चात “कल्चर, डिप्लोमेसी एंड इंडिया सॉफ्ट पावर” विषय पर एक विशेष सत्र आयोजित हुआ, जिसमें सांस्कृतिक कूटनीति और वैश्विक संवाद को आगे बढ़ाने में साहित्य एवं कला की भूमिका गहन चर्चा की गयी। इस पैनल में श्री संजीव चोपड़ा, डॉ. वर्षा दास एवं सुश्री अंजू रंजन मंच पर थे, जबकि संचालन सुश्री रितु शर्मा ने किया।

    संजीव चोपड़ा ने राष्ट्रीय शक्ति और सांस्कृतिक प्रभाव के बीच गहरा संबंध स्थापित करते हुए कहा कि किसी भाषा और संस्कृति को वैश्विक प्रतिष्ठा तभी मिलती है, जब राष्ट्र आर्थिक रूप से सशक्त बनता है। उन्होंने कहा कि हिंदी को किसी विशेष प्रचार की आवश्यकता नहीं है — जैसे-जैसे भारत एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभरेगा, उसकी भाषा और संस्कृति स्वाभाविक रूप से पूरी दुनिया में फैलेंगी।

    डॉ. वर्षा दास ने चर्चा को व्यक्तिगत और मानवीय आयाम देते हुए कहा कि संस्कृति केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन जीने की संपूर्ण पद्धति है। उन्होंने भारत की बहुभाषिक संरचना का उत्सव मनाते हुए कहा कि भाषा लोगों को जोड़ने वाला सबसे सशक्त माध्यम है और भारत की भाषाई विविधता उसकी सबसे बड़ी सभ्यतागत शक्ति है।

    अंजू रंजन ने सांस्कृतिक कूटनीति को बढ़ावा देने में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने योग और उसे संयुक्त राष्ट्र से मिली मान्यता को भारत की सॉफ्ट पावर का एक प्रमुख उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि कूटनीति का स्वरूप बदल चुका है, जहाँ आर्थिक शक्ति केंद्रीय भूमिका निभाती है, वहीं सत्य और अहिंसा पर आधारित भारतीय दर्शन आज भी वैश्विक संवाद के लिए एक प्रभावशाली माध्यम बना हुआ है।

    कार्यक्रम में आगे “रूट्स टू रूट्स – डायस्पोरा एंड कल्चरल आइडेंटिटी” विषयक सत्र के साथ जारी रहा, जिसमें भारतीय प्रवासी समुदाय के बीच सांस्कृतिक निरंतरता और वैश्विक स्तर पर साझा विरासत के संबंधों पर चर्चा हुई। इस सत्र में महामहिम प्रो. अनिल सूकलाल, डॉ. सरिता बोधू, सुश्री सुमन केशरी एवं प्रो. अजय दुबे मंच पर थे, जबकि संचालन प्रो. मनीष कर्मवार ने किया।

    प्रो. अनिल सूकलाल ने कहा, मैं दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के दौर में पैदा हुआ और बड़ा हुआ, जहाँ नस्लवाद सिर्फ़ समाज में नहीं बल्कि कानून में भी मौजूद था। मैं उन लोगों में था जिन्हें अश्वेत समुदाय माना जाता था, इसलिए बचपन से ही भेदभाव और अन्याय को करीब से देखा। उसी संघर्ष और अमानवीय व्यवहार ने मेरे सोचने का तरीका बनाया। उन्होंने आगे कहा कि उस समय भारत हमारे लिए दूर था, क्योंकि 1946 में भारत दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद शासन के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगाने वाला पहला देश बना। बाद में राजनीतिक, सांस्कृतिक और खेल संबंधी प्रतिबंध भी लगे, जिससे दक्षिण अफ्रीका दुनिया से अलग-थलग पड़ गया। इसका असर वहाँ के भारतीय समुदाय पर भी पड़ा, जिनके भारत से गहरे भावनात्मक संबंध थे।

    डॉ. सरिता बोधू ने कहा, मुझे नालंदा के बारे में सबसे पहले मॉरीशस में हमारे फैमिली बुकशॉप से पता चला, जिसे मेरे चाचा ने शुरू किया था। वहीं से मैंने भारतीय सभ्यता और संस्कृति को समझा। बाद में मैं ICCR की छात्रवृत्ति पर कोलकाता विश्वविद्यालय में भूगोल पढ़ने भारत आई। यह बहुत पुरानी बात है, लगभग छह दशक पहले की। पढ़ाई के बाद मैं मॉरीशस लौट गई और 1983 में फिर वापस आई। मॉरीशस एक बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक और बहु-जातीय देश है, जहाँ यूरोपीय, चीनी, अफ्रीकी और भारतीय मूल के लोग रहते हैं। हम सभी प्रवासी मूल के हैं और हमें गिरमिटिया कहा जाता है।

    डॉ. सुमन केशरी ने कहा, जब हम कल्चर की बात कर रहे हैं तो मैं देख रही हूँ कि इसमें समग्रता है। यहाँ पर हम विचार के स्तर पर कल्चर पर बात कर रहे हैं जो महत्वपूर्ण काम है। प्रो. अनिल सूकलाल से मुखातिब होते हुए उन्होंने आगे कहा, “मेरा जो अपनी जड़ों से कटना है वह उसी रूप में है जैसे कि आप किसी पौधे को दो दिन तक पानी न दें, लेकिन इनका जो अपनी जड़ों से कटना है, वह दिल को दहला देने वाला है।”

    इसके बाद “यूथ इनोवेशन एंड कल्चरल लीडरशिप” विषय पर एक महत्वपूर्ण सत्र आयोजित हुआ, जो युवा पीढ़ी की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षक के रूप में भूमिका पर केंद्रित रहा । इस पैनल में पद्मश्री शोवना नारायण, डॉ. सच्चिदानंद जोशी, श्री नितीश्वर कुमार एवं श्री मुकुल कुमार सहभागी थे, जबकि संचालन सुश्री प्रेरणा जैन ने किया।

    इस पैनल में विरासत, संस्कृति, नवाचार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के परस्पर संबंधों पर गंभीर चर्चा हुई। डॉ. सच्चिदानंद जोशी“हमारी सबसे बड़ी विफलता यह रही कि हमने युवाओं को अपनी विरासत और संस्कृति की ओर उन्मुख नहीं किया। नई शिक्षा नीति 2020 औपनिवेशिक मानसिकता को समाप्त करने का प्रयास है — पहली बार भारतीयता को शिक्षा के केंद्र में रखा गया है। अब एक छात्रा जो एमबीबीएस पढ़ रही है, वह भरतनाट्यम भी सीख सकती है। लेकिन वास्तविक मानसिक परिवर्तन यह है कि उसका परिचय ‘एक भरतनाट्यम नृत्यांगना, जो साथ में एमबीबीएस भी कर रही है’ के रूप में दिया जाए — न कि इसका उल्टा। हमारे बच्चों का प्रेम नहीं बदला है, केवल उसकी अभिव्यक्ति बदली है। समय मुझे तब तक तोड़ नहीं सकता, जब तक मेरे भीतर आनंद, आस्था और विनम्रता जीवित हैं।”

    मुकुल कुमार ने कहा “न्यूज़ीलैंड की माओरी भाषा लगभग विलुप्त हो चुकी थी, लेकिन युवाओं ने डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया और पॉडकास्ट के माध्यम से उसे पुनर्जीवित किया। युवा ही संस्कृति के वास्तविक संरक्षक हैं, जो परंपरा और आधुनिकता के बीच निरंतर संवाद बनाए रखते हैं। तकनीक उस विरासत को बचाने में सहायक बन रही है, जो कभी लुप्त होती जा रही थी। लेकिन युवाओं को जिम्मेदारी का भाव भी रखना होगा — क्योंकि संस्कृति को अधिक सुलभ बनाते समय उसकी प्रामाणिकता की रक्षा करना उतना ही आवश्यक है। विरासत की आत्मा और संवेदना को बचाए रखना, उसके स्वरूप को बचाने जितना ही महत्वपूर्ण है।”

    शोभना नारायण ने कहा “कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक शक्तिशाली और उपयोगी साधन है, लेकिन इसका उपयोग विवेक और संवेदनशीलता के साथ होना चाहिए। हमें तकनीक का स्वामी बने रहना है, उसका दास नहीं। रचनात्मकता, भावनाएँ और मानवीय चिंतन कभी भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अधीन नहीं होने चाहिए। आज के युवाओं से जुड़ने के लिए हमें उनकी भाषा और उनके माध्यमों में संवाद करना होगा। संस्कृति, साहित्य और परंपरा को उसी डिजिटल रूप में प्रस्तुत करना होगा जिसे वे समझते हैं। लेकिन इस आधुनिकता के बीच हमें अपनी सांस्कृतिक आत्मा, संवेदनशीलता और मूल्यों को अक्षुण्ण बनाए रखना होगा।”

    नितीश्वर कुमार ने कहा “अनुवाद में हमेशा कुछ न कुछ खो जाता है। अमीर खुसरो ने हमें ऐसी काव्य परंपरा दी, जो भाषा की सीमाओं से परे जाती है — और किशोर कुमार जैसे महान कलाकारों ने उस आत्मा को पर्दे पर जीवंत कर दिया। जब खुसरो की पंक्तियाँ गूंजती हैं — ‘ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन बा-रंजिश’ — तब कोई अनुवाद उस भाव को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकता। दिल वह समझ लेता है, जिसे मन शब्दों में नहीं समझा पाता। यही हमारी क्षेत्रीय भाषाओं और साहित्यिक विरासत की शक्ति है — इसे केवल अनुवादित नहीं, बल्कि महसूस किया जाना चाहिए।”

    पहले दिन का समापन एक भव्य और यादगार सांस्कृतिक संध्या के साथ हुआ, जिसने उपस्थित दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। प्रसिद्ध गायिका विद्या शाह और उनकी टीम की विशेष प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को सुरों और संवेदनाओं से भर दिया। इस संगीतमय प्रस्तुति को उन्होंने “सुर, शब्द और ताल” नाम दिया, यह बताते हुए कि संगीत और साहित्य का रिश्ता एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ है।

    रवीन्द्रनाथ टैगोर जयंती के अवसर पर प्रस्तुत रचनाओं ने शाम को एक विशेष गरिमा और सौंदर्य प्रदान किया। विद्या शाह ने शास्त्रीय संगीत में लोकभाषाओं और लोकधुनों के प्रयोग को भी बेहद खूबसूरती से प्रस्तुत किया, जिसमें दादरा जैसी शैलियों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद “जश्न-ए-कव्वाली” के अंतर्गत तस्कीन अली खान और उनकी टीम ने अपनी दमदार प्रस्तुति से समां बांध दिया। सूफियाना अंदाज़, ऊर्जावान गायन और तालियों की गूंज के बीच पूरी शाम संगीत, साहित्य और संस्कृति के अद्भुत उत्सव में बदल गई।

    अधिक जानकारी के लिए: @NalandaLittFest

    धनु बिहार के बारे में:

    धनु बिहार, वर्ष 2020 में स्थापित एक गैर-लाभकारी संस्था है, जो बिहार में वंचित समुदायों के सशक्तिकरण के लिए कार्यरत है। इसके प्रमुख क्षेत्र हैं—महिला सशक्तिकरण, किसान सहयोग, सांस्कृतिक संरक्षण, शिक्षा और सामाजिक कल्याण।

    अधिक जानकारी के लिए:
    www.nalandaliteraturefestival.com

    मीडिया संपर्क:
    ज़िमिशा कम्युनिकेशन
    संतोष कुमार
    मो.: +91 99909 37676
    ईमेल: santosh@zimisha.com

    मानस  प्रतिम देका
    मो.: +91 99539 70829
    ईमेल: manash@zimisha.com

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