यह पलाश के फूलने का समय है

         
आज युवा कवि अनुज लुगुन की कविताएँ. अनुज की कविताओं में सभ्यता का गहरा अँधेरा है, हाशिए के लोगों की वह उदासी जिसके कारण ग्लोब झुका हुआ दिखाई देता है. एकदम नए काव्य-मुहावरे के इस कवि में बड़ी संभावनाएं दिखाई देती हैं, बेहतर भविष्य की, बेहतर कविता की- जानकी पुल.




१.
ग्लोब
मेरे हाथ में कलम थी
और सामने विश्व का मानचित्र
मैं उसमें महान दार्शनिकों
और लेखकों की पंक्तियाँ ढूँढ़ने लगा
जिसे मैं गा सकूँ
लेकिन मुझे दिखायी दी
क्रूर शासकों द्वारा खींची गई लकीरें
उस पार के इंसानी ख़ून से
इस पार की लकीर, और
इस पार के इंसानी  ख़ून से
उस पार की लकीर।
मानचित्र की तमाम टेढ़ी-मेंढ़ी
रेखाओं को मिलाकर भी
मैं ढूंढ नही पाया
एक आदमी का चेहरा उभरने वाली रेखा
मेरी गर्दन ग्लोब की तरह ही झुक गई
और मैं रोने लगा।
तमाम सुनी – सुनाई, बताई
तर्कों को दरकिनार करते हुए
आज मैंने जाना
ग्लोब झुकी हुई क्यों है। 
२.
महुवाई गंध
(कामगरों एंव मजदूरों की ओर से उनकी पत्नियों के नाम भेजा गया प्रेम -संदेश )
ओ मेरी सुरमई पत्नी!
तुम्हारे बालों से झरते है महुए।
तुम्हारे बालों की महुवाई गंध
मुझे ले आती है
अपने गाँव मे ,और
शहर के धूल-गर्दों के बीच
मेरे बदन से पसीने का टपटपाना
तुम्हे ले जाता है
महुए के छँव में
ओ मेरी सुरमई पत्नी !
तुम्हारी सखियाँ तुमसे झगड़ती हैं कि
 महुवाई गंध महुए में है।
मुझे तुम्हारे बालों में  
आती है महुवाई गंध
और तुम्हें
मेरे पसीनों में
ओ मेरी महुवाई पत्नी !
सखियों का बुरा न मानना
वे सब जानती हैं कि
महुवाई गंध हमारे प्रेम में है। 




अनायास
अनायास ही लिख देता हूँ
तुम्हारा नाम
शिलापट पर अंकित शब्दों-सा
हृदय मे टंकित
संगीत के मधुर सुरों-सा
अनायास ही गुनगुना देता हूँ  

तुम्हारा नाम ।

अनायास ही मेघों -सी
उमड़ आती हैं स्मृतियाँ
टपकने लगती हैं बूंदें
ठहरा हुआ मैं
अनायास ही नदी बन जाता हूँ  
और तटों पर झुकी
कँटीली डालियों को भी चूम लेता हॅूँ
रास्ते के चट्टानों से मुस्कुरा लेता हूँ ।
शब्दों के हेर -फेर से
कुछ भी लिखा जा सकता है
कोई भी कुछ भी बना सकता है
मगर तुम्हारे दो शब्दों से
निकलते हैं मिट्टी के अर्थ
अंकुरित हो उठते हैं सूखे बीज
और अनायास ही स्मरण हो आता है
लोकगीत के प्रेमियों का किस्सा ।
किसी राजा के दरबार का कारीगर
जिसका हुनर ताज तो बना सकता है
लेकिन फफोले पड़े उसके हाथ
अॅँधेरे में ही पत्नी की लटों को तराशते हैं
अनायास ही स्मरण हो आता हैं
उस कारीगर का चेहरा
जिस पर लिखी होती हैं सैकडों कविताएँ
जिसके शब्द, भाव और अर्थ  
आँखों में छुपे होते हैं
जिसके लिए उसकी पत्नी आँचल पसार देती है
कीमती हैं उसके लिए
उसके आँसू
उसके हाथों बनाए ताज से
मोतियों की तरह
अनायास ही उन्हे
वह चुन लेती है।
अनायास ही स्मरण हो उठते हैं
सैकड़ों हुनरमन्द हाथ
जिनकी हथेलियों पर कुछ नहीं लिखा होता है
प्रियतमा के नाम के सिवाय।
अनायास ही उमड़ आते हो तुम
तुम्हारा नाम
जिससे निकलते हैं मिट्टी के अर्थ
जिससे सुलगती है चूल्हे की आग
तवे पर इठलाती है रोटी
जिससे अनायास ही बदल जाते हैं मौसम ।
 अनायास ही लिख देता हूँ
तुम्हारा नाम
अनायास ही गुनगुना देता हूँ  
संगीत के सुरों- सा
सब कुछ अनायास
जैसे अपनी धुरी पर नाचती है पृथ्वी
और उससे होते
रात और दिन
दिन और रात
अनायास
सब कुछ………
गंगाराम कलुण्डिया
                गंगाराम कलुण्डिया भारतीय सेना के देशभक्त सैनिक थे। 1971 ई0 
के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्होंने लड़ाई लड़ी और राष्ट्रपति द्वारा वीरता पुरस्कार से सम्मानित भी हुए। तत्पश्चात् सूबेदार होकर सेवानिवृŸा हुए। अपने क्षेत्र पं0सिंहभूम के कोल्हान में खरकई नदी में  सरकार की ईचा बाँध परियोजना से विस्थापित हो रहे आदिवासियों का इन्होंने नेतृत्व किया तथा
विस्थापन के विरूद्ध आन्दोलन चलाया। प्रतिरोध के बढ़ते तेवर को देख पुलिस ने 3 अप्रैल 1982 ई0 को शीर्ष नेतृत्वकत्र्ता गंगाराम कलुण्डिया की गोली मार कर हत्या कर दी और आन्दोलन दबा दिया गया।
               यह कविता गंगाराम कलुण्डिया और उन्हीं की तरह अपने अस्तित्व और अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले आदिवासियों को समर्पित।
1. देश
गंगाराम !
तुम कहाँ मरने वाले थे
पुलिस की गोली से
तुम्हें तो दुश्मन की सेना भी
खरोंच नहीं पाई थी सीमा पर।
दनदनाते गोलियों
धमकते गोलों और क्षत-विक्षत लाशों के बीच
सीमा पर
लुढ़कते-गुढ़कते- रेंगते
अपनी बन्दूक थामे रहनेवाले योद्धा थे
तुम कहाँ मरने वाले थे< /div>

पुलिस की गोली से।
खून के छीटों के बीच याद आता रहा होगा तुम्हें
बेर की काँटीली डालियों पर
फुदकते गाँव के बच्चे
औरतों के साथ
चट्टान के ओखल में मडुवा कूटती
पत्नी का साँझाया चेहरा
और देश के करोड़ों लोगों की
आँखों में तैरती मछरी की बेबसी
दुश्मनों के गोला-बारूद की
लहरों को रोकने के लिए
गंगाराम, तुम बाँध थे
तुम कहाँ मरने वाले थे
पुलिस की गोली से।
गंगाराम !
तुमने बाँध दी थी बाँध
अपनी छाती की दीवार से
और उसमें अठखेलियाँ करने लगी थीं
देश के मानचित्र की रेखाएँ
उनकी अठखेलियों में
तुम्हें याद आता था
अपने बच्चें की शरारत
उनकी शरारतों के लिए
तुम जान देने वाले पिता थे
पिता की भूमिका में
देश के  वीर सपूत थे
तुम कहाँ करने वाले थे
पुलिस की गोली से।
2. देश भक्ति
गंगाराम !
तुम कहाँ मरने वाले थे
पुलिस की गोली से
लेकिन आ धमके एक दिन
पुलिसिया दल-बल के साथ
तुम्हारी छाती पर बाँध-बाँधने,
तुम्हारी छाती-
जिसकी शिराओें में होती हैं नदियाँ
अस्थियों में वृक्षों की प्रजाति
मास- पिण्डों में होते हैं
मौसमों के गीत
आखाड़ों की थिरकन
तुम्हारी छाती में होती है पृथ्वी
और उसकी सम्पूर्ण प्रकृति,
तुम्हारी छाती पर आए मूँग दलने
तुम्हारे ही देश के लोग।
गंगाराम !
तुम देश के लिए हो
या, देश तुम्हारे लिए
संसदीय बहसों और
अदालती फैसलों में नहीं हुआ है निर्णय
जबकि तुमने तय कर लिया था कि
तुम लड़ोगें अपने देश के लिए।
सलामी देते झण्डे के
हरेपन के लिए
तुम लडे़े थे
जंगलों के लिए
जिसको सींच जाती थी पहाड़ी नदी
पहाड़ी नदी की सलामी को
बंधक बना कर रोक देना
देशभक्त सिपाही की तरह
तुम्हें कतई स्वीकार नहीं था
तुम नहीं चाहतें थे
देसाउली और सरना से उठकर
हमारे जीवन में उतर जाने वाली ठंडी हवा
उस बाँध में डूब कर निर्वात् हो जाए
उस निर्वात् को भेदने के लिए
तुम चक्रवात थे
तुमने आह्वान किया शिकारी बोंगा से
तीर के निशाने से न चूकने के लिए
तुमने याद किया
पुरखों का आदिम गीत
तुम्हारी आवाज कोल्हान में फैल गई
निकल पड़े बूढे़-बच्चें औरत सभी
धान काटती दरान्ती
और लकड़ी काटती कुल्हाड़ी लेकर
सदियों से बहती आ रही
अपनी धार बचाने
गंगाराम !
तुम मुर्गें की पहली बाॅग थे
तुम कहाँ मरने वाले थे
पुलिस की गोली से।
3. देशांतरण
गंगाराम !
तुम कहाँ मरने वाले थे
पुलिस की गोली से
तुम्हें तो मृत्यु ने
ले लिया था आकस्मिक अपनी गोद में
जिसके सामने हर कोई मौन है मगर तुम सदैव
इस मौन से अजेय संवाद करते रहे
तुम्हारा अजेय संवाद
आज भी बहस करता है
उनके गिरेबान से
जब भी वो
कदम उठाते हैं तुम्हारे देश की ओर।
गंगाराम !
तुम्हारे मरने पर
नहीं झुकाया गया तिरंगा
नहीं हुए सरकारी अवकाश
और न ही बजाए गए
शोक गीत के धुन
तुम्हारे बंधुओं के अलावा
किसी का घर अंधेरे नहीं हुआ
तुम्हारे मरने से ही ऊँचा  हो सकता था
देश का मान
बढ़ सकती थी उसकी चमक
विज्ञापनों में वे कह सकते थे
अपने प्रोडक्ट का नाम।
गंगाराम !
तुम मरे ऊँचे आसनों पर बैठे
लोगों की कागजी फाँस से
जहाँ हाशिए पर रखे गए हैं
तुम्हारे लोग
देशांतर है जहाँ
तुम्हारे ग्लोब का मानचित्र तुम्हारी आखरी तड़प ने
उनके सफेद कागजों पर कालिख पोत दी है
मरते हुए भी हुए
देशी हितों के अखबार निकले
गंगाराम !
तुम कहाँ मरने वाले थे
पुलिस की गोली से
तुम्हें तो दुश्मनों की सेना भी
खरोंच नहीं पाई थी सीमा पर।





यह पलाश के फूलने का समय है
(1)
जंगल में कोयल कूक रही है
जाम की डालियों पर
पपीहे छुआ-हुई खेल रहे हैं
गिलहरियों की धमाचैकड़ी
पंडुओं की नींद तोड़ रही है
यह पलाश के फूलने का समय है।
यह पलाश के फूलने का समय है
उनके जूडे़ में खोंसी हुई है
सखुए की टहनी
कानों में सरहुल की बाली
अखाडे़ में इतराती हुई वे
किसी भी जवान मर्द से कह सकती हैं
अपने लिए एक दोना
हड़ियाँ का रस बचाए रखने के लिए
यह पलाश के फूलने का समय है।
यह पलाश के फूलने का समय है
उछलती हुईं वे
गोबर लीप रही हैं
उनका मन सिर पर ढोए
चुएँ के पानी की तरह छलक रहा है
सरना में पूजा के लिए
साखू के पŸाों पर वे बाँस के तिनके नचा रही हैं
यह पलाश के फूलने क समय है।
(2)
यह पलाश के फूलने का समय है

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