बांग्ला भाषा के प्रसिद्ध लेखक रबिशंकर बल के उपन्यास का हिन्दी अनुवाद आया है-‘रूमी: एक आईना-सी ज़िंदगी’। अमृता बेरा द्वारा अनूदित इस उपन्यास पर यह विस्तृत टिप्पणी लिखी है युवा कथाकार शहादत ने। रेख्ता से प्रकाशित इस उपन्यास की यह समीक्षा आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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बांग्ला भाषा के महत्वपूर्ण कथाकार रबिशंकर बल के उपन्यास ‘रूमी: एक आईना-सी ज़िंदगी’ का अनुवाद अपने प्रकाशन के बाद से ही हिंदी साहित्य में चर्चा का विषय बना हुआ है। जैसा कि इस किताब के नाम से ज़ाहिर है, यह उपन्यास मौलाना रूमी के जीवन पर आधारित है। हालांकि, इस उपन्यास को अगर केवल मौलाना रूमी की ज़िंदगी का बयानिया कहा जाए तो यह इस किताब और किताब में दर्ज कहानी के साथ ना-इंसाफ़ी होगी। क्योंकि, इस किताब में केवल मौलाना रूमी ही नहीं बल्कि उनके साथ इस कहानी को बयां करने वाले विश्व प्रसिद्ध मुस्लिम फिलोसफ़र और यात्री इब्ने बतूता की कहानी भी चलती है।
उपन्यास की शुरुआत इब्ने बतूता के मौलाना रूमी की कर्म-भूमि (जन्मभूमि नहीं) कोन्या पहुंचने के साथ होती है। कोन्या पहुंचने पर इब्ने बतूता को अहसास होता है कि यह कोई आम शहर नहीं है, बल्कि यह वो शहर है, जिसके कण-कण में रूमी बसे हुए हैं। वह शख़्स जिसे इस्लामी दुनिया का शेक्सपियर कहा गया और जिसकी ख़्याति उसकी इस्लामिक विद्वता से ज़्यादा उसकी प्रेम-कविताओं के लिए फैली। कोन्या में अपने क़याम के दौरान इब्ने बतूता को बार-बार यह भी अहसास होता है कि इस शहर का हर मुहल्ला, हर गली और इसका हर निवासी मौलाना रूमी की ज़िंदगी से जुड़ा कोई-न-कोई क़िस्सा छुपाये बैठा है। उसके दरख़्त, पेड़-पौधे, खंडहर, मकानात, उन मकानों के दलाना, दालानों में रखी चक्की और चक्की से निकलता बारीक आटा… सब-कुछ रूमी-शम्स के इश्क़ की दास्तां बयान कर रहे हैं।
इब्ने बतूता अपनी इस यात्री में आगे बढ़ते हैं और उनकी मुलाक़ात ख़ानकाह के एक दरवेश से होती है, जो मौलाना रूमी के मुरीदों में से ही एक हैं। उस ख़ानक़ाह में रहने और वहां रहने के अनुभवों को दर्ज करने के दो-तीन बाद ही इब्ने बतूता एक ख़तातीह (ख़त, किताब लिखने वाला) के घर जा पहुंचते हैं, जहां उन्हें मालूम होता है कि वह ख़तातीह मौलाना रूमी और शम्स के रूहानी इश्क़ पर एक किताब लिख रहा है, जिसकी एक प्रति वह इब्ने बतूता को भी देना चाहता है। ‘प्रति’ जिसे आप पांडुलिपि भी कह सकते हैं, प्रस्तुत उपन्यास का मग़ज़ है। इसकी रुह है। साथ ही रबिशंकर बल की वह शैली भी है, जिसके इर्द-गिर्द वह अपने औपन्यासिक कथा के रेशे सुलझाते हैं।
‘आईना-सी ज़िंदगी’ उपन्यास लिखने से पहले रबिशंकर ने ‘छायापुतुलेर खेला’ अर्थात् ‘साये पुतलों का खेल’ जैसा उपन्यास और ‘दोज़ख़नामा’ जैसी दास्तान पूरे कर लिए थे। ‘आईना-सी ज़िंदगी’ उसी धारा का एक पड़ाव है। ‘दोज़ख़नामा’ में रबिशंकर ने जिस क़िस्सागोई का सहारा लिया था, उसे पश्चिमी साहित्य आलोचना की भाषा में ‘फाउंड मैन्युस्क्रिप्ट’ यानी पाई हुई पांडुलिपि कहा जाता है। संरचनात्मक स्तर पर ‘आईना-सी ज़िंदगी’ भी कुछ-कुछ वैसा ही है। यह उपन्यास इब्ने-बतूता की क़िस्सागोई शैली में लिखा गया है। यह उपन्यास शम्स के रूमी की ज़िंदगी में दाख़िल होने से शुरू होकर और उनके अपने बेहतरीन काम ‘मसनवी’ के लेखन की शुरुआत पर आकर ख़त्म हो जाता है। ‘साहित्य’ यहाँ ग़ैर-मौजूद है। या यूं कहे कि उसकी मौजूदगी की ज़रूरत का अहसास होने से पहले ही आख़्यान खत्म हो जाता है।
हालांकि, यह भी सच है कि ‘आईना-सी ज़िंदगी’ किसी भी लिहाज़ से जलालुद्दीन रूमी की जीवनी नहीं है। इस उपन्यास को ‘लिटरेरी बायोग्राफी’ भी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि, लिटरेरी बायोग्राफी की एक अहम शर्त यह है कि साहित्य और साहित्य के कामों को लेखक की ज़िंदगी से जोड़कर देखा जाए और फिर उसी नज़रिए से लेखक की ज़िंदगी की घटनाओं को तर्तीब दी जाए। ‘आईना-सी ज़िंदगी’ उस ज़िम्मेदारी से आज़ाद है। आज़ादी की इस लहर को देखते यूं लगता है कि रबिशंकर बल शायद इस दास्तान को सभी ज़िम्मेदारियों से आज़ाद करना चाहते थे। इसीलिए उपन्यास में नैरेटिव के शुरुआती दौर से ही क़िस्से पर क़िस्सा चलता रहता है, कोई कहानी किसी और कहानी से गुफ़्तगू करने लगती है। पढ़ते हुए कई बार यूं लगने लगता है कि हम वाकई रूमी की ज़िंदगी दास्तान पढ़ रहे हैं या फिर कुछ ओर!
हालांकि, दास्तान को सभी ‘ज़िम्मेदारियों’ से आज़ाद कराने के फेर में लेखक ने इस उपन्यास में कुछ ऐसे वाक़ियात भी लिख दिए हैं, जिन्हें किसी हाल में मौजूं नहीं कहा जा सकता। इन वाक़ियात को बयान करते हुए लेखक बांग्ला लेखन-शैली का सहारा लेता हुआ दिखाई देता है, जिसमें एकाएक ग़ुस्से में इस तरह प्रतिक्रिया देना, जो रूमी या शम्स जैसे दरवेश सिफ़्त व्यक्ति का तरीक़ा कभी नहीं हो सकता है। या फिर ख़ुशी के मौक़े पर ‘हँसी से फट पड़ना’ जैसे वाक्यों का इस्तेमाल करना। मौलना रूमी सादा-जीवन और उच्च विचार के क़ायल रहे हैं और इसी जीवन-शैली के लिए उन्हें जाना और सराहा गया है। उनकी शख़्सियत बेहद सादा, कम-गौ अंदाज़ और हल्की-हल्की मुस्कुराहट की निशानदेही रही है। जबकि रबिशंकर बल अपने तरीक़ा-ए-दास्तान से उनकी इस शख़्यिसत को एकाएक तबाह कर देते हैं, और उनकी एक ऐसी छवि पाठकों के सामने पेश करते हैं, जिसके अंदर न तो लिहाज़ है, न अदब और न ही संयम। यही अंदाज़ वह शम्स से जुड़ी घटनाओं का वर्णन करते हुए भी अपनाते हैं। हालांकि, शम्स की घुमक्कड़ प्रवृत्ति को देखते हुए उनके विषय में इस तरह के शब्दों, वाक्यों या घटनाओं को बयान करना ज़्यादा अखरता नहीं है। हालांकि, क़िस्सागोई और साहित्यिक संदर्भ में देखा जाए तो एक लेखक को यह छूट होती है कि वह अपनी कथा के किरदारों को जैसा चाहे रंग-रूप दे, और जिस तरह चाहे उनके व्यक्तित्व को चित्रित करे।
मगर दृष्टव्य है कि रबिशंकर बल यहीं नहीं रुकते। वह एक और पायदान ऊपर चढ़ते हैं और शम्स तबरेज़ और मौलाना रूमी के रूहानी-इश्क़ को न केवल समलैंगिक नजरिये से देखते हैं, बल्कि उनके पाकीज़ा रिश्ते को ‘समलैंगिक’ क़रार भी देते हैं। रूमी और शम्स के बीच के उक्त रिश्तें को पूरी साफ़-गोई के साथ वह उनके क़िस्सों कहानियों का सहारा लेकर बयान करते हैं, जो कोन्या शहर में मौलाना रूमी के किरदार को ध्वस्त करने के लिए उनके आलोचको और विरोधियों द्वारा न सिर्फ़ फैला गए हैं, बल्कि किताबी शक्ल में प्रकाशित कराके बेचे भी जा रहे होते हैं। इस तरह के सनसनी-खेज़ क़िस्से और कहानियों, जिन्हें साहित्य की दुनिया में लुगदी साहित्य या फिर ‘कामोत्तजेक कथाओं’ की श्रेणी में रखा जाता है, उन्हें लेखक अपने इस उपन्यास में ऐतिहासिक किरदारों के साथ नत्थी कर देता है।
हालांकि, रूमी-शम्स के बीच के रूहानी रिश्ते को तार-तार करते इन क़िस्सों को लेकर जब उपन्यास की अनुवादक अमृता बेरा, जो ख़ुद के अफ़साना-निगार होने पर रबिशंकर बल को अपना मुर्शिद बना लेने जैसी साहसिक टिप्पणी करती हैं, सवाल किया गया तो उन्होंने कहा,
‘रूमी: एक आईना-सी ज़िंदगी’ उपन्यास पाठकों से भी एक तैयारी की मांग करता है। इसमें जो घर वापसी की पुकार है, इस पुकार से वाबस्ता होने के लिए, इश्क़ की ऐसी जुदाई को महसूस करना होगा, जो शरीर से होता हुए भी उस रुहानी बुलंदी तक पहुंचती है।
भाषा के स्तर पर बात की जाए तो इस उपन्यास में ज़रूरत से ज़्यादा उर्दू के नाम पर क्लिष्ट फ़ारसी शब्दों का इस्तेमाल किया गया। वह भी इतने भारी-भरकम शब्दों का जिन्हें पढ़ते हुए कई बार शब्दकोश तक की ज़रूरत महसूस होने लगती हैं। इसके अलावा, इन कथित उर्दू शब्दों के बीच में अर्द्ध-कोमा (’) का इस्तेमाल किया गया है, जिससे पाठ की रवानगी में रुकावट पैदा होती है।
अनुवादक अमृता बेरा ने उपन्यास की क्लिष्टता के बारे में कहा,
यह रेख़्ता का अपना क़ायदा है। यानी उनकी शब्द-शैली है। वह अपनी हर किताब में उर्दू शब्दों का इसी तरह इस्तेमाल करते हैं।
यह सही है कि हर प्रकाशक की एक शब्द-शैली होती है और वह उसी अंदाज़ में शब्दों का प्रयोग अपने यहां से प्रकाशित होने वाली किताबों में करता है। मगर यह भी सच है कि किसी भी भाषा का वजूद उसके बोलने वालों से होता है। आम लोग जितनी आसानी और रवानी से किसी भाषा और उसके शब्दों का प्रयोग बोल-चाल/बातचीत में करते हैं, उसका आधार उतना ही मजबूत होता है। अगर कोई बादशाह, शासन या फिर प्रकाशक किसी भाषा को भारी-भरकम शब्दों से लाद दे या फिर उसमें अपने मर्ज़ी से बदलाव करना शुरू कर दे तो वह भाषा आम-जन दूर होना शुरू हो जाती है। संस्कृत से पालि, पालि से प्राकृत और प्राकृत से अपभ्रंश का विकास हमे यही सीख देता है। फ़ारसी से उर्दू और उर्दू से हिंदुस्तानी का निकलना भी इसी तथ्य को स्पष्ट करता है।
मगर लगता है कि रेख़्ता वाले इस बात को समझ नहीं रहे हैं और वह फिर से हिंदुस्तानी में उर्दू और उर्दू में फ़ारसी के भारी-भरकम और आम-फ़हम की ज़बान पर न आने वाले शब्दों का इस्तेमाल कर उसे एलीट और शासक-वर्ग की भाषा बना देना चाहते हैं।
ख़ैर, इन सब कमियों के बावजूद ‘रूमी: एक आईना-सी ज़िंदगी’ अपनी तरह का मुख़्तलिफ़ उपन्यास है। और इस उपन्यास को पढ़ने के लिए पाठक को वाक़ई अपनी मन:स्थिति को एक अलग स्तर पर ले जाने की आवश्यकता होती है।
किताब की भूमिका में अनिर्वाण मुखोपाध्याय इस तथ्य को कुछ यूं बयां करते हैं,
‘आईना जीवन’ उस ला-महदूद इम्कान, यानी अनंत संभावना की ओर सफ़र की कहानी है, जहां मैं से तुम, तुम से अनेक, अनेक से असीम पाठक का इंतज़ार करते हैं। कहानी के ख़त्म हो जाने के बाद भी ‘मसनवी’ बाक़ी रहती है, जो पाठक के सामने तीन-हिस्सों में बंटे हुए ‘सच’ को पेश करती है।
समीक्षक शहादत युवा कथाकार और अनुवाद हैं। उनका पहला उपन्यास ‘मुहल्ले का आख़िरी हिंदू घर’ शीघ्र प्रकाशय है।

