मनीषा कुलश्रेष्ठ के उपन्यास ‘त्रिमाया’ पर यह टिप्पणी लिखी है युवा लेखक अविनाश कुमार ने। अविनाश कुमार उड़ीसा कैडर के आईएएस हैं, और अभी हाल में ही उनका पहला उपन्यास वाणी प्रकाशन से आया है- ग्रामकहानी। आइये उनकी लिखी हुई यह समीक्षा पढ़ते हैं। संयोग से मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास भी वाणी प्रकाशन से ही आया है- मॉडरेटर
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माया—यह शब्द भारतीय अध्यात्म में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ब्रह्मांड की एकात्मक सत्ता में विश्वास रखने वाले आदि शंकराचार्य को भी अंततः माया को देवी-शक्ति के रूप में स्वीकार करना पड़ा। शाक्त परंपरा में देवी-शक्ति केवल उपासना का विषय नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की मूल सत्ता है—वही सृजन करती है, वही पालन करती है और वही संहार का आधार बनती है।
मनीषा कुलश्रेष्ठ के उपन्यास ‘त्रिमाया’ में माया अपने शाक्त रूप में प्रस्तुत होती है—एक शक्तिशाली और सक्रिय सत्ता के रूप में। ‘त्रिमाया’ शब्द में ‘त्रि’ को मैं इसी अर्थ में ग्रहण करता हूँ। संभव है कि लेखिका का आशय तीन मुख्य कहानियों की ओर संकेत करना रहा हो, किंतु मेरे लिए इस त्रिमाया में ‘त्रि’ का अर्थ सृजन, पालन और संहार—तीनों शक्तियों का समावेश ही है।
मातृसत्ता पर आधारित यह पुस्तक इस धारणा को स्थापित करता है कि प्रकृति के सबसे निकट स्त्रीत्व का तत्व ही है और संभवतः शायद इसीलिए प्राकृतिक क्रम में स्त्री-नेतृत्व वाले ढाँचे ही अधिक स्वाभाविक और टिकाऊ प्रतीत होते हैं।
उपन्यास में वर्णित कथाओं की झलक मेरे लिए बेहद परिचित और अपनापन देने वाली रही। हाथियों के मातृसत्तात्मक समाज को वर्णित करती पहली कहानी मेरे आईएएस की ट्रेनिंग डिस्ट्रिक्ट अलीपुरद्वार से जुड़ी हुई है। जलदापाड़ा एवं बक्सा के जंगलों में न जाने कितनी बार मैंने इस उपन्यास में वर्णित ऐसे ही हाथियों के झुंड को देखा है। किंतु उनकी दुनिया को कभी मानवीय संवाद एवं संवेदना के साथ इतनी प्रखरता से न कभी पढ़ा था और इसके बाद शायद कभी कहीं पढ़ भी न पाऊँगा। इसके हरेक पलटते पन्ने के साथ मैं आश्चर्य से मुग्ध होता गया।
इस उपन्यास को लिखते समय की गई शोध-प्रक्रिया सहज ही पाठक को महसूस हो जाती है। यह शोध केवल जंगलों या हाथियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी मानवशास्त्रीय पड़ताल भी अत्यंत सलीके से की गई है और उसे बहुत करीने से कथा में गूँथ दिया गया है। परिणाम यह होता है कि उपन्यास कही भी बोझिल जानकारी या तथ्यों का ढेर नहीं बनता; बल्कि पाठक उन हाथियों की लंबी यात्राओं का सहभागी बन जाता है। वह उनके झुंड का एक हिस्सा बनकर उनके साथ चलने लगता है—जल्दापाड़ा से मानस की ओर, बक्सा की ओर और फिर भूटान की ओर।
लेखिका की भौगोलिक समझ अत्यंत पुख्ता है। नदियों के नाम, दिशाओं की सटीकता, पहाड़ों और जंगलों की संरचना—सब कुछ बिल्कुल सही स्थान पर और सही अनुपात में उपस्थित है। इसके साथ ही जंगली जानवरों, वन कर्मचारियों की कार्य-संस्कृति की समझ भी इतनी सूक्ष्म है कि यह स्पष्ट हो जाता है कि यह सब केवल कल्पना का परिणाम नहीं हो सकता। जिसे किसी ने बहुत नज़दीक से देखा, जिया और उस पर गंभीर चिंतन किया हो—वही इसे इस स्तर पर लिख सकता है।
पहली कहानी ‘विलक्षण माया’ को पढ़ते हुए यह बोध होता है कि जानवरों का जीवन केवल जीवित रहने की जद्दोजहद नहीं है। वे भावनाओं, संबंधों और सामूहिक निर्णयों से गुँथे सामाजिक प्राणी हैं। उनका जीवन मात्र सर्वाइवल इंस्टिंक्ट पर आधारित नहीं होता, बल्कि उनके लिए गए कई निर्णयों में भी इमोशनल कोशिएंट भी हावी होता है।
दूसरी कहानी ‘मायाविडु’ लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी, मसूरी की पृष्ठभूमि में घटित होती है। यही अकादमी थी जहाँ “शीलम् परम भूषणम्” ध्येय-वाक्य के साथ मेरी प्रशिक्षण अवधि रही। कहानी की केंद्रीय पात्र त्रिवेन्द्रम की रहने वाली आईएएस प्रशिक्षु माया है। इसमें कैडर को लेकर संतोष-असंतोष, अकादमी का होस्टल जीवन, शुरुआती दिनों में अपरिचित लोगों से धीरे-धीरे घुलने-मिलने की प्रक्रिया, और अकादमी की सख़्त अनुशासनात्मक व्यवस्था—इन सभी पहलुओं का विवरण है।
यह कथा एक ऐसा परिवेश रचती है जहाँ देश के अलग-अलग हिस्सों से आए मेधावी लोग अपनी-अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक पृष्ठभूमियों के साथ एक ही संस्थान में दिन-रात रहकर महीनों तक प्रशिक्षण लेते हैं। इस सामूहिक जीवन में क्या घटता है, उनके बीच संबंध कैसे बनते और बदलते हैं, किन तानों-बानों में उनकी कहानियाँ बुनी जाती हैं, और जीवन की अन्य परिस्थितियाँ किस तरह साथ-साथ चलती हैं—कहानी इन सभी बिंदुओं पर ठहरकर विचार करती है।
यहाँ एक ओर पेशेवर सफलता है, तो दूसरी ओर निजी जीवन की अधूरी चाहतें भी—यह इच्छा कि निजी जीवन भी किसी तरह सुलझ जाए, और प्रशासनिक प्रशिक्षण की कठोर दिनचर्या के बीच मनुष्य होने की ज़रूरतें भी अपनी जगह बना सकें।
भारत-दर्शन के बाद की ब्लॉक लीव में जब माया घर लौटती है, तो वह केरल के नायर समाज की मातृसत्तात्मक व्यवस्था से साक्षात्कार करती है और नायर समुदाय के मातृवंशीय इतिहास को समझने लगती है और वहीं से कथा अपने मूल थीम पर वापिस लौटती है।
भारत दर्शन वास्तव में एक प्रशिक्षु अधिकारी के लिए कई मायनों में जीवन बदल देने वाला अनुभव होता है। सामान्यतः जब प्रशिक्षु अधिकारी अकादमी पहुँचते हैं, तो भारत को लेकर उनकी समझ प्रायः पुस्तकों से अर्जित ज्ञान तक ही सीमित होती है। भिन्न–भिन्न पृष्ठभूमियों से आए अधिकांश प्रशिक्षुओं को इससे पहले न तो भारत की विविधता को प्रत्यक्ष रूप से देखने का अवसर मिलता है, न ही उसे गहराई से समझने का।
उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक, पूर्व में मणिपुर से लेकर पश्चिम में कच्छ तक—इतने व्यापक भूगोल का भ्रमण करने के लिए न तो पर्याप्त संसाधन ही सहज उपलब्ध होते हैं, न इतना समय, और न ही वह दृष्टि विकसित हो पाती है जिससे भारत को सूक्ष्मता के साथ समझा जा सके। भारत दर्शन इस अभाव को भरता है। यह केवल यात्रा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा को टटोलने का अवसर होता है—उसकी धड़कन को सुनने का, उस विश्वास को महसूस करने का जो इस देश को भीतर से जोड़े रखता है। यहीं से यह प्रश्न उभरता है कि वह क्या है जो हमें बाँधता है, और वह कौन-सी अदृश्य शक्ति है जो इतनी विविधताओं के बावजूद हमें एक राष्ट्र के रूप में एक साथ बनाए रखती है।
व्यक्तिगत अनुभव की बात करूँ, तो भारत दर्शन और ब्लॉक लीव मेरे जीवन में भी निर्णायक रहे। इसी दौर में जीवन में स्पष्टता आई, ठहराव आया, और मुझे मेरी जीवन संगिनी मिली। यही कारण है कि ‘मायाविडु’ भी हृदय को छू जाती है। मनीषा कुलश्रेष्ठ का लेखन इतना निराला और आत्मीय है कि पाठक उनके शब्दों और पात्रों की यात्रा में शामिल हो जाता है, उनके सुख-दुःख का भागीदार बन जाता है।
तीसरी कहानी एक खासी महिला की है, जो यह स्पष्ट करती है कि उसका नाम माया नहीं, माइया है—और यह नाम लातीनी अमेरिका से नहीं, बल्कि खाँटी खासी परंपरा से आया हुआ है। यह वहीं मेघालय में पोस्टेड एक बंगाली फ़ौजी ऑफिसर भट्टा की कहानी भी है। ट्रांसफर-पोस्टिंग वाली नौकरी में हर जगह जाना, हर जगह कुछ छोड़ आना, और हर जगह का कुछ हिस्सा हमेशा अपने साथ लिए रह जाना—यह कहानी इन सभी पहलुओं पर सोचने को मजबूर कर देती है।ऑल इंडिया सर्विसेज में समय बिताने के साथ-साथ स्थानीयता धीरे-धीरे कम होने लगती है। आप जहाँ भी जाते हैं, वहाँ के होने लगते हैं। वहाँ की बहती हवा में अपने पैरों को मिट्टी में जमाए रखना भी एक चुनौतीपूर्ण कार्य बन जाता है। पहाड़ी जीवन, उसकी कठिनाइयाँ और वहाँ की आदतें—सभी का अनुभव, कहानी में गहराई से उभरता है।इस कहानी को पूरा पढ़कर लगता है कि लेखिका ने बिल्कुल सही लिखा है कि जीवन विडम्बनाओं की स्वीकार्यता का ही नाम है।
अंत में एक लघुकथा भी है जो अपने आप में पठनीय है। इस पुस्तक का आवरण भी विशेष रूप से आकर्षित करता है। चित्र में एक महिला को हाथी पर सवार दिखाया गया है, जो शक्ति, नेतृत्व और अधिकार का प्रतीक लगती है। यह परंपरागत पुरुष प्रधान चित्रों के विपरीत स्त्री की शक्ति को केंद्र में रखता है। वहीं चित्र में एक दूसरी स्त्री भी है—जो आधुनिक वस्त्रों में हाथी के पास खड़ी है। यह ‘त्रिमाया’ के बहुआयामी अर्थों और स्त्रियों की विभिन्न पीढ़ियों या भूमिकाओं की ओर इशारा करता है।
आवरण में दिख रहा हाथी, ताड़ के पेड़ और घनी वनस्पतियां पुस्तक को केरल या पूर्वोत्तर भारत से जोड़ देता है, जहाँ मातृवंशीय परंपराएं प्रचलित रही हैं। चित्र की शैली आधुनिक होते हुए भी भारतीय लोक कला से प्रेरित लगती है। हाथी पर बने बारीक सफेद पैटर्न और आकृतियों की सरल रेखाएं इसे एक ‘एथनिक’ और ‘मिट्टी से जुड़ा’ एहसास देती हैं। इस तरह यह आवरण पूरी तरह से पुस्तक को स्वयं में समेटे हुए है।
अंततः कबीर के शब्दों में इतना भर ही कहा जा सकता है—“माया महा ठगनी हम जानी। तिरगुन फाँसि लिये कर डोलै, बोलै मधुरी बानी।” इसलिए “कहैं कबीर सुनो भाई साधो, यह सब अकथ कहानी।”
—अविनाश कुमार, लेखक (ग्रामकहानी)

