रमज़ान का महीना शुरू हो गया है। मुझे याद आता है रहमान अब्बास का उर्दू नॉवेल (ख़ुदा के साए में आँख मिचोली), जिसमें एक किरदार कहता है- “मैं भूखा हूँ रोज़ादार नहीं हूँ।” बता दूँ कि 2011 में छपे, रहमान के इसी नॉवेल पर महाराष्ट्र साहित्य अकादमी का बेस्ट नॉवेल का अवार्ड मिला था। यह नॉवेल मज़हबी समाज में एक लिबरल आदमी की ज़िन्दगी पर आधारित है। आइए पढ़ते हैं, नॉवेल का एक छोटा सा हिस्सा – त्रिपुरारि
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रमज़ान का महीना अब्दुल्स सलाम के लिए रहमतों भरा नहीं बल्कि अज़ीयतों भरा होता। रोज़ा नहीं रखता था लेकिन पूरा दिन रोज़ादारों की सी हालत बनाए रहता। दिल में अफ़सोस करता कि काश में उन्हें बता देता कि मैं भूखा हूँ रोज़ादार नहीं हूँ। घर पर रहता तो दिन-भर खाते पीते रहता और मग़रिब की अज़ान से ज़रा पहले दुस्तरख़वान पर बैठ जाता। वालिदा के साथ दुआ पढ़ कर रोज़ा खौलता और भाईयों के साथ बिल्डिंग से नीचे उतरता। उस के भाई मस्जिद की तरफ़ जाते, वह पान वाले की दुकान पर पहुंच जाता- “एक भोला ,कच्ची सुपारी, स्टार मार कर।”
दुकान वाला पूछता सर रोजे कैसे जा रहे हैं?
तो जवाब में कहता- “इस साल तो मालूम ही नहीं पड़ रहे हैं।”
पान मुँह में डाल कर दिल में कहता- किस साले को मालूम नहीं पड़ रहे हैं? फिर आसमान की तरफ़ देखते हुए सोचता, इस महीने अगर शैतान को तू क़ैद करता है तो फिर मुझे गुमराह कौन कर रहा है? शायद तू ही नहीं चाहता कि मैं रोज़े रखों। अगर तेरी यही मर्ज़ी है, तो मुझे रोज़े रखने की तौफ़ीक़ क्यूँ-कर नसीब हो? वैसे रख भी लेता तो कुछ नहीं बिगड़ता। स्कूल में इतने घंटे तो यूं भी भूखा रहता हूँ। कुछ देर बाद अपनी ही बात को काटते हुए कहता- क्या पागलपन है। भूखा रहने से तू ख़ुश हो जाता? तू इतना बेवक़ूफ़ नहीं हो सकता। अगर होता तो ना? हाँ मगर भूखा रहने से मेरा हाज़मा ठीक हो जाएगा। कई फ़ायदे हैं रोज़ा रखने में। नेक्स्ट टाइम रखूँगा। तेरी ख़ातिर नहीं बल्कि अपने हाज़मे की ख़ातिर। मगर वो दिन कभी ना आया। पचासवें सालगिरा के दूसरे रोज़ उसे लगातार पेचिस हुए, तब डाक्टर से कहा- सब जानता हूँ, इसके पीछे किस का हाथ है? काश साले रोज़े रख लेता। फिर आसमान की जानिब देखकर इल्तेजा करने वाले लहजे में कहा- इतने कमज़ोर आदमी से इतना शदीद इंतिक़ाम।

