भारत में जिसको कला फ़िल्म कहा जाता रहा है उसके विकास में राष्ट्रीय फ़िल्म विकास निगम का बहुत बड़ा योगदान रहा है। राष्ट्रीय फ़िल्म विकास निगम के पचास साल पूरे हो गये। इस अवसर पर उसके योगदान को याद कर रही हैं संस्कृतिकर्मी वाणी त्रिपाठी। यह उनका स्तंभ है ‘जनहित में जारी सब पर भारी’। आइये पढ़ते हैं- मॉडरेटर
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राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (NFDC), जिसकी स्थापना 1975 में हुई थी, ने भारत में स्वतंत्र सिनेमा की दिशा और पहचान गढ़ने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। एक सरकारी समर्थन प्राप्त निकाय के रूप में इसका प्रमुख उद्देश्य ऐसे उच्च गुणवत्ता वाले और सारगर्भित सिनेमा को प्रोत्साहित करना रहा है जो व्यावसायिक मुख्यधारा से बाहर के विषयों और स्वरूपों को प्रस्तुत करता है।
NFDC ने उन फिल्मों का समर्थन किया है जो भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक वास्तविकताओं को दर्शाती हैं — वे आवाजें जिन्हें अक्सर मुख्यधारा के व्यावसायिक सिनेमा में नजरअंदाज कर दिया जाता है।
पिछले कई दशकों में, NFDC ने ऐसी कई फिल्मों का निर्माण और सह-निर्माण किया है जिन्हें न केवल देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आलोचनात्मक सराहना मिली है। क्लासिक फिल्मों जैसे गांधी (1982), जाने भी दो
यारो (1983), मिर्च मसाला (1987), और सलीम लंगड़े पे मत रो (1989) से लेकर समकालीन रत्नों जैसे द लंचबॉक्स (2013) और कोर्ट (2014) तक, निगम ने ऐसे फिल्मकारों का समर्थन किया है जिनकी कलात्मक दृष्टि सशक्त और विशिष्ट रही है।
NFDC ने उन्हें फंडिंग, मार्गदर्शन, वितरण और अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म्स पर प्रस्तुति के अवसर देकर नए फिल्मकारों को सशक्त किया है।
NFDC की एक प्रमुख पहल फिल्म बाजार — जो दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा फिल्म बाज़ार है — ने भारतीय स्वतंत्र सिनेमा को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस मंच के माध्यम से भारतीय फिल्मकारों को अंतरराष्ट्रीय प्रोड्यूसर्स, सेल्स एजेंट्स और फेस्टिवल प्रोग्रामर्स से जोड़ने का अवसर मिला है।
यह पहल न केवल वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देती है, बल्कि कहानी कहने के नए तरीकों और नवाचारों को भी प्रेरित करती है।
एक ऐसे फिल्म उद्योग में जहाँ प्रायः सितारों की लोकप्रियता ही सफलता का पैमाना मानी जाती है, NFDC ने यह सुनिश्चित किया है कि विचारधारा पर आधारित, निर्देशक-केंद्रित सिनेमा न केवल जीवित रहे, बल्कि फले-फूले।
NFDC की विरासत एक ऐसे नए फिल्मकार वर्ग के उभार में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है, जो ताजगी भरे दृष्टिकोण, क्षेत्रीय विविधता और फिल्मी प्रयोगों के माध्यम से भारतीय सिनेमा को वैश्विक मंच पर पुनर्परिभाषित कर रहा है।
भारतीय राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (NFDC) और स्वतंत्र सिनेमा (इंडिपेंडेंट सिनेमा) की यात्रा भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक विशेष स्थान रखती है। 1975 में स्थापित एनएफडीसी ने ऐसे सिनेमा को समर्थन दिया है जो न केवल सामाजिक और राजनीतिक वास्तविकताओं को उजागर करता है, बल्कि भारतीय कहानियों को एक वैकल्पिक स्वरूप में वैश्विक मंच तक पहुँचाता है।
🎬 समानांतर सिनेमा के अग्रदूत
NFDC ने उन फिल्मकारों को सहयोग दिया जिनकी दृष्टि मुख्यधारा से भिन्न थी:
मृणाल सेन – भुवन शोम
मणि कौल – उसकी रोटी, नज़र
कुमार शहानी – माया दर्पण, तरंग, ख़याल गाथा
सत्यजित राय – घरे बैरे
श्याम बेनेगल – द मेकिंग ऑफ़ द महात्मा
केतन मेहता – मिर्च मसाला
कुंदन शाह – जाने भी दो यारो
मीरा नायर – सलाम बॉम्बे!
🎥 1990 के दशक में एनएफडीसी का योगदान
सुधीर मिश्रा – धारावी
लक्ष्मीकांत शेठगांवकर – पलटादाचो मुनिस
🌟 2000 और उसके बाद की पीढ़ी
NFDC और इसके प्रमुख मंच फिल्म बाजार के सहयोग से नई प्रतिभाओं को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली:
रितेश बत्रा – द लंचबॉक्स
चैतन्य तम्हाणे – कोर्ट
कनु बहल – तितली
गुरविंदर सिंह – अन्हे घोड़े दा दान, चौथी कूट
राम रेड्डी – थीथि
नीना लाठ गुप्ता (निर्माता) – मांझी, आइलैंड सिटी, चौरंगा, किस्सा, लंचबॉक्स
मोस्तफा सरवर फारूकी – नो मैन्स लैंड
हर्षद नलावड़े – फॉलोअर
जितेन्द्र मिश्रा – बाघुनी (डांस लाइक अ टाइगर)
🎞️ फिल्म बाजार की भूमिका
फिल्म बाजार, दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा फिल्म मार्केट, NFDC की एक अनूठी पहल है जिसने भारत और दक्षिण एशिया के स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं को वैश्विक मंच पर स्थापित किया। इस मंच ने निम्नलिखित फिल्मों को भी बढ़ावा दिया:
शिप ऑफ थीसियस
मिस लवली
लिपस्टिक अंडर माई बुरखा
न्यूटन
मार्गरीटा विद ए स्ट्रॉ
किस्सा
लायर्स डाइस
दम लगाके हइशा
🌍 क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग
NFDC और फिल्म बाजार ने नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, अफगानिस्तान जैसे देशों के फिल्मकारों को भी अवसर दिए, जिससे दक्षिण एशियाई सहयोग को नई दिशा मिली।
NFDC ने यह सिद्ध किया है कि जब सरकार रचनात्मकता और नवाचार को संस्थागत समर्थन देती है, तो विश्वस्तरीय सिनेमा संभव है। स्वतंत्र सिनेमा को जीवंत रखने और नए विचारों को प्रोत्साहित करने में एनएफडीसी और फिल्म बाजार की भूमिका अतुलनीय है। आज का भारत सिनेमा के
वैश्विक नक्शे पर एक नई पहचान बना रहा है — और इसका बहुत बड़ा श्रेय NFDC को जाता है।
स्वतंत्र सिनेमा का भविष्य
1. रचनात्मक स्वतंत्रता और विविध आवाज़ें: स्वतंत्र सिनेमा ऐसे अनूठे, प्रयोगात्मक और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण विषयों की कहानियों के लिए एक आवश्यक मंच बना रहेगा, जिन्हें मुख्यधारा की फिल्मों में अक्सर जगह नहीं मिलती। फिल्म निर्माता नए तरीकों से कहानियाँ प्रस्तुत करते रहेंगे और हाशिए पर रह रही या कम सुनाई गई समुदायों की आवाज़ उठाएंगे।
2. डिजिटल प्लेटफॉर्म और ओटीटी का उछाल: नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम और अन्य क्षेत्रीय ओटीटी सेवाओं के बढ़ते प्रभाव के कारण, स्वतंत्र फिल्में अब ज्यादा दर्शकों तक पहुँच रही हैं। इससे वितरण की प्रक्रिया आसान हुई है और फिल्में दुनियाभर के दर्शकों तक पहुंचती हैं, बिना पारंपरिक सिनेमा घरों पर निर्भर हुए।
3. कम लागत और तकनीक: किफायती डिजिटल कैमरे और संपादन सॉफ्टवेयर जैसी तकनीकों के कारण स्वतंत्र फिल्मों का निर्माण अब कम बजट में संभव हो पाया है। इससे नए प्रतिभाशाली फिल्मकारों के लिए रास्ते खुले हैं।
4. अंतरराष्ट्रीय सहयोग और त्योहार: स्वतंत्र फिल्में कांस, बर्लिन, संडांस जैसे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पहचान पा रही हैं, जिससे उनकी वैश्विक पहुंच बढ़ रही है। देशों के बीच सहयोग से कहानियाँ और भी समृद्ध होंगी।
5. दर्शकों में बदलाव: युवा दर्शक अधिक वास्तविक और सार्थक कहानियों को पसंद कर रहे हैं, जो पारंपरिक फिल्मों से अलग हैं, जिससे स्वतंत्र सिनेमा की मांग बढ़ रही है।
6. चुनौतियाँ: वित्त पोषण, वितरण और मार्केटिंग में कुछ चुनौतियाँ बनी रहेंगी, लेकिन सरकारी नीतियाँ और संस्थान इन बाधाओं को कम करने में मदद कर रहे हैं।
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एनएफडीसी (राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम) की भूमिका और भविष्य
1. स्वतंत्र फिल्मकारों का निरंतर समर्थन: एनएफडीसी उन फिल्मों के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करता रहेगा जिन्हें व्यावसायिक निवेश नहीं मिल पाता। यह स्क्रिप्ट विकास, निर्माण, पोस्ट-प्रोडक्शन और मार्केटिंग में मदद करता है।
2. भारतीय सिनेमा का वैश्विक प्रचार: एनएफडीसी स्वतंत्र भारतीय फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुत करता है, जिससे को-प्रोडक्शन और वैश्विक पहचान मिलती है।
3. क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण: एनएफडीसी नए फिल्मकारों के लिए कार्यशालाएँ और मेंटरिंग कार्यक्रम चलाता है, जो प्रतिभा को निखारने में मददगार हैं।
4. डिजिटल अनुकूलन: बदलते वितरण माध्यमों के अनुसार, एनएफडीसी ओटीटी और डिजिटल प्रचार के क्षेत्र में अपनी भागीदारी बढ़ाएगा।
5. नीति समर्थन: स्वतंत्र सिनेमा के लिए सरकारी नीतियों जैसे वित्तीय योजनाओं, टैक्स छूट और वितरण प्रोत्साहनों के लिए एनएफडीसी सक्रिय भूमिका निभाएगा।
6. विस्तार: फिल्मों के अलावा, एनएफडीसी वेब सीरीज, डॉक्यूमेंट्री और अन्य डिजिटल कहानियों को भी समर्थन देगा, जो आधुनिक मीडिया खपत की प्रवृत्तियों को दर्शाता है।
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निष्कर्ष
स्वतंत्र सिनेमा एक रचनात्मक, विविध और प्रभावशाली क्षेत्र के रूप में फल-फूल रहा है, जो भारतीय और वैश्विक सिनेमा संस्कृति को समृद्ध कर रहा है। एनएफडीसी एक महत्वपूर्ण संस्थान के रूप में इस दिशा में योगदान देता रहेगा और तकनीकी व बाज़ार के बदलावों के अनुरूप अपने कार्यों को विकसित करेगा। दूरदर्शी फिल्मकारों और सहयोगी संस्थानों के मेल से स्वतंत्र सिनेमा एक स्थायी और जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र बन जाएगा।

