सारंग उपाध्याय समकालीन कहानी में समादृत नाम हैं। अपनी भाषा शैली, परिवेश के कारण उनकी कहानियाँ अलग से ही पहचान में आ जाती हैं। द्वितीय जानकी पुल शशिभूषण द्विवेदी स्मृति सम्मान की शॉर्ट लिस्ट में उनका कहानी संग्रह ‘सलाम बॉम्बे: व्हाया वर्सोवा डोंगरी’ भी शामिल है। आइये पढ़ते हैं सारंग उपाध्याय की एक बहुपथित कहानी- मॉडरेटर
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पिता का सीधा सामना करना मेरे लिए हमेशा से चुनौती भरा होता था. वे जब भी मेरे सामने पड़ते मैं एक अजीब से मानसिक दबाव में होता और मेरी हालत ऐसी होती मानों मैं किसी मुठभेड़ फंस गया हूं. घर से कहीं बाहर जाते हुए या फिर बाहर से घर लौटते हुए पिता के घर पर होने की स्थिति मेरे भीतर एक डर, असहजता और आशंका भर देती थी. सबसे ज्यादा हालत तब खराब होती थी जब मैं घर में पढ़ाई कर रहा होता था और मुझे डर लगा रहता था कि कहीं पिता आ गए और उन्होंने मेरी पढ़ाई-लिखाई को लेकर कुछ पूछताछ कर ली तो क्या होगा? पढ़ते हुए मैं जैसे ही उन्हें आसपास महसूस करता तब अपनी गर्दन झुकाकर आंखें बंद कर लिया करता और तब तक सिर ऊपर नहीं उठाता जब तक वे हट ना जाएं. ऐसे ही घर में ही छोटी-मोटी चीजों से खेलते वक्त या यूं ही टाइम पास करते हुए मेरा आधा ध्यान सदा मेरे पिता पर लगा रहता था कि वे कहीं आ ना जाएं और आकर अपनी खामोशी मुझ पर उंडेल ना जाएं.
दरअसल, बहुत कम बोलने वाले पिता बिना कुछ कहे ही वह सबकुछ कह जाते थे जिनके अर्थ मेरे मन में दिनों बाद खुलते थे. उनकी आंखों की भाषा मुझे खुद एक गहरा देने वाली चुप्पी में डुबाने के लिए काफी थी. ऐसी चुप्पी जिससे घंटे दो घंटे मेरा बाहर आना बेहद मुश्किल भरा होता था.
मुझे याद है एक बार मेरे पिता का सामना अजीब तरह से हुआ था. वे जाड़े के शुरुआती दिन थे. हल्की सर्दियों की दस्तक थी और धूप ढलते ही शाम में ठंडक को महसूस किया जा सकता था. उस रोज पिता के दफ्तर से लौटने में भी देरी थी लेकिन बावजूद इसके वे अचानक आंगन तक पहुंचने वाली पीछे की गली से आ धमके. आंगन का दरवाजा खुला था और वे रोजाना की तरह अपनी उसी रहस्यमयी खामोशी लिए अंदर दाखिल हुए थे. अंदर आते ही उन्होंने साइकिल दीवार से सटाकर खड़ी की और ताला लगाकर उसकी चाभी दीवार की छोटी सी कील में टांगते हुए बिना कुछ बोले मुझ पर निगाह डालते, पास लगे नल तक पहुंचे थे और हाथ-पैर और मुंह धोकर घर के अंदर चले गए.
खैर, अब आप सोच रहे होंगे कि पिता का आंगन में प्रवेश सामान्य ही तो था भला इसमें मुझे क्या दिक्कत होनी चाहिए लेकिन मेरे पिता का असल खेल वहीं से शुरू होता था कि वे बस अचानक आते थे और अपनी खामोशी मुझ पर उंडेलते हुए गुजर जाते थे फिर अपने पीछे जो कुछ भी छोड़ जाते थे वह दूसरों के लिए भले ही कैसा हो लेकिन मेरे लिए इतना रहस्यमय होता था कि वहां से मैं खुद भी अंदर एक यात्रा पर निकल जाता और जब वहां से लौटता तो मेरा जीवन पूरी तरह बदल जाता था.
और उस दिन भी यही हुआ-
उस रोज जब पिता अचानक से ऐसे लौटे तो मैं घर के उस आंगन में, जहां एक बड़ा सा अमरूद का पेड़ था उस पर चढ़ा हुआ था और स्कूली खाकी चड्ढी में पके हुए अमरूद ढूंढ रहा था. उस समय हल्की ठंड में लिपटी सांझ ढल रही थी और अस्तांचल के सूरज की लालिमा में लिपटा आसमान लौटते पंछियों के शोर में डूबा था. ऐसे में पिता की एंट्री मुझे साइलेंट करने के लिए काफी थी और मैं सच में साइलेंट हो गया था. मेरा दिल भारी था जबकि मैं जानता था कि पिता अपना काम कर गए थे.
पिता के जाने के बाद मैं अमरूद के पेड़ के पत्तों से झांकते डूब रहे सूरज की झरती रौशनी में देर तक आसमान देखता रहा जहां इक्का-दुक्का तारे रात की बाट जोहते खिलने के लिए छटपटा रहे थे. उजाले का झुटपुटा सांझ में लिपटा बिखरे बादलों में छितराकर यहां-वहां फैल रहा था. इस तरह आकाश में थोड़ी देर लगी टकटकी के बीच मैं मुट्ठी में पकड़े उस कच्चे अमरूद की ओर लौट आया जिसे कुछ देर पहले मैं फेंकना चाहता था लेकिन रुक गया था क्योंकि अब उस कच्चे और आधे खाए गए अमरूद में मुझे पिता की आंखें और चेहरा नजर आ रहा था. मुट्ठी के अमरूद को देखने के बाद अब मेरी नजर नीचे आंगन पर थी जहां कुछ देर पहले मैंने कई कच्चे अमरूद तोड़कर, खाकर और मुंह को कसैला कर-करके नीचे फेंके थे और कुछ देर पहले साफ-सुथरे आंगन को अमरूदमय कर दिया था. यह नजारा देखकर मुझे पिता ज्यादा जोर के याद आए थे और मैंने हाथ के अमरूद को फेंकना स्थगित किया और पेड़ पर चढ़ा-चढ़ा ही उसे दोबारा खाने लगा.
इस अमरूद का स्वाद कसैला नहीं था क्योंकि पिता उसे खिला रहे थे.
तो उस रोज पिता से ऐसा सामना मुझे स्तब्ध करने से ज्यादा मुझे बदलने वाला था. मैं चढ़ती सांझ में पेड़ से नीचे उतर आया और पास पड़ी झाड़ू से तब तक आंगन साफ करता रहा जब तक कि एक-एक पत्ता वहां से साफ ना हो गया. मैंने सारे अमरूद और पत्ते इकट्ठे किए और पास के ही कोने में समेट दिया. उस समय आंगन में रसोई घर की खिड़की से आ रही रौशनी के धब्बे यहां-वहां फैल रहे थे और मैं झाड़ू को उन पर घुमा रहा था. पंछियों का कलरव बीत चुका था और झिंगुरों की आवाजों की कतरन एक लय में गूंजने लगी थी लेकिन मैं फिर एक बड़ी सी चुप्पी में डूब गया था. खामोश और अपने में रीतता. झाड़ू को कोने में रख देने के बाद मेरी निगाहें पिता की काले रंग की साइकिल पर जमी हुई थीं. ऊंची, नीले रंग की सीट, हेंडल पर आगे की ओर लगी बास्केट और बड़ी सी घंटी जो अक्सर शाम को पिता के घर आने का संकेत होती थी, पर उस रोज जानें क्यों पिता ने इसका इस्तेमाल नहीं किया था.
बाहरहाल, मेरे पिता दूसरों के लिए भले ही एक सामान्य व्यक्ति रहे हों लेकिन मेरे लिए बचपन से ही एक रहस्यमयी किस्म के जीव थे. वे हमारे घर में दक्ष प्रजापति की तरह सारे नियमों के नियंता और उनका क्रियान्वयन करने वाले केंद्र थे. घर में उठना-बैठना, खाना-पीना, पहनना-ओढ़ना और रोजमर्रा के सारे काम पिता की ओर से निर्धारित नियमों के अंतर्गत ही होते थे. पिता घर की धुरी थे. गृहकार्यों को दैनिक प्रबंधन में बांधने वाले. एक तरह से किसी के जीवन में बेहद सामान्य सी नजर आने वाली बातें और दिनचर्या हमारे घर में आचरण की तरह उतरी थीं. पिता चीजों के बरतने और उन्हें इस्तेमाल करने को लेकर बहुत जोर देते थे. जरूरत के हिसाब से करना, समय पर करना, ठीक से बरतना जैसे शब्द और वाक्य हमारे घर में गाइडलाइंस की तरह गूंजते थे. मैंने जब से होश संभाला था तब से पिता की खामोशी किसी मंत्र की तरह हमारे घरभर में गूंजती रहतीं या फिर गाहे-बगाहे टकराती रहती. मुझे तो बहुत बाद में पता चला था कि पिता की लंबी खामोशी और उसमें अचानक यदा-कदा गूंजने वाले कुछ इक्का-दुक्का शब्द केवल शब्द या संवाद भर नहीं थे बल्कि बाकायदा एक प्रैक्टिस थे और हम सभी का यानी मेरी मां कल्याणी, मेरा माने मनु यानी मानव का, कनु दीदी का और भैया तनु मतलब तन्मय का जीवन इसमें ढल गया था. दरअसल, हम तीनों ही भाई-बहन की सुबह उठने से लेकर स्कूल जाने और वहां से लौटने तक और शाम को खेलकर थके-मांदे आकर सोने तक जैसी क्रियाएं बेहद संतुलित और एक निर्धारित क्रम में सधी हुई थी.
दरअसल, मेरे पिता का व्यवहार इतना अजीब था कि उनके आचरण ने पूरे मोहल्ले में हमारे घर को रहस्य और आश्चर्य से कम न बना छोड़ा था. पिता सामान्य कद के सादगी पसंद एक ग्रामीण व्यक्ति थे जो एक कस्बाई जीवन में छोटे से सरकारी मुलाजिम के तौर पर अपने परिवार के साथ गुजर-बसर कर रहे थे. सरल सा दिखने वाला उनका जीवन जितना आसान दिखाई देता था उससे कहीं अधिक किसी के लिए वह पेचिदा, जटिल और आश्चर्य से भर देने वाला हो सकता था. वे हमारे घर के प्रधानमंत्री थे. घर की कंपनी के अंबानी. एक छोटे जंबू द्वीप के राजा जहां खाने-पीने, रहने, बोलने-चालने और जीने के उनके अपने नियम थे.
उस जीवन के नियम जिसे जीने का मेरे हिसाब से केवल एक ही नियम हो सकता थ कि उसका कोई नियम नहीं हो.
पिता का जीवन प्राथमिक, अनिवार्य और वैकल्पिक होने के बीच की एक आवाजाही था. एक ऐसा क्रम जिसमें उनके लिए किसी चीज का विकल्प हमेशा से प्राथमिकता के विरुद्ध होता था और जितनी भी अनिवार्यताएं थीं वे प्राथमिकता के बाहर होती थीं. खास यह था कि जो उनके लिए चयन में प्राथमिक होता था वह किसी भी परिस्थिति में कभी वैकल्पिक नहीं रहा करता था और जो वैकल्पिक होता था वे उसे सदा से ही प्राथमिकता और अनिवार्यता से बाहर कर दिया करते थे. अब आवश्यकता क्या हो और रुचि क्या हो वह अपनी प्राथमिकता, अनिवार्यता व विकल्प के मुताबिक चयन कर ले.
खैर, पिता की छाया में जीवन की इस नियमावली में पलते-बढ़ते और एक उम्र तक आते-आते मैं ही नहीं बल्कि परिवार का हर सदस्य यह समझने लगा था कि किसी भी व्यक्ति के लिए जीवन जीने का यही एक सूत्र है कि वह आवश्यकता को प्राथमिक माने और जो प्राथमिक हो उसे अनिवार्य मानकर जीवन राजी खुशी गुजर कर ले. जहां तक रुचि का मामला हो उसे वह वैकल्पिक मान ले. हालांकि मैं समझ सकता हूं कि पिता की ये बातें आपको थोड़ी घुमावदार लगेंगी लेकिन कुल मिलाकर पिता की छाया में रहते हुए मोटी बात जो मेरे पल्ले पड़ती थी वह केवल इतनी ही थी कि व्यक्ति को स्वाद से ज्यादा भोजन को महत्व देना चाहिए, भोजन की जगह ऊर्जा को, और भोजन ऊर्जा से ज्यादा पानी को क्योंकि वैकल्पिक तौर पर पानी से भूख भुलाई जा सकती है, अब चूंकि पिता भूख मिटाने से ज्यादा भूख को भुलाने वाले जीवन से आते थे.
अब एक बार का किस्सा सुनिए-
जेठ की तपती दोपहरी के दिन थे. सूरज सुबह से ही गर्म हो उठता था. धूप ऐसी पड़ रही थी मानों कोई बदन पर आग बरसा रहा हो. 11 बजे तक तापमान 35 पार हो जाता और 3 बजे तक को लू के ऐसे थपेड़े चलते लगता कोई गर्म हवा फेंकने वाला बड़ा सा कूलर किसी ने चलता छोड़ दिया हो. गर्मी के इन दिनों में मोहल्ले में पानी की किल्लत आम थी. नल एक वक्त आते थे और वह भी कभी-कभार तो एक दिन छोड़कर. हमारे घर में पानी केवल नल से ही आता था और झुलसा देने वाली गर्मी के इन दिनों में दूर एक पाइप लाइन अलग फूट गई थी सो हम सब पास के ही एक बरगद वाले कुंए से पानी की बाल्टियां लेकर पीछे आंगन की टंकी में खाली कर रहे थे. मां मोहल्ले की दूसरी महिलाओं के साथ कुएं से पानी खींच रही थी और हम तीनों भाई-बहन बाल्टियां भरकर आंगन में खड़क पिता को थमा रहे थे और वे टंकी में खाली कर रहे थे. भर गर्मी में पानी भरने के तकरीबन एक घंटे के इस उपक्रम का अंत होने को ही था कि उस रोज पिता ने धूप में झुलसे, थके-मांदे हम तीनों ही भाई-बहनों से कुछ सवाल पूछना शुरू किया-
अच्छा बताओ दुनिया में सबसे कीमती चीज क्या है? ये सवाल तनु भैया को देखते पूछा गया था जबकि मैं और मनु दीदी केवल पिता को देख रहे थे. दरअसल, कनु भैया हम तीनों ही भाई-बहनों में सबसे बड़े थे और वे पिता को हम सबसे ज्यादा और बेहतर समझते थे. इससे पहले कि पिता के इन सवालों में हम कुछ उलझ-सुलझ पाते तनु भैया तपाक से बोले- पानी
पानी नहीं- हवा.
पिता का चेहरा शांत और गंभीर बना रहा. मानों वे जानते हों कि कनु भैया क्या कहने जा रहे थे.
फिर वे धीमे से बोले- दुनिया में पानी से भी ज्यादा हवा की कीमत होती है. जैसे हवा के नहीं होने पर होगा. देखना एक दिन दुनिया में पानी की तरह हवा की भी कीमत भी चुकानी पड़ेगी.
अबकि पिता फिर एक सवाल के साथ लौटे- अच्छा बताओ पसंद जरूरी है या जरूरत
मैं उत्साह से बोल पड़ा- पसंद की चीजें मिलती है तो खुशी मिलती है. उस रोज मैं जो पिता की खामोशी से अक्सर आतंकित रहता था उन्हें बड़े ध्यान से सुन रहा था. उनका यह सवाल सुनते ही उत्साह में मैं जवाब दे गया था. लेकिन मेरे जवाब देते ही पिता गंभीर हो गए और मैं फिर चुप्पी मार गया. पिता ने मुझे लगभग अनुसना कर दिया था और उनकी खामोशी मुझे वह सबकुछ समझा गई जो शायद कनु दीदी और तनु भैया पहले ही समझते आ रहे थे.
कुल जमा पिता जीवन के छोटे से छोटे कामों के बीच हमें आवश्यकता और रुचि जैसे शब्दों का भी कायदे से अंतर समझा देते थे और इस बात पर जोर देते थे कि हम यानी जब जो प्राथमिक हो अनिवार्य हो या फिर वैकल्पिक हो उसमें सावधान रहें और मन-इंद्रियों से उनकी जरूरी बातें आचरण में ढाल लें.
बहरहाल, चीजों की बातें तो छोड़ ही दीजिए, एक घर और परिवार के बसर करने में जो कुछ शामिल होता है, उस छोटे-मोटे कार्यक्रम व आयोजन का अतीत मेरे पिता दीन दयाल शर्मा के पिता गिरधारी लाल देवकीनंदन शर्मा की आदतों से भी जुड़ता था, लेकिन असल बात यह थी कि मेरे पिता मेरे दादा और उनके अपने दादा से भी एक कदम आगे थे. इस आगे होने की व्याख्या यही थी कि घर,परिवार, बच्चे, रिश्तेदारी, हारी-बीमारी, चूल्हा-चौका, बरतन-भांडे, सब्जी-भाजी, तरकारी, गादी-बिस्तर, अनाज-धान, कपड़े-लत्ते, शादी-ब्याह, लेना-देना, शोक संताप-गमी क्रियाकर्म, तेहरवीं, बार-त्योहार सहित हर तरह की चीज में पिता की भूमिका थी जिसमें उनका सधा, संतुलित और नियम-कायदे का गणित चलता रहता था. मां उनके बगैर सांस ना लेती थी और बाकी बचे हमारे रिश्तेदार जिनमें वे हमारे देवास वाले चाचा और रतलाम वाली बुआ के घर की तो अप्रत्यक्ष धुरी पिता ही थे. उन सभी लोगों के जीवन में पिता का महत्व सरकारी सील और ठप्पे की तरह ही था. हर क्रिया-कार्यक्रम, फैसलों में अंतिम मुहर की पिताजी की सलाह ही होती थी.
लेकिन इन तमाम चीजों के बीच मेरे पिता को लेकर जो एक बात मुझे सबसे ज्यादा आश्चर्य में डालती थी वह था पिताजी का बोलने-बतियाने का ढंग.
दरअसल, मेरे घर में दुनिया जहां के सारे नियम धतकरम और उनका पालन यदि किसी चीजे के सहारे और बिना बाधा के किसी सॉफ्टवेयर की तरह ऑटो सिस्टम में चलायमान होता था तो उसकी वजह थी मेरे पिता का बोलना. पिता बेहद कम बोलते थे और घर में उनके बोलने और बात बरतने का गणित इतना सधा हुआ था कि आप सोचकर आश्चर्य करेंगे कि क्या शब्दों को बरतने, इस्तेमाल करने और बात करने के ढंग का भला ऐसा भी लेखा-जोखा हो सकता है. पिता बोलने के दौरान इस्तेमाल किए गए शब्दों का भी तरीके से हिसाब-किताब रखते थे. बोलने बात करने के मामले में वे इतनी बंधे थे कि वे उतना ही बोलते थे जितना उन्हें जरूरी लगता था. एक-एक शब्द नपा-तुला और कायदे का, जिसका कि कोई अर्थ सुनने वाले के कानों में ठीक तरह से पहुंचे. घर के मुखिया की ओर से नीचे की ओर आ रही यह प्रैक्टिस इतनी प्रभावी थी कि पिताजी को कई दफे किसी बातचीत दौरान मैं इतने सधे, सटीक और सलीके के शब्दों को बरतते हुए देखता तो मुझे लगता भला ऐसे भी कहीं होता है, क्या इस तरह से जीवन जिया जा सकता है? मैं अक्सर उन्हें कम लेकिन संतुलित बोलते हुए यह महसूस करता कि क्या वाकई बोले गए शब्दों का इतना महत्व और प्रभाव होता है कि उसका इस्तेमाल संकल्प से फलीभूत होने लगे?
पिता को बात करते देख मैं यह महसूस करने लगा था कि जैसे वे हर शब्द को जी चुके होते थे और उनके मुंह से हर शब्द ऐसे झरता जैसे वह अपने पूरे अर्थों के साथ उनके भीतर जज्ब हो. आत्मा में धंसा हुआ, जीवन अनुभव की भट्टी में पका हुआ. धीमे-धीमे मैं यह समझने लगा था कि मेरे पिता के पास शब्दों का घनघोर अनुशासन था और यह शब्द उनके जीवन में प्रणाली की तरह आए थे. कई दफे तो ऐसे कि मुझे लगता कि वे शब्दों को उसके पूरे संदर्भ, प्रसंग ही नहीं बल्कि वातावरण व परिवेश के साथ समझते थे, ऐसे कि तादात्मय बस हो चुका हो, शब्द रहा ही ना हो बल्कि केवल क्रिया ही क्रिया हो. मुझे लगता है यही वजह थी कि हमारे घर से लेकर रिश्तेदारों तक में उनकी चलाई जा रही नियम, अनुशासन और कायदों की प्रणाली साकार हो जाती थी और कई दफे उनके बोलने ही नहीं बल्कि सामने आ जाने मात्र से चीजें स्वयं घटने लगती थीं.
आपकी समझ के लिए बताऊं तो पिताजी के लिए भोजन केवल शब्द नहीं था बल्कि एक पूरी प्रक्रिया थी, जिसमें भोजन करते हुए, उसका स्वाद लेते हुए, उसे चबाते हुए, उसे पचाने तक वे ऐसे हो जाते मानों स्वयं ही भोजन बन चुके हों, ऐसे ही जब वे मां से पानी मांगते तो पानी पीने की प्रक्रिया हम सभी के सामने होती तो उन्हें पानी पीते हुए देखकर ऐसा लगता वे स्वयं ही पानी बन गए हों.
अब जैसा कि मैंने शुरू में कहा था कि पिता को कई बार मौन देखकर शुरुआत में मैं आश्चर्य से भरा रहता और उनकी खामोशी मेरे लिए एक डर बनने लगी थी. सच कहूं तो मेरे और उनके बीच में उनकी वही खामोशी थी जिसके चलते मैं उनके करीब बहुत कम जाता था. वे दूर से आते दिखते तो मैं उनकी आंखों से ओझल हो जाता या फिर कि पढ़ाई करने बैठ जाता. यही हाल शुरुआत में मेरे बड़े भाई-बहनों का रहा. हालांकि बाद में जब मैं धीरे-धीरे बड़ा होने लगा तो जैसे हम सभी को यानी मुझे, भैया, दीदी और मां को उनके इस स्वभाव की आदत सी हो गई थी, लेकिन इधर घर की दहलीज के बाहर की दुनिया में झांकते हुए उन्हें इस तरह देखते ही मुझे कोफ्त होने लगती थी कि कोई व्यक्ति इतना तोल-मोल के कैसे बोल सकता है? कम बोलने से ऐसा क्या खर्च हो जाता है कि जिसे हासिल ना किया जा सके? अक्सर हम उनकी इस आदत पर हंसते थे और मां के सामने इशारों-इशारों में उन्हें चिढ़ाकर निकल जाते थे. मुझे याद है कि जिस वाक्य का इस्तेमाल मैंने अभी किया है- यानी तोल-मोल के बोल इसी नाम से एक प्रोग्राम उन दिनों हमारे घर की ब्लैक एंड व्हाइट टीवी पर आने वाले चैनल जी टीवी पर प्रसारित होता था और उसे देखते हुए हम पिताजी को उनकी पीठ के पीछे जीभ चिढ़ाते हुए कह उठते थे-
तोल-मोल-के बोल, जिसे देखकर हमारी मां मुस्कुराती रहती थी.
दरअसल, हम भाई-बहन जितनी बातें मां से करते थे उतने पिताजी से कभी नहीं कर पाए, खासतौपर मैं. तो जैसा मैंने कहा चीजों को छोड़ दीजिए, पिताजी से बात करते हुए हम शब्दों को बहुत सही तरीके से बरतना सीख गए थे जबकि इसके उलट हम झूठ पकड़ना, मिथ्या भाषण पहचानना, गोल-मोल बातों को समझ लेना, गुमराह करते वाक्यों को पकड़ लेना, शब्दों की जालसाजी, वादा खिलाफी, झूठे वचन, कौन कितनी चालाकी से बातों को घुमा रहा है, कौन सच बोल रहा है और कौन जुमला फेंक रहा है यह सब हमें किसी को बोलते देख ही समझ आने लगा था.
मेरे पिताजी केवल 11वी पास थे और शहर के बिजली विभाग में लाइन मैन का काम करते थे, लेकिन उनका मौन उन्हें किसी भारी-भरकम चिंतक से कम नहीं बनाता था. वे एक चलते-फिरते क्लास रूम से बन गए थे जहां कोई भी उनके संपर्क में आया सो ना केवल सध जाता था बल्कि अपने बोलने के क्रम में सोचने-समझने लगता था जबकि आचरण के तौर पर संतुलित हो जाता था. उनका व्यक्तित्व विद्युत की तरह ही हो गया था कि जो भी संपर्क में आता उसका मन, आत्मा कौंध जाते और भीतर एक उजास फैल जाती. सहकर्मी उनकी सोहबत में शांति पाते, उनसे सलाह लेते जबकि अधिकारी भी बाते करते या आदेश देते हुए उनका लिहाज पालते, सकुचाते और भीतर से सम्मान देते नजर आते. यह पिता के कम बोलने, बतियाने, लाग-लपेट ना करने, सधा हुआ कहने और हमेशा सच कहने का ही नतीजा था कि उनकी बरसों से ओढ़ी गई उस चुप्पी के बहुत बाद और जिस रूप में वे मेरे भीतर आकार ले रहे थे मुझे उन्हें देखते हुए यही समझ आ रहा था कि वे शायद शब्द को ब्रह्म मानने वालों की परंपरा के वाहक थे. शायद नाद ब्रह्म के. एक तरह से ध्वनियों के उपासक. उनकी इस छवि को लेकर मेरा विश्वास तब और भी दृढ़ हुआ था जब वे रात को अक्सर रेडियो पर गाने सुनते या फिर सुबह शास्त्रीय संगीत सुनते और उसके स्वर और संगीत में बहते रहते. ये और बात थी कि मुझे जीवन के 20 साल गुजरने के बाद यह समझ आया था कि शब्द पिताजी के मुख पर ही नहीं बल्कि उनके मौन के भीतर भी बिना उनके अनुमति के प्रविष्ठ नहीं हो पाते थे. वे जितना बाहर खामोश थे उतना ही भीतर भी थे. वे जो बोलते थे वह स्वाभाविक रूप में घटित हो जाता था और जो वे नहीं बोलते थे उसका अपना एक महत्व था. वे बोलने-बतियाने और कुछ कहने-सुनने के बीच भी प्राथमिक, अनिवार्य और वैकल्पिकता को महत्व देते थे.
इधर, जब मैं धीरे-धीरे बड़ा हुआ और देश गठबंधन सरकारों की जद से बाहर आने लगा था और नोट पर हस्ताक्षर करने वाले आरबीआई गवर्नर से लेकर चाय बेचने वाले तक देश के प्रधानमंत्री बन गए तब मुझे पिता के बोलने, नहीं बोलने और ज्यादा बोलने, क्या बोलने और कहीं भी कुछ भी बोलने जैसी बातों का हिसाब कुछ ज्यादा समझ आया. पिता की खामोशी, उनका बोलना और सधे हुए तरीके से कही गई बात मेरी चुप्पी में इस कदर धंस गई थी कि वह आगे चलकर मेरी फेसबुक, इंस्टा और ट्विटर की दीवार पर भी उसी तरह से चस्पां हुई जैसे मेरे पिता के चेहरे पर हुई थी. हालांकि वह तो पिता के जमाने में बोलने बतियाने का दौर था. तब ना कोई फेसबुक था, ना इंस्टा ना ट्विटर था और ना ही वीडियो के मार्फत लोग बोलते बतियाते थे बल्कि लोग बोलते थे तो किसी वजह से बोलते थे और जब वे चुप रहते थे तब इसलिए रहते थे क्योंकि उन्हें पता होता था कि बोलने के लिए कुछ है नहीं और बेवजह बोलना और दिखना मूर्खों का लक्षण है.
खैर, चूंकि अब इस दौर में शब्दों का इतना महत्व नहीं है और हर शब्द इतनी जगह, इतनी बार बेवजह इस्तेमाल हो रहा है कि वह अपनी महिमा और गरिमा खो चुका है सो पिता की खामोशी और उनका बोलना या नहीं बोलना इसका कोई ज्यादा महत्व नहीं रहा है. झूठ, मिथ्या भाषण से शब्दों की ऐसी दुर्गति हो चुकी है कि वह वह हिंसक हो उठे हैं. यहां तक कि समाज, परिवार और पूरी दुनिया में अशांति का कारण बन रहे हैं सो उन्हें लेकर अब किसी को वैसी परवाह भी नहीं है जैसी मेरे पिताजी करते रहे.
बाहरहाल, आज मेरे पिता गंजबासौदा बिजली विभाग में लाइन मैन की नौकरी से रिटायर हो रहे हैं. 40 साल की उनकी नौकरी का आज आखिरी दिन है. बीते चार दशकों से अनवरत् एक नियम से बंधे यहां नौकरी करते उन्होंने कई बदलाव देखे हैं और बदलता हुआ जमाना और यह देश सब उनकी खामोशी के बीच से गुजरे हैं. लंबी नौकरी में कई इलाकों में उनके ट्रांसफर हुए, कई बार दिनों-महीनों के लिए पोस्टिंग भी हुई, लेकिन उन्होंने कभी अपने परिवार को इस स्थान परिवर्तन का हिस्सा नहीं बनाया. वे घूमते रहे, बहते रहे लेकिन हमें स्थिर रखा. मुझे याद है पिता कई महीनों, दिनों के बाद भी सदा वैसे ही घर आते रहे जैसे वे हमारे साथ रहा करते थे. हमसे दूर रहकर, यात्राओं के बीच और बढ़ती उम्र ने उनके भीतर जो बदलाव किए वे उनके उस रहस्यमयी स्वभाव में और सरलता ले आए जिसे देखकर मुझे लगता है कि क्या पिता को रहस्यमयी देखना मेरा भ्रम रहा था या अब उनकी सादगी और सरलता भ्रम बन चुकी है. पिता की पीठ के पीछे हम अब भी उन्हें हम तोल-मोल के बोल कहकर चिढ़ाते हैं बल्कि उनकी पीठ और कंधे देखकर इस दुनिया का भार उठाने की ताकत महसूस करते हैं. हम तीनों ही भाई-बहनों ने अपनी उम्र के हिसाब से पिता को जब-जब जैसे देखा है वे उतना ही अपनी खामोशी में स्थिर, स्थित और प्रवाहित होते रहे हैं.
आज पिता के रिटायरमेंट का दिन है. 40 साल की नौकरी के आखिरी दिन भी पिता सुबह 4 बजे उठे हैं, योग, ध्यान और प्राणायाम के साथ सुबह 8 बजे तक वे केवल मौन रहे हैं. इस बीच उनकी पहली आवाज कनु की मां की पुकार के तौर पर हुई है. वे जानते हैं आज इस दशकों से बंधी दिनचर्या और नियम का आखिरी दिन है. एक खंडन होगा. बाकी चीजें वैसी ही होंगी. सुबह उठना, ध्यान, योग, प्राणायाम, सुबह की सैर, चाय के साथ अखबार पढ़ना भी होगा. डेढ़ घंटा अखबार पढ़ने के क्रम में वे उन तमाम शब्दों को, नेताओं के बयानों को, किसी पर किसी के कहे को और किसी की टिप्पणी की गंभीरता को लेकर ज्यादा चौकन्ने और सतर्क दिखाई पड़ेंगे. अखबार पढ़ते हुए वे मुस्काराएंगे भी ठीक वैसे ही जैसे रेडियो पर मन की बात सुनते हुए या फिर टीवी पर न्यूज चैनल देखते हुए मुस्कुराते रहे हैं, लेकिन इस पूरे कार्यक्रम के बाद वे ऑफिस नहीं जाएंगे. एक क्रम टूटेगा, पिता की नियमों की बंधी छत में कुछ बिखराव होगा.
हमें नहीं पता की सेवानिवृत्त होने के बाद इतने कायदों की दिनचर्या से बंधे वद्ध के लिए आगे जिंदगी कैसी होगी. लेकिन 12 भोजन, 1 बजे दोपहर की नींद और 3 बजे किसी एक पुराण का अध्ययन उनकी जीवनचर्या का हिस्सा रहा है, इधर शाम को 6 बजे के आसपास वे घर के पीछे बने सरकारी उद्यान में वे टहलने जाते हैं और अपनी खामोशी के बीच पास के हनुमान मंदिर की आरती करते हुए 8 बजे घर लौटते हैं. शेष बातें मां के साथ होती हैं या फिर बहन से कभी-कभार फोन पर बाकी उनका मौन उनके साथ गमन करता है. इधर आपको बता दूं कि इन दिनों मां और हम सबने पिता को और करीब से देखा है. वे पहले की तुलना में अब और भी बहुत कम बोलने लगे हैं. स्मार्ट फोन, स्मार्ट टीवी, डिजिटल मीडिया, फेसबुक, इंस्टा, , फोटोज, फिल्में अमेजॉन, नेटफि्लक्स के दौर में उनके पास फोन नहीं है और उनके सारे फोन घर लैंडलाइन नंबर पर ही आते हैं.
मेरी बहन की शादी हो चुकी है, बड़े भाई रेलवे की नौकरी में हैं और महीने में एकाध बार घर आते हैं जबकि मैं एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने लगा हूं. हम तीनों ही भाई बहनों के बीच पिता का कम बोलना आज भी वैसा ही सधा हुआ है. हम तीनों भाई बहन पिता के तोल-मोल के बोल के अलग-अलग वर्जन हैं. राखी या किसी विशेष मौके पर परिवार में मिलने के दौरान मां की मुस्कुराहट हमारे बीच शब्दों का सबसे सुंदर संगीत रचती हैं. पिता अपने मौन के क्रम में कल्याणी दीदी और हम दोनों भाइयों के सिर पर हाथ फेरते हुए बहुत सुंदरता से मुस्कुराते हैं.
आज हम सभी पिता के कार्यालय पहुंचे हैं. हालांकि वे रोजाना की तरह अपनी साइकिल से एक घंटा पहले ही ऑफिस पहुंचे हैं. वे शायद आखिरी बार साइकिल से ऑफिस आना चाहते थे और हमने उन्हें रोका नहीं. उनका रिटायरमेंट के अवसर ऑफिस के साथियों ने उन्हें एक विदाई पार्टी दी है. खुला हुआ आधी बांह का सफेद कमीज और उसके जेब में हरे कलर का टेस्टर दूर से ही चमक रहा है, मानों अभी निकल पड़ेंगे फील्ड पर. काला पैंट, चमड़े की चप्पलें और गले में गेंदे की माला डाले झुर्रियों से भरे गेहुंए रंग का चेहरा लिए पिता सामान्य सी मुस्कुराहट के बीच सामने एक छोटी सी चेयर पर बैठे हैं. उनके साथ सालों से काम करने वाले साथी, कुछ अफसर और चंद दूसरे लोग उनके काम को, अनुशासन को याद कर रहे हैं, हर व्यक्ति उनकी सोहबत, संगत और काम के प्रति निष्ठा, ईमानदारी व उनके स्वभाव को याद कर रहा है.
मैं कल्याणी दीदी, मेरा भांजा आगत, और तनु भैया व मां हम सब पिता को देख रहे हैं.
मां की आंखों में आंसु हैं और वे एकटक पिता को देख रही हैं. लाल और हरे रंग की फूल वाली साड़ी और चश्मा पहनी मेरी मां पिता को एकटक देखे जा रही हैं. छोटे कद की ठिगनी सी मेरी मां मानों मेरे पिता की परछाई ही रहीं हैं. वे मेरे पिता के मौन का एक ऐसा अनुवाद है जिसे केवल पिता ही पढ़ पाते हैं. मैं देख रहा हूं कि मेरे पिता की नजर रह-रहकर मां पर ठिठक जाती है फिर वे नीचे गर्दन झुका लेते हैं. मंच पर उनके साथ काम करने वाले और एक विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी मेरे पिता के बारे में चंद शब्द बोल रहे हैं. अब मंच के सामने तकरीबन 20 लोगों के बीच पिता को चार शब्द कहने के लिए कहा जा रहा है लेकिन वे हाथ जोड़कर मना कर रहे हैं और मैं समझ पा रहा हूं कि दूसरे लोगों को भले ही यह उनकी झिझक, संकोच, या शर्माहट लगे लेकिन वे भीतर कहीं हैं, इस बीच उनके एक साथी ने उनसे विनती की है वे कुछ बोले.
इधर पिता आग्रह पर खड़े हुए हैं मैं उन्हें उठता हुआ देख रहा हूं. सीधा, तना और झुरियों में डूब रहा उनका चेहरा अपनी खामोशी के बीच भी अनगिनत भावों से भरा हुआ है. उनके हाथ जुड़े हुए हैं और वे कह रहे हैं-
जीवन का एक पाठ पूरा हुआ. मैं अपने साथियों से मिलता रहूंगा. मुझसे जाने-अंजाने कोई गलतियां हुई हैं तो क्षमा करें. हाथ जोड़ते हुए पिता का चेहरा भी झुक गया है, उनकी आंखें डबडबा गई हैं और वे मेरी मां की ओर देख रहे हैं जिसकी आंखों से आंसुओं की एक धार गालों पर बह रही है.
पिता के इतना कहते ही थोड़ी गहमा-गहमी सी बढ़ी है लग रहा है सभा का विसर्जन है. पिता लोगों से मिल रहे हैं बिजली विभाग के उस साधारण से दफ्तर के उस छोटे से कमरे की सीलन भरी दीवारों पर चमकते दो ट्यूबलाइट्स और घूमते हुए पंखों की घरघराहट के बीच मेरी निगाह सामने लगी घड़ी पर है जिसमें शाम का पौने सात बज रहा है, पिता के जीवन की नियमावली का एक समय. पिता मिलने वालों से भी अपने ही मौन और सधे शब्दों से मिल रहे हैं.
मैं जान गया हूं कि उन्होंने आंखों ही आंखों से एक इशारा मां की ओर कर दिया है कि अब हमें यहां से निकलना है..!
समाप्त

