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  • समीक्षा
  • पूर्व-राग : एक पाठक की नोटबुक में कस्बों, किताबों और सिनेमा की दुनिया

    आज प्रस्तुत है राकेश कुमार मिश्र द्वारा कथाकार-गद्यकार जयशंकर की किताब पूर्व-राग : एक पाठक की नोटबुक की समीक्षा – अनुरंजनी 
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    पूर्व-राग : एक पाठक की नोटबुक में कस्बों, किताबों और सिनेमा की दुनिया

     हिंदी के वरिष्ठ कथाकार-गद्यकार जयशंकर जी की नई किताब पूर्व-राग : एक पाठक की नोटबुक (2025) को पढ़ते हुए लगा कि अपने भीतर के उथल-पुथल को लगातार दर्ज़ करना कितना ज़रूरी है । इस डायरी से गुज़रते हुए हवा और पानी जैसी भाषा से सामना हुआ । यह इल्हाम भी हुआ कि भाषा सिर्फ सम्मोहन नहीं है। भाषा कोई जादू और करतब भी नहीं है । भाषा अपने मूल रूप में ख़ुद को दर्ज़ करने की जगह है। तमाम आवरण को उतार फेंक ख़ुद को देखने का अवसर है। “लेखकों के लेखक” निर्मल वर्मा के बेहद करीब रहे जयशंकर जी ने अपनी डायरी में भाषा को इसी तरह से इस्तमाल किया है। मेरी दिलचस्पी शुरू से उन लेखकों में रही है, जो हिंदी विभागों की उपज नहीं हैं, या जो हिंदी पट्टी की ‘गुरु वंदना’ परंपरा से नहीं आते। जयशंकर जी की जड़ें दक्षिण भारत से जाकर जुड़ती हैं। उन्होंने हिंदी ‘सीखा’ है। हिंदी पट्टी के किसी युवा की तरह वो इस भ्रम में कभी नहीं रहे की वो इस भाषा के ‘ज्ञाता’ हैं। उनकी भाषा में जो ठहराव और सुकून सहज ही तैरता है, उसके पीछे उनका इस भाषा को  सीखने और सहेजने की इच्छा ही शायद अंतस में कहीं काम कर रहा हो।

    सन 1981 से शुरू होकर लगभग तीन दशक की यात्रा तय करती इस डायरी की शुरूआत 21-22 साल के उस लड़के से होती है, जो विदिशा से दिल्ली आया है। दिल्ली के शोर में प्रवेश करते ही वो एक घोड़ा को चौराहा पर अकेला मरते हुए देखता है। हृदय विदारक यह दृश्य किसी भी महानगर को बड़े फलक पर समझने में हमारी मदद करता है। तीस की उम्र की तरफ आगे बढ़ते हुए उस युवक की बैचनी को साफ देखा और समझा जा सकता है । यह युवा किसी प्रोफेसर या हिंदी के कलावादी ख़ानदान से नहीं है। जिसका जन्म और पालन-पोषण पश्चिम भारत के उन कस्बों में हुआ है, जहाँ सुविधाएं शुरू से कम रही हैं। जहाँ ख़ुद को परिष्कृत करने का एकमात्र तरीका सेल्फ-एजुकेशन है। जो किसी भरोसेमंद मार्गदर्शक को खोज रहा है। उस युवक का स्वअध्याय और उसकी भूख ही उसका सच्चा मार्गदर्शक बनता है। बदलते समय के साथ वो हिंदी के चर्चित लेखक निर्मल वर्मा थे, जो ऐसे कई युवा लेखकों के मार्गदर्शक बने। यह डायरी तमाम छोटे कस्बों में सक्रिय युवा लेखकों के लिए प्रेरणा और सबक दोनों है। 

    इस डायरी को पढ़ते हुए हमारा परिचय उस युवा से होता है जो पश्चिम और मध्य भारत के अलग-अलग कस्बों में रहते हुए ख़ुद को जानने और अभिव्यक्त करने की छटपटाहट से भरा हुआ है। वह युवक अपनी डायरी में सिर्फ दिनचर्या ही दर्ज़ नहीं कर रहा है बल्कि भागदौड़ से दूर इन कस्बों के मूल तत्व को छूने की भी कोशिश कर रहा है। यह युवा कहीं पहुँचने की जल्दबाज़ी में नहीं है, बल्कि अपने आलस्य से लड़ते हुए परिमार्जन के लिए सतत प्रयासरत है। उसकी सारी शिकायतें ख़ुद से हैं, किसी व्यवस्था विशेष से नहीं। इस किताब को पढ़ते हुए, किसी किताब से स्वभाविक रूप से बनने वाले संबंध के बार में भी पता चला। किसी किताब के साथ होना किसी संबंध को जीने जैसा है। शायद इसलिए किसी किताब को किसी एक शब्द या वाक्य में कहना मुश्किल होता है। यहाँ तक कि कोई समीक्षा भी किसी किताब को समझने की एक अपूर्ण कोशिश ही होती है। फिर भी अगर मुझे बाध्य किया जाए कि इस किताब के लिए कोई एक शब्द खोज लाऊँ, तो वो शब्द है : भूख ।

    बदलते समय के साथ साहित्य की दुनिया में प्रवेश आसान हुआ है। इस किताब को पढ़ते हुए मुझे फ्रैंकफर्ट स्कूल से जुड़े बीसवीं सदी के प्रसिद्ध जर्मन-यहूदी दार्शनिक, साहित्यिक आलोचक और संस्कृति सिद्धांतकार वाल्टर बेंजामिन (Walter Benjamin) का चर्चित निबंध, “The Work of Art in the Age of Mechanical Reproduction” (यांत्रिक पुनरुत्पादन के युग में कला का कार्य), जो 1936 में प्रकाशित हुआ था, बार-बार याद आता रहा। लगभग दो दशक पहले हिंदी के वरिष्ठ कवि अरुण कमल द्वारा अनूदित और ‘पहल’ में प्रकाशित इस निबंध में, बेंजामिन ने यांत्रिक पुनरुत्पादन, जैसे कि फोटोग्राफी और फिल्म, के आगमन के साथ कला के काम के स्वरूप में होने वाले बदलावों पर चर्चा की है। बेंजामिन का मुख्य तर्क यह है कि यांत्रिक पुनरुत्पादन कला के काम की “आभा” (aura) को नष्ट कर देता है। आभा, बेंजामिन के अनुसार, कला के काम में मौजूद एक विशिष्टता है, जो इसे एक अद्वितीय और अनमोल वस्तु बनाती है। यह “आभा” समय और स्थान में कला के काम की मूल उपस्थिति से जुड़ी होती है। जब कला के काम को यांत्रिक रूप से पुनरुत्पादित किया जाता है, तो उसकी “आभा” कम हो जाती है, क्योंकि अब यह हर जगह उपलब्ध हो जाती है और इसकी विशिष्टता खत्म हो जाती है। प्रिंटिंग प्रेस की सहज उपलब्धता के कारण, किताबों और लेखकों की बढ़ती संख्या के कारण लेखक के उस “आभा” (aura) को ध्वस्त हुए एक लंबा समय हो गया। पाठक से लेखक बनने का जो लंबा श्रम साध्य रास्ता था, वह रास्ता बहुत छोटा हो गया है। यानी पिछले एक सदी में पाठक से लेखक होना आसान हुआ है । साथ ही, सोशल मीडिया के आने के बाद लेखक की “आभा” (aura) हर रोज ध्वस्त होता है। इस तरह कहना गलत नहीं होगा कि साहित्य की दुनिया में रहना कैसे है, यह हमें कोई नहीं बताता। यह ख़ुद ही सीखना पड़ता है। पिछले तीन दशक में जो हिंदी साहित्य हमारे सामने है, उसमें शोर और खींच-तान चरम पर है। अस्सी के दशक से शुरू होकर 21वीं सदी की तरफ बढ़ती यह डायरी संवाद के सुख और महत्व को बखूबी रेखांकित करती है। इस डायरी में पत्रों का इंतज़ार है। यहाँ किसी नए संबंध को लेखक ने अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा है। पंचकुला लेखक शिविर में हिंदी की महत्वपूर्ण रचनाकार और अनुवादक ज्योत्स्ना मिलन (1941-2014) से लेखक का मिलना और फिर उसके बाद शुरू हुआ आत्मीय संवाद को लेखक ने उस साल की सबसे सुंदर घटना के तौर पर अपनी डायरी में दर्ज़ किया है। इस डायरी में सरकारी बैंक की उबाऊ और थकाऊ नौकरी के बावज़ूद पत्रों का उत्तर देने की प्रबल इच्छा को साफ देखा जा सकता है। इन पत्रों में सिर्फ सहमति का जश्न नहीं है बल्कि असहमति और मतभेद के लिए जीवन में पर्याप्त जगह बनाने की कोशिश भी है। ये कोशिशें लेखक के जीवन का इस हद तक हिस्सा बन गई हैं कि अचानक संवाद में आया कोई भी अवरोध जीवन को निरर्थक बनाने लगता है। इस क्रम में भोपाल से जुड़े लेखकों से लेखक का निरंतर संवाद इसका सुंदर उदहारण है। इस डायरी को पढ़ते हुए संवाद के संदर्भ में सहज ही दिमाग में कुछ सवाल उत्पन्न हुए। ये सवाल हैं : साहित्य में रहते हुए संवाद इतना क्यों ज़रूरी है ? पिछले तीन दशक के हिंदी जगत में संवाद का जो रूप बदला है, उस बदलाव के बाद संवाद को अब कैसे समझा जाए ? आख़िर में एक और सवाल, सोशल मीडिया के दौर में जो संवाद हो रहा है, वो संवाद है या संवाद का अभिनय?  शायद अब समय आ गया है कि इन कुछ सवालों पर थोड़ा ठहरकर सोचा जाए। 

    जयशंकर जी की डायरी पर बात हो और “लेखकों के लेखक” निर्मल वर्मा जी की चर्चा ना हो, यह संभव नहीं। इस डायरी में लेखक की निर्मल जी के साथ संभव हुई शुरूआती भेंट और बातचीत को समेटा गया है। यहाँ बताना ज़रूरी है कि जब अस्सी के दशक में जयशंकर जी का निर्मल जी के साथ संवाद शुरू हुआ, तब उनकी और निर्मल जी के उम्र में लगभग तीस साल का अंतर था। तब तक निर्मल जी सिर्फ हिंदी में ही नहीं बल्कि भारतीय साहित्य में एक महत्वपूर्ण लेखक के तौर पर स्थापित हो चुके थे। उम्र के लंबे फ़ासले के बाद भी संभव हो रहा यह संवाद अब किसी अचरज की तरह लगता है। इस बातचीत में “एकांत साधक” निर्मल जी को सुनने, उनसे सीखने और लेखक के तौर पर निर्मल जी के परिश्रम को अपने जीवन में उतारने की कोशिश को देखा जा सकता है। कम उम्र और समझ के कारण लेखक से जानकारी के स्तर पर कुछ गलतियाँ भी होती हैं, पर बिना समय गँवाए वह निर्मल जी के माध्यम से उन्हें सुधारता भी है। इस अविस्मरणीय संवाद के बारे में पढ़ते हुए निर्मल वर्मा द्वारा जयशंकर नामक युवा लेखक को लिखे गए पत्रों का संग्रह देहरी पर पत्र (2010) की याद आई। यह पुस्तक 1982 से 2005 तक लिखे गए पत्रों को एक साथ लाती है, जो एक वरिष्ठ और एक युवा लेखक के बीच संवाद का प्रतिनिधित्व करती है। इन पत्रों में, निर्मल वर्मा का एक अलग, मुखर और संवादप्रिय रूप प्रकट होता है। पूर्वराग में भी निर्मल जी का संवाद के प्रति उत्साह, भाषा और जीवन में गरिमा को बचा लेने का अथक प्रयास देखा जा सकता है। 

    एक पाठक के तौर पर इस अत्यंत आत्मीय बातचीत के बारे में पढ़ना एक पूरे दौर को याद करना है, यह हमारे सतही और शातिर समय को थोड़ा गौर से देखने का अवसर भी है। निर्मल जी जिस एकांत और गरिमा के साथ हिंदी में रहे, जयशंकर जी ने उस एकांत और गरिमा को अपने जीवन में काफ़ी हद तक बचा लिया है। यह किसी उपलब्धि से कम नहीं। साथ ही, निर्मल जी के बाद की पीढ़ी में बहुत कम लेखक हैं, जिन्होंने अपने “self-education” पर इतना काम किया हो। जयशंकर जी अपनी इस डायरी में लेखक के तौर पर लगातार किया जाने वाला ‘homework’ करते हुए दिखते हैं। 

    पिछले तीस सालों में जिस तरह का समाज हमने बनाया है, उसमें जाति, धर्म और संप्रदाय के स्तर पर विविधता और स्वीकारता की कमी को आसानी से देखा और महसूस किया जा सकता है। आज के समय में विविधता की वो सुगंध लगभग गायब है। नब्बे के दशक में सांप्रदायिकता के फैलते जहर को लेखक ने बहुत बेचैनी के साथ अपनी डायरी में कुछ जगहों पर दर्ज़ किया है। इसी बेचैनी में वो ‘जनसत्ता’ के संपादक को पत्र लिखता है। पिछले एक दशक में हिंसा और नफरत का जो माहौल सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में बना उसे समझने के लिए हमें नब्बे के दशक की तरफ बार-बार पलटकर देखना होगा। साथ ही पिछला दशक जिस पॉलिटिक्स ऑफ अदरिंग (politics of othering) के कारण खास तौर से मीडिया में चर्चित रहा है, उसके कई सूत्र नब्बे के दशक में छुपे हैं। नब्बे का दशक कई स्तर पर एक महत्वपूर्ण दशक है। यह दशक सिर्फ उदारीकरण के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि हिंसा को उन्माद में बदलने का काम भी इस दशक में हुआ है। हिंसा का किस हद तक व्यवस्थित रूप से संरक्षण हो सकता है, यह हमें इस दशक में देखने को मिलता है। यहाँ मैं किसी राजनीतिक पार्टी का नाम लेने के बजाए उस मानसिकता को समझने की कोशिश कर रहा हूँ, जो इस दशक में प्रचलित चुनावी नारों से पहले लोगों के आचरण में पहले परिलक्षित हुआ। और वह हिंसा किस तरह लोगों के आम जीवन और दिनचर्या का हिस्सा बन गया। अस्सी और नब्बे के दशक में नागपुर में रहते हुए जयशंकर जी उस दौर को अपनी डायरी में दर्ज़ करते हैं, जब वरकरी संप्रदाय के साधु, मुस्लिम फकीर, घुमंतू सपेरे और मदारी इस शहर में आसानी से दिख जाते थे। डायरी में लेखक के ईसाई दोस्तों और उनके परिवार के बारे में पढ़कर सहज ही खुशी हुई। शायद हमारे पूर्वज इसी तरह का समाज बनाना चाहते थे, जो शायद बदलते समय के साथ हमारे सपनों का हिस्सा नहीं रहा।

    जयशंकर जी की डायरी का एक बड़ा हिस्सा साहित्य, सिनेमा और कला के रोचक विवरण से बना हुआ है। लेकिन पूर्वराग (2025) को सिर्फ साहित्यिक डायरी कहना ठीक नहीं होगा। अपने समय के प्रति सजग और जागरूक रहते हुए लेखक ने सामाजिक और राजनीतिक घटनाओं को भी इस डायरी में पर्याप्त जगह दिया है। इस संदर्भ में भारत की भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या का उल्लेख यहाँ ज़रूरी है। पिछले कुछ सालों से इंदिरा गांधी द्वारा अपने शासनकाल में लगाए गए आपातकाल की चर्चा इन दिनों खूब हो रही है। ऐसे में इंदिरा गांधी की हत्या को जिस विचलित भाव से लेखक ने अपनी डायरी में दर्ज़ किया है, वह स्वतः ही किसी पाठक को उस राष्ट्रीय शोक को थोड़ा ठहरकर सोचने के लिए बाध्य करता है। कुछ देर के लिए इंदिरा गांधी को अगर किसी खास पार्टी से जोड़कर ना देखा जाए तो यह बात स्पष्ट होती नजर आएगी की इंदिरा गांधी की जनमानस से जुड़ी एक जननेता की जो छवी थी, शायद उसके कारण लेखक उनकी दिल दहलाने वाली हत्या से परेशान है। 

    इस क्रम में लेखक ने भोपाल गैस त्रासदी को जिस मानवीयता से दर्ज़ किया है, वह इस डायरी को एक नया अर्थ देता है। ज्यादातर संदर्भों में डायरी को पर्सनल डॉक्यूमेंट के तौर पर देखा जाता है। अगर हम डायरी लेखन का इतिहास क्रमबद्ध रूप से देखें तो, यह बात स्पष्ट होती है कि डायरी लेखन शुरुआती अवस्था से ही अपने समय के सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं और परिवर्तनों को दर्ज़ करने का एक अहम दस्तावेज़ी माध्यम रहा है। यहाँ डायरी लेखन के इतिहास में विशिष्ट स्थान रखने वाले Samuel Pepys (1633-1703) का उलेखख ज़रूरी हो जाता है।  सन 1660 से 1669 तक फैली अपनी डायरी में  सैमुअल पेपीज़ ने लंदन में सन 1665 में फैले प्लेग और 1666 में लंदन में ही चार दिन चले अग्निकांड को बहुत सूक्ष्मता के साथ अपनी डायरी में दर्ज़ किया है। ये दोनों घटनाएँ डायरी को एक बड़े फलक पर देखने और समझने में हमारी मदद करती हैं।  

    इस डायरी के कई महत्वपूर्ण पक्ष हैं। उन सभी पक्षों पर किसी एक समीक्षा में बात करना संभव नहीं है। पर इस डायरी में कुछ ऐसे  अवसर हैं जब मृत्यु को बहुत सशक्त रूप से लेखक ने दर्ज़ किया है। इस संदर्भ में परिवार में हुए एक किशोर की मृत्यु को उन्होंने जिस मार्मिकता के साथ दर्ज़ किया है, वह किसी पाठक का देर तक पीछा नहीं छोड़ता। यहाँ डायरी के उन सारे एंट्री को याद करना ज़रूरी है, जब लेखक ने बीमारियों से ग्रस्त दोस्तों और आत्मीय जनों के देहांत को पूरी शिद्दत से अपनी डायरी में जगह दिया है। ‘पूर्वराग’ से गुजरते हुए यह बोध बार-बार होता है कि मृत्यु कोई बाहर की घटना नहीं है बल्कि हमारे जीवन में ही किसी अदृश्य रूप में उपस्थित है।

    पूर्व-राग (2025) जयशंकर जी की गद्य-त्रयी का हिस्सा है। इस त्रयी में गोधूलि की इबारतें (2020) और कुछ दरवाज़ें और कुछ दस्तकें (2023) जैसी किताबों की पर्याप्त चर्चा हुई है। इस त्रयी को पढ़ते हुए लगा कि कला वो अदृश्य सूत्र है, जो इन तीनों किताबों को जोड़ने का काम करता है।थोड़े ठहराव के बाद यह भी स्पष्ट होने लगता है कि साहित्य के बाद सिनेमा और संगीत, कला के दो ऐसे माध्यम हैं, जिसने लेखक के चेतना और उसके रचनात्मक संसार को भरपूर खुराक दिया है। नागपुर में रहते हुए जयशंकर जी सिने मोनताज नामक  संस्था की स्थापना के साथ विश्व सिनेमा को आम जनता से जोड़ने के लिए पिछले तीन दशक से निरंतर सक्रिय हैं। सिने मोनताज के माध्यम से वो और उनके सहयोगी कई महत्वपूर्ण आयोजन कर चुके हैं। इन आयोजनों में हिंदी के वरिष्ठ कवि और संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी जैसे कई विद्वान सहभागिता कर चुके हैं। 

    पिछले कुछ महीनों में इस डायरी के आखरी हिस्से को पढ़ते हुए डायरी लेखन से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सवाल लगातार पीछा करते रहे हैं। जयशंकर जी ने इस डायरी के अंत में कहा है कि, “डायरी एक तरह कच्चा माल ही है।” वो आगे कहते हैं, “डायरी लिखना कोई कला नहीं हो सकती है।” एक स्तर पर ये दोनों ही बातें कुछ हद तक सही हैं। पर हिंदी और अंग्रेजी में कुछ लेखकों की डायरी पढ़ने के बाद मुझे लगा कि डायरी लेखन भले ही कोई कला ना हो पर यह किसी लेखक के self-evolution को समझने के लिए एक समय के बाद ज़रूरी दस्तावेज़ बन जाता है। यह तमाम थकान के बाद भी किया जाने वाला रियाज़ है। रियाज़ से पहले उस अनुशासन को ज़िंदा रखने की भरसक कोशिश है। डायरी का “कच्चा माल” भले ही किसी कविता या कहानी की शक्ल ना ले, पर डायरी लेखन, मुझे लेखक होने की पहली शर्त की तरह लगता है। यह सिर्फ अपने इल्हाम को दर्ज़ करने का सुख नहीं है, बल्कि उस डर को बार-बार मंत्र की तरह दोहरना है कि : एक लेखक के तौर पर मेरे पास समय बहुत कम है। साहित्यिक विधा के तौर पर डायरी के संदर्भ में बहुत कुछ लीखा और बोला गया है। यहाँ अंग्रेजी और मराठी के प्रतिष्ठित कवि-अनुवादक सचिन केतकर को याद करना ज़रूरी है। अपने एक लेख में प्रो. सचिन केतकर ने इस बात की ओर इशारा किया है कि, डायरी साहित्यिक विधाओं के स्थापित हाइरार्की (hierarchy) को चुनौती देती है, इस विधागत ऊँच-नीच में कई बार कविता और कहानी को शीर्ष स्थान पर रखा जाता है। डायरी जो वास्तव में एक बहुत ही मार्जिनल विधा है, साहित्य के पारंपरिक विधागत श्रेष्ठता को चुनौती देने की क्षमता रखती है। इसका मतलब यह नहीं है कि डायरी, लेखन का एक ‘सच्चा’ रूप है, लेकिन इसका मतलब केवल इतना है कि सत्य के लिए इसका दावा अन्य दूसरे विधाओं से अधिक है। दूसरे शब्दों में कहें तो डायरी, एक दशक पहले प्रचलित ‘ब्लॉग’ की पूर्वज है, लेकिन ब्लॉग फिर से डायरी के विपरीत सार्वजनिक डोमेन में है और इसलिए इसे वास्तव में डायरी का समकालीन रूप नहीं माना जा सकता है। शायद सार्वजनिक और निजी डोमेन के बीच का संबंध इंटरनेट, टीवी, मोबाइल और फोन जैसे नए मीडिया के कारण खत्म हो गया है। और साथ ही, नए मीडिया के उदय के कारण यूट्यूब, सोशल नेटवर्किंग साइट्स और ब्लॉगिंग पर ‘यूजर जेनरेटेड कंटेंट’ जैसे आत्म प्रकटीकरण के नए रूप डायरी की जगह ले चुके हैं। यद्यपि डायरी अपनी बनावट में विषय-वस्तु के स्तर पर ‘व्यक्तिगत’ है, लेकिन भाषा और माध्यम के स्तर पर बहुत हद तक सामाजिक और सार्वजनिक है।

    मुझे जयशंकर जी को पढ़ते हुए लगभग दो दशक हो गया। साहित्य का विद्यार्थी होने के नाते उन्हें पिछले कुछ महीनों में व्यस्थित रूप से पढ़ने का अवसर मिला।  इस किताब को पढ़ते हुए जो सुकून, ठहराव और संतोष मुझे मिला, इसके लिए जयशंकर जी और प्रकाशक देश निर्मोही जी तक मेरा आभार और कृतज्ञता पहुँचे। हिंदी के वरिष्ठ कथाकार ओमा शर्मा जी का भी आभार, जिनसे इस किताब पर सार्थक बातचीत हो पाई। इस किताब को जयशंकर जी ने ओमा शर्मा जी और कथाकार सरोज अंथवाल जी को समर्पित किया है। हाल ही में आधार प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब को जरूर पढ़ें। 

    …………………………

    किताब का विवरण : पूर्व-राग : एक पाठक की नोटबुक (डायरी), : जयशंकर, आधार प्रकाशन, पंचकुला, हरियाणा, 2025. 

    संपर्क : राकेश कुमार मिश्र, असिस्टेंट प्रोफेसर (अंग्रेज़ी), डॉ. आशाबेन पटेल सरकारी विज्ञान कॉलेज, तालुका : उंझा, जिला : मेहसाणा (उत्तर गुजरात), पिन कोड : ( 384315) मोबाईल : 8758127940 ईमेल : rakeshansh90@gmail.com

     

    2 thoughts on “पूर्व-राग : एक पाठक की नोटबुक में कस्बों, किताबों और सिनेमा की दुनिया

    1. जयशंकर जी हमारे समय के महत्वाकांक्षी लेखक हैं। यह डायरी मैंने भी पढ़ी है। उनकी डायरी उनके गहरे पाठक होने और कलाप्रेमी होने का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। राकेश कुमार मिश्र जी ने बहुत विस्तृत समीक्षा की है। एक बार पुनः इस डायरी से रुबरु करवाने के लिए आभार जानकी पुल।

    2. मुझे कभी-कभी जयशंकरजी का लेखन निर्मल वर्मा की स्याही की बोतल मे बचीं स्याहीके कुछ अंतिम बूँदोंसे लिखा हुआसा प्रतीत होता है …

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