आज पढ़िए युवा लेखक आलोक कुमार मिश्रा के कहानी-संग्रह ‘दूध की जाति’ पर युवा कवि जावेद आलम ख़ान की टिप्पणी। यह कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ है न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन से- मॉडरेटर
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कहानी मात्र एक विधा नहीं है व्यक्ति की आदिम इच्छा और जिज्ञासा की तृप्ति है।
आलोक मिश्रा अपने पहले कहानी संग्रह ‘ दूध की जाति और अन्य कहानियां’ से कहानी के क्षेत्र में मजबूत दस्तक देते हैं।इस संग्रह में कुल चौदह कहानियां हैं जो पूर्व में पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इस कहानी संग्रह को पढ़ते हुए लेखकीय चेतना और संवेदना के विविध आयामों से परिचित होते हैं।इन कहानियों का विषय – वैविध्य आलोक की रेंज बताता है।इनमें प्रेम, वर्ग- संघर्ष, स्त्री चेतना, दलित अभिव्यक्ति, सामाजिक सद्भाव,राष्ट्रीय एकता, यौन कुंठाओं की संवेदनायुक्त अभिव्यक्ति के साथ- साथ थर्ड जेंडर की भावनाओं को भी आवाज मिलती है।
उनके संग्रह की पहली ही कहानी है दूध की जाति।
इस कहानी में लोक की गंध व्याप्त है।ग्रामीण समाज का ताना बाना, अवधी की रवानी, जाति व्यवस्था, आपसी संबंध और संघर्ष, परंपरा और प्रतिष्ठा की जकड़बंदी के बीच सरल संवेदन मन की सहज अभिव्यक्ति कहानी में हुई है।ग्रामीण आंचल की बोली – बानी पात्रों के साथ ऐसी घुली मिली हुई है कि पूरा गांव दृश्यमान हो उठता है।एक कहानीकार के रूप में आलोक की यह सबसे बड़ी सफलता है।
हालांकि यह प्रेमचंद स्कूल की कहानी है।यहां 20- 40 वर्ष पूर्व का ग्राम समाज है जहां कुंए होते थे।सामाजिक जकड़बंदी ज्यादा थी।निचली कही जानी वाली जातियां अपने अधिकार समझने लगीं थीं लेकिन लेने के लिए उतनी आक्रामक नहीं हैं।यही स्थिति आज से करीब 100 साल पहले प्रेमचंद के कथा साहित्य में भी मिलती है।इतने सालों बाद भी स्थिति में कोई खास परिवर्तन न दिखना अखरता है। ‘गोड़ई ताइन’ के कथन से आभास होता है कि निचली जातियां कानून से वाकिफ हैं लेकिन उनकी मृत्यु के बाद की परिस्थितियों में जिस तरह कानूनी कार्रवाई हुई वह बहुत पिछले बल्कि प्रेमचंद के समय की लगती है।हैरानी होती है कि पूसन अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाता, साधू मिसिर के विरोधी या जाति की राजनीति करने वाला कोई नेता उससे संपर्क नहीं करता,बड़े अधिकारियों के पास नहीं जाता और एक दिन पहले हुई ज्यादती का विरोध नाटकीय तरीके से भूलकर चला आता है और एक नया आरोप झेलकर बाभन – पूत की अर्थी को कंधा भी देता है।संभव है उस गांव में दो ही टोले हों लेकिन पड़ोस के गांव भी तो खबर पहुंची होगी।दिन दहाड़े की हत्या इतनी आसानी से नहीं छूटती जबकि साधू मिसिर कोई जमींदार या रसूखदार नहीं केवल गांव का साधारण व्यक्ति है।इस कहानी के अंत पर विचार किया जा सकता था।
अति आदर्शवाद ने स्वाभाविकता को प्रभावित किया है।लेखक पर प्रेमचंद का प्रभाव झलकता है यदि प्रेमचंद के साथ शिवमूर्ति को मिलाया जाता तो यह एक बेहतरीन आंचलिक कहानी होती।
‘ छुवन ‘ में संयुक्त परिवार के झगड़े और टूटन के साथ स्त्रियों के प्रति लेखक की दृष्टि सामने आती है।
‘ मझली फरार है’ स्त्री की दैहिक आवश्यकताओं को खुलकर सामने रखती है।मिथ्या पौरुष के दंभ तले दबी स्त्री अस्मिता की छटपटाहट और अपने हिस्से के सुख को पाने के लिए बने बनाए सामाजिक दायरों को तोड़ती मझली का चरित्र इस कहानी का हासिल है।
उसकी खुशबू स्त्री पुरुष के सहज आकर्षण के साथ दोस्ती, प्रेम और वासना पर बात करती है।खुले मन वाली,प्रतिभाशाली निसंतान स्त्री में किस तरह काम लोलुप वर्ग अपनी संभावनाएं ढूंढने लगता है यह इस कहानी का विवेच्य विषय है लेकिन यहां भी आलोक की वैचारिकता उनके पात्रों पर हावी हो जाती है और कहानी उपदेशपरक हो जाती है।
बुआ चली गई एक और उद्धृत करने योग्य कहानी है।इसकी विषय वस्तु भी कोई नई नहीं है।एड्स पीड़ितों पर पहले भी साहित्य और फिल्मांकन हुआ है लेकिन यह कहानी दो बातों के लिए पढ़ी जानी चाहिए – पहली, एड्स पीड़ित महिला की मनःस्थिति और संबंधों पर असर; दूसरी, इसकी बुनावट।रहस्यमई चुप्पी ओढ़े बुआ के प्रति पाठकों की जिज्ञासा पूरी कहानी में बनी रहती है और जब इस रहस्य से पर्दा उठता है तब…….दिमाग़ भन्ना गया है कहानी खत्म करते करते।किताब को एक तरफ रखकर चुपचाप बैठा हूं।देह ने कुछ देर के लिए हिलने से इनकार कर दिया है। मन विरक्ति की चादर ओढ़कर बैठा है।मस्तिष्क में बुआ की छवि जम गई है।रील रूकी हुई है।लगभग वही मनोदशा है जो पहली बार देवदास की मृत्यु का अंतिम कारुणिक दृश्य देखकर हुई थी।मैं समझता था कि ‘ दूध की जाति ‘ इस संग्रह की प्रतिनिधि और सर्वश्रेष्ठ कहानी होगी लेकिन ‘ बुआ चली गई ‘ कहानी ने चौंका दिया।
‘ बरदेखुआ’ चरित्र प्रधान कहानी है।एक बार बरदेखुआ सामने आता है तो उसके प्रति पाठक की उत्सुकता बढ़ती जाती है।कन्या के लिए वर देखने आए इस व्यवहार कुशल और कुछ हद तक हाजिर जवाब व्यक्ति की असलियत जब सामने आती है तब तमाम नकारात्मकता के बावजूद इससे हमदर्दी होने लगती है।ग्रामीण जीवन शैली और मनोभावों को सामने रखने में लेखक सफल हुआ है।
भोले बाबा भी गांव की सरल,सहज जीवन शैली को चित्रित करती है।यहां एक घटना से सांप्रदायिक टकराव की स्थिति किस तरह एक छोटी पंचायत से हल हो जाती है,समझदार बुजुर्ग किस तरह बड़े से बड़े मामले को महज एक बैठक में सुलझा लेते हैं।
धार्मिकता और सांप्रदायिकता का अंतर इस कहानी का विवेच्य विषय है।
प्राइवेसी में होमोसेक्सुअल लोगों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण है पर यह कहानी उपदेशात्मक अधिक हो गई है।
‘ नफीसा’ तरल और मार्मिक कहानी है।ऐसा लगता है कि पंच परमेश्वर की खाला, दो बैलों की कथा की छोटी लड़की और बूढ़ी काकी के चरित्र लेखक के मन मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ गए हैं जिनके अक्स इस कहानी में आ गए। शाहिद के गांव खानपुरा को छोड़कर चैतापुर के लिए पैदल जाती थकी हारी नफीसा में रास्ते के जाने पहचाने पड़ाव देखकर उमगा उत्साह देखकर कांजी हौज से भागे हीरा मोती की याद अनायास आ जाती है जो रास्ते में जाने पहचाने खेतों,हारो,पगडंडियों को देखकर उत्साह और नई ऊर्जा से भर गए थे।लेकिन जहां प्रेमचंद की यह सभी कहानियां सुखांत है वहीं आलोक की नफीसा अपने तमाम दुखों के साथ अंत को प्राप्त करती है।बूढ़ी नफीसा की लाचारी, संशयात्मक मनोभाव, सहजता और संवाद कहानी को आकर्षक बनाते हैं।
‘ मुंहनोचनी’ ऐसी गर्भवती पागल महिला की कहानी है जो अपने साथ हुई दुर्घटना के कारण मर्दों से घृणा करती है।आलोक उस चरित्र के साथ पूरा न्याय कर पाए हैं।उसकी चेष्टाएं,मनोभाव और गांव के लोगों का उसके प्रति व्यवहार,मानवीय पक्ष के बीच नर के भीतर मौजूद शैतान की उपस्थिति आलोक बखूबी उकेरते हैं।
‘ तन भीतर मन’ भी चरित्र प्रधान कहानी है।रेवती के मरने पर उजागर उसकी नई पहचान से शुरू हुई कहानी पिछली घटनाओं के आधार पर उसका चरित्र बुनती हैं।घटनाओं में रेवती के चरित्र के अनुकूल स्वाभाविकता है लेकिन रेवती के पति के चरित्र चित्रण में आलोक अति आदर्शवादी हो गए हैं।किन्नर होने के बावजूद पहचान छिपाकर रेवती का महेंद्र से विवाह और रात में ही पति पर व्यभिचार का झूठा आरोप गढ़कर मायके वापस आ जाना एक सोचा समझा षडयंत्र था जिसने रेवती के साथ साथ महेंद्र का जीवन भी बर्बाद कर दिया।महेंद्र ने कभी शादी नहीं की और कई साल बाद रेवती के मरने की खबर सुनकर अपनी ससुराल चला आया।अपने साले से बातचीत के दौरान उसके संवाद अति मानवीय लगते हैं।यहां लेखक थर्ड जेंडर के प्रति अपनी संवेदना महेंद्र के मुख से प्रकट कर रहा है लेकिन पात्र के चयन में सावधानी नहीं बरती गई।
अंतिम दो कहानियां ‘ ठंडक’ और ‘ निकेतन’ अपनी शैली में अलग प्रभाव छोड़ती हैं।यह किस्सागोई से अलग नई कहानी जैसी लगती हैं।ठंडक कसी और गुंथी हुई कहानी है जिसमें मकान मालकिन से मिले फ्रिज से उपजा उत्साह मंहगे बिजली के बिल की बात सुनकर ठंडा हो जाता है और गरीब परिवार दो महीने के किराए के बदले उसे मकान मालिक को सौंपकर संतुष्ट हो जाता है।यह कहानी अपनी स्वाभाविक रफ्तार से आगे बढ़ती है।कहीं से कोई बनावटीपन या अतिशय भावुकता नहीं दिखती।
निकेतन कहानी सोसायटी में परिवार सहित कार्य करने वाले राजमिस्त्री का चरित्र सामने रखती है।उसके चरित्र को उकेरने में आलोक सफल हुए हैं।अपने साथ उसकी तुलना करते हुए दरअसल पूंजी और श्रम की तुलना भी आलोक करते जाते हैं पर यहां भी आलोक सारा उजलापन एक चरित्र में भरकर प्रस्तुत करते हैं कि उसकी जीवनचर्या में कोई भी नकारात्मक पक्ष दिखता नहीं।
समाज कैसा है इससे ज्यादा समाज कैसा होना चाहिए को कहानियों का आधार बनाते हैं आलोक।
आलोक की यह सफलता है कि कोई भी कहानी शुरू करो तो खत्म करने तक जिज्ञासा बनी रहती है।घटनाएं,संवाद पाठक को बांधे रखते हैं।
पात्रों का चयन सावधानी से किया गया है।उनके अधिकांश पात्र सहज,सरल जीवन में विश्वास रखने वाले,लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था और हृदय परिवर्तन वाले लेकिन अधिकारों के प्रति सजग दिखते हैं।उनकी कहानियों में पुरुष जितने यथास्थितिवादी दिखते हैं,स्त्रियां उतनी अधिक विद्रोही हैं। कहानियां अपने पात्रों और परिवेश के साथ सहज ही खुलती चलती हैं। पात्रों में इतनी विविधता कम कहानीकारों में देखने को मिलती है। पात्रों की विविधता आलोक की दृष्टि की व्यापकता की परिचायक हैं।आलोक कई बार अपने पात्रों पर हावी हो जाते हैं।वे निरपेक्ष नहीं रह पाते यहां पर कहानी थोड़ी कमजोर होती है।
भाषा शैली – कहानियों के पात्र दो तरह की भाषा बोलते हैं शहरी पात्र साफ सुथरी खड़ी बोली और ग्रामीण पात्र अवधी। अवधी में बोले गए संवाद अधिक प्रभावित करते हैं।इसकी शैली चुटीली है। खड़ी बोली वाले कई पात्र अक्सर लेखक का माउथपीस हो जाते हैं।दोनो का प्रयोग आलोक सफलतापूर्वक करते हैं लेकिन जहां – जहां विमर्शों के प्रति अति आग्रह दिखता है वहां वहां बुनावट में बनावट नज़र आने लगती है।
आलोक के भीतर एक भावुक कवि हर समय उपस्थित रहता है जो अक्सर उनके कहानीकार को अपनी उंगली थमाकर चल पड़ता है।इससे कहानियों का यथार्थ पक्ष कमजोर जरूर लगता है लेकिन कहानियां सरस बनी रहती हैं।पाठक इनसे जुड़ाव महसूस करता है।इस कविपने ने उनके कथ्य और भाषा को रागात्मकता और तरलता प्रदान की है।
आलोक की प्रतिबद्धता उनकी कहानियों का स्पंदन है।मुख्य कथा के साथ लोकतंत्र की हिमायत,सेकुलर और समतामूलक समाज की स्थापना,असहमति का सम्मान,स्त्री अस्मिता और शिक्षा में बालक का स्थान जैसे विमर्श मुख्य कथा में खूबसूरती से घुल मिलकर चलते हैं।
उनकी कहानियों पर एक शिक्षक का असर भी देखने को मिलता है।आलोक स्वयं संवेदनशील शिक्षक हैं।शिक्षा को देखने का उनका एक खास नजरिया है।वे किसी भी हालत में बचपन न छीने जाने के पक्ष में हैं।उनकी कहानियों में यह तथ्य बार बार देखने को मिलता है।
आलोक की कहानियों में ब्यौरे प्रचुर मात्रा में हैं जो खटकते हैं।अगर कुछ जगह संकेतों से काम चलाया जाता तो कहानियां और निखरतीं।
मशीन बनती पीढ़ी में थोड़ी सी संवेदना बचाए रखने का स्वप्न लिए आलोक दरअसल मनुष्यता को बचाने का प्रयास करते हैं।उनकी कहानियां जड़ों से जोड़े रखने की हिमायती हैं।उनके यहां विविध विमर्श टकराते नहीं बल्कि रास्ता दिखाते हैं और एक बेहतर दुनिया बनाने की तरकीब सुझाते हैं।
कहानियों से कथा तत्व गायब होने वाले समय में ‘ दूध की जाति और अन्य कहानियां ‘ संग्रह अपनी कथात्मक सरसता के लिए भी चिन्हित किया जाना चाहिए।
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परिचय
समीक्षक का नाम – जावेद आलम ख़ान
जन्मतिथि – 15 मार्च
जन्मस्थान -जलालाबाद, शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश)
प्रकाशन –
कविता संग्रह – स्याह वक़्त की इबारतें
बारहवां युवा द्वादश में कविताएं
पत्रिकाओं में – हंस, कथादेश, वागर्थ, पाखी, आजकल, पक्षधर, बया, वर्तमान साहित्य, गगनांचल, अकार, उदभावना,परिंदे, मधुमती आदि
ऑनलाइन – सदानीरा, हिंदवी, कविता कोश, जानकीपुल, पोषम पा, पहली बार, कृत्या आदि।
संपर्क – javedalamkhan1980@gmail.com

