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  • जिजीविषा का संस्मरण है ‘मदर मेरी कम्स टू मी’

    अरुंधती रॉय की एक संस्मरण पुस्तक हाल ही प्रकाशित हुई – ‘मदर मेरी कम्स टू मी’, जिसे लेकर भीतर लिखा क्या गया नहीं गया इस पर सार्थक चर्चा की जगह पुस्तक-आवरण पर सिगरेट(?) संबंधी बहस चालू है। ऐसे में इस किताब को पूरा पढ़कर महेश कुमार ने इसकी समीक्षा की है। महेश काशी हिंदू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं तथा विभिन्न प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में उनके लेख प्रकाशित हो चुके हैं। आज प्रस्तुत है उनकी यह समीक्षा- अनुरंजनी

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    जिजीविषा का ‘संस्मरण’ है ‘मदर मेरी कम्स टू मी’

    विवाद और हिंदी साहित्यिक समाज का आलोचनात्मक विवेक: 

    हिंदी में एक उपन्यासिका या कहिए लम्बी कहानी है ‘ऐ लड़की’। यह माँ-बेटी के रिश्तों के बहाने स्त्री मुक्ति, जीवन के व्यवहारिक पक्षों और अपनी पहचान तलाशने का संवाद है। कथानक पुरानी और नयी पीढ़ी की स्त्री के बीच ‘सामान्य’ मूल्यों के संरक्षण और नए अनुभवों से सीखे गए मूल्यों के ‘संवर्धन’ को प्रोत्साहित करता है। अरुंधति रॉय की संस्मरण की यह किताब उसी कथानक का वास्तविक पक्ष है। लेकिन, जैसा कि हिंदी साहित्य के ‘सोशल मीडिया स्पेस’ में होता आया है कि लोग बिना पढ़े पक्ष-विपक्ष बना लेते हैं या बन जाते हैं। इससे यह भी होता है लोग किताब से ज्यादा रचनाकार पर चर्चा करके आलोचना के मूल्यों का क्षरण करते हैं और फिर यह राग भी अलापते हैं कि ‘आलोचना संकट में है’। 

           विवाद मुख्य रूप से कवर पर रॉय के ‘बीड़ी पीती स्त्री’ से है। इसे स्त्रीवाद और स्त्री आंदोलन के लिए खतरा बताया गया। इसे ‘मार्केट स्ट्रेटेजी’ कहा गया। किताब पढ़ने पर यह स्पष्ट है कि अरुंधति रॉय को अपने किशोरावस्था तक माँ के विद्यालय में टॉयलेट कक्ष साफ करना पड़ता था। वहाँ भारी मात्रा में सिगरेट का बट भी होता था जो रॉय के अनुसार पुरुषों द्वारा फेंका जाता था। हो सकता है कि वहाँ से उनके चेतना पर एक सिगरेट को लेकर कोई धारणा बनी हो। दूसरा प्रसंग है जीसस (उनका पहला प्रेम) की पहली छवि बीड़ी पीते हुए जिसमें रॉय उसके शारीरिक बनावट का जिक्र करते हुए कहती हैं कि ‘उनके भीतर पहली बार यौन इच्छा पैदा हुई’। तब उनकी उम्र पंद्रह साल थी। रॉय का बचपन खंडित, अभावग्रस्त और प्रेमरहित था। स्वाभाविक है कि ऐसे में एक किशोरवय लड़की के भीतर इस तरह की ‘छवि’ का गहरा प्रभाव पड़ा होगा। कवर पर जिस स्त्री का बीड़ी पीते हुए चित्र है वह एक किशोरवय लड़की का है। इस प्रसंग को जो ठीक से नहीं ‘डिकोड’ कर सकते उनको कवर चित्र में स्त्री आंदोलन खतरे में दिखाई दे सकता है। मुख्य कवर पर एक ‘तितली’ है। इसपर किसी ने ध्यान नहीं दिया। लाल रंग के कवर पर एक ‘तितली’। लाल अपने रूढ़ अर्थ में ‘क्रांति’ का सूचक है वहीं तितली ‘कोमलता’ का। कोमलता का संबंध ‘स्त्री’ से भी है जो भारतीय समाज में बहुत ‘वल्नेरबल’ है। ‘वल्नेरबल स्त्री’ जब विद्रोही हो जाए या कहिए क्रांति (बदलाव) के राह पर चल पड़े तब उसका जीवन कई गुना ‘संकटग्रस्त’ हो जाता है। दुख की बात है कि इसपर कोई चर्चा नहीं हुई। 

    माँ-बेटी का एक दूसरे से सुरक्षित दूरी का प्रेम:

                              पुस्तक की शुरुआत मेरी रॉय के जाने से होती है और अंत उन्हें खुद के भीतर समाहित कर लेने से (l will be seeing you)। अपनी माँ को वो ‘गैंगस्टर’ कहती हैं। यह शब्द अब नकरात्मक अर्थों में प्रयोग होता है। शब्दकोश इसका सकारात्मक अर्थ ‘साहसी और आत्मविश्वासी’ बताता है। मेरी रॉय इसी अर्थ में प्रस्तुत हैं। एक माँ जो रूढ़ भारतीय किस्म की ममतामयी माँ नहीं हैं। वह एक ऐसी स्त्री हैं जो अपने जीवन को अर्थपूर्ण बनाने के लिए पति को छोड़कर ऊटी आ जाती हैं। आर्थिक और मानसिक संकटों से गुजरते हुए केरल में स्कूल चलाकर बच्चों को सख्त अनुशासन में पालती और पढ़ाती हैं। संपत्ति के अधिकार के लिए सुप्रीम कोर्ट तक जाती हैं। माँ-बेटी का रिश्ता ‘लव-हेट रिलेशनशिप’ है। माँ-बेटी दोनों एक दूसरे को सुरक्षित दूरी से प्रेम करती हैं। जो माँ बार-बार कहती हैं कि ‘मेरे कमरे से, मेरी कार से बाहर निकल जाओ, तुम्हें अनाथालय में छोड़ देना चाहिए था’, वही माँ यह भी कहती हैं कि ‘मैं पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा तुम्हें प्यार करती हूँ’। मेरी रॉय एक विद्यालय संचालिका के तौर पर लड़कों को अपना ब्रा दिखाते हुए कहती हैं ‘यह तुम्हारी माँ और बहन पहनती हैं। इसलिए जब चोरी करना हो तो मेरी ब्रा चोरी करो’। यह बात सत्तर के दशक की है। लैंगिक समानता का इससे ज्यादा ‘बोल्ड’ कदम तब के शिक्षा व्यवस्था में और क्या हो सकता था? नर्मदा आंदोलन में जब अरुंधति आयीं तब पत्रकार ने सवाल पूछा कि ‘आप तो खुद आदिवासियों की जमीन हड़पकर मकान बनवाई हैं’, तब अरुंधति ने अपनी माँ की इसी युक्ति का इस्तेमाल करते हुए कहा था कि ‘यदि ऐसा है भी तो क्या इस कारण से सरकार का नर्मदा पर बांध बनाना न्यायोचित हो जाता है?’ मेरी रॉय ने अपने जीवन से अरुंधति को आत्मनिर्भर, स्वाभिमानी, बेबाक और चुनौतियों को स्वीकार करने वाली स्त्री बनाया। 

                            संस्मरण की यह पुस्तक जितनी माँ की है उतनी ही बेटी की भी। अरुंधति अपने बचपन में हुए यौन उत्पीड़न की घटना का जिक्र करती हैं। एक कोट्टायम संतनुमा बुजुर्ग जो शहर भर में प्रतिष्ठित है, वह अकेले में बच्ची अरुंधति को गलत तरीके से छूता है। उसके यौनांग को बार-बार छूता है। शहर भर के लिए यह शरीफ बुड्ढा उसे एक भारी-भरकम मोटे थथुनों वाला सुअर लगता है। इस घटना का असर यह है कि अरुंधति जब सोलह साल की उम्र में दिल्ली आती हैं (1976) तब उनके बैग में चाकू होता है। सुरक्षा की यह अतिरिक्त चेतना और सतर्कता वाली दृष्टि स्त्रियों को इसी कुंठित मर्दवादी समाज ने दिया। 

    सबसे सुरक्षित जगह जब सबसे खतरनाक बन जाती है:

    उक्त वाक्य बार-बार आया है। अरुंधति का जीवन भागमभाग वाला रहा है। उन्हें जब भी स्थायित्व मिला, उनकी रचनात्मकता बाधित होती रही। पहला प्रेमी जीसस मिला। साथ रहे, कठिन जीवन जिया और फिर वो जीसस के घर चली गयी। वहाँ जीसस की माँ ने उन्हें गृहिणी बनाने की कोशिश की। अरुंधति का जीवन बेफिक्री और बोहेमियन किस्म का था। यह जीवन रास नहीं आने लगा। उधर जीसस की माँ को लग रहा था कि अरुंधति उनसे उनका बेटा छीन रही है। इसे अरुंधति कहती हैं ‘इंडियन मदर्स ऑब्सेशन विथ देयर संस’। प्रेमी और स्वतंत्रता में रॉय स्वतंत्रता चुनती हैं और अकेले वापस दिल्ली आ जाती हैं। दूसरी बार सुरक्षित जगह खतरनाक बन जाती है प्रदीप शर्मा के साथ जब रिश्ता गहरा होता जाता है। वो गर्भवती होती हैं। गर्भपात की जिम्मेदारी प्रदीप लेने से मना कर देते हैं। वो पंचमढ़ी से वापस दिल्ली आती है। गर्भपात कराती हैं और बस पर धक्के खाते हुए, लफंगों को बर्दाश्त करते हुए वापस पंचमढ़ी आती हैं। रॉय अपने फिल्मकार पति के लिए स्क्रिप्ट लेखन में इतना व्यस्त हो जाती हैं कि अपने मन का लेखन नहीं कर पाती हैं। दूसरी तरफ प्रदीप की माँ को लगता है कि कहीं इस लड़की की नजर मेरे बेटे के पैसे पर तो नहीं है। प्रदीप पहले से शादीशुदा हैं और एक तरह से ओपन मैरिज रिलेशनशिप में हैं। इन सब के बीच अरुंधति खुद के लिए एकांत बनाती हैं, प्रदीप की बच्चियों को पूरा स्पेस देती हैं। अलग फ्लैट लेकर अपना लेखन करती हैं और जब वो अपनी लेखकीय पक्षधरता के कारण विवाद में आती हैं तब पति से तलाक लेकर उन्हें सुरक्षित कर देती हैं। इस तरह उन्होंने अपने अब तक के जीवन में जो सबसे सुरक्षित जगह रही पर जो आजाद स्त्री को स्वीकार करने में असमर्थ रही और बंधन बनने लगी उससे वे दूरी बनाती गईं।

    लेखन, पक्षधरता और विवाद:- वैश्विक नागरिकता का बोध

    इस संस्मरण में रॉय ने बताया है कि सीरियन ईसाई चर्च में दलितों को प्रवेश नहीं करने दिया जाता था। मेरी रॉय जब अस्पताल में थी तो उनको लगता था कि सारे डॉक्टर दलित हैं। इससे वो चिढ़ती थीं। ऐसा इसलिए था क्योंकि बचपन में सबलोग उनके बच्चे को दोगला, बिना पते का (बिना बाप का) ऐसे नामों से बुलाते थे। अरुंधति बचपन से जाति अवमानना को महसूस करती थीं। उनके उपन्यास और लेख में जाति पर जो सामग्री है वह उनका व्यक्तिगत अनुभव भी है। ‘गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ में एक सीरियाई ईसाई स्त्री का प्रेम दलित से दिखाया गया है। इस कारण से उनपर केस हुआ। वो लिखती हैं कि बचपन में वो कम्युनिस्ट का गुणगान सुनती थीं खासकर हो-ची-मिन्ह का। लेकिन, वे लोग कभी सोवियत गुलग, यूक्रेन के अकाल और चीन के द ग्रेट लीप की बात नहीं करते हैं। उनके जेहन में यह बात रही होगी। अपने उपन्यास में उन्होंने नंबूदरीपाद पर जो लिखा उसे केरल सरकार ने एन्टी-कम्युनिस्ट माना और केस हुआ। एक उपन्यास से एक ही राज्य में जाति और विचारधारा की आलोचना ने उन्हें विवादित बना दिया। वो इसकी कीमत चुकाती रहीं। दूसरी कीमत चुकाई ‘बैंडिट क्वीन’ में अत्यधिक रेप दृश्यों के आलोचना के कारण प्रदीप शर्मा से रिश्ता का खत्म होना। 

           नर्मदा बांध को वो ‘स्लो मोशन एक्सप्लोजन’ मानती हैं। इस कारण से मीडिया और सरकार के निशाने पर रहीं। कश्मीर और कश्मीरियों के मुद्दे पर उनका स्टैंड प्रो-मुस्लिम रहा है। इस किताब में दो घटना का जिक्र जरूरी है जो विवादस्पद और संदर्भहीन मालूम होता है। 1984 के दंगों का जिक्र करते हुए वो लिखती हैं कि ‘काँग्रेस के गुंडे और हिन्दू नेशनलिस्ट ने सिखों का जनसंहार किया’। निश्चित रूप से उस दंगों में काँग्रेस के समर्थक थे जो हिन्दू होंगे। लेकिन इसे अलग से ‘हिन्दू नेशनलिस्ट’ कहकर संबोधित करना एक विवादास्पद रणनीति है। उसी तरह वो अपनी माँ पर बनी डॉक्यूमेंट्री का जिक्र करती हैं। डॉक्यूमेंट्री बनाने वाले का नाम है राशिद तालिब। वो राशिद तालिब के बगल में कोष्ठक में जिक्र करती हैं (यह वह समय था जब मुसलमानों को मीडिया, व्यवसाय, हिंदुओं के पड़ोस से बाहर किया जा रहा था)। जबकि, यहाँ पर कोई राजनीतिक संदर्भ नहीं है। इस तरह से लिखना एक विवादास्पद शैली की पहचान है। अपनी राजनीतिक लेखन में उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं जिनमें सबसे महत्वपूर्ण है सिख दंगों के बाद कांग्रेस का बहुमत से सरकार बनाना। वो लिखती हैं “इस जीत ने राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों को यह विश्वास दिला दिया कि अल्पसंख्यकों की हत्या करके चुनाव जीते जा सकते हैं।” आज यह भारत की राजनीति में सर्वव्याप्त है।

    अरुंधति का लेखन जहाँ विवादस्पद है वहीं वैश्विक नागरिकता बोध से लैस भी है। अमेरिका के द्वारा अफगानिस्तान पर हमला का विरोध करती हैं। वह लेख अमेरिका में नहीं छपता है। वो अपनी रॉयल्टी का कुछ हिस्सा जनपक्षधर लेखकों, एक्टिविस्ट और फिल्मकारों को देती हैं। उनका ट्रस्ट है जो तभी तक चलेगा जबतक उनको रॉयल्टी मिलेगी। उनके उपन्यास और लेखन को एक राष्ट्र-राज्य के दायरे में सोचने से वे देशद्रोही लग सकती हैं जबकि वे केरल को बहुत प्यार से याद करती हैं। 

    इस तरह यह संस्मरण की किताब एक स्वाभिमानी, आत्मनिर्भर और आजाद  माँ-बेटी के रिश्तों के साथ रचनाकार के वैश्विक नागरिकता बोध की जरूरत और राष्ट्र-राज्य के राष्ट्रवाद के सीमाओं से भी अवगत कराती है।

    One thought on “जिजीविषा का संस्मरण है ‘मदर मेरी कम्स टू मी’

    1. बेसब्री से हिंदी अनुवाद का इंतजार है

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