• कथा-कहानी
  •     अंजू त्रिपाठी की कहानी ‘बिगड़ैल लड़की’  

    आज पढ़िए अंजू त्रिपाठी की एक मार्मिक कहानी- मॉडरेटर

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    लड़की कल दोपहर से लापता थी। वैसे तो आठ बजे के बाद से ही किसी ने नहीं देखा उसे। फिर भी अनुमान लगाया जा रहा है कि बारह बजे तक तो घर में रही ही होगी क्योंकि उसके गीले कपड़े गुसलखाने में पड़े हुए थे, और वो अभी भी इतने गीले थे कि जैसे दो-तीन घंटे पहले ही उन्हें उतारा गया हो। जब भी वह जल्दी में होती तो कपड़ों को एक कोने में फेंक देती थी।

    गली, मोहल्ले, पास के रेलवे स्टेशन, बस स्टॉप, उसकी पसंदीदा छोले कुलचे की दुकान और डिस्ट्रिक्ट पार्क- सभी जगह ढूंढ लिया गया, कहीं कोई अता-पता नहीं उसका।

    शाम ढलते-ढलते माँ की बेचैनी बढ़ गई। बेटी की चिंता में वह बेकल थी। पति घर पर नहीं था, तो माँ ने चुपके से लड़की के छोटे भाई को उसकी सहेलियों के घर पूछताछ करने भेजा।

    बाप बीच राह टकरा गया। पागलों सा बेटे को मारता हुआ घर लाया और फरमान सुनाया, “सुन रे लौंडे, कल से न स्कूल जाएगा, न खेलने! वरना हाथ-पैर तोड़ कर हमेशा के लिए घर में बैठा दूँगा!” माँ को भी धमकाया, “अब से तू भी घर में बैठ! इधर कुछ दिन काम पर जाने की सोची, तो चमड़ी उधेड़ दूँगा।

    वह मन ही मन तैयार था कि ये औरत जरूर लड़ेगी और तब इसकी खाल खींचूंगा, लेकिन जब वह कुछ नहीं बोली तो फिर से गरजते हुए बोला, “मातम काहे को मना रही है, उस हरामजादी के लिए? मुझे भी भूखा मारेगी क्या? तुझे बस बहाना चाहिए खाना न बनाने का। जिसको जाना था चली गई। थोड़े दिन बीत जाएंगे तब क्रिया-कर्म कर देंगे।”

    लड़की की माँ घरों में सफाई और बर्तन का काम करती थी, और आमतौर पर चार बजे तक घर लौट आती थी। पिता सब्जी की रेहड़ी लगाता था और सूरज ढलने के बाद ही घर लौटता। ज्यादातर वह सूरज डूबते ही रेहड़ी समेट लेता, क्योंकि ठेके पर लंबी लाइन लगी होती थी।

    वैसे तो एक बोतल रोज पीता था, पर कमाई थोड़ी अच्छी हो जाए, फिर कहना ही क्या… दो, तीन… मतलब जितनी अच्छी कमाई उतनी बोतलें। जब ज्यादा हो जाती थीं तब उल्टियां करके बीवी को परेशान कर देता था। दारू के साथ उसे चखने की भी जरूरत नहीं पड़ती थी। एक बोतल के बाद बीवी के साथ गाली-गलौज शुरू कर देता था। दूसरी, तीसरी बोतल अंदर जाते ही जैसे कोई दानव उसके अंदर समा जाता था। बोतल दर बोतल उसकी हैवानियत बढ़ती जाती थी। बच्चों के सामने ही बीवी के साथ जोर-जबरदस्ती करता। मना करने पर बल भर मारता।

    जब उसके अंदर का पिता जागृत अवस्था में होता, वह बच्चों को बाहर धकेल कुंडी लगा लेता और बीवी की देह को दरिंदगी से नोचता-खसोटता। किंतु जब बोतल का नशा यह भुलवा देता कि वह एक पिता भी है तो उनके सामने ही बीवी के ब्लाउज खींचने लगता और छाती मसलना शुरू कर देता था।

    लड़की अब बड़ी हो रही थी। जब पिता का ऐसा व्यवहार शुरू होता, वह अपने छोटे भाई को लेकर बाहर सीढ़ियों पर बैठ जाती। ठंडी सीढ़ियाँ, टिमटिमाते तारे, और माँ की चीखें—उसके बचपन की रातें इन्हीं से बनी थीं।

    लड़की और उसका भाई स्कूल साथ जाते। दोपहर में माँ-बाप काम पर होते थे। लड़की घर संभालती—खाना बनाना, भाई को खिलाना, कपड़े धोना। माँ-बाप की अनुपस्थिति में लड़की छोटे भाई की मम्मी बन जाती थी। टीवी खोलने की शर्त यही होती, जितनी जल्दी खाना खत्म होगा उतनी जल्दी टीवी खुलेगी।

    इन सब कामों के बीच अगर समय मिल जाता तो वह अपना होमवर्क पूरा करती थी, अन्यथा स्कूल में डांट सुनती और कक्षा के बाहर खड़ी रहती थी। लड़की पढ़ने में मध्यम से कम थी। हाँ, इतना जरूर पढ़ लेती, कि जैसे-तैसे पास हो जाती।

    वह शालीन और भोली इतनी थी कि अपनी और अपने घर की सारी बातें अपनी बहुत पक्की सहेलियों को बता देती थी। वही पक्की सहेलियाँ अपनी दूसरी बहुत पक्की सहेलियों को बता देती थीं… फिर इस तरह एक-एक करके पूरे स्कूल को। बस उसे नहीं पता होता था कि उसकी बातें किसी को मालूम हैं। वही बहुत पक्की वाली सहेलियाँ घर जाकर अपनी मम्मियों को और उनकी मम्मियाँ दूसरी मम्मियों को बता देती थीं। इतनी सारी मम्मियाँ अब वो बातें भी बतातीं जो उसके घर में कभी हुई भी नहीं होती थीं।

    पंद्रह वर्ष की लड़की पूरी तरह जवान हो जाती है! वो भी तब और जब घर में इस तरह का माहौल हो। उम्र की इस दहलीज पर हार्मोन्स पूरी तरह परिवर्तित होकर विपरीत लिंग की ओर चुंबक की तरह खिंचे चले जाते हैं। स्कूल, ट्यूशन, बाजार-हाट, शादी-विवाह, पूजा-कीर्तन कुछ भी हो, कहीं भी हो, कोई न कोई मिल ही जाता है, जिसको देखते रहने का दिल करता है। उसकी मोहब्बत भरी निगाहों के सहारे वह समय अच्छे से ही नहीं बल्कि बहुत जल्दी बीतता हुआ प्रतीत होता है, साथ ही कुछ दिनों के लिए दिल बहलाने का खुशनुमा सामान भी तैयार हो जाता है।

    उन दिनों लड़की बहुत सुंदर होती जा रही थी। मध्यम से थोड़ी ऊँची कद काठी, तांबई रंग, दुबली काया, लंबे बालों में दो चोटी, सुग्गे जैसी नाक तथा ठोड़ी पर काला मस्सा, उसके चेहरे को और भी खूबसूरत बना देते थे।

    आजकल वह आँखों में सुरमा भी डालने लगी थी। उसको देखकर यही मन में आता, जवान होती लड़कियाँ खुद को टिप-टॉप रखना भी सीख लेती हैं। काजल भरी आँखों के साथ उसकी झुकी हुई पलकें जब उठकर किसी ओर देखतीं तो लगता, मानों हिलोर मारता हुआ सागर पल भर के लिए ठहर गया हो।

    इश्क और तरुणाई दोनों साथ मिलकर दुनिया के किसी भी शय को निखारने की क़ुव्वत रखते हैं। लड़की आठ महीने से प्रेम में थी। प्यार मन से है तो वह सुंदर से सुंदरतम की ओर ले जाता है। लड़की दिन-दिन निखरती जा रही थी। उसकी कांति से सहेलियों को रश्क होने लगा था।

    लड़के को यह पता था, स्कूल से आकर लड़की कुछ घंटे घर में अकेली होती है, जब छोटा भाई खेलने चला जाता था। डरते-सहमते एक दिन निर्जन दोपहरी में लड़का उसके दरवाजे के सामने आकर खड़ा हो गया। लड़की उसको देख चौंकी कम, घबराई ज्यादा, कि कोई देख न ले। उसने इधर-उधर नजरें दौड़ाईं और झट से लड़के का हाथ पकड़कर भीतर खींच लिया।

    लड़की ने उसे बहुत फटकार लगाई, “इस तरह आओगे तो बदनामी होगी हमारी।”

    लड़का मायूस हो गया। जिसको हम प्यार करते हैं, उसे मायूस भला कहाँ देख पाते हैं? दोनों में से किसने पहला चुम्बन लिया यह कहना मुश्किल था। माथे पर पहला चुम्बन भरोसे का था फिर होंठों को छूते हुए पूरे शरीर के हर हिस्से पर दोनों ने एक-दूसरे के नाम लिखे। अभी तक दोनों मन से एक थे अब तन से भी एक हो चुके थे।

    जब तक किसी वस्तु, द्रव्य, सुविधा, साधन, क्रियाकलाप से अनजान रहते हैं, तब तक उस चीज की आवश्यकता भी नहीं होती है, किंतु एक बार यदि जान लिया इन चीजों के बारे में तो उसकी आदत लगते देर नहीं लगती। लाख कोशिश के बाद भी दोनों अपनी इंद्रियों को वश में नहीं कर पाए।

    आए दिन लड़का दरवाजे पर खड़ा हो जाता और तब तक खड़ा रहता जब तक कि लड़की उसे भीतर न खींच लेती। नाबालिग लड़की निखर रही थी। अपना तन-मन सौंपकर उसके साथ जीने-मरने की ख्वाहिश लिए अपने बालिग होने का इंतजार कर रही थी।

    लड़की के पीरियड्स में पहले भी एकाध महीने का गैप आ जाता था। उस समय डॉक्टर को दिखाया था, तब कारण था उसका एनीमिक होना। इस बार भी तीन महीने इत्मीनान से रही कि कमजोरी में ऐसा हो जाता है। इन दिनों उसको नींद बहुत आने लगी थी, थोड़ा संदेह भी था कहीं…?

    लड़का आज दोपहर आया तो पास के केमिस्ट से प्रेग्नेंसी किट भी खरीदकर लाया और लड़की के हाथ में रख दिया, “जाओ! अभी टेस्ट करो…”

    वैसे तो तरीका किट पर लिखा होता है फिर भी तसल्ली के लिए लड़के ने अच्छे से लड़की को समझाया।

    उसमें पड़ी दो लाइनों ने दोनों के होश उड़ा दिए। लड़का बिना कुछ कहे घर से निकल गया।

    बस इतने से गर्भ ठहर जाएगा, ऐसा दोनों ने सोचा नहीं था। शायद दोनों को पता नहीं होगा प्रिकॉशन लेने के बारे में या फिर यह भी हो सकता है कि जल्दबाजी में गलती कर गए होंगे।

    लड़का अब लड़की से कटने की कोशिश करता था लेकिन पगलाई लड़की कहीं से भी उसको ढूंढ निकालती थी। किसी भी जगह पकड़ कर, ‘अब आगे क्या?’ इसके बारे में सवाल-जवाब करती थी।

    ऐसी बातें भला माँ से कब तक छिपाई जा सकती थीं। बिटिया की गोल-मोल बातों से शक हुआ। फिर सख्ती से पूछताछ शुरू की। शुरूआत में ना-ना करती रही, जब चप्पल, झाड़ू नहीं सह सकी तो उसने माँ को सारी बातें बता दी।

    चोटी पकड़ कर उसका सिर झटकाते हुए माँ ने कहा, “किसी भी तरह से उसके पिता को यह बात पता नहीं चलनी चाहिए, अन्यथा वह पहले हम दोनों को मार डालेगा और फिर खुद भी मर जाएगा।”

    माँ ने निर्णय लिया, किसी भी तरह वह बेटी के कोख में पल रहे पाप को गिरवा देगी। इससे वो लोग बदनामी से भी बच जाएंगे।

    अगली सुबह, वह सभी काम करने वाले घरों में छुट्टी बोलकर बेटी के साथ सरकारी अस्पताल पहुंच गई। गेट पर खड़े होकर एक बार पीछे मुड़कर देखा, कोई जान-पहचान वाला तो नहीं है यहाँ। फिर उसने अपनी बेटी का हाथ कसकर पकड़ लिया और तेजी से भीतर दाखिल हो गई।

    “जल्दी चल!” माँ फुसफुसाई, मानो हर बीतते पल के साथ उसकी बेचैनी बढ़ रही हो।

    डॉक्टर कुर्सी पर बैठी फाइल देख रही थी। माँ ने धीरे से कांच के दरवाजे को धकेला और अंदर दाखिल हुई।

    “बताइए?” डॉक्टर ने बिना नजर उठाए कहा।

    दोनों माँ-बेटी चुप रहीं तो डॉक्टर ने फिर से कहा, “अपनी तकलीफ बताओ?”

    “डॉक्टर साहब, मेरी छोरी… वो… वो… इसका बच्चा गिरवाना है,” माँ ने धीमे से कहा।

    डॉक्टर ने फाइल बंद कर दी! पहले माँ की ओर देखा फिर एक नजर बेटी पर डाली जो कि कमजोर, सहमी हुई बैठी थी।

    “लड़की की उम्र?” डॉक्टर ने पूछा।

    माँ थोड़ा असहज हुई लेकिन संभलते हुए बोली, “पंद्रह साल से दो महीने ऊपर…”

    डॉक्टर गंभीर हो गई, “नाबालिग लड़की और चार महीने का गर्भ… देखिए, इस स्थिति में बच्ची के साथ किसी भी तरह का छेड़छाड़ करना कानूनन अपराध है। साथ ही पुलिस को भी खबर करना चाहिए। जिससे अगर कोई जोर-जबरदस्ती की गई है तो बच्ची को न्याय भी आसानी से दिलवाया जा सकेगा।”

    “पर… पर डॉक्टर साहब, आप किसी से मत कहिएगा, नहीं तो इसकी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। हम कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे।”

    डॉक्टर ने सख्त लहजे में कहा, “इससे लड़की की जान जा सकती है। शायद आपको मालूम नहीं है कि गलत तरीके से गर्भपात हुआ तो क्या हो सकता है? इंफेक्शन, जिंदगी भर की तकलीफ या फिर मौत भी?”

    “लेकिन अगर बच्चा पैदा हो गया तो हमारी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी! समाज हमें जीने नहीं देगा!”

    माँ के चेहरे का रंग उड़ गया।

    “समाज क्या कहेगा, यह सोचकर आप अपनी बेटी की जान खतरे में डाल देंगी?”

    माँ ने फिर से गुजारिश की, “आप ही कोई रास्ता निकालिए, डॉक्टर साहब!”

    डॉक्टर कुर्सी से उठकर लड़की के पास आईं, “तुम क्या चाहती हो?”

    लड़की कुछ देर चुप रही, फिर धीरे से बोली, “मुझे नहीं पता… लेकिन मैं मरना नहीं चाहती।”

    माँ स्तब्ध रह गई। उसने शायद पहली बार बेटी की आँखों में झांककर देखा था—वहाँ सिर्फ डर नहीं था, बल्कि जीने की बहुत सारी उम्मीद भी थी।

    डॉक्टर ने माँ की ओर देखते हुए कड़े शब्दों में कहा, “ये फैसला आपको नहीं, इसे लेना है। आप माँ हैं, लेकिन इसकी जिंदगी, इसकी अपनी है।”

    माँ के चेहरे पर कई भाव आते और जाते रहे। फिर एक गहरी चुप्पी लिए हुए दोनों अस्पताल से घर आ गईं। डॉक्टर के शब्दों ने माँ को अंदर तक हिला दिया था—“ये फैसला आपको नहीं, इसे लेना है।” वो पूरी रात इन्हीं शब्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही। समाज, बदनामी, ताने—इन सबका डर उसे अब भी था, लेकिन पहली बार उसने अपनी बेटी की आँखों में झांककर देखा था। वहाँ एक टूटा हुआ हौसला था, लेकिन साथ ही जीने की एक प्रबल चाह भी थी।

    रात के दूसरे पहर तक जब लड़की का बाप धुत्त होकर एक कोने में पड़ गया तब बिना बत्ती जलाए, माँ उठकर बेटी के पास आई और उसके बालों में उँगलियाँ फिराने लगी। पहली बार वह बेटी को किसी अपराधी की तरह नहीं, एक इंसान की तरह देख रही थी।

    “तू बता… अब क्या करें?” माँ की आवाज पहले जैसी कठोर नहीं थी। लड़की ने माँ के सीने से चिपटकर तसल्ली देते हुए कहा, “मैं लड़के से बात करूंगी, वह शादी के लिए जरूर मान जाएगा।”

    लड़की के बार-बार आग्रह करने पर, प्रेमी उससे मिलने दोपहर को उसके घर आया तो शादी की बात सुनकर पहले हड़बड़ा गया फिर उसने लड़की को सलाह दिया कि वह अपनी माँ को मेरी माँ से, हमारी शादी की बात करने के लिए भेज दे।

    लड़की की माँ ने मन मजबूत किया और लड़के के घर गई। लड़के की माँ ने स्वागत किया, क्योंकि उन्हें कुछ पता नहीं था।

    थोड़ी इधर-उधर, थोड़ी इनकी-उनकी चाय-चुगली के बाद लड़की की माँ ने कहा, “बहन जी, एक जरूरी बात करनी थी तुमसे।”

    “कहो…?”

    “तुम्हारा लड़का और मेरी लड़की एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते हैं”—आँख मूंदकर एक सांस में उसने कह डाला।

    “इसमें कौन सी नई बात है। मेरा छोरा है ही इतना सुंदर कि दुनिया भर की छोरियां उस पर जान देती हैं।”

    “असल बात वो नहीं है… कहने का मतलब है कि बात इससे आगे बढ़ चुकी है। मेरी लड़की को तुम्हारे लड़के ने पेट से कर दिया है।”

    “छि! तेरी जबान से ऐसा निकला भी कैसे? तेरी जनी है भी कि नहीं वो छोरी। भला कौन सी सगी माँ अपनी बेटी को इस तरह बदनाम करवाना चाहेगी। अपनी छोरी संभलती नहीं तो किसी पर भी दोष मढ़ देंगे…।”

    लड़का दरवाजे से सट कर सारी बातें सुन रहा था। उसे देखकर लड़की की माँ ने कहा, “छोरे, अब तो कुछ बोल दे, कब तक मुँह में दही जमाए बैठा रहेगा।”

    लड़के की माँ ने आँख तरेरी, वह अंदर दुबक गया।

    लड़की उम्मीद लिए हुए घर के बाहर सीढ़ियों पर बैठी थी। माँ का रुआंसा चेहरा देखकर वह समझ गई कि उधर से जवाब ना में मिला है। उसे फिर से निराशा ने अपनी जकड़ में ले लिया और मन ही मन तय किया कि अब वह इस जीवन को और नहीं ढोएगी।

    लड़की की मंशा माँ ने भांप ली थी। दुलारते हुए उसे समझाना शुरू किया, “अगर तुझे लगता है कि मर कर तू इन सबसे छूट जाएगी तो गलत सोच रही है। लड़के और उसकी माँ को बातें बनाने का और मौका मिल जाएगा।”

    लड़की की माँ अपना समय सोचने लगी कि आज के समय में बच्चा गिराना कितना मुश्किल हो गया है, जबकि जाने कितनी बार खुद वह भी दवाई खाकर बच्चे गिरा चुकी थी। दो से तीन दिनों में खून के साथ काले लोथड़े छोटे-छोटे टुकड़ों में बाहर आ जाते थे। शरीर, कमर और पेट में थोड़ी ऐंठन और मरोड़ होती थी। बस पांच दिन में काम खत्म। फिर से छक कर घर का काम करने लगती थी।

    लड़की को अगले दिन जाने क्या फितूर सूझी, वह खुद चली गई लड़के के घर, उसकी माँ से मिलने, “आंटी, हम दोनों की शादी करवा दो। मैं उससे बहुत प्यार करती हूँ और वह भी मुझे बहुत चाहता है।”

    माँ ने डपटकर बेटे को आवाज लगाई, “क्यों रे! इस छोरी को जानता है तू?” उसने ना में गर्दन हिलाई और भीतर चला गया।

    “तुम दोनों माँ-बेटी कितनी निर्लज्ज हो रे। माँ से बात नहीं बनी तो बेटी को ही भेज दिया। शुक्र मना कि हल्ला नहीं मचा रही हूँ।”

    लड़की हिम्मती और बेखौफ़ हो गई थी। इस तरह की ठोकरें उसे और कठोर बना रही थीं। गूंगी लड़की अब बोलने लगी थी।

    “आंटी, मचाओ शोर। कम से कम दुनिया भी जाने, मेरी अकेले की गलती नहीं है। इसके लिए जितनी जिम्मेदार मैं हूँ, उतना ही जिम्मेदार तुम्हारा बेटा भी है। फिर सजा किसी एक को क्यों मिले? दोनों को बराबर मिलना चाहिए।”

    “तू तो बड़ी छिनाल है रे! गज भर लंबी जबान तेरी। जाने किसका पाप लिए घूम रही है और नाम मेरे सीधे-साधे बेटे का लगा रही है।”

    लड़के की माँ ने पांच सौ के चार नोट लड़की के हाथ में जोर से पटकते हुए, “किसी नर्स के पास चली जा, इतने में वह बच्चा गिरा ही देगी।”

    “मम्मी गई थी… यहाँ आने से पहले ही डॉक्टर के पास। चार महीने का बच्चा है इसलिए मना कर दिया। प्लीज शादी करवा दो आंटी… मैं तुम्हारे पैर पड़ती हूँ। अगर ऐसा नहीं होगा तो मेरी मम्मी मर जाएगी।”

    “तेरी मम्मी की जगह कोई और होती तो ऐसा सुनते ही मर जाती। इस तरह भरे समाज में वह अपनी लड़की की इज्जत न उतरवाती।”

    लड़की ने डॉक्टर की बात याद की—पुलिस को बताने से न्याय मिलेगा। वह बेखौफ हो चुकी थी। लड़के के घर से निकलकर थाने गई। गेट पर कदम ठिठके, फिर हिम्मत जुटाई। महिला कांस्टेबल से बोली, “रिपोर्ट दर्ज करानी है।”

    “किस मामले में?”

    “मुझे एक लड़के ने धोखे से…” वह पूरी बात न कह सकी।

    “उम्र?”

    “पंद्रह।”

    “पंद्रह? रुको, साहब से मिलवाती हूँ।”

    सब-इंस्पेक्टर ने बुलाया। “कब हुआ?”

    “चार महीने पहले,” सिर झुकाया।

    “चार महीने पहले? अब आई हो?”

    आँखें छलकीं, वह चुप रही।

    “कोई साथ आया?”

    “कोई नहीं… लेकिन मुझे रिपोर्ट लिखवानी है।”

    “अकेली नाबालिग की रिपोर्ट न लिखी जाए। माँ-बाप के साथ आओ।”

    वह मिन्नतें करती रही, लेकिन समझा-बुझाकर घर भेज दी गई।

    लड़की घर पहुंची, माँ उसका इंतजार कर रही थी। बिना किसी लाग-लपेट के लड़की ने कहा, “मैं थाने गई थी लड़के के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने।”

    “तू ऐसी बिगड़ैल हो गई है रे छोरी! अकेले थाने चली गई। हमारे मुंह पर कितना कालिख पुतवाएगी। हाय रे मेरे फूटे करम… अब तू थाना, कचहरी करवाएगी हमसे, हमारी इतनी हैसियत ना है कि कोर्ट-कचहरी कर सकें। अपने बाप को जानती है न तू…।”

    “‌अच्छी तरह जानती हूं। अब तक इसने कौन सी इज्जत कमाई? तुझे रोज मारता है, हमें गालियाँ देता है। ऐसे बाप से तो बिना बाप अच्छा!”

    “चटाक…” माँ ने लड़की के गाल पर एक चांटा जड़ दिया।

    “इसी तरह मर्दों पर दया खाकर जाने कितनी औरतें रोज पिटती हैं और जान तक से हाथ धो बैठती हैं।” लड़की ने चोट खाए गाल को सहलाते हुए क्रोध में तमतमा कर कहा।

    माँ चुपचाप लड़की की बातें सुनती हुई जमीन पर बिछावन लगाने लगी। माँ को चुप देखकर बेटी ने कहा, “मैं कल फिर जाऊंगी, तू चलेगी न साथ?”

    लड़की की माँ चुप रही और दीवार के सहारे बैठकर छत की ओर देखने लगी। लड़की थोड़ी देर तक माँ की ओर टकटकी लगाए रही किंतु जब उत्तर के रूप में मौन मिला तो वह लेट गई।

    सुबह उठते ही लड़की ने फिर पूछा, “तू चल रही है न?” माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।

    रोज की तरह काम पर जाते हुए उसने लड़की से कहा “अपने कपड़े बैग में धर लियो, शाम को तुझे मौसी के घर जाना है।”

    वह माँ की सभी बातों को अनसुना करते हुए फिर से थाने पहुंच गई। चाहे जो भी हो उसे लड़के के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवानी ही है।

    बार-बार थाने में यह कहने पर कि रिपोर्ट लिखने के लिए माँ-बाप का साथ होना जरूरी है, उसने कहा, “उसके माँ-बाप ने उसे मरा हुआ समझ लिया है। वो लोग मेरे लिए अब से कुछ नहीं करेंगे।”

    “सुन लड़की! अब एक ही तरीका है तेरी रिपोर्ट लिखने का,” पुलिस ऑफिसर ने कहा।

    लड़की प्रश्नवाचक चिन्ह बनाते हुए सिर हिला कर ऑफिसर की तरफ देखने लगी।

    पेन और पेपर उसके सामने जोर से रखते हुए, “चल… लिख कर दे, कि तू अबसे अपने माँ-बाप के साथ नहीं रहना चाहती है। वह तेरा ख्याल नहीं रख पाते हैं, न ही तेरी कोई जरूरत पूरी कर पाते हैं। साथ ही किसी-किसी दिन तुझे भूखा भी रहना पड़ता है। चूंकि इस समय तू पेट से है इसलिए तेरे स्वास्थ्य और भोजन का पूरा इंतजाम होना बहुत जरूरी है।”

    “फिर… कहाँ जाऊंगी मैं?”

    “भिजवाऊंगी कहीं, किसी एनजीओ में।”

    लड़की तुरंत राजी हो गई, यह सब लिखने को। पुलिस अधिकारी ने तुरंत एक एनजीओ को फोन किया और सारी बात बताई। आधे घंटे के अंदर एनजीओ की दो महिलाएं पुलिस स्टेशन पहुंच गईं और लड़की को अपने साथ ले गईं।

    पॉस्को एक्ट के तहत अपराध दर्ज करते हुए रिपोर्ट लिखी गई। मेडिकल जांच हुई। आरोपी की गिरफ्तारी के आदेश निकले।

    दोपहर तक पुलिस ने लड़के को उसके घर से पकड़ लिया। उसे गाड़ी में धकेलते हुए इंस्पेक्टर ने कहा, “चल बेटा अब वहीं तेरी खातिरदारी होगी।”

    थाने पहुंचते ही दो डंडे उसकी पीठ पर जमाए गए। वह दर्द से चीख उठा- “साले! लड़की को अपनी जायदाद समझ रखा है तूने? जैसे, जब मर्जी होगी, इस्तेमाल करेगा? अब जिंदगी भर सड़ यहीं!”

    थोड़ी देर बाद लड़के के माँ-बाप भी थाने पहुंच गए। वे हाथ-पैर जोड़ने लगे। “साहब, हमारा बेटा अभी छोटा है… गलती हो गई… उसे माफ कर दो!”

    “छोटा? जब लड़की के साथ जबरदस्ती कर रहा था, तब छोटा नहीं था? ऑफिसर ने आँखें बड़ी करते हुए कहा।

    “साहब, रहम कर दो! मेरा बेटा जेल में नहीं रह पाएगा। उसे किसी तरह बचा लो!”

    ऑफिसर ने उसकी आँखों में देखा—वहाँ डर था, लेकिन अपराधबोध नहीं। “अगर बचाना है, तो लड़की से पूछो। यदि वह चाहेगी, तो ही कुछ हो सकता है।”

    लड़के की माँ तुरंत ंलड़की के घर गई और मिन्नतें करने लगी “मेरी बहु को बुला, उससे जरूरी बात करनी है।”

    ” बहू..?”

    “अपनी छोरी से बात करने दे, उससे कहो कि मेरे छोरे को बचा ले। दोनों की शादी धूमधाम से करवाऊँगी, रानी बनकर रहेगी वो।”

    “तूने ही मेरी बेटी गायब करवाई है न? और अब नाटक रचा रही है।” माँ चिल्लाई।

    “ना रे, मैंने कुछ नहीं किया, मेरे बेटे की सौंह।”

    माँ को शक हुआ— कहीं बेटी ने कुछ कर तो नहीं लिया? बहस बीच में छोड़कर वह थाने की ओर भागी। भय, करुणा, वेदना से लथपथ लड़की की माँ के मन में अनेकों डरावने ख्याल आ रहे थे जिसे वह चाहकर भी दूर नहीं झटक पा रही थी। थानेदारनी को देखते ही वह जोर से रोने लगी।

    “मैडम, मेरी छोरी खो गई है।”

    “कब?”

    ” दो दिन हो गए।”

    “अभी तक कहाँ थी?”

    “बदनामी न हो जाए, इसी डर से चुप थी।”

    जबसे लड़की के बाप को पता चला है कि माँ, बेटी की पूछताछ के सिलसिले में थाने गई थी तबसे वह रात भर बाहर रहता है और जब कभी घर आता तो कहर बरपाता है। हमेशा नशे में धुत्त रहता, गाली-गलौज तथा मार-पीट करता।

    उस रात नशा ज्यादा होने लगा तो वह गुस्से में बोतल छीनने लगी। छीना-झपटी में बोतल टूट गई तो उसने बौखला कर बाल खींच लिया और बाहर जाकर पटक दिया। खुद को बचा न पाने पर पत्नी ने चिल्लाकर कहा—“मैं पुलिस बुला लूँगी!”

    “हट, हरामजादी। पुलिस वाले तेरे यार लगते हैं, जो रात को बुलाएगी।”

    हर बार की तरह इस बार भी वह इसे कोरी धमकी समझ रहा था। इस बार लड़की की माँ ने पुलिस को फोन कर ही दिया। जैसे ही पुलिस आई उसके होश उड़ गए। वह गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए बीवी के पैरों में लोट गया। वह अबकी पति प्रेम में डगमगाई नहीं। पुलिस ने थाने ले जाकर खूब तबियत से उसकी खातिरदारी की तो जाने कितने जन्मों का प्यार याद दिलाने लगा बीवी को। यहाँ से किसी तरह घर ले चलने के लिए रिरकने लगा।

    अपनी बेटी के लिए माँ दिन भर थाने में बैठी रहती थी कि शायद कोई खबर मिले। उसकी हालत खराब होते देख, उसे लड़की के जीवित होने की बात बता दी गई। हजारों मिन्नतें की उसने, बहुत हाथ-पैर जोड़ने पर लड़की की माँ को अपनी बेटी से मिलने दिया गया।

    वह, उसे घर ले जाने की सिफारिश करने लगी, तब थाने में लड़की द्वारा दिए गए लिखित बयान के बारे में उसे बताया गया। सुनते ही माँ बेहोश होकर गिर पड़ी।

    पुलिस अधिकारी ने माँ को समझा-बुझाकर वापस घर भेज दिया कि तब तक लड़की उसी एनजीओ में रहेगी जब तक कि तुम्हारे घर में वह असुरक्षित महसूस करती है।

    अगले दिन तड़के लड़की की माँ फिर से थाने पहुंच गई। थोड़ी हील-हुज्जत, डांट-फटकार के बाद लड़की को थाने में फिर से बुलवाया गया। माँ के आंसू देखते ही वह पिघल गई और खुद भी रोने लगी।

    इंस्पेक्टर ने चेतावनी भरे अंदाज में लड़की की माँ से कहा, “यह ध्यान रखना, तुमने लिखित में दिया है कि हर हाल में अपनी बेटी का साथ दोगी।”

    “साहब अब मैं कमजोर नहीं पड़ूंगी, अपनी बेटी के लिए कुछ भी करूंगी।”

    लड़की जैसे ही बाहर आई, लड़के की माँ ने उसे अपनी दोनों बाहों में भरकर जकड़ लिया और उसे चूमती हुई तरह-तरह से लाड़-प्यार करने लगी।

    लड़की ने झटक कर लड़के की माँ को अपने से दूर कर दिया, “मुझे न तो तुम्हारे लड़के से कोई मतलब है, न सहानुभूति है और ना ही मैं कोई तुम लोगों से संबंध रखना चाहती हूँ।”

    लड़की का यह रूप देखकर, लड़के की माँ हैरान थी कि जो लड़की अब तक शादी के लिए मुझसे गिड़गिड़ा रही थी, वह भला कैसे इस तरह से उसे नकार सकती है।

    लड़की अपनी माँ के साथ घर आ गई। उस पर प्रतिदिन लड़के के परिवार की ओर से और समाज की ओर से दबाव बनाया जाने लगा। लड़के की माँ ने समाज के कुछ प्रभावशाली लोगों की मदद से कोशिश की, लड़की को समझा-बुझाकर अपने बयान से पलटने के लिए राजी किया जाए।

    कहानी लगभग समाप्त हो चुकी थी। लड़की के साथ जो कुछ हुआ, उसको नियति मानकर उसने फिर से जीना शुरू कर दिया था।

    किंतु खत्म हुई कहानी में फिर से चिंगारी फूट पड़ी जब थाने की महिला कांस्टेबल, जिसने उन दिनों लड़की का बहुत साथ दिया था, उसी ने फिर से उसको थाने बुलवाया।

    थाने के उस कमरे में हल्की सी धूप छनकर अंदर आ रही थी। लड़की, कांस्टेबल के सामने बैठी थी। वह चुपचाप अपने हाथों की लकीरें देख रही थी। उसे अपनी जिंदगी इन उलझी हुई रेखाओं की तरह बिखरी हुई प्रतीत हो रही थी।

    कांस्टेबल ने पानी का गिलास उसकी ओर बढ़ाया, “पानी लो‌ बच्चे।” लड़की ने गिलास पकड़ लिया, लेकिन पानी नहीं पिया।

    “तुम्हें फिर से बुलाने का एक कारण है, बेटा। हम तुम्हारी मर्जी के बिना कुछ नहीं करेंगे, लेकिन ये कुछ बातें हैं, जिन पर तुम्हें दोबारा विचार करना चाहिए।”

    पुलिस कांस्टेबल ने नरम आवाज में कहा।

    जब लड़की ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, तब फिर से उसने कहा, “देखो लड़की, पुलिस ने बलात्कार का केस फास्ट-ट्रैक कोर्ट में भेजने की तैयारी कर ली है। लड़के की गिरफ्तारी पक्की है। एक बार जब उसे सजा हो जाएगी फिर वह तुम्हारे हाथ से निकल जाएगा। वो लोग अभी भी कोशिश कर रहे हैं कि तुम अपने बयान बदल दो और मामला रफा-दफा हो जाए। वे तुम्हें अपनी बहु बनाना चाहते हैं। तुम्हें भी इस समय होशियारी से काम लेना चाहिए क्योंकि अभी तुम्हारे सामने पूरी जिंदगी पड़ी है और तुम्हारे साथ एक अजन्मा बच्चा भी है। उनके पास रुपए-पैसे की भी कोई कमी नहीं है।”

    लड़की ने एक लंबी सांस ली और अपनी मुट्ठी भींच ली, “मुझे लड़के के परिवार से कोई लेना-देना नहीं। न ही उनके पैसे से, न उनकी हमदर्दी से!”

    लड़की के बाप को कांस्टेबल ने पूरी तरह अपने शीशे में उतार लिया था कि उस लड़के के सिवा कोई और उसे अपनाना तो दूर की बात, देखेगा भी नहीं। अत: हर लिहाज से उस लड़के जितना अच्छा कोई और उसके लिए हो ही नहीं सकता।

    लड़की की माँ, बेटी के साथ थी किंतु जब उसे अलग-अलग लोग समझाने आते कि समाज में तुम लोगों की इतनी थू-थू हो चुकी है। भला अब कौन ही अपनाएगा उसे और उसकी नाजायज औलाद को। कैसे पालेगी अकेली बिन ब्याही माँ अपने बच्चे को। दुनिया जीने कहाँ देती है ऐसों को?

    कांस्टेबल लड़की की माँ को लगभग रोज ही समझाती, “थाने में आए दिन ऐसे केस आते हैं। अहम में आकर लड़कियां ऐसा निर्णय ले तो लेती हैं लेकिन बाद में स्थितियां संभाल नहीं पातीं। बहुत बार सब कुछ घर वालों पर छोड़कर खुद आत्महत्या कर लेती हैं और उनके लिए मुसीबत तैयार कर देती हैं। मेरी मानो तो दोनों को एक खूंटे से बाँध दो और सबसे बड़ी बात हींग लगे न फिटकरी रंग भी चोखो होय।”

    बेटी के लिए परेशान होकर वह भी कहने लगी, “भूल जा सब कुछ, ब्याह कर ले लड़के से, तू भी खुश रहेगी… हम भी खुश रहेंगे।”

    किसी भी तरह से लड़की मानने को तैयार न थी। मानों लड़की ने भीष्म पितामह की तरह कठिन प्रण ले लिया हो कि वह लड़के को किसी भी हालत में छुटकारा नहीं मिलने देगी। वह अडिग रही। अपने साथ हुए अन्याय पर उसे कोई समझौता नहीं चाहिए, न ही अपने दर्द और संघर्ष का मोल लगाकर वह किसी को शांति देना चाहती थी।

     लड़की को यह एहसास हो गया था कि न्याय की राह आसान नहीं होती, लेकिन वह हार मानने वालों में से नहीं थी।

    13 thoughts on “    अंजू त्रिपाठी की कहानी ‘बिगड़ैल लड़की’  

    1. उम्दा कहानीं । रियलिस्टिक पाॅवरफ़ुल अंत .. या कहें कि स्वाभिमान और हिम्मत के साथ.. एक नई लड़ाई की शुरूआत।

    2. बहुत बधाई इस कहानी के लिए अंजु जी… जागरूक करती कहानी

    3. Anju ji bahut hi sunder kahani hai.kintu kahani ka ant kaisa hoga.mera man bada vichilit hai.kripaya uchit margdarshan kare.

    4. ख़ुद को न्याय दिलाना दुनिया का सबसे दुरूह काम है । कहानी आरम्भ में अंत तक आते – आते
      सशक्त होती जाती है ।
      शुभकामनाएं अंजु, कलम रुकनी नहीं चाहिए ।

      1. अनिल जी मेरे विचार से कहानी का अंत यही होना चाहिए। जो मेरी नायिका निर्णय लिया है, कोई भी स्वाभिमानी लड़की ऐसा ही निर्णय लेगी।

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