कविता शुक्रवार 20: निशांत की कविताएँ सोनम सिकरवार के चित्र

‘कविता शुक्रवार’ की इस बीसवीं प्रस्तुति में युवा कवि निशांत की कविताएं और सोनम सिकरवार के चित्र हैं। वर्ष 2008 में कविता के लिए प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार निशांत को दिया गया था। किसी एक कविता को आधार बना कर दिए जाने वाले इस पुरस्कार के लिए समकालीन भारतीय साहित्य के जुलाई-अगस्त 2007 के अंक में प्रकाशित उनकी कविता, ‘अट्ठाइस साल की उम्र में’ को दिया गया था। जिसके निर्णायक नामवर सिंह थे। निशांत और उनकी कविता के बारे में नामवर सिंह का यह कथन उल्लेखनीय है कि बड़बोलेपन से बचते हुए यह कवि अपने आस-पास के जीवन से सीधे साक्षात्कार करता है।काव्य-भाषा पर भी कवि का अच्छा अधिकार है।
निशांत ने पिछले वर्षों में अपने को साबित भी किया है। उनकी कविताएं अपने समय के जीवन को चित्रित करती है। उनकी कविताओं का पहला संग्रह ‘जवान होते हुए लड़के का कुबूलनामा’ (भारतीय ज्ञानपीठ की युवा पुरस्कार योजना के तहत प्रकाशित) है। दूसरा संग्रह ‘जी हाँ, लिख रहा हूँ’ राजकमल से और तीसरा ‘जीवन हो तुम’ सेतु प्रकाशन से प्रकाशित है। निशान्त बांग्ला व हिंदी के बीच एक मजबूत सेतू भी हैं। बांग्ला कवि जय गोस्वामी और बुद्धदेव दासगुप्ता की कविताओं का तथा महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘अरण्येर अधिकार’ (जंगल के दावेदार पर आधारित इग्नू के एम.ए. के पाठ्यक्रम के लिए पाठ्य-सामग्री) का अनुवाद एवम अनन्त कुमार चक्रवर्ती की पुस्तिका ‘वन्दे मातरम् का सुर: उत्स और वैचित्रय’ का हिंदी में अनुवाद किया है। इसके अलावा ज्ञानरंजन की आठ कहानियों के संग्रह के हिन्दी से बांग्ला में अनुवाद में सहायक रहे है। रवीन्द्रनाथ टैगोर की 13 कविताओं पर आधारित फिल्म- त्रयोदशी में अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त फिल्मकार-कवि बुद्धदेव दासगुप्ता के साथ बतौर सहायक निर्देशक और अभिनेता कार्य किया है। आलोचना की पुस्तक ‘जीवनानंद दास और आधुनिक हिंदी कविता’ भी प्रकाशित है। वे कवि नज़रुल विश्वविद्यालय,आसनसोल पश्चिम बंगाल में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।
घूमने-पढ़ने, फिल्में देखने, गप्पे लड़ाने और गोलगप्पे खाने के शौकीन निशान्त स्वभाव से वैसे बेहद आलसी हैं।
आइए पढ़ते हैं उनकी नई कविताएं, सोनम सिकरवार के चित्रों के साथ-

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पानी मछलियों के रोने से बनता है
 
यह कुआँ बना है
एक छोटी मछली के आंख के पानी से
देखों वो अंदर टहल रही है
 
गांव का तालाब
झील, नदी समुन्द्र
उनके ही आंखों के पानी से बने हैं
चाची बतलाती और मेरा मुँह देखती
 
पानी से बाहर निकालते ही
वे मरने लगती हैं
वे हमलोगों के लिए रोती हैं
मेरे तुम्हारे और
तुम्हारी माँ के हिस्से का भी वहीं रोती हैं
 
रोना ही उनका काम है
है ईश्वर
है प्यार
 
बबुआ ई चिट्ठी
रामप्रसाद मास्टर जी को देना
कहना मछली ने लिखा है
सचमुच चिट्ठी के अंत में
एक सुंदर सी मछली टांक देती थी विधवा चाची
 
एकदिन चाची
घर के कुएं में मछली बन उतराई
 
आज जब मेरी बेटी
-मछली जल की रानी है
जीवन उसका पानी है…तुतलाती है
चाची की बात याद आती है
-पानी
मछलियों के रोने से बनता हैं
 
 
 
 
 
 
जिधर एक किसान थूक कर चला गया है
 
हाथी गड्ढे में बैठ भी जाएगा
तो गदहे से ऊंचा दिखेगा
 
उस किसान ने कहा
फिच्च से थूका
और अपनी राह पकड़ ली
 
मैं समझ नहीं पाया
यह मुहावरा किसके लिए है
उस ने खुद के लिए कहा है या
मुझ मास्टर के लिए
पेट्रोल पंप के मालिक को या
लानत मलामत करते हुए ईश्वर को
 
आज के आज
और अभी के अभी रिटायर करते हुए
मुख्यमंत्री
प्रधानमंत्री या
गांव के सरपंच के लिए या
उस पार्टी के लिए जिसकी सरकार
कल उसने उतार दी है
अपने एक वोट से
 
किसके लिए था
किसके लिए है
यह मुहावरा
 
जिसकी जिससे भी तुलना हो
मुहावरे में अर्थ तो है
काफी खतरनाक अर्थ है
आखिर एक किसान ने कहा है
और उसकी वह फिच्च की थूक
काफी आग लगानेवाली थी
पेट्रोल के बनिस्बत
घाटे की खेती में
रोजगारविहीन समय के जीवन में
जवान भारत में
जवान विश्व में
 
मैं तो एक डेग भी नहीं उठा पा रहा हूँ
उधर ही देख रहा हूँ
जिधर एक किसान थूक कर चला गया है।
 
 
 
 
 
 
बाजार के पक्ष में
 
( | )
 
कमरे से
दस रुपये की दूरी पर है एस एन मार्किट
बीस रुपये की दूरी पर सी पी
और एक बस बदल कर चांदनी चौक
 
महंगे मालों की महंगी दुकानों ने नहीं
साधारण बसों के साधारण किरायों ने
हमें असाधारण मनुष्य बनाया
एस एन पहुँचाकर
 
सचिन, रितिक, सानिया
विराट, धोनी और दीपिका पादुकोण जैसा ही दिखने लगे हम
सौ रुपये में टैग ह्यूजर की घड़ी
साठ रुपये में रे-बैन का चश्मा
ढाई सौ में री-बाक का जूता और
पांच सौ रुपए में रेमंड्स का कोट पहनकर
नरेंद्र मोदी और कोविद जैसा कुछ महसूसने लगी हमारी त्वचा
 
ये बाजार न होता तो हम मनुष्य है
इस पर हमें विश्वास न होता
 
हमारी आत्मा शर्म में डूबकर मर जाती
कर्ज की दुकान में जिस्म ऐंठ कर दम तोड़ देता
अपने ही हाथों से हमारे बच्चे अपना गला घोंट लेते
दस रुपए के साधारण किराए ने उन्हें एस एन पहुँचाकर
आत्महत्या करने से बचा लिया
हमें शर्म में डूबकर मरने से भी
 
( || )
 
कमाने को हम तो इतना कमा ही लेते थे कि
पेट भर जाए तन ढक जाए
पर मामला पेट भरने और तन ढकने का नहीं था
वह तो रिक्शावाला रेहड़ीवाला और
गली का पियक्कड़ रामलाल तक भर ढक लेता है
 
हम तो सरकारी बड़ी नौकरियों
जिसमें पैसे बरसने की इफ़रात जगहें निकलती है
एम एन सी कम्पनियों
जिसमें एक पैर हमेशा हवाई जहाज में होता है
बड़े उद्योगपतियों मसलन टाटा, बिरला, अम्बानी
जो खरीद ले धोनी, सचिन, विराट को या फिर
कैटरीना, ऐश्वर्या, दीपिका जैसा कुछ दिखना चाहते हैं
 
सुंदर और समृद्ध बनने की सारी कोशिशों के बाद
जब भाग्य से हारने लगता है जीवन
तब यही बाजार ऑक्सीजन बन आता है सामने
मरने की चाहत जिंदा हो जाती है
सुंदर और समृद्ध दिखते हैं हम यहाँ आकर
 
उनके जैसा न बन पाने का दुख
उनके जैसा दिखने से कम करना चाहते है हम
 
हम गरीबी रेखा से ऊपर के हैं
पर कैटल क्लास जैसा दिखते हैं उन्हें
हमें बचाए रखना पड़ता हैं अपना आत्म सम्मान
हवा से भी ज्यादा जरूरी आत्म सम्मान
 
एस एन मार्केट ने
समय समय पर पहुचाया है जरूरी ईंधन
आत्म सम्मान को बचाए रखने के लिए
 
दस रुपये की दूरी पर है एस एन मार्किट
बीस रुपये की दूरी पर सी पी
और एक बस बदल कर चांदनी चौक दिल्ली में
और दिल्ली के बाहर पटना
कोलकाता, हैदराबाद, लखनऊ, औरंगाबाद में भी
बस नाम बदल जाता है
माल वही रह जाता है
 
ये बाजार न होता तो हम मनुष्य है
इस पर हमें विश्वास ही न होता।
 
 
 
 
 
 
 
 
आज पन्द्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी है
 
चाँद उतरकर कमरे में आ गया
तब दोपहर के बारह बज रहे थे
 
सर के ऊपर से
एक बड़ी सी मछली उड़कर
अमेरिका चली गई
 
हवाएं चलती तो नदी भी चलती
जहां हवाएं रुकती
नदी वही बहने लगती
 
सिनेमा हाल के पर्दे से डीलक्स निरोध का विज्ञापन
धमाके के साथ आकर
सिनेमा हाल के बाहर गिरा
उसके बगल से
सिगरेट पीती हुई एक लड़की चली गई
खट खट खट करते हुए
 
धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है
सिगरेट के पैकेट पर चमाचम विज्ञापन छपा था
 
एक पेड़ के बगल में
एक आदमी की थकान खड़ी थी
पेड़ काला था और थकान पीली
काला और पीला दो रंग मिलकर भगवा हो गए
 
भगवा रंग एक आदमी के सूट में चमक रहा है
एक औरत के साड़ी के पल्लू में
एक मोटा भाई के चेहरे पर
 
आज पन्द्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी है
भारत एक स्वतंत्र और गणतंत्र राज्य है।
 
 
 
 
 
 
 
मन की बात
एक तितली के लिए
मन बहुत खराब हो गया
 
पोती आई
खनककर बोली
“ग्रांड पा, ग्रांड पा यह देखिए
कितनी सुंदर तितली
मेरी प्यारी तितली
कल इसे स्कूल ले जाऊंगी
मिस को इसे दिखाउंगी।”
 
हथेली पर तितली
अंतिम सांस के लिए लड़ रही थी
 
तीन दिन से
कांप कांप कर करवट बदल रहा हूँ
तितली को बचा लिया है
इस पीढ़ी को कैसे बचाऊँ ?
 
खिलौना हो या तितली
सबको अपनी मुट्ठी में बन्द करने की यह प्रवृत्ति
डॉक्टर साहब इसका कुछ हल बतलाए ?
बहू इसको समझाओ !
मिस यह ऐसा कैसे कर सकती है ?
 
डॉक्टर
बहू
अध्यापिका ने मुझे सनकी बुढ्ढा
घोषित कर दिया है
 
जवाहर होता तो
इसे लेकर
उस से मिल आता
जितना भी बड़ा नेता हो
बच्चों की मन की बात झट से
समझ लेता था
अपने मन की बात
किसी पर नहीं थोपता था
 
ओह हो!
अब समझ में आया
हत्यारे को बच्ची प्रधानमंत्री समझती है
उसकी बातों का तो नहीं
उसके मन का प्रभाव
उस पर पड़ रहा है
 
यदि आप सुन रहे है मेरी बात
तो सबसे पहले बन्द कीजिये सुनना
मन की बात
 
 
 
 
 
 
 
मेरे ठेंगे से
मान लो जी माना कि
मैं जरा ज्यादा चरित्रहीन हूँ
हूँ जरा ज्यादा ही लम्पट
 
जरा ज्यादा प्रेमी
जरा ज्यादा चाहनेवाला
जरा ज्यादा लोभी
जरा ज्यादा भोगी
 
जरा जरा मुझ में अतिरिकत्ता है
जरा जरा बदमाशी
जरा सी शराफत
 
मैं वह सब कुछ हूँ
जो होना चाहिए
 
ओ नहीं हो पा रहा हूँ
जो आप मुझ में चाहते हो
जो ओ मुझ में चाहता है
जो पत्नी मुझ में चाहती है
जो प्रेमिका मुझ में चाहती है
जो पार्टी मुझ में चाहती है
जो सत्ता मुझ में चाहती है
जो प्रधानमंत्री मुझ में चाहता है
 
जो मैं नहीं हूं
ओ मैं नहीं हूं
मेरे ठेंगे से।
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सोनम सिकरवार : बीज जहाँ सम्पूर्ण हैं
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– राकेश श्रीमाल
 
बचपन से ही शुरू हुई कुछ दिलचस्पियाँ जीवन भर बनी रहती है। निश्चित ही वह परिष्कृत भी होती जाती हैं। विशेषकर तब, जब उसे जीवन की धुरी बना ली जाए। सोनम सिकरवार के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। उन्होंने बचपन से ही ड्रॉइंग क्लास जाना शुरू कर दिया। वे स्कूल में होने वाली प्रतियोगिताओं में भाग लेते रहती थी, जिसमें उन्हें कई पुरस्कार भी मिले। उन्हें अच्छा लगता था रंगों से खेलना। देवी देवताओं के चित्र उन्होंने बचपन में बहुत बनाए। उन्होंने वे ड्राइंग कॉपी अभी तक संभाल कर रखी हैं। घर में बड़ी दी उन्हें बहुत सपोर्ट करती थी। जिसकी वजह से उनका मन कला में लगा रहा। 12वी कक्षा में भी फाइन आर्ट विषय चुना और कला संकाय में मेरिट में नाम आया।
वे घर में आर्ट क्लासेज भी लेती थी और बहुत सारे बच्चे सीखने आते थे। कॉलेज में भी उन्होंने फाइन आर्ट विषय लिया। फिर उन्होंने भारत भवन जाना शुरू किया। भोपाल में रहने का यह फायदा उन्हें हुआ। भारत भवन जाने से कला के विस्तार रूप को देखने-समझने का अवसर मिला। जिसके बारे में पहले कोई जानकारी उन्हें नहीं थी। भारत भवन में देशभर के कलाकार और कला छात्र आकर काम करते थे। सोनम जब वहाँ गई, तब वहाँ के ग्राफिक स्टूडियो के इंचार्ज वरिष्ठ चित्रकार युसूफ थे। उन्होंने सोनम को बच्चा समझ कर भगाना चाहा। पर फिर जिद के कारण उन्हें काम करने की अनुमति मिल ही गई l
उनकी कला को देखने की नजर वहीं से बनी। यूसुफ वहाँ कलाकारों से बहुत सारी बातें करते थे। जिससे उन्हें बहुत कुछ समझने को मिला। यूसुफ ने उनसे कहा, काम करो। क्या करो ये नहीं पता था। बस फिर शुरू हो गया उनका काम करना। कुछ ढूंढना, छोटे छोटे कागज पर टेप लगा कर काम करना। वहाँ और नए कलाकार भी काम करते थे। एक चुनौती होती थी कि कौन कितने ज्यादा काम करेगा। रोज उन्हें कुछ काम करके दिखाना होता था। रोज उन्हें यही सुनने को मिलता था कि और करो, और करो, आएगा, काम निकलेगा। काम करते करते आखिर वह दिन आ ही गया, जब सोनम के यूसुफ सर को काम पसंद आया। एक दिन जब यूसुफ ने पूछा कि यह किसके काम है। वे डरीं, लगा कि कुछ गलत हुआ है। लेकिन यूसुफ ने कहा ये तो तुमने अच्छा काम किया है।
वे अमूर्तन में ‘जड़ और बीज’ को लेकर काम करती हैं। ये बीज प्रकृति में पाए जाने वाले बीजों से भिन्न है, किन्तु स्वयं बीज होने का आभास देते हैं। संसार की लगभग सभी वस्तुओं का जन्म कहीं न कहीं किसी बीज की संरचना से ही हुआ है। इन बीजों को वे अपने अमूर्तन में बरतती हैं और रंग-रेखा के संयोजन से उनमें दिखते दृश्य को अदृश्य में बदल उसका एक नया अर्थ गढ़ती हैं। अपने चित्रों के बारे में उनका कहना है कि- “इन बीजों के साथ मेरी कहानी बचपन से ही शुरू हो गई थी। गॉंवों में अक्सर खेती होते देखती थी। कई तरह के बीजों को फसलों, पेड़- पौधों में बदलते देखा। तब मुझे नही पता था कि ये बीज मेरी कला का हिस्सा बन जाएगें। इस सृष्टि का सृजन इन्ही बीजों की कहानी में छुपा है। इन बीजों को मैं जन्म लेने वाली हर वस्तु मे देख पाती हूँ। जब से ये बीज मेरी कला का हिस्सा बने हैं, इनको मैं और अच्छे से समझने लगी हूँ। इनकी संरचना में, अपनी कल्पनाओं से इनके अन्दर भ्रमण करने की कोशिश करती रहती हूँ। इनके पल-पल बदलते बदलाव की छवि अपने चित्रों में उकेरती रहती हूँ। ये बीज ही भविष्य की दुनिया से जोड़ने का मेरा माध्यम हैं। वैसे तो हम को पता है कि दुनिया में जिस तरह के बदलाव हो रहे हैं, वहाँ एक सुंदर भविष्य की करना मुश्किल है। मानव प्रजाति अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति को प्रभावित कर रही है और उसके संतुलन से खेल रही है। इसका परिणाम अच्छा तो नहीं होने वाला है।”
एक कलाकार होने के नाते अपनी चिंताओं को वे अपने सृजन में उकेरती हैं। आखिर कोई कलाकार इससे अधिक अपनी अभिव्यक्ति अन्यत्र कहीं प्रस्तुत नहीं कर सकता। पर्यावरण का सतत क्षरण हमारे समय की बड़ी समस्या हैं। अगर उसके लिए फिक्र कैनवास पर हो रही है, तो भी उसका स्वागत होना चाहिए, यह जानते हुए भी कि इससे जमीनी हकीकत बदलने वाली नहीं है।
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राकेश श्रीमाल (सम्पादक, कविता शुक्रवार)
कवि और कला समीक्षक। कई कला-पत्रिकाओं का सम्पादन, जिनमें ‘कलावार्ता’, ‘क’ और ‘ताना-बाना’ प्रमुख हैं। पुस्तक समीक्षा की पत्रिका ‘पुस्तक-वार्ता’ के संस्थापक सम्पादक।
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