आज बीसवीं सदी के बड़े शायरों में एक नासिर काज़मी की जन्मशताब्दी है। आज पढ़िए उनकी डायरी का एक अंश जिसका उर्दू से हिन्दी में लिप्यंतरण किया है दिल्ली के युवा शायर और दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी अभिषेक कुमार अम्बर ने। नासिर काज़मी की डायरी का यह अंश हिन्दी में पहली बार ही प्रकाशित हो रहा है। जल्द की यह पुस्तक के रूप में प्रकाशित होने वाली है। फ़िलहाल आप यह अंश पढ़िए- मॉडरेटर
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1925, 8 दिसम्बर, हफ़्ता अली अल-सुब्ह अपने नाना मरहूम के घर मुहल्ला क़ाज़ी-वाड़ा में पैदा हुआ। मिस डेविस, मिसेज़ स्काटलर, मिस ज़हरा, मिस मैरी और मेरी वालिदा की दीगर सहेलियाँ इस मौक़ा पर मुबारकबाद देने के लिए आईं। मिशन गर्ल्स स्कूल मेरे नाना के घर के सामने था। उस दिन स्कूल में छुट्टी हो गई थी। मेरे दादा का मकान मुहल्ला हाशमी में, जो उनके बड़े भाई के नाम पर है, अम्बाला में था।
घोड़े, कुत्ते और दूसरे जानवर रखने का शौक़ मेरे दादा और वालिद को बहुत था। मेरे दादा सैयद शरीफ़-उल-हसन पुलिस इंस्पेक्टर थे। और नसीरपुर, मगरपुरा और राजगढ़ के बहुत बड़े ज़मींदार थे। और अम्बाला के चंद नामवर रईस में से थे।
मेरे वालिद सैयद मुहम्मद सुल्तान बी.ए. तक तालीम हासिल, लाहौर में इस्लामिया कॉलेज में, नायब तहसीलदार रहे और सब सब-इंस्पेक्टर पुलिस भी हुए। लेकिन मुलाज़मत की तरफ़ से उनका दिल उचाट था। घुड़सवारी का शौक़ उन्हें बहुत था। 25 साल की उम्र में महकमा सप्लाई फ़ौज में मुलाज़िम हुए। तुर्की, बलूचिस्तान, इराक़, अरब और मिस्र में रहे। जनरल टायसन के दफ़्तर सूबेदार मेजर रहे।
निहायत ही नमाज़ी, आबिदे-शब ज़िन्दा-दार मुख़लिस, ईमानदार थे। ऐसे लोग दुनिया में बहुत ही नायाब हैं। लाहौर में 29 मई 1949 की सुब्ह को सर गंगाराम हस्पताल में जिगर और मेदे की बीमारी से फ़ौत हुए। मरते हुए वो मुझे कह रहे थे कि नासिर मेरा नाम ज़िन्दा रखेगा और उर्दू अदब उस पर नाज़ करेगा।
मेरी वालिदा अम्बाला शहर में सबसे पहले सीनियर पास करके मिशन गर्ल्स कॉलेज में मुअल्लमा हुईं। मीर तक़ी, मीर अनीस और मीर हसन की ख़ास मद्दाह थीं। 26 नवम्बर 1949 की सुब्ह को दिमाग़ की बीमारी से चल बसीं। मासूम, नेक, नमाज़ी और रहम-दिल औरत थीं।
मैंने पाँचवी जमाअत तक मिशन गर्ल्स स्कूल में और बाक़ी वालिदा मरहूम के ज़ेरे-साया तालीम हासिल की। 12 बरस की उम्र में क़ुरआन ख़त्म किया। 13 बरस की उम्र में गुलिस्तान, बोस्तान, शाहनामा फ़िरदौसी, क़िस्सा चहार दरवेश, फ़साना-ए-आज़ाद, अलिफ़ लैला, सर्फ़-ओ-नहव और शाइरी की दीगर किताबें ख़त्म कर लीं।
पाँचवी और छठी जमाअत मैंने नेशनल हाई स्कूल पेशावर में पास की। मास्टर पृथमीचंद, पंडित हेमराज, हेडमास्टर भेजामल, मौलवी इनायतउल्लह और मास्टर मूलचंद मेरे उस्ताद थे। पेशावर में ज़ुल्फ़िक़ार अली, वहीदुद्दीन और रतन लाल मेरे हम-जमाअत थे और मेरे ख़ास दोस्त थे।
रतन लाल सिनेमा हॉल में क़ल्बी हरक़त बंद हो जाने से जाँ-ब-हक़ हुआ और बाक़ी न जाने कहाँ हैं।
पेशावर में वज़ीर बाग़, शाही बाग़, क़िला-ए-अकबर मेरी पसंदीदा सैर-गाहें थीं। शाही बाग़ में चिड़िया, चमूने और तोते पकड़ा करता था। कबूतर पालने का शौक़ मुझे बचपन से था। और उनके मुतअल्लिक़ ग़ैर-मामूली मालूमात रखता था। अम्बाला में दूर दूर के रईस मेरे कबूतरों की ज़ियारत को आते थे और सुब्ह के वक़्त जब मेरे कबूतर उड़ते थे, शहर में धूम मच जाती थी।
मेरे वालिद, वालिदा और नानी मरहूमा मेरे कबूतरों का ख़ास ख़याल रखते थे, मेरी नानी अमीर बीबी हरचंद ना-बीना थीं लेकिन मेरे कबूतर और मेरी बिल्ली उनसे बहुत मानूस थे। हिजरत के वक़्त 13 अगस्त को मैं अपने तमाम कबूतर बावा संत सिंह रईस-ए-अम्बाला को दे आया था। ना-मालूम अब किस हाल में हैं। उन कबूतरों की नस्लें अब हमारे मुल्क़ में नायाब हैं।
घुड़-सवारी का मुझे बेहद शौक़ है, ज़िला अम्बाला और पटियाला के तक़रीबन 150 गाँव और पंजाब (गुज़राँवाला, लाहौर, पतोकी, शेख़ूपुरा) के बेशतर गाँव मैंने घोड़े पर सफ़र करते हुए देखे। शिमला हिल्स, डगशाई, जतोक, कोटगढ़, कसौली, सपाटो(सुबाथु), कुमारहट्टी, धरमपुरा, देहरादून, मसूरी, मुरी, डलहौज़ी, ऐबटाबाद, कश्मीर की सैर की।
सातवीं और आठवीं जमा’अत मैंने डी. बी. मिडल स्कूल, डगशाई से पास किये। उस स्कूल में आठवीं जमा’अत नहीं थी लेकिन मेरे वालिद की कोशिश से ये जमा’अत शुरू हुई। डगशाई आठवीं जमा’अत में हम सिर्फ तीन नालिवे-इल्म थे। ताराचंद और रतन लाल पिसर (पुत्र) शामलाल मेरे हम-जमाअत थे। नन्दकिशोर हमारे हेडमास्टर थे। सपाटो में मैंने वर्नाकुलर फाइनल मिडल स्कूल का इम्तिहान दिया और ज़िला शिमला में अव्वल रहा और वज़ीफ़ा हासिल किया।
नौवीं-दसवीं मैंने मुस्लिम हाई स्कूल अम्बाला से पास की। इस अरसा में वालिद साहब और वालिदा से दूर रहा और अक्सर स्कूल से भागता था। क्योंकि मौजूदा तालीम का तरीक़ा ना-पसन्द था और घण्टे के वक़्त पर बजने से सख़्त चिढ़ थी।
स्कूल से भाग कर मैं, मुहम्मद अली, इफ़्तिख़ार…बैरों, अनारों, आमों, अमरूदों के बाग़ उजाड़ते। एक दफ़ा हम ने अमरूदों के बाग़ में आग लगा दी और उस दिन के बाद बाग़ का माली कभी न सोया। फिर एक दफ़ा बिल्वों का बाग़ उजाड़ा। बहेड़े वाले पीर और पंज-पीरों के मज़ार पर बैठ कर हम बैर और आम खाते थे। इफ़्तिख़ार मेरे बचपन का दोस्त है और हिजरत कर के सरगोधा में मुक़ीम है।
एक दफ़ा स्कूल के मास्टर ज़ुहूर-उल-हसन बुख़ारी हमारे पीछे बेंत लेकर दौड़े, कई तलबा भी साथ थे लेकिन हम हाथ न आए और लड़कों को चाकू दिखा कर भगा दिया।
मौसीक़ी से मुझे ख़ास रग़बत है। एक दफ़ा उस्ताद अब्दुल अज़ीज मरहूम से सितार और सारंगी सीखने की कोशिश की लेकिन मेरा कॉलेज खुलने पर हसरत दिल में रह गई और इसी अस्ना (दरमियान) में उस्ताद फ़ौत हो गए।
शाइरी में मेरा सही उस्ताद मेरी वालिदा थीं और वैसे आग़ाज़ में कुछ अहबाब से मशवरे भी लेता रहा हूँ और हफीज़ होशियारपुरी ख़ास तौर पर क़ाबिले-ज़िक्र है।
इश्क़, शाइरी और फ़न यूँ तो बचपन ही से मेरे ख़ून में हैं लेकिन इस ज़ौक़ की परवरिश में मेरे एक-दो मुआशिक़ों का बड़ा हाथ है। 1937 ई. में जब मेरी उम्र 13 बरस की थी पहली बार मुझे दिल में एक ख़लिश महसूस हुई। इस की ज़िम्मेदार एक फूल सी लड़की थी जिसका नाम हुमैरा था। और उसे सब ‘बालो’ कहकर पुकारते थे।
मेरे वालिद डगशाई में मेजर जनरल पींगले के सुपरिटेंडेंट थे। वहाँ हमारे मकान के साथ एक ड्राई-क्लीनर रहता था। ये फ़ितना उनके घर से उठा और आज तक दामनगीर है। हुमैरा अब याद तो नहीं लेकिन भूली भी नहीं। यहाँ से मेरी शाइरी का आग़ाज़ हुआ। उन दिनों मैं नन्ही-मुन्नी नज़्में कहता था और अख़्तर शीरानी मरहूम के शेर बहुत चाव से पढ़ता था लेकिन वालिदा के इसरार पर ग़ज़ल शुरू की। खुद हुमैरा भी ग़ज़ल की शैदाई थी और वालिदा से गुलिस्तान, बोस्ताँ और क़ुरआन पढ़ने आती थी।
एक दिन वालिदा बाहर थी और हम एक दूसरे की शोख़ आँखों का शिकार हो गए। वह मुझ से लिपट गई। उस की ख़ुशबू से अभी तक मेरा दिमाग़ महका हुआ है। हम दिन भर इकट्ठे पढ़ते। पढ़ते तो क्या लेकिन दिखाने को किताब हमारे सामने होती। वैसे वालिदा साहिबा हमारी दिलचस्पियों से आगाह थीं और वो ख़ुद भी ख़ुश थीं लेकिन वालिद साहब की तबीअत और दीगर मजबूरियों की वजह से ख़ामोश थीं।
वो अकसर हुमैरा की तारीफ़ करती और उसी ज़िक्र में हम सो जाते। पहाड़ों की बर्फ़ीली रातें उस के क़ुर्ब में गुज़रती। हम भँवरों की तरह फूलों के गीत गाते, बर्फ़ से खेलते और सरे-आम मिलते। पहाड़ों की मग़रूर सुनहरी चोटियाँ हमें रश्क से देखती। दिन-रात, हफ़्ते, महीने गुज़र गए। हमारी मुलाक़ातों के चर्चे होने लगे। एक दूध बेचने वाली मुझे घूर-घूर कर देखती। यहाँ तक कि मेरे वालिद का तबादला हो गया और मेरे कॉलेज के दिन आए लेकिन मैंने वालिदा को वहाँ रहने पर मजबूर किया।
बरेली में मेरी उम्र ढाई साल थी। कर्नल बोस्टाक विलसन के साथ वालिद साहब हेड-क्लर्क थे। दो खच्चरों वाला बड़ा ताँगा हर वक्त मेरे लिए तैयार रहता था। मुहम्मद्दीन मेरा चपरासी था। वह मुझे कंधों पर बैठा कर कम्पनी बाग़ की सैर कराता । लाल सिंह और पीर ख़ाँ वालिद साहब के दोस्त थे।
एक दिन मैं, वालिद साहब और लाल सिंह दीगर दोस्तों के हमराह शाम के वक़्त रेलवे लाइन के पार शिकार खेलने गए। एक तालाब के किनारे सियाह मुर्ग़ाबियों का जोड़ा बैठा था। वालिद साहब ने गोली चलाई। उन में से मादा पानी में गिर गई। मुहम्मद्दीन ने बाहर निकाल लिया। वो अभी ज़िन्दा थी। घर में पलंग के नीचे छोड़ दी। रात को उस की पुलाव बनाई। मुर्ग़ाबी का नर तन्हा रह गया और दूर तक हमारा पीछा करता रहा। वालिदा हम पर नाराज़ हुईं और वालिद साहब ग़ालिबन फिर शिकार पर नहीं गए।
बरेली में बंदर बहुत थे। एक दिन वो मेरी मिठाई लेकर चले गए और मैं देर तक उन का पीछा किया। आख़िर मैंने अपनी प्लेट वापस ले ली। कर्नल बोस्टाक विल्सन के बाद कर्नल राएस आया, वह मेरे वालिद का बहुत दोस्त और मेहरबान अफ़सर था मुझे बहुत प्यार करता था।
उसके बाद नौ-शहरा छावनी में वालिद साहब का तबादला हुआ। वहाँ हम शहर से दूर एक सरकारी बंगले में रहते थे। रात को गैंडा और दूसरे जंगली जानवर हमें सोने न देते। एक दिन में रीछ की बार में अपने दोस्तों के साथ चला गया और दोस्त मुझे तन्हा छोड़ कर चले आए। अगर वालिद साहब वक़्त पर न आते तो उर्दू अदब एक शाइर से महरूम हो जाता।
एक दिन वालिदा, वालिद और मैं सर्कस देखने गए। हमारे पड़ोस में एक सूबेदार रहता था जिसका नाम नेक ख़ान था। वो अपनी बीवी को बहुत मारता था। आख़िर मेरे वालिद की मुदाख़िलत से वो बा’ज़ आया। बीती को मारने की वजह ग़ालिबन उसका ला-वलद (बे-औलाद) होना था।
इसके बाद दादा जान डेरा इस्माईल ख़ान गए। मैं, मेरी बड़ी बहन हमीदा, वालिदा और वालिद और हमारा नौकर ग़ुलाम हुसैन उर्फ़ गूंगा अम्बाला से रात के दो बजे चले। दिन के वक़्त लाला मूसा पहुँचे। सारा दिन इंतज़ार करके दरिया ख़ाँ के लिए गाड़ी बदली।
दरिया ख़ान सुबह के 5 बजे आया। वह नन्हा मुन्ना ग़ैर-आबाद स्टेशन निहायत ही दिलचस्प और हसीन है। वहाँ मेरा सुर्ख़ कोट गाड़ी के नीचे गिर गया जो हमारे नौकर ने निकाला। उस के बाद दरिया-ए-सिंध के बेस-पॉट से गुज़रे । दरिया खान से डेरा इस्माईल ख़ाँ तक 18 मील का फ़ासला है और ताँगे और मोटरों से गुज़रते हैं। दरिया के किनारे एक छोटी सी रेलवे लाईन है जो किसी ज़माने में पत्थरों की बार-बरदारी (बोझ उठाना) के लिए थी।
छः माह के क़याम के बाद डेरा इस्माईल ख़ाँ से अम्बाला की वापसी मुझे याद है। शाम के वक़्त हम ताँगा लेकर आज़मे- दरिया ख़ाँ होए। दरिया-ए-सिंध तुग़यानी (बाढ़) पर था। पानी के जहाज़ फर्राटे भर रहे थे। जब हम ने कश्तियों के दस दस पाट तय कर लिये तो रास्ते में इस ज़ोर की आँधी आई कि मैंने अपनी ज़िन्दगी में ऐसा तूफ़ान कम देखे हैं।
हम ने अपना ताँगा रस्सियों से बाँध दिया। ऊँटों के क़ाफ़िले और ऊँटनियों के ज़र्द-ज़र्द सुनहरे बच्चे परेशान-ओ-हैरान रेत के टीलों की तरफ़ भाग रहे थे और यही दरिया-ए-सिंध जो अटक के पास मुख़्तसर सा है, यहाँ एक बहरे-बे-कराँ की तरह डुबोने को आमादा था। बड़ी मुश्किल से रात गए हम दरिया ख़ाँ पहुँचे। हुए के बाद ही हमें ख़बर मिली कि तमाम पुल छूट चुके हैं और अब पानी के जहाज़ चल रहे हैं। हमीदा बहन के साथ ये आख़िरी सफ़र था।

