हाल ही में प्रकाशित प्रशांत रमन रवि के काव्य-संग्रह ‘पहाड़ में प्रार्थना’ पर यह टिप्पणी दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा मनीषा कुमारी ने लिखी है- अनुरंजनी
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एक शब्द के कितने मानी
अभी-अभी ख्याल आया कि इस वक्त अगर बालकनी से बाहर झांके तब क्या दिखेगा? यही कि शहर चुप है, सड़क चुप है,चुप है चाँद और रात भी! पर, क्या सच में ये सभी कुछ कहते नहीं, कुछ सुनते नहीं? क्या ऐसा कोई नहीं जो इन्हें सुन रहा हो,इनकी चुप्पियों के भीतर छिपे अदृश्य अक्षरों को जोड़कर शब्द की निर्मिति करते हुए इनके मन को समझने की कोशिश में लगा हो?इन प्रश्नों के उठने का मानी है कि मेरा मन बिल्कुल भी चुप नहीं। कमाल की बात है कि भीतर उठे इस स्पंदन का कारण भी चुप्पी ही है ।इन दिनों प्रशांत रमण रवि का कविता-संग्रह ‘पहाड़ में प्रार्थना’ के अंत: में ख़ूब डूबना-उतरना हो रहा है। जब-जब यह नाम दोहराती हूँ कवि कुंदन सिद्धार्थ की एक पंक्ति याद आती है –
‘तुम्हें देखना
और प्रार्थना में खड़े होना
एक ही बात है’।
जहाँ तक मैं इसे समझ पायी हूँ मुझे यही मालूम होता है कि प्रेम और प्रार्थना करना दोनों ही एक-दूसरे के पर्याय हैं।अब ऐसे में यह देखना कि कोई व्यक्ति पहाड़ में प्रार्थना कर रहा है कितनी आश्चर्यजनक बात है! आश्चर्यजनक इसलिए भी कि पहाड़ तो स्वयं मौन रहता है अतः कोई उस मौन के मध्य खड़े होकर उसे तथा अपने इर्द-गिर्द को महसूस करते हुए उन सभी की पीड़ा को समझकर प्रार्थना कर रहा है,प्रेम कर रहा है और यह सब करते हुए वह भी चुप है,चुप नहीं बल्कि चुप्पी शब्द को लिखते हुए बहुत कुछ कह रहा है।इस कविता संग्रह में “चुप्पी और मौन” इन दो शब्दों का इतनी बार प्रयोग किया गया है कि मैं उत्सुकतावश इस पर कुछ सोचने के लिए मजबूर हो उठी। बहुत कुछ समझने और महसूस करने के उपरांत भी ये दो शब्द मेरे भीतर बार-बार रोमांच की उत्पत्ति कर जा रहे हैं। पढ़ने के प्रत्येक दौर में ऐसा लगता है जैसे कुछ तो और बात है कि कवि ने इनका इतना ज्यादा और इस प्रकार से प्रयोग किया है? जब कवि को कोई नफरत से पुकारता है तब यही चुप्पी प्रेम की चादर बनकर उन्हें अपने में समेट लेती है जो उनके व्यक्तित्व को नफरत में तब्दील होने से रोक लेती है।वही चुप्पी कभी प्रकाश बन जाती है और बिना किसी शोर के मन के बंद अंधेरे कमरे में रोशनी की लकीर खींच जाती है।कवि इन चुप्पियों के सहारे प्रेम में सराबोर होकर नफरत को निरस्त करने लगते हैं।
मैं चुप रहा,
प्रेम की तरह –
जो प्रतिशोध नहीं बुनता,
ना कोई तर्क माँगता है
पर अपनी उपस्थिति से
नफरत को निरस्त कर देता है।
अपनी कविता में कवि एक बेबस माँ के त्याग को भी चुप्पियों में ही दर्ज करते हैं जहाँ वह अपनी रोटी का अंतिम टुकड़ा भी अपने बच्चों की हथेली पर रखने हेतु मजबूर है क्योंकि वे भूखें हैं और उसके पास भर पेट भोजन की उपलब्धता भी नहीं है।साथ ही सवाल भी कि वह बेबस क्यों है? उसके बच्चे भूखें क्यों हैं? तमाम तरह से विकसित होने के उपरांत किसी परिवार को भर-पेट भोजन न मिलना इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ? वहीं अपने बालपन की स्मृतियों में खोते हुए किसी सखी को धूप की एक चुप मुस्कान की तरह याद करते हैं जो बस अपने होने भर से हर तरफ उजाला बिखेर जाती थी किन्तु अब उसकी यह नैसर्गिक खूबसूरती कहीं गुम हो गयी है। व्यवहारिक जीवन की कसौटियाँ उसे इतनी त्रस्त कर गयी हैं कि वह अब अपनी सहजता में कभी वापस लौटने का ख्याल भी नहीं कर पाती या करना शायद व्यर्थथा की बात लगती होगी।अब वह सिर्फ खामोश नहीं बल्कि पितृसत्तात्मक समाज के इस अनुशासन में जिंदा रहते-रहते थोड़ी-सी मर भी गयी है।इन चुप्पियों को उकेरते वक्त कवि बेहद पीड़ित महसूस हो रहे हैं क्योंकि यह केवल उस एक लड़की की हकीकत नहीं बल्कि न जाने और कितनों की है जिसकी मासूमियत को सदियों से कुचली जा रही है।
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पर अब …
वो सांवली लड़की
बड़ी हो गयी है
अब उसके बालों में
तितलियां नहीं बैठतीं,
अब उसकी चुप्पी
सिर्फ खामोशी नहीं,
एक लंबा अनुशासन है
जिसे जीना उसे सीखा दिया गया है।
किसी कविता में कवि अपने पिता की चुप्पियों को भी उकेरते नज़र आते हैं जहाँ वे बगैर कुछ कहे अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं।वे अडिग रहते हैं किसी वृक्ष की भाँति जिसकी छाया बिना कोई आवाज़ किए अपनी करुणा के तले बच्चों को शीतलता का एहसास कराती है। जिंदगी की अनुभूतियों से प्रस्फुटित किन्हीं पंक्तियों में पिता चुप रहकर किसी को मुक्त करने में तल्लीन दिखाई पड़ रहे हैं-
पिता से मैंने जाना है –
चुप रहकर भी
किसी को आजाद किया जा सकता है।
भाषा की विद्यार्थी होकर भी कभी-कभी जीवन के किसी लम्हें में ऐसा महसूस होता है कि अक्षर सूझ नहीं रहे और अचानक से शब्द कहीं खो चुके हैं।उस परिस्थिति में शब्दों से परे जाना कितना सुखद महसूस होता है,किसी क्षण मौन की शरण में चले जाना कितना सुकुन देता है!इस सुकून को कवि अपनी कविता में बड़ी खूबसूरती लिखते नज़र आये हैं जहाँ उनके अंतस के मध्य पल रहे मौन में संगीत रचा जाता है, कोमलता उतरती है और चुपचाप जिंदगी थोड़ी आसान हो जाती है।कवि के मौन में इतनी अक्कासियां स्वयं जन्म लेतीं बल्कि वक्त के एक-एक ज़र्रे को जोड़कर इसे जन्म देती है धरती की प्रत्येक माँ जिन्हें वे परियाँ कहते हैं या फिर पिता जो बैल की भांति अपने कंधे पर चुप्पी को ढो रहे होते हैं।इनकी निर्मिति कभी कोई दोस्त या किसी अजनबी की मुस्कुराहट से भी होने लगती है –
परियाँ-
जो करुणा की छंद हैं
जो शब्दों की सीमाएं पार कर
मौन में भी संगीत रच जाती हैं।
केवल इतना ही नहीं कभी-कभी कवि के भीतर का मौन किसी की आँखों से टकराते हुए भीतर एक अनदेखी रौशनी को प्रकाशित कर जाता है। शायद यह टकराहट मौन का स्पर्श है जहाँ बेनाम दो आत्माएं कुछ और नहीं महज मनुष्य होकर एक-दूसरे को महसूस कर पाती हैं, पहचान पाती हैं। पहचानने के इस एक क्षण में पूरी दुनिया जैसे उनके बीच आकर ठहर जाती है।मौन के इस स्पर्श के माध्यम से कवि ने इंसानियत के स्पर्श का बोध कराया है।वह बताना चाहता है कि बगैर तमाम औपचारिकताओं और रिश्तों के बंधनों में बंधे, बिना किसी स्पर्श के भी हम किसी से मनुष्य मात्र होकर प्रेम कर सकते हैं। धरती पर प्रेम करना ही मनुष्य की सहज और स्वाभाविक प्रकृति है।
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क्या यह प्रेम था?
या वह सरल अनुभूति –
जब दो आत्माएंँ
नाम और भाषा से परे
सिर्फ मनुष्य बनकर
एक-दूसरे को
पहचान लेती हैं,
और क्षण भर के लिए
सारा संसार
उनके बीच ठहर जाता है।
अपनी कविता में कवि धरती पर युद्ध की स्थिति को देखते हुए उलझने-सुलझने लगते हैं।सोचते हैं कि कैसी मन:स्थिति के लोग होंगे धरती पर जो युद्ध को जीवित रखना चाहते हैं जबकि यह तो हर किसी को मालूम है कि ‘युद्ध से भय उत्पन्न होता है और भय मनुष्य को अंधकार में धकेलता है’? वहीं दूसरी तरफ इसी पृथ्वी की गोद में कोई ऐसा भी जन्म लेता है जो प्रत्येक ज़र्रे पर हरी दूब उगाने हेतु अथक परिश्रम करता है।वह व्यक्ति उगता है कमल की उस पांखुरी की तरह जो अपनी प्रांजलता में मौन छिपाये है। जिसमें स्वयं को महसूस किया जा सकता है तथा सच से रूबरू हुआ जा सकता है। कवि का नरम हृदय इस धरा पर कठोरता से जूझते इंसानों की हथेली पर सिर्फ एक रोटी नहीं बल्कि एक गुलाब भी रखना चाहता है। उन्हें लगता है कि गुलाब केवल एक फूल या विलास की वस्तु नहीं वरन् एक मौन पुकार है जो इंसानियत को हकीकत में जिंदा रखने की तमाम कोशिशें कर रहा है। उन्हें एहसास है कि महज़ साँस लेना ही जीवित रहना नहीं, भीतर संवेदना की सरिता का निरंतर प्रवाहित होना ही जीने का सबसे ख़ूबसूरत सलीका है। कवि किसी की हथेली में सिर्फ गुलाब नहीं बल्कि गुलाब के सहारे एक भरोसा रखना चाहते हैं जो उसे इस बात की आश्वस्ति दे सके कि दुनिया अभी पूरी तरह पत्थर नहीं हुई है।वे लोगों को इस एहसास से अवगत कराना चाहते हैं कि तमाम जटिलताओं के बावजूद भी धरती पर कहीं-न-कहीं कोमलता बची हुई है और स्वयं को यों ही बचाए रखने हेतु अनवरत संघर्ष भी कर रही है।
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तुमने जब
मेरी हथेली में
कांपता हुआ गुलाब रखा,
तो वह
सिर्फ़ एक फूल नहीं था-
वह एक मौन पुकार थी
कि इस सख़्त पड़ती दुनिया में
कोमल रहना भी
एक संघर्ष है।
कविता में पिरोयी यह चुप्पी हर बार केवल सकारात्मकता की ओर ही इशारा नहीं करती बल्कि किन्हीं मसलों में यह इंसानियत के अंत होने की तरफ भी संकेत करते नज़र आती है। यह कवि की कलात्मकता है कि एक ही शब्द को भिन्न-भिन्न संदर्भों से संपृक्त करते हुए प्रत्येक बार कोई नवीन अर्थ को प्रकट करने में बखूबी सफल रहे हैं।इस कविता में चुप्पी शब्द का प्रयोग करते हुए कवि कहना चाह रहे हैं प्रत्येक बार चुप रहना ही समस्या का हल नहीं इसे भी कवि ने स्पष्टता के साथ दर्शाया है। कविता में उन्होंने चुप्पी साधे हर उस नागरिक पर व्यंग्य किया है जो अपनी तटस्थता को भीतर की महानता समझता है।यहाँ पर कवि ने बड़ी बारीकी से हमारा ध्यान उस ओर खींचा है जहाँ से हम नित्य ही बच निकलने का प्रयास करते हैं और स्वयं को उस खोखले तर्क के सहारे एक झूठी आश्वस्ति देते हैं कि हमें इन चीजों से या राजनीति से कोई मतलब नहीं, हम अपना काम तो कर रहे हैं न! किंतु यह कितनी सच बात है कि हम क्या खा रहे हैं, कैसे जी रहे हैं यह सबकुछ राजनीति तय करती है और अपने आप को तटस्थ साबित करना भी दरअसल एक प्रकार की राजनीति ही है।
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वह सच में
एक आदर्श नागरिक था-
जो चुप रहकर
संवेदना की हत्या करता रहा,
और खुद को सज्जन मानता रहा।
हाँ! एक बात है कि तमाम विपरीत परिस्थितियाँ होने के बाद भी कवि हर बार प्रेम चुनते हैं ताकि खूबसूरती बची रहे।जीवन का चुनाव करते हैं ताकि इंसानियत जिंदा रहे जो दुनिया को थोड़ी और सुंदर बना दे।इतनी सारी ‘मौन और चुप्पियों’ के भीतर से फूटती तमाम तरह की पीड़ा और दुख में रीतते हुए भी कहीं एक उम्मीद नज़र आती है।शायद, कवि अपनी कविताओं में उम्मीद की इस महीन रेखा को सहेजे रखने हेतु प्रार्थना में लीन हैं। जिसका सबसे सुंदर और मासूम उदाहरण यह पंक्ति है-
बच्चा पूछता है –
” माँ,रोटी कब मिलेगी?”
वह मुस्कुराती है
आँखों की बुझती चिंगारी
ओस में छुपा देती है,
फिर धीरे से कहती है-
जहाँ सूरज उगेगा
वहाँ रोटी भी उगेगी।’
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– मनीषा कुमारी
विद्यार्थी – हिंदी विशेष, तृतीय वर्ष
दौलत राम महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय

