• पुस्तक अंश
  • हृषीकेश सुलभ के उपन्यास ‘जूठी गली’ का एक अंश

    हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार, उपन्यासकार, नाटककार हृषीकेश सुलभ का नया उपन्यास आया है ‘जूठी गली’। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास का एक रोचक अंश पढ़िए- मॉडरेटर

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    अतुल को साथ लेकर बब्बो साँझ के झुटपुटे में छत पर गई।

    किराएदारों के बच्चे खेलकर नीचे जा चुके थे।

    अतुल ने पूछा, “क्या बात है बब्बो दी?”

    “कलेजा क्यों काँप रहा है तुम्हारा?…बोलो?…कौन-सा कांड

    किये हो कि मेरे बतियाने से पहले ही पसीना छूटने लगा?” बब्बो ने दबिश दी।

    “हम कौन कांड किये हैं?…तुम बिना बात के हमको किसी कांड में मत लपेटो बब्बो दी!” अतुल दृढ़ बनने की कोशिश में था, पर भीतर ही भीतर सन्देह की सूइयाँ चुभ रही थीं। वह सोचने लगा कि आख़िर कौन-सी बात पता चल गई बब्बो दी को!

    “सिगरेट निकालो।” बब्बो रानी ने बिना लाग-लपेट के कड़े स्वर में दबिश बढ़ा दी।

    “हम सिगरेट नहीं पीते हैं बब्बो दी।” अतुल की आवाज़ में रिरियाहट थी।

    “निकालो चुपचाप, इसके पहले कि हम निकाल लें तुम्हारी जेब से।” बब्बो किसी सधे हुए ख़तरनाक राहजन की तरह अतुल पर झपटी। इसके पहले कि वह सिगरेट निकाले, अतुल ने समर्पण कर दिया। अपने पैंट की जेब से सिगरेट का डिब्बा निकालकर बब्बो के हाथों में सौंप दिया।

    “माचिस?”

    अतुल ने माचिस भी दे दी। बब्बो ने एक सिगरेट निकालकर अतुल को दिया। दूसरी अपने होंठों से लगाकर सुलगाई और जलती हुई माचिस की तीली अतुल की ओर बढ़ा दी।

    अतुल की सिगरेट भी सुलगी।

    दोनों सिगरेट का कश लेते रहे। अचानक एक साथ दोनों हँसे।

    “क्या बब्बो दी?…तुम भी न ग़ज़बे ड्रामाबाज़ हो! क्या ज़रूरत थी इतना ड्रामा रचने की? सीधे-सीधे माँग लिया होता। हद्द करती हो दी!” अतुल बोलते हुए सतर्क था कि कोई छत पर न आ जाए!

    “इधर-उधर का झाँक रहे हो? चैन से खींचो। कोई नहीं आएगा।” अब बब्बो की बारी थी।

    “अरे दोनों किराएदार ऐसे मिले हैं कि उनकी बीवियों के पेट में पानी तक नहीं पचता। तुरन्त जाकर अम्मा की शरण में भजन गाने लगेंगी कि भाई-बहन दोनों मिलकर सिगरेट धूँक रहे थे।” अतुल ने चिन्ता

    प्रकट की।

    “सबको मालूम है कि बब्बो रानी सिगरेट पीती हैं।…रम्भा देवी और कायस्थ कुलभूषण मुंशी सत्यनारायण लाल को भी मालूम है बच्चे।” बबिता ने धुएँ का गोल छल्ला छोड़ते हुए अतुल को सूचित किया।

    “तुम अम्मा-पापा का नाम कैसे इस तरह ले रही हो? एकदम ढीठ हो!”

    “इतना ही नहीं, मैं तो सपनों में कुलपिता मुंशी जूठी लाल के सामने बैठकर सिगरेट पीती हूँ। वे हुक्का पीते हैं,…ख़ुशबूदार तम्बाकू वाला और मैं सिगरेट।…वे हमसे अपने कुल के तमाम नालायक़ों की निन्दा करते हैं। बेनी लाल…टेनी लाल…फेनी लाल…चेनी लाल—सबकी।”

    “मेरे बारे में भी कुछ बात होती है?” अतुल ने जिज्ञासा प्रकट की।

    “अभी जनम के खड़े ही हुए हो और कुलपिता तक पहुँचना चाहते हो?…वे तो तुम्हें पहचानते ही नहीं।”

    “बब्बो दी इतना मत फेंको!”

    भाई-बहन दोनों हँसे।

    सिगरेट ख़त्म हो चुकी थी।

    “अतुल!” बब्बो का स्वर मन्द्र हो चला था।

    “बोलो दी?”

    “इस ख़ानदान का क्या होगा?”

    “क्यों?…क्या हो गया इस ख़ानदान को?”

    “पूरा ख़ानदान बरबाद हो रहा है।”

    “आज तुम्हें अचानक जूठी लाल के समूचे ख़ानदान की चिन्ता क्यों हो गई?” अतुल को मज़ा आ रहा था।

    “छोड़ो समूचे ख़ानदान को। सत्यनारायण लाल के ख़ानदान का क्या होगा?” बब्बो का स्वर कुछ-कुछ उदास हो चला था।

    “तुमको अचानक हो क्या गया बब्बो दी?” अतुल को थोड़ी चिन्ता हुई। उसे मामला कुछ गड़बड़ लग रहा था।

    हिन्दी फ़िल्मों के बहुरचित दृश्य की तरह बब्बो गली की ओर वाले छत के बारजे पर गई। पीछे-पीछे अतुल गया। उसे लगा बब्बो दी कहीं कूद न जाए! इसका कोई ठिकाना नहीं। दोनों हथेलियाँ रेलिंग पर टिकाकर बब्बो ने गहरी और लम्बी साँस भरी और बोली, “अतुल बाबू!…सुब्बो और नम्मो तो उड़ गईं। अब दोनों वापस नहीं लौटने वालीं। बची मैं।…अगर मैं उड़ गई तो इस प्रचंड काली माई रम्भा देवी को कौन सँभालेगा? निठल्ले सत्तो बाबू को कौन बचाएगा रम्भा देवी के प्रकोप से?…मैं अभी चाहूँ, तो उड़ जाऊँ। मेरी डोली तो तैयार है भाई। तुझे तो मालूम ही है। मामला स्वरा भास्कर वाला है सो मैंने अभी दबा के रखा है।…तुम दोनों भाई इतने नालायक़ हो…बाप से भी बड़े निठल्ले…कि ठीक से पढ़ाई-लिखाई करने में न कोई इंटरेस्ट है और न कोई धंधा करने में। लहेड़ों की तरह मंटुआ-झंटुआ के साथ बमबमवा गुंडे की सेना बने फिर रहे हो। बाप-दादा के बनवाए मकान का किराया खाकर जीना पैरासाइट की तरह ख़ून चूसकर जीना होता है अतुल बाबू।…तुम अपनी ज़िन्दगी का रास्ता बदलो और उस नन्हकू अंशुल बाबू को भी समझाओ।”

    बब्बो रानी उर्फ़ बबिता लाल की साँस तेज़-तेज़ चल रही थी। उसकी आँखें पनिया गई थीं। अतुल ने हौले से कहा, “दी, तुम सही सोच रही हो। हम लोग इतना सोच नहीं पाते हैं।…घर में कोई भी आज तक घर के लिए…कुल-ख़ानदान के लिए इतना नहीं सोच पाया। सुब्बो दी निकल गई।…नम्मो दी को ले गई। उसकी शादी करवा रही है, बस यही एक अच्छी बात है।”

    “घोंचू हो तुम। अबे दोनों आज़ाद पंछी हुईं अब। दोनों पढ़ी-लिखी हैं। अपना कैरियर बनाएँगी। तुम दोनों भाइयों की तरह नहीं हैं।…न ठीक से पढ़ना-लिखना और न…चलो छोड़ो, जिसके जी में जो आए, करे ।” बब्बो का स्वर निराशा के सम पर आकर थमा।

    “ऐसी कोई बात नहीं है बब्बो दी।…कुछ न कुछ तो हम लोग भी कर ही रहे हैं।” अतुल का स्वर दबा हुआ था।

    “कर तो रहे हो।…जय हो…जय हो करते रहो रात-दिन।”

    “नहीं दी, समय आने पर बहुत लाभ है इससे। पावर और पैसा दोनों में सेंध लगाने का मौक़ा मिलता है।”

    “सेंध चोर लगाता है अतुल बाबू। लगाओ सेंध।” बब्बो की आवाज़ में निराशा और गहरा गई थी।

    “अंशुल बाबू प्रेम कर रहे हैं।” अतुल को लगा इस सूचना से थोड़ा माहौल बदलेगा, पर माहौल जैसा था, वैसा ही रहा।

    “मालूम है हमको।”

    “सच्ची बब्बो दी?”

    “हाँ!…और तुम्हारा भी।”

    “हमारा छोड़ो दी। हमारा तो सारी दुनिया जान रही है। सब कुछ डाँवाँडोल चल रहा है।…उसका बाप क्रिमिनल है। पता नहीं भाग्य में क्या लिखा है!” अतुल ने गहरी साँस छोड़ी।

    “इ जनकदुलारी वाला क्या मामला है?” बब्बो ने अपना स्वर स्थिर किया और प्रसंग बदला।

    “कुछ समझ में नहीं आ रहा है दी।”

    “अरे कुत्ते, एक जवान दुखियारी विधवा को तो बकस दो। काहे उसकी लाज लूट रहे हो भगवान के नाम पर। बमबमवा तो उसका आशिक़ रहा है।…तुम्हारे चचाजान…शिब्बू लाल भी कुत्ते की तरह उसके पीछे लगे हैं कि मकान क़ब्ज़ा कर लें।” फुफकार उठीं बब्बो रानी।

    अतुल भौचक। दम साधे अपनी बब्बो दी को सुन और देख रहे थे।

    बब्बो एक झटके से मुड़ी और अतुल को भौचक छोड़ नीचे उतरने के लिए सीढ़ी घर की ओर बढ़ चली।

    साँझ कब की हो चुकी थी। जूठी गली में हल्की रोशनी फैल चुकी थी और साँझ का कार्यव्यापार चल रहा था।

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