• पुस्तक अंश
  • ‘जेपी से बीजेपी’ पुस्तक का एक अंश

    पटना पुस्तक मेले में गया तो संतोष सिंह की किताब ‘जेपी से बीजेपी: सौ साल के आईने में बिहार’ की चर्चा सुनी। यह अनूदित पुस्तक है लेकिन संतोष सिंह द्वारा बिहार पर लिखी गई किताबों में यह एक और रोचक और शोधपूर्ण किताब है। बीसवीं शताब्दी से आज तक के बिहार की राजनीति को संपूर्णता में समझने के लिए यह एक महत्वपूर्ण किताब है। आइये वाणी प्रकाशन से प्रकाशित और शुभम कुमार द्वारा अनूदित इस किताब की भूमिका पढ़ते हैं, जिसमें किताब का सार भी है- मॉडरेटर

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    सियासत की लड़ाई में कुछ पोस्टल एड्रेस बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। चाहे वह सोनिया गांधी का 10, जनपथ हो, भारत के प्रधानमंत्री का 7, लोक कल्याण मार्ग (पूर्व में रेस कोर्स रोड), या फिर बिहार का 1, अणे मार्ग, पर स्थित मुख्यमंत्री का आधिकारिक निवास। ये भी बड़ा ही दिलचस्प तथ्य है कि माधव श्रीहरि अणे जिनके नाम पर बिहार का यह मशहूर पता है, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नेता थे। यह भी संयोग मात्र ही है कि कांग्रेस तो नहीं मगर एक सोशलिस्ट पार्टी, जनता दल यूनाइटेड़, के नेता, नीतीश कुमार, पिछले
    19 वर्षों से इस पते पर काबिज हैं। बिहार की सियासत की बिसात पर फिर बिछा है यह पता।

    मेरी पुस्तक, ‘जे पी टू बीजेपी : सौ साल के आईने में बिहार’, ऐसे ही महत्वपूर्ण पते, या इसके इर्द-गिर्द रहने वाले नेताओं के अतीत और वर्तमान से रूबरू कराती है। ये किताब आपको बिहार की सियायत की जड़ों तक ले जाती है। यह पुस्तक पहले मुख्यम त्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह से लेकर वर्तमान में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कहानी तो है ही, साथ ही इस लम्बी यात्रा में आये हुए कुछ मील के पत्थरों की दास्तान भी है। डॉ. राममनोहर लोहिया का समाजवाद क्या था? रामनन्दन मिश्र, जगदेव प्रसाद की आजादी के आन्दोलन में क्या भूमिका थी? और जयप्रकाश नारायण को कौन भूल सकता है! उनका परिचय सिर्फ 1974 का जेपी आन्दोलन नहीं है, वरन 1942 की क्रान्ति भी है जब वो कुछ साथियों सहित हजारीबाग जेल की ऊँची दीवार फांद गये थे। तभी तो रामधारी सिंह दिनकर ने उनके बारे में कहा था, “नखत अमा के बुझते हैं, सारा आकाश तुम्हारा है।”

    यह किताब समाजवादियों की दूसरी पीढ़ी, कर्पूरी ठाकुर, रामानन्द तिवारी और कपिलदेव सिंह, की कहानी भी बयां करती है।“ मातहत और बेज़ुबानों  की आवाज़ भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर की यात्रा किसी लोककथा जैसी मालूम पड़ती है। रामानन्द तिवारी का जन्म भले ही अगड़ी जाति में हुआ था लेकिन वे बक्सर स्टेशन पर यात्रियों को पानी पिलाकर गुज़ारा करते थे । कपिलदेव सिंह ने क्लास दस के बाद स्वतंत्रता आन्दोलन में हिस्सा लेने के लिए पढ़ाई छोड़ दी, लेकिन इतना स्वाध्याय किया कि एक बार हजारी प्रसाद द्विवेदी ने
    उनसे पूछा, “इतना ज्ञान कैसे सहजेते हो?”
    इस पुस्तक को इसके नाम तक महदूद न करें । कांग्रेस के उत्थान और पतन की कहानी अगर कम शब्दों में जाननी हो तो यह किताब ज़रूर पढ़ें। कैसे डॉ. श्रीकृष्ण सिंह का काल बिहार की राजनीति और कांग्रेस का स्वर्ण युग था? कैसे अपनी सफलता के घमंड में चूर कांग्रेस ने अपने ओबीसी नेतागण, बीर चंद पटेल, राम लखन सिंह यादव, लहटन चौधरी और सीताराम केसरी, को कभी उचित सम्मान नहीं दिया? कांग्रेस शुरुआत से सवर्णों की राजनीति करती रही और सामाजिक नब्ज़ कभी टटोली ही नहीं। इस पुस्तक में मैंने 1937 से अब तक की बिहार कांग्रेस की यात्रा समेटने की कोशिश की है। एक अर्थ में, यह किताब कृष्ण से (श्रीकृष्ण सिंह) से कन्हैया (कुमार) तक की कहानी।

    ‘जे पी टू बीजेपी’ सिर्फ़ समाजवाद से राष्ट्रवाद का सफ़र ही नहीं बताती बल्कि उसका पूर्ण चक्र भी बताती है । समाजवाद के महत्वपूर्ण किरदार, शरद यादव, रामविलास पासवान जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, की राजनीतिक यात्रा भी कंटकों से भरी थी। कैसे एक सत्तू पहलवान का अपमान किसी को शरद यादव बना सकता है और एक रिक्शा यूनियन का नेता कैसे रामविलास पासवान बन जाता है, यह नयी पीढ़ी को जानने की ज़रूरत है।
    लालू प्रसाद, नीतीश कुमार तो इस किताब के केन्द्र में ही हैं। मैंने पिछले 100 वर्षों में हुए बिहार के महत्वपूर्ण राजनीतिक व्यक्तित्व के द्वारा पूरे बिहार की सामाजिक और राजनीतिक यात्रा को बताने का प्रयास किया है। इसे आप समेकित अवलोकन भी कह सकते हैं और सिंहावलोकन भी । वैसे लालू और नीतीश की परत-दर-परत कहानी मैंने अपनी पहली पुस्तक, ‘रूल्ड  और मिसरूल्ड’ (हिन्दी में ‘कितना राज कितना काज’), में कही है। लेकिन इस किताब में भी उनका बरखूबी ज़िक्र है। चारा घोटाले की अनकही कहानी भी है। नीतीश की थकान का भी ज़िक्र है। कैसे बिहार को सपने दिखाने वाला ये जादूगर बस “बिजली, सड़क और पानी” से आगे नहीं बढ़ पाया। सोशल इंजीनियर के रूप में नीतीश ने जरूर कर्पूरी के सपनों को बहुत हद तक पूरा किया लेकिन औधोगिक विकास के क्षेत्र में डॉ. श्रीकृष्ण सिंह अब भी अव्वल हैं। लालू प्रसाद का ज़िक्र तो किताब में आता ही रहेगा। मंडल मसीहा कैसे अपना रास्ता भूल जाते हैं और जाति समीकरण की विरासत ही अपने पुत्र तेजस्वी प्रसाद यादव को सौंप पाते हैं। फिर भी लालू प्रसाद बिहार की राजनीति के रेफ़रेंस पॉइंट बने हुए हैं। उनका आधा वाक्य भी खबर बन जाता है।

    ‘जे पी टू बीजेपी’ में भारतीय जनसंघ से बीजेपी तक, कैलाशपति मिश्र से लेकर लालमुनि चौबे तक, सुशील कुमार मोदी से सम्राट चौधरी तक की कहानी भी दर्ज है। जनसंघ को कैसे 1967 में महामाया प्रसाद सिन्हा के संयुक्त विधायक दल की सरकार में एक महत्वपूर्ण सहयोगी बनाया जाता है और जनसंघ की राजनीतिक अस्पृश्यता खत्म होती है? 1977 में जेपी ने राष्ट्रीय स्तर पर वही काम किया जो 1967 में गोलवलकर और लोहिया ने किया था। मैंने यह बताने की भी कोशिश की है कि क्यों बीजेपी सुशील कुमार मोदी के बाद कोई बड़ा नेता नहीं दे पायी जो नीतीश के समकक्ष हो? कहाँ है बीजेपी की दूसरी पीढ़ी? भगवा दल क्यों बिहार में अभी तक उधार का सिंदूर  लगाने के लिए विवश है? बीजेपी के पास नीतीश का क्या विकल्प है और साथ ही जेडीयू के पास नीतीश के अलावा क्या विकल्प है?

    मैंने दूसरी पीढ़ी के छह नेताओं का खाता-बही भी दिया है। भाजपा के सम्राट चौधरी, राजद के तेजस्वी प्रसाद यादव, कांग्रेस के कन्हैया कुमार, लोजपा (रामविलास) के चिराग पासवान, नीतीश के पुत्र निशान्त कुमार और जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्र​शान्त किशोर की राजनीतिक कुंडली जानने की कोशिश की है। क्या इनमें ही है बिहार का अगला मुख्यमंत्री या फिर नीतीश ही कुछ और दिन बने रहेंगे? प्र​शान्त किशोर क्या 2025 के चुनाव के निर्णायक तत्त्व हैं? क्या कन्हैया और तेजस्वी एक राजनीतिक स्पेस में रह सकते हैं?
    क्या चिराग पासवान बिहार की तरफ देख रहे हैं? या फिर बिहार को कोई नया सम्राट मिलेगा? मुख्यमन्त्री के पुत्र निशान्त कुमार सक्रिय राजनीति में आने की दस्तक दे ही रहे हैं। क्या निशान्त भाजपा के लिए अगली चुनौती होंगे?

    इस पुस्तक में मैंने बहूतरे अकादमिक सन्दर्भों सहित बहुत सारे साक्षात्कार को समाहित किया है। एक रिपोर्टर की रपट भी बीच-बीच में आपको मिलेगी। मेरा उद्देश्य है कि इस पुस्तक के माध्यम से लोग बिहार के राजनीतिक इतिहास को जानें और भविष्य का सिरा पकड़ने की कोशिश करें। सौ वर्षों का इतिहास आपके सामने से गुज़रने वाला है बताइयेगा, यात्रा कैसी रही?
    अन्त में अगर मैं इस किताब के अनुवादक, शुभम कुमार, का जिक्र न करूँ तो बात अधूरी रह जायेगी। जिस तल्लीनता और मनोयोग से शुभम ने किताब का अनुवाद किया है, लगता है किताब नये सिरे से लिखी गयी है। किताब संवर्धित और नवीकृत है। शुभम को इस किताब की आत्मा में रच-बस जाने के लिए बहूत धन्यवाद। ज़्यादा कहना आत्ममुग्धता होगी। किताब अब आपकी है।

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