समकालीन लेखकों में प्रत्यक्षा का स्वर सबसे विशिष्ट है। अपनी भाषा, शैली और ऐस्थेटिक सबमें अलहदा। अभी हाल में ही उनका उपन्यास प्रकाशित हुआ है ‘शीशाघर’। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास का एक रोचक अंश पढ़िए- मॉडरेटर
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सैम उर्फ समी बारटन क्यों आया है यहाँ , जिस जगह को कभी जाना नहीं सिवाय अम्मा की कहानियों के , उस जगह से क्या वास्ता ? और अम्मा क्या भारतीय थीं? खुद को पक्का अंग्रेजन बना लिया था उन्होंने , जाने कब से। न घर में इंडियन खाना बनता , न ईद मुहर्रम। जैसे अपने को काट लिया हो उस दुनिया से । जैसे कोई बड़ा हादसा हुआ हो और जितना उससे दूर जा सकें उसी में भलाई हो । जैसे बचे रहने का सिर्फ यही एक तरीका हो।
इंग्लैंड में इधर उधर बसते उखड़ते रहे । बाप टेड प्रोफेसर थे और उसके बचपन में कॉलेज बदलते रहे। अंतत एडीनब्रा में बसे। अम्मी भी वहीं ।बचपन और जवानी का बहुत समय जो याद में बचा है वो लेस्टर और एडीनब्रा का ही रहा।
बाद में दोनों में जब अलहदगी हुई और टेड अमरीका में ईस्ट कोस्ट के किसी कॉलेज में पढ़ाने लगा फिर भी वो एडीनब्रा में ही बचे रहे।
अम्मा को कोई देखता तो समझता लिली बारटन में कुछ स्पैनिश या इटालियन खून है। उसका चेहरा अब भी बहुत खूबसूरत और नाजुक था, बाल एकदम गाढ़े भूरे और आँखें कालीं। वो लंबी और पतली थी और इतने साल यहाँ रह कर उसकी बोली स्कॉटिश हो गई थी। वो तेज तेज चलती , हवा में उन के बाल उड़ते और हर काम में फुर्ती होती, जैसे वक्त निकला जा रहा हो और सब कर लेना ठीक अभी , निहायत जरूरी। उन्होंने दो किताबें लिख डालीं थीं और उन किताबों ने उन्हें लोकल सेलेब्रिटी बना दिया था।यूनिवर्सिटी में छात्र उससे मोहब्बत करते और अब भी कई साथी प्रोफेसर उसकी ख्वाहिश।
सैम बारटन अंग्रेज ही पैदा हुआ था और अंग्रेज ही रहता। भारत के बारे में उसे क्या ही पता चलता जब तक उसकी अम्मा जान कुछ न बताती। और अम्मा ने तो जैसे सोच रखा था कि वो चैप्टर ज़िंदगी का बंद हुआ अब क्या खोलना। लौटने का तो कोई भी जवाज़ नहीं बनता। इतने साल गुजरे, एक बार भी नहीं लौटे। नूर मंजिल का नूर खत्म हुआ तब भी। अब्बा जान गुजरे तब भी, मानी जान तो पहले ही जा चुकीं थीं। और गुल? गुल को बाजी रूनी ने अपने पास बुला लिया था। नूरमंजिल बर्बाद हुआ। क्या लौटें?
अब्बा के वक्त जरूर ही आती अगर उसी वक्त सैम न पैदा हो रहा होता वो भी सात साढ़े सात महीने में और उसके जन्म के समय इतनी जटिलताएं न होतीं।
अस्पताल के कमरे में लेटे जब खुद ही क्रिटिकल थी, टेड ने उसे बताया न था। बाद में बाजी से बात हुई थी। कई दिन महीने उसने कल्पना की थी, नूर मंजिल की। अब्बा को उसने देखा था निचाट अकेलेपन में, सिर्फ गुल और मुलाजिमों के सहारे। अम्मी बतूल भी तब तक वीपिंग विलो में शिफ्ट हो गईं थीं, गरचे आती जाती रहतीं । अकेले उनका भी वहाँ क्या मन लगता पर इतना करीब न था कि बार बार आया जाए।
अब्बा का बड़ा सा कमरा याद आता। कितनी धूप आती थी उन बड़ी बड़ी छत से फर्श तक की खिड़कियों से। गर्मियों में खस की टट्टी डाली जाती और रह रह कर भिगाया जाता तब कमरा ठंडा होता। अब्बा का जहाज जैसा पलंग, उनके लिखने पढ़ने की मेज, उनकी आराम कुर्सी, कोट हैंगर पर उनकी शेरवानी और अचकन, खिड़की की तरफ वाले गोल मेज पर चाय का सरंजाम। अच्छी चाय का उन को कितना शौक था। जाने कहाँ कहाँ से चाय की पत्तियां मँगवाते, दार्जीलिंग से, असम से, लोपचू और फ्लावरी ऑरेंज पीको और रंगली रंगलियोट। बाकायदा घड़ी देख कर चाय को ब्रू किया जाता, नाममात्र को चीनी और नाममात्र को दूध। चाय के बर्तन भी बड़े नफीस होते। बढ़िया पॉट, बढ़िया पतले पोरसलेन के कप, सुंदर ट्रे, ट्रे को ढकने के लिए कढ़े हुए नैपकिन और जाड़े में सुंदर टी कोज़ी।
अब्बा खुद कितने नफीस थे। ऑल द फाईनर थिंग्स इन लाईफ। जितने खूबसूरत थे उतने ही सलीके से कपड़े पहनते। उनके कुर्ते पाजामे अचकन सब बढ़िया कपड़ों के बेहतर सिले होते। ही वाज़ अलवेज़ सो डैपर, सो वेल ग्रूम्ड। उनकी दाढ़ी, उनके बाल, नाखून, पैरों के तलवे, कुहनी, हथेलियाँ, सब साफ सुथरे। उनकी लंबाई, उनकी सेहत सब। हर चीज करीने से करने वाले, बोलते भी तो शाईस्तगी से, और उनकी आवाज भी तो कितनी भारी गहरी थी। हैदर अली उनका जो पुरखा था जो अफगानिस्तान से आया था, खूबसूरत जवान मर्द जिसने अपने हाथों अपनी किस्मत चमकाई थी, हूबहू असगर अली कुरैशी में दोबारा इस दुनियावी संसार में आ गया था। और लिली अब्बा को याद करती , कुर्सी पर पैर मोड़ कॉफी का कप थामे खिड़की से बाहर देखती है। उसे बाहर की तेज हवा और हल्की झीसी नहीं दिखती, चढ़ाई को जाती सड़क नहीं दिखती, कुछ दूर पर रॉयल माईल की सड़क नहीं दिखती, वो गोथिक इमारतें तक नहीं दिखतीं। आंसुओं के परदे के पार नूर मंजिल दिखता है, बाहर गुलाब के बगीचे के पार हरी घास पर पसरा धूप दिखाता है, रूनी बाजी का हँसना और गुल का खिलखिलाना दिखता है, अब्बा खूबसूरत प्यारे अब्बा का छड़ी लेकर टहलना दिखता है, घर की रोजमर्रा की आवाज़ें सुनाई देती हैं, रसोई की तामझाम, मानी जान का चिल्लाना, रिक्शे से रोज स्कूल जाना, शाम को पिटटो और गुड़िया गुड़िया खेलना, खाना न खाने की जिद करना और मानी जान का डांटना, सब दिखता है। इंसान के बस में होता तो हर पल वापस लौटता रहता, हर पल उस पल के अलावा किसी और पल में जीता। और ये गुजरा हुआ वकफ़ा इतना करीब होता कि आँखें मूँदो तो ऐसे धड़कने लगता है जैसे उससे बड़ा सच कोई न हो, अभी इस वक्त का वकफ़ा तो बिलकुल बिलकुल भी नहीं।
कहते हैं एक जीन होती है, “रेस्टलेस जीन” के नाम से भी जाना जाने वाला DRD4-7R प्रवास सहित जोखिम लेने वाले व्यवहार से जुड़ा होता है। ऐसा ही जीन हैदर अली में था। ऐसा ही जीन हैदर अली के पुरखों में भी था जो अरब से अफगानिस्तान आए और फिर ऐसा ही जीन लिली में भी था जो भारत से इंगलैंड चली गई। कौन जाने सैम बारटन में भी हो जो वापस भारत आ गया है।
सैम बारटन जिसे अम्मा समी बुलातीं, समी बारटन। समी में समी उल्लाह छिप जाता और सैमी बाहर कूद आता। और इस तरह लिली ने जैसे अपना नाम दिलारा गायब कर दिया था, उसी तरह अपनी जड़ों को भुला देने का खुद से जाने कैसा वादा कर लिया था वो वादा भी बना रहा। कभी उस जिगर के टुकड़े को समी उल्लाह न पुकारा। बस जब पैदा हुआ था तब अस्पताल में पहली बार उसे सीने से लगाते, उस लाल चेहरे को जो ज़ार ज़ार इस दुनिया में लाए जाने के विरोध में सुर्ख चेहरा किये रो रहा था, उस मसले फूल को चूमते उसके कान में एक बार धीरे से फुसफुसाकर उसने कहा था, समी उल्लाह खान और उसके बाद उस नाम को भीतर जज़्ब कर लिया था दोबारा कभी न बोलने के लिए और उस बच्चे को कभी न सुनने के लिए।
जब टेड आया था उसने थके स्वरों में कहा था, कैन वी कॉल हिम सैम? सैम बारटन?
और इस तरह समी उल्लाह सैम हुआ और अम्मा को जब दुलार आता तब समी हो जाता और तब सब समझते ये लिली का उच्चारण कभी कभी अजीब सा हो जाता है, अपने देस वाला, इसलिए सैमी को समी कह देती है।
दिलारा बेगम उर्फ लिली बारटन का बेटा इस तरह पूरा अंग्रेज ही रहा।
सैम जैसे जैसे बड़ा होने लगा एक बात उसे समझ आने लगी कि कोई बात थी जिसने अम्मा को वतन से दूर किया। न अम्मा बतातीं न उसे कभी इल्म होता। बीच बीच में रूनी खाला आतीं तो सोचता शायद इन्हें पता हो, शायद गुल खाला को पता हो, शायद लौटने पर पता चले, या उससे भी ज्यादा शायद कोई बात ही न हो। सब उसके दिमाग की उपज हो।
कभी कभार जब अम्मा नूर मंजिल की बात करतीं तो उनके चेहरे पर कोई किरण नाचने लगती। वरना तो अम्मा प्रैक्टिकल प्रोफेसर थीं, नो नॉनसेन्स। जैसे कोमल नरम चीजों के लिए उनके जीवन में कोई जगह न थी। सब काम थे, बॉक्सेज़ थे जिन्हें टिक करना था, ये हुआ, ये भी हुआ और ये भी। टेड जब अलहदगी के बाद अमरीका गया तब उस तलाक को उन्होंने इसी तरह ट्रीट किया। बैंक के अकाउंट्स में जॉइन्ट नाम हटाए, घर के कागजात दुरुस्त किये, अकेले रहने को और जो सरंजाम थे, फेहरिस्त बना कर एक एक करके खत्म किया, दिमाग के भीतर जो कंटीला झाड था उसे दिन रात करके काटा, साफ किया, दिल को पहले वीरान किया, उस कब्रगाह से टेड की याद तक मिटाई, जैसे ग्लव्स और बूटस पहन कर कचरे की सफाई होती है उसी निर्ममता से सब झाड पोंछ कर दूर किया। बहुत जखमी हुई लेकिन दुनिया से छिपाए रखा। बेटे तक से। बस अब जीवन ऐसा होगा, सीख लो ऐसे रहना मेरी प्यारी, खुद को समझाया और दुनिया के आगे हँसती मुसकुराती दिखीं हरदम।
फिर ऐसी अम्मा से सैम क्या उम्मीद करे कभी। उस दिन सर्दियों की रात थी। बाहर बर्फ गिर रही थी लगातार। घर के भीतर गरम रौशनी थी,आराम और सुकून था। अम्मा ग्लेनफर्कस की बोतल उठा लाईं थी। पता नहीं किस अफ़सुरदगी में थी। लगातार दो पीने के बाद कहने लगी, समी तुम कभी सोचते हो तुम दो देशों के हो, दो विरसे के?
लेकिन अम्मा, आपको मॉम की बजाय अम्मा कहने के अलावा मैं पूरा का पूरा यहीं का हूँ, और ये जरा जरा हिन्दुस्तानी बोलने के अलावा भी। आपने मुझे कभी उस देश का होने कब दिया?
सैम ये बोलते बोलते रुका था। पिता के चले जाने के बाद उसे लगता वो अम्मा को प्रोटेक्ट करने वाला भी बन गया है।
जानते हो समी मेरे एक पुरखे ने हिन्दू लड़की से शादी की, बाद में इस तरह के कितने ही घालमेल होते रहे, ऐसे कई थे जो कन्वर्ट हो कर, अपना धर्म छोड़ कर मजहब में आए, और ऐसे जो उसी मजहब के थे लेकिन अपना वतन अपनी मिट्टी छोड़ कर आए, कोई अपना क्लास छोड़ कर आया, कोई अपनी पुरानी ज़िंदगी , और मैं मैंने तो अपना वतन भी छोड़ा और एक तरीके से अपना मजहब भी। मतलब मैं मुसलमान से क्रिस्तान तो नहीं बनी लेकिन मेरा बेटा क्रिस्तान है तो वो भी मैंने एक तरह से छोड़ा ही और ये भी कहते हैं गैर मजहबी से निकाह जायज नहीं, तो देखो एक तरह से तुम नाजायज ही हुए फिर।
आप क्या सोचती हैं ? तब तो नहीं सोचा जब शादी की थी ?
अब भी नहीं सोचती , एक बात कह रही हूँ , शायद बूढ़ा रही हूँ । जवानी में आप हवा के घोड़े पर सवार रहते हैं , दुनिया के बताए नियम आपको बेकार लगते हैं, आप सिरे से उनको खारिज करने के मुहिम में जुटे होते हैं, फिर एक समय आता है जब आप वजूदी संकट के बारे में सोचने लगते हैं, आप आध्यात्मिक होने लगते है, आप अल्लाह को जानने की कोशिश करने लगते हैं। शायद हम प्रोग्राम्ड हैं इस के लिए, वायर्ड टू थिंक लाईक दैट। शायद एक कंप्लीट सर्कल होने लगता है। अंत आते आते आप अपनी शुरुआत के बारे में सोचने लगते हैं।
आपका अंत अभी नहीं है अम्मा। यू आर इन रोबस्ट हेल्थ। और ऐसी बातें करके मुझे सताईए तो मत ही।
अम्मा ने तीसरा पेग ढ़ारा था। उनके चेहरे पर लैंप की रौशनी पड़ रही थी, ग्लेनफारकास का हमवार जायका और ये नरम रौशनी।
कितनी खूबसूरत हैं अम्मा।
अम्मा इंग्लैंड आने के पहले आप का कोई इंडियन बॉय फ्रेंड नहीं था?
अम्मा हंसने लगीं थीं, उसने इसरार किया था, बताएं न अम्मा। मैं मान नहीं सकता कि किसी ने आपको पसंद न किया हो? मैंने आपकी तस्वीर देखी है न, पुरानी जिसमें आपके बाल कंधों तक कटे हैं और आपने स्लैक्स और शर्ट पहन रखा है। यू वर सो ब्यूटीफुल , सो स्मार्ट, लाईक अ मोडेल ऑर ऐन एक्ट्रेस।
मुझे तुम्हारे डैड मिले न । टेड वाज़ अलवेज़ सो हैन्सम । कॉलेज की सब लड़कियां फिदा थीं बट ही फेल फॉर मी।
एण्ड यू?
अम्मा अचानक उठ गईं थी। आई हैड वन टू मेनी टुडे। वो जरा लड़खड़ाती उठीं। ग्लास अभी खत्म नहीं हुआ था। उसे लिए लिए अपने कमरे में गईं। अब भी उनका शरीर किसी लड़की सा था, दुबला लंबा, छोटे बाब कट बाल। अब भी सुंदर आकर्षक हसीन। अब भी लोग मिलते तो उनके मोह में पड़ जाते।
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