प्रसिद्ध कवयित्री सुमन केशरी ने महाभारत की स्त्रियों को लेकर कविताएँ लिखीं, जो ‘निमित्त नहीं’ नाम से संग्रह के रूप में प्रकाशित हुआ और ख़ासा चर्चित हुआ। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित उसी कविता संग्रह के बहाने यह टिप्पणी लिखी है मूर्द्धन्य विद्वान वागीश शुक्ल ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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सव्यसाची से असहमत*
वागीश शुक्ल
११ दिसम्बर २०२५
* (सुमन केशरी की निमित्त नहीँ !! (वाणी प्रकाशन २०२२) पढ़ कर लिखा गया)
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सुमन केशरी की कविताएँ एक लम्बे अरसे से ध्यान खीँचती रही हैँ। अपनी नयी किताब निमित्त नहीँ!! मेँ उन्होँने महाभारत के कुछ स्त्री पात्रोँ को केन्द्र मेँ रखा है और शीर्षक से ही यह घोषित कर दिया है कि वे निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् (= हे अर्जुन! केवल निमित्त रहो) — श्रीमद्भगवद्गीता ११-३३ का उपदेश ग्रहण करने वाले से असहमत हैँ।
इस असहमति का निहितार्थ स्पष्ट है। भगवान् ने अर्जुन से यह कहा कि तुम कर्ता का अहङ्कार त्याग कर कर्म करो और भोक्ता का अहङ्कार त्याग कर फल भोगो, इन सभी कौरवोँ को मैँ पहले ही मार चुका हूँ, तुम केवल निमित्त हो — और अर्जुन ने इसे स्वीकार कर लिया। सुमन जी ने जब अर्जुन का प्रतिपक्ष ग्रहण किया है तो उन्होँने इन स्त्रीपात्रोँ को कर्ता और भोक्ता दोनोँ ही माना है। दार्शनिक ऊहापोह से बचते हुए, यह एक सत्तात्मक वक्तव्य है—स्त्री की सत्ता का, और उसके माध्यम से मनुष्य की सत्ता का भी। सुमन जी यह कह रही हैँ कि मनुष्य की—इस जगत् की—सत्ता भी वास्तविक है, मायिक नहीँ। इसे किसी दार्शनिक स्थापना से जोड़ने-घटाने से मैँ परहेज़ कर रहा हूँ—यह एक काव्यात्मक अभिव्यक्ति है, शास्त्रार्थ के लिए प्रस्तुत कोई पूर्व-पक्ष या उत्तर-पक्ष नहीँ।
स्त्री की सत्ता को समेटने वाले वक्तव्य अरसे से दिये जाते रहे हैँ—सबसे लोकप्रिय वक्तव्य उसकी पारिवारिकता को बखानने वाले हैँ, वह माँ है, बहिन है, बेटी है, पत्नी है, प्रेमिका है, अर्थात् वह सब कुछ है जो उसे पुरुष बना सकता है। इसकी बग़ल मेँ उसकी स्वायत्त इयत्ता को बखानते वक्तव्य हैँ— वह एक आर्थिक, वैधानिक, यौनिक, प्राणी है, अर्थात् वह ‘स्वतन्त्र’ है किसी तन्त्र का हिस्सा नहीँ।
सुमन जी ने एक तीसरा ही मार्ग चुना। महाभारत की ये स्त्रियाँ बेटोँ बापोँ भाइयोँ दूल्होँ वाली होते हुए भी दुखोँ और चाहतोँ के दुहत्थड़ से जिन संज्ञाओँ को परिभाषित कर रही हैँ उनका व्याकरण ख़ुद इनका ही रचा हुआ है।
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यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मेरे लिखने मेँ महाभारत कहने से तीन व्यास-कृतियोँ का समूह समझा जाता है— स्वयं महाभारत, उसका खिलभाग हरिवंशपुराण, और श्रीमद्भागवत जो इसलिए लिखा गया कि महाभारत रच देने के बाद भी व्यास के मन मेँ एक बेचैनी बची हुई थी। इस पुस्तक मेँ जिन स्त्रियोँ पर कविताएँ लिखी गयी हैँ उनमेँ भानुमती को छोड़ कर सारे पात्र महाभारत से हैँ। इसलिए पहले भानुमती।
दुर्योधन की पत्नी को महाभारत मेँ कोई अलग जगह नहीँ मिली थी— भट्ट नारायण ने वेणीसंहार मेँ उसको नाम दिया और उसको एक भूमिका भी दी। हिन्दी लेखन मेँ भानुमती का नाम पहले भी कुछ-कुछ ‘भुला दी गयी उर्मिला’ की तर्ज़ पर आया है किन्तु सुमन जी ने जो तीन कविताएँ भानुमती पर लिखी हैँ उनकी व्यञ्जना भिन्न है।
वेणीसंहार मेँ भट्ट नारायण ने भानुमती को दुर्योधन के विसंवाद की तरह प्रस्तुत किया है— छह महारथियोँ द्वारा अभिमन्यु के मारे जाने से जहाँ दुर्योधन का कञ्चुकी तक सहमा हुआ है और दुर्योधन डीँग मारता हुआ भी अनचाहे और अनजाने ही अपनी मृत्यु की सूचना देता है, वहीँ भानुमती एक अज्ञात भय से काँप रही है जिसकी प्रगाढता को दुर्योधन के विजयोद्गार बढ़ा रहे हैँ।
भानुमती पर पहली कविता सुन्दरी भानुमती मेँ भानुमती द्रौपदी को ‘पुंश्चली’ कहती है—और मुझे यह देख कर कुछ आश्चर्य हुआ कि द्रौपदी पर दूसरी कविता मेँ द्रौपदी भी स्वयं को पुंश्चली कहती है। ‘पुंश्चली’ का तात्पर्य है ऐसी स्त्री जो एक मर्द से दूसरे मर्द तक अपनी कामतुष्टि के लिए डोलती रहती है और इस प्रकार जिसमेँ निष्ठा का सर्वथा अभाव है। पूरे महाभारत मेँ द्रौपदी को किसी ने ‘पुंश्चली’ नहीँ कहा है—सिवाय कर्ण के जो सभापर्व (६८-३५) मेँ उसे ‘बन्धकी’ कहता है क्योँकि द्रौपदी के पाँच पति हैँ। इस पञ्चपतित्व से कहीँ द्रौपदी मेँ कोई हीनता आयी है, यह कर्ण के अतिरिक्त किसी ने कभी नहीँ कहा है। दुर्योधन ने जो द्रौपदी की ओर ताकते हुए कर्ण को दिखा कर अपनी बायीँ जाँघ ठोकी है वह द्रौपदी के ‘पुंश्चलीत्व’ को बताने के लिए नहीँ उसके दासीत्व को बताने के लिए है, कीचक ने जो उसे भोग्या माना है वह उसके सैरन्ध्री होने के नाते, जयद्रथ की ‘बुरी नज़र’ द्रौपदी के असहाय होने के नाते है। भानुमती का द्रौपदी को ‘पुंश्चली’ कहना भानुमती के मन मेँ द्रौपदी के प्रति एक ऐसे ईर्ष्याभाव को बताता है जो न तो दुर्योधन के व्यवहार से और न ही द्रौपदी के व्यवहार से समर्थित है।
यहाँ यह प्रश्न उठाया ही जायगा कि क्या महाभारत पर लिखते हुए व्यासकृत महाभारत से ‘बँधना’ आवश्यक है— आख़िर अनेक परवर्ती रचनाकारोँ ने कथाविस्तार भी किया है और नये पात्र भी जोड़े हैँ— भानुमती स्वयं ही एक उदाहरण है। यह बात सच है किन्तु आधुनिक काल के पहले राम-कथा या कृष्ण-कथा के जो उपबृंहण हुए हैँ वे मूल पाठ से वि-संवादी नहीँ होते थे— सिर्फ़ आधुनिक काल मेँ ही माइकेल मधुसूदन दत्त ने मेघनाद को हीरो बनाया सिर्फ़ आधुनिक काल मेँ ही ऐसे उपन्यास लिखे गये जिनमेँ दिखाया गया कि द्रौपदी कर्ण के प्रति सकामा थी। जैसे ही आप इस तरह की बातेँ लिखते हैँ ये पात्र रामायण या महाभारत के नहीँ रहते। फिर जिस भानुमती की बात होती है वह दुर्योधन की पत्नी नहीँ एक राजा की पत्नी है— राजा साहब एक ऐसी औरत पर लार टपका रहे हैँ जो ख़ुद कई मरदोँ की सेज सँवार चुकी है।
डरी रहती है भानुमती मेँ भानुमती का भय दिखता है किन्तु कालक्रम मेँ परिवर्तन करते हुए— महाभारत मेँ दुर्योधन-पुत्र लक्ष्मण का वध अभिमन्यु द्वारा हो चुका है किन्तु इस कविता मेँ लक्ष्मण को ले कर आशाएँ और आशङ्काएँ अभिमन्यु-वध के बाद उभरती हैँ। यह विपर्यय कथा मेँ एक नये आयाम की सर्जना करता है जिसमेँ महाभारत के झरोखे से झाँकता कमज़ोर पाण्डवोँ के ज़ोर से शहज़ोर दुर्योधन का भय झलकता है क्योँकि भानुमती का डर उस ‘अभिमान’ से है जो दुर्योधन का अभिलक्षण है। इसी का दारुण विस्तार तीसरी कविता जाने कौन पुकारता है मेँ हुआ है— दुर्योधन की याद आते ही उसके अभिमान की बलि चढ़े हुए लोग भी याद आते हैँ—ख़ास तौर पर बेटा लक्ष्मण।
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इस लिहाज़ से यह सुखद है कि द्रौपदी पर लिखी गयी कविताएँ उसकी कृष्णमयता को उभारती हैँ— प्राचीनोँ मेँ भी केवल नीलकण्ठ चतुर्धर ने इस ओर स्पष्टतः ध्यान दिलाया है कि द्यूत के समय युधिष्ठिर के अनर्थ का प्रतीघात नहीँ हुआ क्योँकि कृष्ण को उन्होँने अपने हृदय से दूर रखा जब कि द्रौपदी के अनर्थ का प्रतीघात हुआ क्योँकि कृष्ण उससे दूर नहीँ थे।
महाभारत द्रौपदी मेँ ही कूटबद्ध है— कृष्ण, अर्जुन, युधिष्ठिर, भीष्म, कर्ण, दुर्योधन, दुःशासन, धृतराष्ट्र, सब उसी के प्रकाश मेँ अपने को उजागर करते हैँ। इस केन्द्रीयता को केवल कृष्ण के माध्यम से भी व्यक्त किया जा सकता है क्योँकि कृष्ण और कृष्णा मेँ एक अनिर्वचनीय अभेद है— और सुमन जी ने यही किया है।
किन्तु इस कूटबद्धता के चलते द्रौपदी एक जटिल और बहुल चरित्र है और सुमन जी ने उसमेँ माद्री से ले कर प्यासी कोख तक की छवियाँ पायी हैँ। मैँ द्रौपदी पर कम-से-कम एक और कविता चाहता था जो उसकी उस समय की छवि का इशारा करती जिसमेँ उसने अपने सामने बाँध कर लाये गये अश्वत्थामा को छोड़ देने का आदेश दिया ताकि द्रोण की पत्नी उस तरह पुत्रशोक मेँ न रोये जिस तरह द्रौपदी ख़ुद रो रही है (श्रीमद्भागवत) — या शायद इस कविता को उस पर लिखी छठवीँ कविता मानसपुत्री मेँ पाया जा सके। इस छवि के सामने ही द्रौपदी की वह छवि दीप्तिमान् होती है जिसमेँ उसके बाल खीँचने वाले दुःशासन की छाती के ख़ून से वह अपने बाल धो रही है। जिस स्त्री की दोनोँ बाँहेँ प्रतिशोधपटल के इन दोनोँ छोरोँ को समेटती हैँ उसी का नाम द्रौपदी है — उसी से महाभारत परिभाषित होता है।
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महाभारत मेँ दुःशला का दुख कुछ अलग ही है— प्रतापी और अनाचारी पति की मृत्यु के बाद एक ऐसे पुत्र के सहारे उजड़ा राज्य सँभालती हुई जो अर्जुन के आगमन की ख़बर सुनते ही डर से काँपता हुआ मर जाता है और जो फिर अपने नन्हे पौत्र को ले कर अर्जुन की शरण मेँ जाती है। किन्तु भय निर्मूल है— युधिष्ठिर के अश्वमेध के सम्पादन की अङ्गीभूत अर्जुन की यह दिग्विजययात्रा सुप्रमाणित प्रताप को पुनःप्रमाणित करने के लिए नहीँ चुकाये जा चुके पुराने बदले चुकाने के लिए नहीँ सिर्फ़ एक उत्सव मेँ नेवता बाँटने के लिए थी। एक पुरानी दार्शनिक उक्ति याद आ गयी— जो साँप रस्सी मेँ दिखता है उसके विष का कोई प्रतिविष नहीँ है।
जो तीन कविताएँ दुःशला पर हैँ उनमेँ कथा के इस अंश का सन्दर्भ नहीँ है— केवल उस तपिश का ज़िक्र है जो द्रौपदी के अनसँवरे बालोँ से फूट कर कुरु-परिवार की सभी स्त्रियोँ को झुलसा रही है। मेरी अपनी समझ मेँ महाभारत के भीतर दुःशला की उत्तरकालीन उपस्थिति को ध्यान मेँ रखते हुए भी एक कविता लिखना अच्छा होता किन्तु जयद्रथ के शव मेँ भीम के लोहे के पुतले को देखना (प्यारा भीम…) कुछ हद तक इसकी जगह ले सकता है क्योँकि दुःशला ने इस पति के नाते ही अपने भाइयोँ को भी खो दिया— अनर्थप्रतीघात का उसका स्वाभाविक अधिकार अब उन शक्तिमानोँ की करुणा का मुहताज है।
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इस संग्रह मेँ सुमन जी ने शर्मिष्ठा दमयन्ती और वपुष्टमा को नहीँ लिया है जो शायद इस समझ के तहत होगा कि ये ‘महाभारत-कथा’ के पात्र नहीँ हैँ। किन्तु शर्मिष्ठा से न केवल पुरु-वंश का प्रारम्भ है अपितु विवाह और प्रेम से जुड़े कुछ सवाल भी उठते हैँ जिनके घेरे मेँ वह पुरुवंश है जिसमेँ महाभारत की कथा बसी हुई है। दमयन्ती की कथा युधिष्ठिर के इस प्रश्न के उत्तर मेँ सुनायी गयी है कि क्या उनसे बढ़ कर अभागा कोई राजा हुआ है और वपुष्टमा की कथा अश्वमेध जैसे यज्ञोँ के अप्रासङ्गिक हो जाने की सूचना देने के लिए दी गयी है—उस अश्वमेध के बाद जो स्त्रीविलाप-पर्व के आँसुओँ की बाढ़ मेँ तिरते-डूबते युधिष्ठिर के राज्यारोहण के परम प्रमाण के रूप मेँ उपस्थित है किन्तु जिसका पुण्य सेर भर सत्तू के दान के बराबर भी नहीँ ठहरता।
संग्रह मेँ जिस पात्र की अनुपस्थिति मुझे सबसे अधिक खटकी वह है कृपी—कृपाचार्य की बहिन द्रोणाचार्य की पत्नी और अश्वत्थामा की माँ। इस अनाथ कन्या के गार्हस्थ्य के दारिद्र्य ने ही इसके पति को आश्रम मेँ गुरु न रह कर महल मेँ नौकर होने के लिए विवश किया। द्रोण द्वारा वैतनिक अध्यापन का स्वीकार वर्णाश्रम की ईँट खिसकने का संकेत है—फिर राजकुमारोँ के लिए बनाये गये विद्यालय मेँ एकलव्य को प्रवेश नहीँ मिल सकता और कर्ण को दाख़िला तब मिलता है जब दुर्योधन उसे इस उम्मीद मेँ राजा बना देता है कि यह पाण्डवोँ से दुश्मनी मेँ उसका साथ देगा। गुरु अब शिष्य का चुनाव नहीँ कर सकता—किसी सत्यकाम जाबाल के शिष्यत्व की सम्भावना समाप्त है।
विद्या ब्राह्मण के पास रक्षा के लिए आयी थी बाज़ार मेँ उतारने के लिए नहीँ। अथर्ववेद से सम्बद्ध कौशिक-सूत्र मेँ किसी राष्ट्र के कुदेश होने का लक्षण यह बताया गया है कि उसके ब्राह्मण शस्त्रधारण करते हैँ—और ऐसा होने के कुपरिणामोँ का निदर्शन कृपी से बढ़ कर कौन है जिसका पति बाल-हत्यारा बना जिसका भाई सोते हुए लोगोँ की हत्या करता है जिसका बेटा भ्रूण-हत्यारा हुआ है? ये सारे अतिचार कृपी के नाम पर हुए हैँ। किन्तु किसी ने कृपी से नहीँ पूछा कि क्या वह ब्राह्मणी होते हुए भी दरिद्रता मेँ जीने के लिए तैयार नहीँ थी—क्या उसने हठ किया कि मैँ दूध के नाम पर आटे का घोल पीते हुए बेटे की ख़ुशी से दुखी हूँ मुझे असली दूध देने वाली गाय ला कर दो? यह प्रश्न इसलिए नहीँ पूछा गया कि वस्तुतः यह विद्याविक्रय और फिर सेवक होने के नाते शस्त्रधारण के कर्म दरिद्रता से उद्विग्नता के नाते नहीँ द्रुपद द्वारा किये गये अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए हुए हैँ जब कि अपमान सह लेना ब्राह्मण का धर्म बताया गया है। पुराणोँ का अनुशीलन यह बताता है कि ब्राह्मण का अपमान नहीँ ब्राह्मण द्वारा अपमान न सह पाना ही—धर्मलक्षण क्षमा को विस्मृत करना ही—अनर्थ का कारण हुआ है।
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तथापि सुमन जी ने उन कई स्त्रियोँ को कविता मेँ उतारा है जिन्हेँ महाभारत के ‘गौण पात्र’ माना जाता रहा है जबकि सच यह है कि महाभारत का न एक भी शब्द फ़ालतू है न एक भी पात्र।
हिडिम्बा ने प्रेम मेँ अपना जंगल, अपना भाई, अपना बेटा, सब गँवाया है और इस बेदाम बिकने की ओर प्राचीनोँ का भी ध्यान गया है जिन्होँने घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की अद्भुत कथा जोड़ कर महाभारत को एक नये आयाम मेँ समृद्धतर बनाया है। घटोत्कच की पत्नी कामकटङ्कटा का ज़िक्र महाभारत मेँ नहीँ आया—स्कन्दपुराण मेँ है—किन्तु उसके विना महाभारत मेँ एक ख़ालीपन है क्योँकि उसके बेटे बर्बरीक ने ही अपना सिर दे कर महाभारत की लड़ाई का सच देखा है—सिर्फ़ एक चक्रधारी पुरुष ही युद्ध कर रहा था और कोई नहीँ—सच जो संजय की दिव्य दृष्टि से ओझल रहा, सच जो केवल अर्जुन को दिख पाया जब उन्होँने अपने सखा कृष्ण का विश्वरूप देखा।
बर्बरीक का विना नाम लिये ही प्रेम मेँ कातर कविता मेँ उल्लेख आया है जिसमेँ दुःशासन का सीना फाड़ कर भीम द्वारा ख़ून पीने को एक ‘कुकृत्य’ बताया गया है। महाभारत इसे केवल एक कृत्य बताता है—न कु-कृत्य न सु-कृत्य—यह प्रतिज्ञापालन का एक उदाहरण है और ऐसे दारुण उदाहरणोँ से महाभारत भरा पड़ा है। यह कविता इस कर्म को ‘जंगलीपन’ से जोड़ती है और इस तरह उस प्रश्नात्मकता से इसे अलग कर देती है जो महाभारत मेँ थी—पाप का प्रतीकार क्या पाप ही है?
इस सिलसिले मेँ केवल एक बात और। ‘वन’ और ‘नगर’ का द्वन्द्व हम आज समकालीन समाजशास्त्र के चलते कुछ-कुछ ‘बस्तर बनाम दिल्ली’ की तर्ज़ पर समझते हैँ किन्तु महाभारत मेँ यद्यपि दुर्योधन की समझ यही है, पाण्डवोँ के लिए वन-वास और नगर-वास का सम्बन्ध एक दूसरे ही तात्पर्य मेँ अर्थवान् होता है। विस्तार-भय से यहाँ इस प्रसङ्ग पर और कहना सम्भव न होगा।
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भीष्म साहनी जी की कृपा से माधवी का आगमन हिन्दी साहित्य मेँ हुआ और गुड़ को गोबर बताने की उनकी अनोखी प्रतिभा से प्रभावित कुछ और साहित्यकारोँ ने भी इस ‘शोषिता’ पर करुणा बरसाते हुए अपने क्रोध की लपटोँ मेँ प्राचीन भारतीय समाज की अन्यायपूर्ण संरचना को भस्मसात् करने के प्रयास किये हैँ। इसका तर्क स्पष्ट है—समकालीन बेलनीय स्त्री-विमर्श सभी स्त्री-लिङ्गी पात्रोँ को समपाट करते हुए एक ढेरी मेँ रखता है जिसमेँ से कोई भी यादृच्छिकतया उठाया जा सकता है और उतना भी निरखने की ज़रूरत नहीँ होती जितना टमाटर की ढेरी से अपने काम का टमाटर बीनने मेँ निरखा जाता है। कोई इस तरफ़ ध्यान नहीँ देता कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के कुल एक हज़ार श्यामकर्ण घोड़ोँ मेँ से चार सौ ग़ाइब हैँ और आठ सौ की असम्भव माँग को पूरा करने के लिए माधवी की सर्जना की गयी है। चार सम्राट् मिल कर कुल छ्ह सौ घोड़े जुटा पा रहे हैँ और शून्य से आठ सौ की संख्या तक के जुगाड़ का नाम माधवी है। इसको यौन व्यवसाय की शब्दावली मेँ समझने-समझाने वाला वही हो सकता है जिसे न तो श्यामकर्ण घोड़े का मतलब मालूम है न यौन व्यवसाय का।
अपनी कविता मेँ सुमन जी ने माधवी को पृथ्वी से जोड़ा है और यह एक विस्मय का विषय है कि चाहे अनजाने मेँ ही हुआ हो उनकी कविता यह स्मरण दिलाती है कि वाल्मीकि-कृत रामायण मेँ पृथ्वी का नाम ‘माधवी’ है। विना ‘माधवी= पृथ्वी’ के इस समीकरण पर ध्यान दिये हम बहुभोग्या रत्नप्रसू माधवी की उपस्थिति को क़तई नहीँ समझ सकते।
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सावित्री भी माधवी की ही तरह महाभारत की ‘मुख्य कथा’ का अङ्ग नहीँ है किन्तु माधवी की ही तरह वह ‘स्त्री-विमर्श’ के लिए एक उपयुक्त पात्र है—विशेषतः इसलिए कि कुछ पहले से ही ‘सीतासावित्री’ का युग्म भारतीय नारी के आदर्श के रूप मेँ प्रस्तुत किया जाता रहा है।
सावित्री का उपाख्यान वनपर्व मेँ सीतोपाख्यान के ठीक बाद अध्याय ३९७ से प्रारम्भ होता है किन्तु यद्यपि यह सावित्री के पातिव्रत्य का ही बखान है सावित्री-यम संवाद मेँ इस पातिव्रत्य की फलप्राप्ति का विवरण कई बातेँ समझाता है। सन्तुष्ट यम सावित्री से उसके पति के जीवन के अतिरिक्त कोई वर माँगने के लिए कहते हैँ—वह पहले दो वर अपने श्वशुर के लिए, फिर तीसरा अपने पिता के लिए माँगती है। चौथे वर के रूप मेँ उसने सत्यवान् से अपने औरस पुत्रोँ की माँग रखी है—क्षेत्रज की नहीँ—जो यम ने उसे दिया किन्तु अब वे फँस गये हैँ क्योँकि यह माँग विना सत्यवान् को जीवित किये नहीँ पूरी हो सकती। पूरी चर्चा मेँ यम सावित्री की वाक्पटुता पर मुग्ध हैँ जो उसके द्वारा धर्म-प्रतिपादन से परिभाषित है। इसलिए वे पाँचवाँ ‘अप्रतिम वर’ देने को विवश हुए हैँ। यह धर्मप्रतिपादन से परिभाषित वाक्पटुता ही सावित्री का बल है जिसके चलते वह रोये-गिड़गिड़ाये विना पति को वापस जीवित पाती है। पातिव्रत्य के भीतर श्वशुर-कुल पितृ-कुल की कल्याण-कामना शामिल है सिर्फ़ पति के साथ एकल गार्हस्थ्य उसका तात्पर्य नहीँ है।
इस कविता को पढ़ते हुए मैँ महाभारत की एक अचर्चित स्त्री-पात्र ‘मृत्यु’ को सामने रखना चाहूँगा जिसका विवरण शान्तिपर्व अध्याय २५८ मेँ आया हुआ है। यह प्रजापति द्वारा प्रजा-संहार के निमित्त मृत्यु की सर्जना, मृत्यु द्वारा इस कार्य को अधर्म बताते हुए इससे इनकार करने की और उसकी घोर तपस्या तथा बारंबार प्रार्थना के बावुजूद प्रजापति द्वारा अपने आदेश को अटल बताते हुए उसको इसके लिए बाध्य करने की कहानी है। यह यम का स्त्री-अवतार है—कर्तव्य-पालन को विवश किन्तु अन्याय-बोध की वेदना से पीडित, जब कि हम यम मेँ ऐसी वेदना का अभाव पाते हैँ और सत्यवान् का पुनर्जीवन किसी करुणा या धर्मबोध का नहीँ, एक तेजोमूर्ति को दी गयी बख़्शीश है।
महाभारत —और भारत— के स्त्री-विमर्श को ऐसे ही सूक्ष्म सङ्केतोँ मेँ पाया जाता है—उन सतही आँकड़ोँ मेँ नहीँ जो समकालीन बातचीत मेँ जमाने के लिए हमारे साहित्य से उठा लिये जाते हैँ।
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कुन्ती, माद्री, गान्धारी, सुभद्रा सभी ऐसे स्त्रीपात्र हैँ जिन्होँने अपनी सन्तानोँ को महाभारत के सर्वक्षयकारी युद्ध मेँ खोया है—और जैसा कि सुभद्रा पर लिखी पाँचवीँ कविता कहती है, तृष्णा के नाते।
सर्वप्रथम गान्धारी। उन्होँने सौ बेटे ज़रूर चाहे हैँ और उनका होना तथा भीम द्वारा उन सभी का वध महाभारत का एक प्रमुख घटनाक्रम है जो एक उपकथा मेँ दुहराया भी गया है—कद्रू के हज़ारोँ पुत्रोँ पर विनता के पुत्र गरुड हावी हैँ—लेकिन गान्धारी की अपनी चाहत एक बेटी की भी है ता कि ‘दौहित्र-ज’ लोक भी धृतराष्ट्र को मिलेँ। वह बेटी भी उसी लोथड़े से उसे मिलती है जिससे उसे सौ बेटे मिले हैँ—और जिस तरह धृतराष्ट्र को अपने पुत्रोँ से कोई लोक प्राप्त नहीँ हुए उसी तरह ये ‘दौहित्र-ज’ लोक भी नहीँ मिले क्योँकि यह दौहित्र भी उनके जीवनकाल मेँ ही मृत्यु को प्राप्त हो गया। गान्धारी के गर्भ-धारण के दौरान धृतराष्ट्र ने एक वैश्या (= किसान की बेटी) अपने ‘शौक़-मौज’ के लिए उठवा ली थी जिससे युयुत्सु पैदा हुआ है—उनके एक सौ एक पुत्रोँ मेँ अकेला जो धर्म के पक्ष से लड़ा और जिसके अभिभावकत्व मेँ परीक्षित को सौँप कर युधिष्ठिर महाप्रयाण के लिए निकलते हैँ।
बर-अक्स इसके, कुन्ती ने कोई पुत्र ख़ुद नहीँ चाहा है। कर्ण एक कुतूहल के चलते जनमा है, युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन को कुन्ती ने पाण्डु की प्रार्थना पर जन्म दिया है—और अपने वर मेँ माद्री को भी हिस्सेदारी दी है। फिर भी कुन्ती ने एक पुत्र खोया है—कर्ण जो युयुत्सु का विलोम है पाण्डु का इकलौता पुत्र जो अ=धर्म की ओर से लड़ा है और जो मानता था कि धर्म भी ताक़त के पीछे चलता है (आदि-पर्व १३५-१९)। यह वह ताक़त है जो कर्ण के पास कभी नहीँ थी जो अर्जुन से नहीँ जीता और सात्यकि से हारा है। उसे भीष्म महारथी छोड़ रथी भी नहीँ मानते और वह दुर्योधन का इतना वफ़ादार दोस्त है कि जब लड़ाई का वक़्त आता है तो तिनक कर पीछे हट जाता है कि जब तक भीष्म ज़िन्दा हैँ, मैँ नहीँ लड़ूँगा। कर्ण की सारी बहादुरी उछल-उछल कर द्रौपदी को गालियाँ सुनाने मेँ ख़र्च होती है और जिस एक मौक़े पर उसे धर्म याद आता है वह है जब उसके रथ का चक्का ज़मीन मेँ धँसा हुआ है।
महाभारत गान्धारी-पुत्रोँ के जन्म के बारे मेँ बहुत स्पष्ट है। जन्मान्ध धृतराष्ट्र को राज्य नहीँ मिल सकता सो पाण्डु को मिलता है (आदि-पर्व १०८-२५) और धृतराष्ट्र की इकलौती उम्मीद यह है कि जिन पाण्डु के पराक्रम से प्राप्त सम्पत्ति को हथिया कर उन्होँने उन्हेँ जंगल मेँ रहने को भेज दिया है वे महाराज पाण्डु निस्सन्तान मर जाँय। युधिष्ठिर के जन्म का समाचार सुनते ही गान्धारी ग़म और ग़ुस्से मेँ अपने उदरस्थ भ्रूण पर चोट पहुँचाती हैँ और व्यास जी अपना वचन निभाने के लिए उसी लोथड़े से सौ पुत्र एक पुत्री जनमा कर दिखा देते हैँ लेकिन फ़ाइदा क्या जब युवराज पैदा हो चुका है। वैसे, धृतराष्ट्र सबसे पूछते हैँ कि क्या युधिष्ठिर के बाद उनका बेटा राजा बन सकेगा (आदि-पर्व, अध्याय ११४)। कैसी उम्मीद है कि युधिष्ठिर भी निस्सन्तान मर जाय तो मेरा बेटा राजा बन सके।
महाभारत की आधुनिक पढ़ाई कर्ण का गुणगान करते नहीँ थकती और ऐसा बताने वालोँ की कमी नहीँ है जो कहते हैँ कि राज्य पर हक़ तो दुर्योधन का ही था!
सुमन जी की कविताओँ मेँ उत्तराधिकार के इन विवादोँ की झलक नहीँ है—उन्होँने इन माताओँ की यौनिकता पर ध्यान दिया है। गान्धारी पर लिखी कविताएँ धृतराष्ट्र की ‘वासना’ और उनके ‘ऊर्जस्वित वीर्य’ की बात करती हैँ, उनके ‘शक्की मन’ की बातेँ करती हैँ, गान्धारी ‘द्वापर की पाषाण’ हैँ और सम्भोग के क्षणोँ मेँ ‘पृथ्वी सी पड़ी’ रहती हैँ। ये सभी कविताएँ कुन्ती को सम्बोधित हैँ—और इनमेँ कुन्ती की यौनिक सक्रियता को ले कर ईर्ष्या की भी गन्ध है—किन्तु जो कविताएँ कुन्ती पर हैँ उनमेँ भी द्रौपदी को ले कर ईर्ष्या झलकती है—मन्त्र मेँ इतनी शक्ति क्योँ न थी/ कि बँधे रह जाते उसके आँचल से/ सूर्य/ धर्म/ वायु/ और इन्द्र। माद्री को अश्विनीकुमारोँ से ‘सुख’ मिलता है और सुभद्रा चित्राङ्गदा तथा उलूपी से सौतिया डाह रखती है।
महाभारत मेँ नियोग के तहत यौन सम्पर्क को तकनीकी तौर पर वि-रुचिकर बनाने की शास्त्रीय व्यवस्था है और विचित्रवीर्य की रानियाँ व्यास के जुगुप्सित शरीर से नज़दीकी को मन मेँ नहीँ उतार पातीँ किन्तु जो दासी विदुर को जन्म देती है वह व्यास को ‘ख़ुश’ करती है—और इन नाख़ुशियोँ के कु-परिणाम अन्धे धृतराष्ट्र तथा चर्मरोगी पाण्डु के रूप मेँ, इस ख़ुशी के सु-परिणाम विदुर के रूप मेँ सामने आये भी हैँ। दीर्घतमस् की जो कहानी भीष्म ने नियोग की नज़ीर के तौर पर सत्यवती को सुनायी है उसमेँ भी तक़रीबन ऐसी ही कहानी है। द्रौपदी ने भी सुभद्रा को ब्याह लाये अर्जुन से मान किया है। इस तरह यह नहीँ कहा जा सकता कि स्त्री-यौनिकता के ये पक्ष सर्वथा वर्तमान-कालिक चिन्ताओँ के चलते उभरे हैँ और निश्चय ही इन पर सोचा-लिखा जाना चाहिए।
किन्तु क्या यह यौनिकता स्वायत्त है? हम भारतीय सङ्कल्पना मेँ किसी यौनिकता के दण्डनीय होने का ज़िक्र नहीँ पाते किन्तु समलैङ्गिकता और तृतीय-लिङ्गियोँ की भागीदारी जैसे विकल्प ज़िक्रतलब होते हुए भी ग़ौरतलब नहीँ माने गये हैँ। न केवल यौनिकता ‘पुंसक= स्त्री-पुरुष का युग्म’ से सु-परिभाषित है अपितु उसमेँ संसार-यात्रा के अन्य पक्ष भी संहत हैँ—सम्भोग का कर्म अपने कौटुम्बिक और सामाजिक फलोँ से निरपेक्ष नहीँ रह सकता। यह ‘मानक यौनिकता’ स्त्रियोँ के प्रति ‘क्रूर’ नहीँ है—उदाहरण के लिए जनमेजय ने यह पूछना ज़रूरी समझा है कि धृतराष्ट्र का गान्धारी के प्रति कैसा व्यवहार था—किन्तु यौन-गतिकी के लिए पहिये दो ही चाहिए एक का तात्पर्य अधूरापन है।
महाभारत इस ‘मानक यौनिकता’ मेँ कई संशोधन-प्रस्ताव लाता है। कुछ ऐसे हैँ जो गर्भ-धारण पर स्त्री के एकाधिकार को चुनौती देते हैँ—एक बच्चा किसी घड़े मेँ भी तैयार हो सकता है। कुछ वीर्य-निषेचन से पितृत्व को अलगाने वाले हैँ—हम एक भी उदाहरण ऐसा नहीँ पाते जिसमेँ नियोग के लिए चुने गये पुरुष ने बच्चे का बाप होने का दावा किया हो। किन्तु सम्भवतः इनमेँ केवल यौनिकता तक सीमित रहने वाला प्रस्ताव एक ही है—कौमार्य की अक्षति का प्रस्ताव। हम पाते हैँ कि द्रौपदी को यह वरदान प्राप्त है कि सम्भोग से उसके कौमार्य को कोई क्षति नहीँ पहुँचेगी—ऐसा ही आश्वासन सत्यवती को पराशर ने दिया है और इनके अतिरिक्त भी नाम गिनाये जा सकते हैँ।
कुछ सभ्यताओँ मेँ कौमार्यक्षति एक शारीरिक परिवर्तन से समीकृत है—योनिच्छदभङ्ग (= Rypture of the Hymen) ही कौमार्य-क्षति का प्रमाण है और यदि पति यह पाता है कि उसकी पत्नी कुँवारी नहीँ है तो यह विवाह-विच्छेद का आधार है। इसके चलते योनिच्छद-सीवन (= Hymenorraphy) की भी एक भूमिका है और ईरान मेँ एक फ़तवा भी जारी हुआ था कि यदि किसी स्त्री ने अपने योनिच्छद की यह ‘मरम्मत’ करवा ली है तो उसका शौहर उसे इस आधार पर तलाक़ नहीँ दे सकता कि उसका किसी अन्य पुरुष से विवाह के पहले भी यौन सम्पर्क रहा है।
किन्तु वैदिक विवाह-सूक्तोँ से ले कर गृह्यसूत्रोँ तक और कामसूत्र से ले कर विभिन्न काव्योँ मेँ नव-सङ्गम-वर्णनोँ तक भारतीय परम्परा मेँ कौमार्य की ऐसी कोई शारीरिक परिभाषा उपलब्ध नहीँ है—इस पर मैँने थोड़े विस्तार से अपनी पुस्तक आहोपुरुषिका मेँ लिखा है। तो इन सारे आश्वासनोँ का क्या वास्तविक तात्पर्य हो सकता है? क्या युधिष्ठिर हर बार अपनी पारी पर द्रौपदी मेँ वही कन्या पाते हैँ या हर बार नवोढा-सङ्गम मेँ कुछ भिन्नता भी रहती है?
हम कुन्ती पर सोचते हैँ। उसे दुर्वासा ने वर दिया कि एक मन्त्र के प्रयोग से वह जिस देव को बुलायेगी उसके प्रभाव से उसे पुत्र की प्राप्ति होगी। यह ‘आपद्धर्म’ था किन्तु कुन्ती ने ‘कौतूहल’ और ‘विजिज्ञासा’ के चलते कन्या रहते हुए ही सूर्य का आह्वान किया जिन्होँने मन्त्र की ‘अमोघता’ का हवाला देते हुए उससे सम्भोग कर के कर्ण को जन्म दिया है किन्तु फिर उसका ‘कन्या-त्व’ वापस कर दिया है। यदि यह वापसी कोई ऐसा अभिलक्षण नहीँ है जिसे परख कर पाण्डु सन्तुष्ट हो सकते कि उनकी नवविवाहिता अ-कन्या नहीँ है तो हमेँ इसकी पड़ताल करनी चाहिए कि वह क्या है। इसके लिए हमारे पास सत्यवती और माधवी ही नहीँ, वे पाँच कन्याएँ—अहल्या, द्रौपदी, तारा, कुन्ती और मन्दोदरी—भी हैँ जिनका नित्यस्मरण महापातकोँ का नाश करता है।
एक पुस्तक-समीक्षा मेँ ऐसी किसी पड़ताल के लिए अवकाश नहीँ है। किन्तु कुन्ती पर लिखी गयी कविता जीवनदान मेँ कर्ण के जन्म को एक ‘प्रगल्भ क्षण’ के चलते हुआ बताया गया है और कर्ण के जन्म का जो विवरण हमेँ महाभारत से उपलब्ध है उसमेँ और जो कुछ हो ‘प्रगल्भता’ नहीँ है। धर्म वायु और इन्द्र को भी कुन्ती ने रतिसुख के लिए नहीँ पाण्डु की विनती पर बुलाया है और सूर्य से ले कर इन्द्र तक ने भी कोई ऐसा संकेत नहीँ दिया है कि कुन्ती के साथ रतिसङ्गत होने से उन्हेँ कोई ‘सुख’ मिला है—प्रत्येक सङ्गम मेँ दोनोँ ही पक्ष मन्त्र के प्रभाव से यन्त्रवत् हैँ।
इस लिहाज़ से शायद अम्बा-अम्बालिका-दासी पर लिखी कविताओँ मेँ से दासी पर लिखी कविता सबसे उद्दाम है और उलूपी पर लिखी कविता सबसे उत्तप्त—यद्यपि महाभारत की कहानी मेँ उलूपी-चित्राङ्गदा का युग्म अपराजेय अर्जुन को पराजय मृत्यु और पुनर्जीवन के पाठ पढ़ाने के लिए सिरजा गया लगता है। महाभारत की लड़ाई तक सर्वजेता अर्जुन की तदनन्तर शिकस्तोँ का भी बयान व्यास को करना ही था यद्यपि इन शिकस्तोँ का बयान जैमिनि-कृत महाभारत के एकमात्र उपलब्ध अंश जैमिनीयाश्वमेधपर्व मेँ अधिक तीखा और अधिक पसरा हुआ है।
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संग्रह के प्रारम्भ और अन्त मेँ एक एक कविता दी गयी है जिनके द्वारा किसी स्त्रीपात्र पर नहीँ अपितु पूरे महाभारत पर टिप्पणी की गयी है। समापन की कविता यह कौन सा कालखण्ड है? एक जाइज़ और ज़रूरी सवाल उठाती है—क्या कोई कालखण्ड ऐसा था या है या हो सकता है जिसमेँ महाभारत न हो रहा हो? सवाल पूछने की अदा मेँ ही जवाब भी छिपा है—ऐसा कोई कालखण्ड नहीँ है। और यह जवाब भी जाइज़ और ज़रूरी है क्योँकि जिसे ‘समय की शक्ति’ कहते हैँ उसकी पहुँच सीमित है—जैसा कि मीमांसाशास्त्र का सिद्धान्त है दुनिया वही रहती है यद्यपि उसके भीतर की चीज़ेँ नश्वर हैँ।
किन्तु इसी के साथ यह भी सत्य है कि महाभारत द्वापर की कथा है और प्रत्येक युग का धर्म अलग है। इसलिए द्वापर के नियमोँ से कलियुग को परखना ही उन समस्याओँ को जन्म देता है जो महाभारत को ‘हिस्ट्री’ की तरह पढ़ने वाले उत्पन्न करते हैँ। महाभारत पढ़ने वाले उससे कुछ रचने वाले और उन रचनाओँ से कुछ पाने वाले सभी को इसका ध्यान रखना चाहिए।
जो लोग महाभारत को ‘हिस्ट्री’ की तरह पढ़ते हैँ उन्हेँ महाभारत ‘बृहद्वादी’ कहता है—‘बृहद् = बड़ा’, ‘वादी = बोलने वाला’ ‘बृहद्वादी = बड़बोला’। यह शब्द वनपर्व के अध्याय १९० श्लोकाङ्क २८ मेँ आया हुआ है जहाँ मार्कण्डेय मुनि ने युधिष्ठिर को कलियुग के बारे मेँ बताते हुए कहा है कि कलियुग के मनुष्य बृहद्वादी होते हैँ—टीकाकार नीलकण्ठ चतुर्धर ने इस बड़बोलेपन का अर्थ समझाते हुए लिखा है कि पिता की हत्या कर के पुत्र और पुत्र की हत्या कर के पिता कहते हैँ कि हम तो अ-कर्ता हैँ करने वाला तो ईश्वर है।
श्रीमद्भगवद्गीता मेँ भगवान् ने अर्जुन को समझाया था कि तुम अपने को कर्ता न समझो और जीव तथा ब्रह्म मेँ अभेद है। इसके बाद युद्ध प्रारम्भ होता है जिसमेँ पौत्र पितामह का वध करते हैँ और आचार्य बालक का। इस तर्क से श्रीमद्भगवद्गीता को ‘बुक ऑफ़ वार’ कहने वाले बहुत हैँ—कोई उस पर प्रतिबन्ध लगाने की बात करता है कोई उससे प्रेरित हो कर शस्त्रधारण हेतु उकसाता है—ये ही वे बड़बोले हैँ।
पहली कविता कोई नहीँ देखता इस समर को एक वैकल्पिक पाठ मेँ महाभारत का अर्थान्वेषण करती है जिसमेँ अन्धे धृतराष्ट्र के अतिरिक्त कोई नहीँ देख पाता कि जिन्हेँ हारमांस के पुतले समझा जाता है वे वस्तुतः लोहे के पुतले हैँ जिनका चूरचूर होना ही महाभारत-युद्ध है—एक छद्म (= ersatz) क्रीडा जिसे खेलने वाला भी अदृश्य है क्योँकि बर्बरीक के जिस सिर ने सचमुच महाभारत का दृश्य देखा वह अपनी ऊँचाई से लुढ़क कर ज़मीन पर आ गया है। सञ्जय द्वारा देखा गया युद्ध हाड़-मांस के पुतलोँ का शस्त्र-सञ्चालन था, बर्बरीक द्वारा देखा गया युद्ध उन पुतलोँ की डोरियाँ खीँचते हुए नाचनचैया सूत्रधार कृष्ण को पहचान रहा था, यह धृतराष्ट्र का देखा हुआ युद्ध है जिसमेँ न केवल प्रतिशोध की विफलता है अपितु आक्रमण और रक्षा की युक्तियोँ की निरर्थकता भी अपने को खोलबिखेर देती है। दृश्य महाभारत को अदृश्य महाभारत मेँ ढकेलती हुई यह कविता कम्प्यूटर के कुंजीपटल की उस कुंजी को सामने लाती है जिसे हम ‘स्पेस’ कहते हैँ और जिसकी चोट से कुछ लिखते हुए भी उस कुछ को उभरते-छपते देख नहीँ पाते।
लोहे के ये पुतले इन कविताओँ मेँ बार-बार आये हैँ और इनकी यान्त्रिकता महाभारत का एक ‘साइंस फ़िक्शन’ के रूप मेँ पुनःपाठ करती दीखती है। ऐसे और भी पुनःपाठ इसमेँ खोजे जा सकते हैँ जो उस दिलचस्पी को बताते हैँ जो हमारे कुछ रचनाकारोँ मेँ हमारी आकर-कथाओँ के प्रति जागृत हो रही है। परिचय के प्रगाढतर होने के साथ-साथ उन कृत्रिम शास्त्रीयताओँ का असर भी कम होगा जो औपनिवेशिक चिन्तन-पद्धति ने हम पर लादीँ और जिनके चलते हम अपने नैरन्तर्य के बौद्धिक अनुभवोँ से छिटक चले हैँ।
इन कविताओँ का स्वागत है।

