• Blog
  • आपने ‘द फ़ैमिली मैन’  का तीसरा सीजन देखा है?

    मनोज वाजपेयी अभिनीत ‘द फ़ैमिली मैन‘, सीजन 3 पर यह टिप्पणी लिखी है युवा लेखक मुशर्रफ परवेज़ ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

    =====================

    कुछ एक दिन पहले एक प्रिय जूनियर ने कहा- “भैया आपने ‘द फ़ैमिली मैन’  का तीसरा सीजन देखा है?”
    मेरा जवाब हमेशा की तरह यही था कि भाई ये सिरीज़-विरीज देखना फालतू लगता है मुझे। वो दो मिनट तक मुझे देखता रहा और फिर बोला “भैया एक बार तो देखिए आपको अच्छा लगेगा।”

    ख़ैर, गूगल पर सर्च किया तो पता चला कि 21 नवंबर से ही ‘द फ़ैमिली मैन’ का तीसरा सीज़न धूम मचा रखा है। फ़िर सोच में पड़ गया कि भाई… आख़िर राज और डीके ने ऐसा क्या बना दिया जो लोग इतने दीवाने बन गए हैं। तह में गया तो पता लगा कि ये एक ‘थ्रिलर’ वेब-सीरीज है। अब अपन ठहरे हिंदी वाले तो थ्रिलर आते ही अपने को ‘गोपालराम गमहरी’ याद आ जाते हैं क्योंकि उन्होंने ही जासूसी उपन्यास लिखने की परंपरा का सूत्रपात किया था।

    बात रखने से पहले ही ये कह देना मैं बेहतर समझता हूँ कि मैं कोई फ़िल्म समीक्षक नहीं हूँ न ही कोई बड़ा टिप्पणीकार। इसीलिए जो अपनी हल्की-फुल्की समझ है वही रखने की भरसक कोशिश करूंगा। हां, आप कई जगहों पर मेरे मतों से अवश्य गुरेज रख सकते हैं और ये लाज़िम भी है।

    एक बात तो स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि पिछले दोनों सीजन पे ये वाला सीज़न भारी है। अब क्यों भारी है इसका जवाब आपको धीरे-धीरे मिलता जायेगा। सातों एपिसोड लाजवाब है। एक के बाद दूसरा तुरंत देखने को मन करता है। ये सातों एपिसोड 3 देशों के 4 शहरों के मध्य चलता है। भारत का दिल्ली और नागालैंड, अमरीका का न्यू यॉर्क और पाकिस्तान का इस्लामाबाद। दरअसल भारत, पाकिस्तान और अमरीका के मध्य आए दिनों कुछ न कुछ चलता ही रहता है। मनोज वाजपेई जो कि ‘श्रीकांत’ की भूमिका में भारत के ख़ुफ़िया एजेंसी, NIA का सबसे क़ाबिल एजेंट है। ‘प्रोजेक्ट शाहकार’ को सफ़ल बनाने के लिए अपनी जान गंवा देता है।
    जो देश की रक्षा हेतु घर-परिवार, बीवी और बच्चों तक को समय नहीं दे पाता है। बदले में उसके ऊपर अरेस्ट वारंट निकाल दिया जाता है।

    पहले एपिसोड की शुरुआत श्रीकांत के गृह-पूजन से होती है। जहां वो अपने बेटे, अथर्व को बता रहा है कि उसने बचपन से सेविंग इसीलिए किया ताकि नया फ्लैट ले सके। अधिकतर भारतीय परिवार में आज भी बच्चे के पैदा होते ही उसके लिए LIC खुलवा दिया जाता है ताकि उसका भविष्य उज्ज्वल बने। श्रीकांत और सुचित्रा जो उसकी तलाकशुदा पत्नी है फ़िर भी वे दोनों साथ रहते हैं ताकि बच्चों पर कोई प्रभाव न पड़े। इस मक़ाम पर मोहन राकेश के नाटक ‘आधे-अधूरे’ वाले महेंद्रनाथ और सावित्री की याद आ जाती है।

    ऑपरेशन शाहकार को सफ़ल बनाने जब श्रीकांत और NIA चीफ, कुलकर्णी नागालैंड जाते हैं। वहां डेविड के यहां रुकते हैं। उस समय डेविड का पोता, अबुजा जो कि वहां की स्थिति का जिम्मेदार भारत सरकार को मानता है। डेविड अपने पोता यानी अबुजा से कहता है -“Violance से कुछ भी अचीव नहीं होने वाला।” क्योंकि उसने हमेशा से अपने गाँव और शहर को पिसते हुए देखा है। विडंबना देखिए जिस अहिंसा के नाम पर महात्मा गांधी ने पूरे विश्व को शांति का पाठ पढ़ाया उन्हीं के देश का युवा हिंसा का रास्ता अपना लिया है।

    मीरा जो न्यू यॉर्क से नागालैंड के माहौल को बिगाड़ने की मास्टरमाइंड है। उसका किया हुआ भुगतता है इमानदार श्रीकांत। मीरा के प्लान को नागालैंड में सफ़ल बनाता है रूक्मा। वही रूक्मा जिसने कुलकर्णी की हत्या श्रीकांत के सामने की। रूक्मा का ये डायलॉग बड़ा प्रासंगिक है। कहता है- “औकात बढ़ानी चाहिए अपनी पर भूलनी नहीं चाहिए।” वैसे तो है वो नाजायज़ रास्ते पर बात पते की करता है।
    रूक्मा की प्रेमिका जब मुठभेड़ में मारी जाती है तब उसको इंसान के जान की क़ीमत समझ आती है। बॉबी जो उसकी प्रेमिका का बेटा है। उसको देखकर मुझे कमलेश्वर की कहानी ‘राजा निरबंसिया’ का एक कथन याद आ जाता है। कमलेश्वर कहते हैं- “औलाद ही तो वह स्नेह की धुरी है, जो आदमी-औरत के पहियों को साधकर तन के दलदल से पार ले जाती है…नहीं तो हर औरत वेश्या है और हर आदमी वासना का कीड़ा।”

    एक कहावत है कि जासूस अपने घर वालों को भी नहीं बताते हैं कि वे क्या काम करते हैं? ये ठीक बात है क्योंकि श्रीकांत के बीवी और बच्चों को भी उसके काम का पता नहीं है। एजेंट का जीवन कैसा होता है खुद श्रीकांत बताता है। कहता है- “जॉब ज्वाइन करने के दिन ही पता था कि जिन्दगी और मौत के बीच एक गोली की दूरी है।”
    इसीलिए अपनी बेटी से श्रीकांत कहता है- “शादी तो कर ली पर शादी में था ही नहीं।”

    आख़िरी सांस तक श्रीकांत का कुलकर्णी सर के प्रति प्रेम बताता है कि गुरु की कितनी महत्ता होती है जीवन में। सच्चा और क्लासिक प्रेम क्या होता है उसको दर्शाती हैं ज़ोया। रूक्मा जब बॉबी को उसके नाना के पास ले जाता है और कुछ पैसे देता है। उस समय उसका नाना पैसे लौटाकर जो कहता है यही भारत के ननिहाल की सच्चाई है। वो कहता है- “अपने नाती को पालने के लिए तुम्हारे रुपए की कोई ज़रूरत नहीं।”

    अंत में एक संवाद जो आपके दिल को भी छुएगा। श्रीकांत जब मीरा और रूक्मा के मिशन की ख़बर अपने NIA के अधिकारी को देता है। उस समय की बातचीत यूं है-
    अधिकारी- तुम क्यों भाग रहे हो?
    श्रीकांत- जिस आदमी ने जीवन भर देश की सेवा की उसको तोहफे में अरेस्ट वारंट देंगे तो भागेगा ही न।

    आपको भी एक बार ‘द फ़ैमिली मैन’ का तीसरा सीज़न ज़रूर देखना चाहिए। क्योंकि सीरीज का नाम ‘द फ़ैमिली मैन’ है पर मनोज वाजपेई का क़िरदार सीरीज के नाम के उलट है। ज़्यादा नहीं बताऊंगा अब आपकी ज़िम्मेदारी है देखिए…

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins