अदम गोंडवी हिंदुस्तानी ग़ज़ल का ऐसा शायर है जो अपनी शाइरी में प्यार-मुहब्बत, हिज्र-विसाल जैसे मौज़ूआत को छोड़ कर आम जनमानस की समस्याओं को उठाता है। वह किसी दरबार का नहीं बल्कि आम जनता का शाइर है जो उनकी तरफ़ से हुक्म-रानों से आँख से आँख मिला कर सवाल करता है। इसलिए बेरोज़गारी, ग़रीबी, भुखमरी, धार्मिक-साम्प्रदायिक एवं जातिगत भेदभाव, स्त्रियों का शोषण आदि विषय उनकी शायरी की विषय-वस्तु बनते हैं जो प्रत्येक नागरिक को सोचने पर मजबूर करते हैं। अदम गोंडवी की शाइरी भले ही शाइरी की प्रचलित लय पर खरी न उतरे किंतु वह ज़िन्दगी की लय पर खरी उतरती है। आज अदम गोंडवी की पुण्यतिथि है। इस मौक़े पर पढ़ते हैं उनकी कुछ ग़ज़लें। पेशकश है अभिषेक कुमार अम्बर की- मॉडरेटर
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ग़ज़ल -1
पहले जनाब कोई शिगूफ़ा उछाल दो
फिर कर का बोझ क़ौम की गर्दन डल डाल दो
रिश्वत को हक़ समझ के जहाँ ले रहे हों लोग
है और कोई मुल्क तो उसकी मिसाल दो
औरत तुम्हारे पाँव की जूती की तरह है
जब बोरियत महसूस हो घर से निगल दो
चीनी नहीं है घर में, लो मेहमान आ गए
महँगाई की भट्ठी में शराफ़त उबाल दो
ग़ज़ल – 2
भुखमरी, बेरोजगारी, तस्करी के एहतिमाम
सन सत्तासी नज्र कर दें, मजहबी दंगों के नाम
दोस्त, मलियाना के पसमंजर में जाके देखिए
दो कदम हिटलर से आगे हैं ये जम्हूरी निजाम
है इधर फाक़ाकशी से रात का कटना मुहाल
रक़्स करती है उधर स्कॉच की बोतल में शाम
बम उगाएँगे अदम दहक़ान गंदुम के एवज़
आप पहुँचा दें हुकूमत तक हमारा ये पयाम
ग़ज़ल-3
वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है
कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है
रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है
ग़ज़ल -4
हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए
ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए
छेड़िए इक जंग, मिल-जुल कर ग़रीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मज़हबी नग्मात को मत छेड़िए
ग़ज़ल-5
उनका दावा, मुफ़लिसी का मोर्चा सर हो गया
पर हक़ीक़त ये है मौसम और बदतर हो गया
बंद कल को क्या किया मुखिया के खेतों में बेगार
अगले दिन ही एक होरी और बेघर हो गया
जब हुई नीलाम कोठे पर किसी की आबरू
फिर अहिल्या का सरापा जिस्म पत्थर हो गया
रंग- रोग़न से पुता, पहलू में लेकिन दिल नहीं
आज का इंसान भी काग़ज़ का पैकर हो गया
माफ़ करिए, सच कहूँ तो आज हिंदुस्तान में
कोख ही ज़रख़ेज़ है अहसास बंजर हो गया
ग़ज़ल -6
बेचता यूँ ही नहीं है आदमी ईमान को,
भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को
सब्र की इक हद भी होती है तवज्जो दीजिए,
गर्म रक्खें कब तलक नारों से दस्तरख़्वान को
शबनमी होंठों की गर्मी दे न पाएगी सुकून,
पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को
पार कर पाएगी ये कहना मुकम्मल भूल है,
इस अहद की सभ्यता नफ़रत के रेगिस्तान को।

