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  • क्या संस्थाएं लेखन की मौलिकता और लेखक की अस्मिता से बड़ी हो गई हैं?

    गौरव-ज्ञानपीठ प्रकरण में निर्णायक मंडल का मत एक महत्वपूर्ण पहलू है. क्या हिंदी के गणमान्य महज अपमानित होने के लिए निर्णायक बनते हैं या इसके पीछे कुछ और पहलू होते हैं. युवा लेखक विवेक मिश्र का यह लेख इस पूरे प्रकरण को एक अलग ‘एंगल’ से देखने का आग्रह करता है- जानकी पुल. 
    ———————————————————————————–
    जानकीपुल ने पिछले दिनों लेखकों की अस्मिता और साहित्यिक संस्थाओं की मनमानी को लेकर कई बेहद जरूरी सवाल उठाए हैं। कोई भी लिखने-पढ़ने वाला व्यक्ति न तो इन सवालों को नज़रअंदाज़ कर सकता है और न ही सब कुछ सुन-समझ कर ख़ामोश ही रह सकता है। अधिकाधिक लोगों ने इस मामले परयथासंभव अपनी राय भी दी हैपर जो एक बात खल रही है वो यह है कि सारी बातें बहुत सनसनीख़ेज़ तरीके से एक लेखक(गौरव) बनाम एक संस्था के पदाधिकारी (कालिया) व ट्रस्टी(आलोक जैन) के बीच अनायास शुरु हुए घमासान की तरह प्रस्तुत की जा रही हैं. साथ ही साथ किसी महायुद्ध की तरह सभी से किसी न किसी पक्ष में कूद पड़ने के लिए अपील भी की जा रही है। मेरा मानना है कि कोई भी बड़ी और खुली बहस इतने संकुचित दायरे में नहीं हो सकती। 
    इस मामले पर कोई भी राय देने या अपना पक्ष तय करने से पहले यह जानना बहुत जरूरी है कि साहित्य के पुस्कारों और प्रकाशनों को किस प्रकार की संस्थाएं संचालित करती हैंउनमें निर्णायक मंडल का चयन किस आधार पर किया जाता हैवास्तव में निर्णायकों को कितनी स्वायत्तता होती हैनिर्णय लेने कीक्या सच में वे निर्णायक होते भी हैं या मात्र संस्था की कारगुज़ारियों को अपने ढ़ंग से चलाने के लिए निर्णायकों का एक मुखौटा भर इस्तेमाल किया जाता हैनिर्णायकों को निर्णयों पर अपनी मुहर लगाने के लिए और हर सही ग़लत फैसले के बाद निर्णायक मंडल में बने रहने के लिएक्या कोई आर्थिक लाभ भी मिलता हैक्या इन ट्रस्टों के द्वारा लिए गए निर्णयों को आर टी आई के दायरे में लाया जा सकता हैयदि लेखक के साथ सचमुच कुछ गलत हुआ है तो क्या वह इसके लिए न्यायालय का दरवाज़ा खटखटा सकता हैक्या कहीं कोई यह सवाल उठा सकता है कि ऐसी संस्थाओं के स्थाई पदों पर बैठे लोगों की क्या योग्यता निर्धारित की गई हैया यह सब किसी ट्रस्ट के मुख्य ट्रस्टी की पसंद न पसंद परया कभी-कभी उसके अच्छे-बुरे मूड पर निर्भर करता है? 
    साथ ही इस बात की भी पड़ताल की जानी चाहिए कि पिछले पाँच सालों में इन संस्थाओं ने किस प्रकार के साहित्य को छापा है?, जिन लेखकों की पुस्तकें इन प्रकाशनों से छपी हैंउनमें से अधिकांश लेखकों की क्या कोई और पुस्तक कहीं और से या किसी व्यवसायिक प्रकाशन से भी छपी हैया वे सब किसी विशेष योजना के तहतकिसी समय विशेष मेंकिसी व्यक्ति विशेष के कहने पर गोद लिए गए थेयदि ऐसा नहीं है तो वह कितनी बार ऐसे विशेष संरक्षण वाली संस्थाओं से इतर छपने तथा अपनी रचनाओं से पाठकों के बीच अपना स्थान बनाने में सफल हुए हैं?
    विवेक मिश्र 
    हम सभी जानते है कि किसी संस्थान में कोई भी गड़बड़ी अनायास ही किसी उल्का पिंड की तरह नहीं गिरतीजब कहीं कुछ पक रहा होता है तो उसकी गन्ध बहुत पहले से आने लगती है और जो परकोटे के भीतर बैठे लोग हैं उन्हें यह सबसे पहले आनी चाहिए पर वह नाक में तब तक पट्टी बाँधे रहते हैंजब तक गन्ध सड़ांध में नहीं बदल जाती। यदि वाकई किसी संस्था और प्रकाशन योजना में इस क़दर मनमानी चल रही है तो संस्था विशेष से एक व्यक्ति विशेष ही क्यों अपनी पांडुलिपि वापस लेता है और पुरुस्कार लौटाता है और बाकी के लोग केवल फेसबुक पर लाईक और शेयर करके या गुपचुप फोन और एस एम एस से ही अपना विरोध जताते हैं। एक बार प्रकाशित हो चुकने के बाद अब तो उनके सामने छपने काया अपनी पहचान का संकट नहीं रह गया है। यह भी जानना जरूरी है कि इस सबके बीच साहित्येतर दुरभसंधियों की कितनी भूमिका हैक्या सचमुच ही यह सस्थाएं लेखन की मौलिकता और लेखक की अस्मिता से बड़ी हो गई हैंक्या यह मान लिया गया है कि यदि कोई लेखक जीवन में कभी इन संस्थाओं से नहीं छपता या पुरुस्कृत नहीं होता तो वह हिंदी समाज में लेखक होने का दर्ज़ा नहीं पा सकताक्या इस प्रकार की पूँजीपतियों द्वारा पोषित संस्थाओं में इनके ट्रस्टों में स्थाई सदस्यता वाला और अपनी इछा से आजीवन बना रहनेवाला कोई साहित्यकार है जिसे सेठ की इछा के आगे घुटने न टेकने पड़ेंअन्यथा ऐसी नख दंत विहीन ज्यूरी और ऐसी नश्वर सदस्यता का क्या अर्थ है जो एक बार न में सिर हिलाते ही समाप्त हो जाएऔर ऐसी लुंज- पुंज ज्यूरी के हाथों पाण्डुलिपि का स्वीकृत होना क्या और पुरुस्कार के लिए चुना जाना और निरस्त किया जाना क्याआखिर लेखक कोई ट्रेलर तो है नहीं जो बिलकुल संस्था के निर्देशक के मन की लम्बाई-चौड़ाई नापकर ऐसी रचना लिखे जो मन का आकार घटते-बढ़ते रहने पर भीनिर्देशक जब भी उसे पहने वह बिलकुल फिटमफिट उसे आ जाए या उसके मन को भा जाए। पर लेखक हैं कि किसी कारीगर से अपने आपको कम नहीं समझते और संस्था के हिसाब से उसके नाप की रचनाएं लिखे जा रहे हैं अब एक आधा बार आर्डर उपर नीचे हो गया कि बस बात उलझ गई। थोड़े से विषयान्तर के साथ एक और बात फिर लेखकों की करना चाहता हूँ कि कुछ लेखकों को एक ही साल में दो-दोतीन-तीन राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त सम्मान दिए जा रहे हैं। ऐसे लेखकों द्वारा लिखित पुस्तकों की विक्री और लोकप्रियता पर प्रकाश डालें तो लेखक द्वारा खरीदी गई प्रतियों और दोस्तों द्वारा लिखी गई समीक्षाओं से इतर एक विशुद्ध पाठक के रूप में इनका नाम लेवा भी कहीं कोई नहीं है। वे लेखक खुद डरे-डरेबचे-बचे और रचनाओं पर खुली चर्चा से छुपे-छुपे फिरते हैं। खैर विश्वविद्यालयों के लेखकों की बात तो समझ में आती है कि इस सबसे बायोडाटा मजबूत होता है। पदोन्नति आदि में मदद बगैरह मिलती हैपर स्वतन्त्र लेखन कर रहे अकादमियों और युनीवर्सिटियों सेमठोंपीठों और न्यासों से अलग बैठ कर लिखने वालों सेगाँव-कसवों के अनुभवों को मन सहेजे बैठे लेखकों सेछपने न छपने की परवाह न करते हुए लिखने वालों से आज भी समाज और साहित्य यह आस बाँधे हुए है कि वे ऐसी चालाकियों को बिना बात की हवा देने के बजाय। हिंदी के पाठकों को यह बताएं ही नहीं बल्कि आगे बढ़कर सिद्ध करके दिखाएं कि यहाँ-वहाँ से छपने में या बाइ डिफाल्ट किसी के हाथ कोई अवार्ड आदि जैसी वस्तु लग जाने से लेखन की दशा और दिशा नहीं बदलती। न ही लेखक की सेहत पर कोई बहुत बड़ा असर पड़ता है। यदि लेखक में मौलिकता है तो वह आज नहीं तो कल अपना स्थान पाठकों के बीच जरूर बना लेगा। 
    काशीनाथ सिंह जी ने हाल ही में प्रकाशित अपने एक साक्षात्कार में कहा है कि लेखक को बाज़ारू हुए बगैर अपनी रचनात्मकता के साथ बाज़ार में जाना चाहिए। अगर रचनात्मकता होगी तो उसे पाठकों का बड़ा समाज भी मिलेगाऊर्जा भी मिलेगी और बाज़ार भी मिलेगा। उन्होने यह भी कहा कि हमने व्यवसायिक लेखन के ख़िलाफ़ 67-68 के ज़माने में आंदोलन शुरु किया था। हमने बड़े घरानों और सेठ पोषित पत्रिकाओं को व्यवसायिक पत्रिका कहा था और कहा ही नहीं था उनमें लिखना बंद भी कर दिया था। उन्होंने बहुत स्पष्ट करते हुए कहा है कि व्यवसायिक लेखन उसे कहते हैं जिसके लिए दूसरों का दुख और गरीबी मनोरंजन हो। हमने मनोरंजन के लिए कभी नहीं लिखा। पुरुस्कारों से लेखक का महत्व बढ़ जाने वाले प्रश्न पर उन्होंने कहा कि ऐसा उनके बीच होता है जो साहित्य की समझ नहीं रखते। जो साहित्य की दुनिया से बाहर के लोग हैंवे ही पुरुकार मिलने पर लेखक का नोटिस लेते हैं। साहित्य से जिनका निरन्तर जुड़ाव है वे तो पहले से ही लेखक और उसकी रचना को जानते हैं। पुरुस्कार से लेखक को लाभ हो या न हो प्रकाशक को इसका लाभ जरूर होता है। काशीनाथ जी की इन बातों के बादअन्त में मैं तो बस यही कहूँगा कि साहित्य में……यह लाभ-हानि का खेल साहित्य को पाठकों की नज़रों में उपर नहीं उठाता वल्कि नीचे ही गिराता है। हमें अपने लेखन की मौलिकता को निरन्तर परखना और उस पर धार धरते रहना चाहिए। बाकी के बादल अपने आप छँटते चले जाएंगे और यह बहस फलाने बनाम ढिकाने की ना होकर साहित्य बनाम साहित्य की चालाकियों की होनी चाहिए। 
    विवेक मिश्र
    9810853128/ vivek_space@yahoo.com

    19 thoughts on “क्या संस्थाएं लेखन की मौलिकता और लेखक की अस्मिता से बड़ी हो गई हैं?

    1. चलते-चलते एक बार और जोकर हर समय में हर जगह होते हैं और हाँ समय को उनकी भी ज़रूरत है,…क्योंकि सच में सच का तनाव बहुत होता है,जिसे हर कोई नहीं झेल पाता।

    2. प्रेम सहजवाला जी तेजेन्द्र शर्मा ने क्या कहा मैं नहीं जानता पर आज भी हमारे बीच- संजीव, शिवमूर्ति, प्रियम्वद जैसे उदाहरण हैं, जो चुपचाप लिखते रहे और दूर-दूर तक पहचाने जाते हैं।उन्होंने किसी पुरुस्कार को पाने की राजनिति में हिस्सा नहीं लिया। न ही अपनी छवि चमकाने और अपना रुतबा बढ़ाने के लिए किसी कोई नक़दी पुरस्कार ही शुरु किया, जो लिखता है उसे आज भी यह सब करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। काशीनाथ जी पुरुस्कार से पहले भी बड़े लेखक थे आज भी बड़े लेखक हैं।

    3. विवेक जी एक नज़र साहित्य की वर्तमान स्थिति पर भी डालें. अब वो ज़माना गया कि लेखक अपने खून पसीने की कमाई से या तो कमलेश्वर या श्रीपत राय की नज़रों में पड़ कर धर्मवीर भारती या मनोहर श्याम जोशी तक पहुँचता है और अथक परिश्रम कर के किसी दिन पहचाना जाता है. अब इस भीड़ भरे माहौल में तो मुझे तेजेन्द्र शर्मा की ही बात सही लगती है जो उन्होंने किसी साक्षात्कार में कही कि हर लेखक अपने आसपास ही अपनी छवि चमका कर प्रसिद्धि पा लेता है (कुछ कुछ ऐसी ही बात कही थी उन्होंने). जब एक प्रकार का भूमंडलीकरण ही हो जाए तो हर लेखक अपने लिये कोई बड़ी कंपनी ढूंढ कर उसमें प्लेसमेंट ले लेता है और साहित्य में भी बड़े बड़े धुरंधर काफिया पैदा हो गए हैं. हम जिसे चार दशक पहले ग्रुपिज्म कहते थे वह अब साहित्य का ग्लोबलाईजेशन हो गया है. ऐसे में मुझे एक और रोचक बात भी याद आती है जो गोविंद व्यास ने एक कार्यक्रम में कही थी कि कुछ लेखक ज़िंदगी भर का परिश्रम सम्मान बटोरने में करते हैं और एक दिन उनके पास इतने सम्मान हो जाते हैं कि वे शर्म के मारे लोगों से छुपते फिरते हैं क्योंकि जेनुएन् पढ़ने वाले उनकी पूछताछ करते हैं कि ऐसे आपने कौन से तीर मार लिये साहित्य में! पर जैसे देश के पूरे माहौल में भ्रष्टाचार अब एक ना हटाई जा सकने वाली बीमारी हो गया है तो साहित्य में भी सम्मान पुरस्कार बटोरने वाले शायद मेरे आप के कहने से हटेंगे नहीं. जो लेखन की ताकत पर कुछ बनना चाहते हैं वे कोने में सही, लिखते रहेंगे और उनकी तरफ किसी की भी नज़र पड़ते ही हाथ जोड़ यही कहेंगे – 'मेरे चार बच्चे हैं, बस यहीं नुक्कड़ में रहता हूँ'… हा हा. जेनुएन् लेखक की रौशनी तब भी छोटे से दायरे में पड़ कर हाई वोल्टेज मानी जाती थी आज भी इसी उम्मीद के साथ जेनुएन लेखन की मशाल जलती रहे तो बेहतर. बाकी सब बातों का इलाज ना आपके पास ना मेरे पास.

    4. आप सबका आभार। आप सबकी बातों से बल मिला। हम सभी के लेखन से जुड़े होने पर सीधे तौर पर यह कहा जा सकता है कि हम लेखक की अस्मिता को बचाने के लिए उसके साथ खड़े हैं और शायद अभी यह भी लगे कि हम व्यक्ति विशेष के समर्थन में खड़े हैं,पर लम्बे समय में व्यक्ति बनाम व्यक्ति की लड़ाइयाँ बहुत निम्न स्तर पर निजी स्वार्थों में सिमट कर रह जाती हैं। इस संदर्भ में उठे प्रश्न बहुत बड़े सरोकारों के,और बहुत गहरे हैं। साहित्य में एक तरह का माफिया तन्त्र काम कर रहा है। और अक्सर अंधेरे उजाले में हम सभी उसे देखते रहे हैं। पुरुस्कारों और कृति विशेष के प्रकाशन और उसके थोथे प्रचारों के लिए की जाने वाली दुर्भसंधियों के सूत्र भारत में ही नहीं। भारत के बाहर भी हिंदी साहित्य में फैले हुए हैं। हमें सावधान रहने और पाठकों को आगाह करने की जरूरत है। क्योंकि हाँ- न करते-करते बाज़ार अपनी पूरी ताक़त के साथ साहित्य में भी गुस आया है।

    5. नवनीत जी आपके नोट्स ने इस पुरे मामले को बहुत महत्वपूर्ण लेखकों की राय से जोड़ा है।धन्यवाद

    6. विमलेन्दु जी आपने सही कहा प्रश्न पूछे जा सकते हैं, पर आन्दोलन इस तरह खड़े नहीं हो सकते।उसके लिए बड़े धरातल तैयार किए जाने चाहिए। पर 'पुरुस्कार और प्रकाशन'पर संस्थानों का विशेषाधिकार है लेकिन वह तभी तक है जब तक कि निजी और व्यवसायिक हैं यदि वे ट्रस्ट के रूप में या समाजसेवी संस्थाओं के रूप में कार्य कर रही हैं। टैक्स में सरकार से छूट पा रही हैं। समाज में एक मानक के रूप में स्थापित हो चुकी हैं तो वे देश,समाज और साहित्य के प्रति उत्तर दायी हैं। नहीं तो वे काले को सफेद करने का अड्डा भर बन के रह जाती हैं। और ऐसा वह केवल धन के साथ ही नहीं करतीं वे व्यक्तियों के साथ भी ऐसा करती हैं।

    7. विवेक भाई ने बेहद ज़रूरी सवाल उठाये हैं…

    8. विवेक जी ने अपने इस आलेख में बहुत ही महत्त्वपूर्ण और निरपेक्ष सवाल उठाए हैं..इस आलेख को पढकर मुझे अपने कुछ नोट्स याद आ गए जो इस संदर्भ में समय-समय पर हमारे महत्त्वपूर्ण लेखकों ने पहले भी उठाए थे…साझा कर रहा हूं..""आज कृति छपने से पहले ही चर्चित हो जाती है, पढे जाने से पहले ही उसे सनद बख्श दी जाती है कि यह हिन्दी की पहली और आखिरी रचना है। उसी हिसाब से एक कृति पर कई-कई पुरस्कार दिए जाते हैं। मेरी चिंता केवल पुरस्कार तक सीमित नहीं है बल्कि उस अन्याय और अपमान के प्रति है जो हर दिन, हर पल एक रचनाकार को सहना पड़ता है।" नासिरा शर्मा (संचेतना)

      "क्या वजह है कि जगदीश गुप्त को भारत-भारती सम्मान इस उम्र में आकर मिला? गिरिजा कुमार माथुर को अकादमी पुरस्कार इतनी देर से मिला, व्यास सम्मान तो स्वयं प्राप्त ही नहीं कर पाए। विष्णु प्रभाकर, देवेन्द्र सत्यार्थी, शैलेश मटियानी, रामदरश मिश्र, महीप सिंह, देवेंद्र इस्सर आदि को तो अभी भी याद नहीं किया गया है जबकि जगूड़ी को मिल गया है।" प्रताप सहगल(संचेतना)

      अरुण कमल को 1998 का साहित्य अकादमी सम्मान मिलने पर अशोक वाजपेयी ने जनसत्ता में अपने डिस्पेच असमंजस में लिखा था’ अव्वल तो पुरस्कार नेमिचंद्र जैन, विनोद कुमार शुक्ल, विष्णु खरे और चंद्रकांत देवताले की पुस्तकों के रहते इस पुस्तक को मिले यह रुचि या मानदण्ड की विभिन्नता का मामला नहीं हो सकता, तब जब जूरी में भीष्म साहनी, केदारनाथ सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी हों। यह खुले तौर पर प्रगतिशील निर्णय है।… पर क्या यह सही है कि उसी पीढी के मंगलेश डबराल का काम अरुण कमल से बेहतर और अधिक रहा है? श्री कमल से पिछली पीढी के रमेशचंद्र शाह, कृष्ण बलदेव बैद, राजेंद्र यादव, और कमलेश्वर को वह नहीं मिला। कुल मिलाकर यह कि इस बार का पुरस्कार गैर साहित्यिक कारणों से किसी सुनिश्चित योजना के अंतर्गत दिया लगता है। यह दूसरी अधिक समर्थ कृतियों को नज़र अंदाज करके दिया गया है।… अगर हमारे जिम्मेदार और वरिष्ठ लेखक-निर्णायक ऎसा निर्णय लेते हैं तो हमें यह जानने का हक है कि उसका ठोस आधार क्या है, कितनी देर, किन कृतियों पर बहस हुयी?"

      "अब चूंकि ज्यादातर पुरस्कार पद, पहुंच और संभवत: पार्टी(दारु आदि की भी, राजनीति की भी) और अन्य कारणों से अंजाम पाते हैं, मात्र उत्कृष्ट लेखन से नहीं। सो गांव, देहात, छोटे कस्बे और शहरों के लेखक या बिना पहुंच के लेखक उस सूची में आ ही नहीं पाते। दूसरी ओर ढेरों पुरस्कारों के घूरे पर बैठे महालेखकों का लेखन आज कहां है, पता भी नहीं चलता।" -संजीव

    9. विवेक जी के सवाल सार्वभौम और बड़े लोकप्रिय सवाल हैं….फिर भी कुछ अपील तो करते ही हैं…..मेरे ज़हन में एक बड़ी सीधी सी बात है कि, यह किसी प्रकाशक या संस्थान का विशेषाधिकार है कि वह किसी लेखक की किताब छापे या किसी को पुरस्कृत करे.इसमें दोनों पक्षों के भीतरी सम्बन्ध भी खासी अहमियत रखते होंगे. ऐसी बातों पर कोई जन-आन्दोलन नहीं खड़ा होना चाहिए.

    10. लेख में जिन मुद्दों पर विचार किया गया है मैं विवेक जी के मत से पूर्णतः सहमत हूँ. इसकी प्रासंगिकता असंदिग्ध है.
      सुंदर लेख के लिए बधाई.

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    गौरव-ज्ञानपीठ प्रकरण में निर्णायक मंडल का मत एक महत्वपूर्ण पहलू है. क्या हिंदी के गणमान्य महज अपमानित होने के लिए निर्णायक बनते हैं या इसके पीछे कुछ और पहलू होते हैं. युवा लेखक विवेक मिश्र का यह लेख इस पूरे प्रकरण को एक अलग \’एंगल\’ से देखने का आग्रह करता है- जानकी पुल. 
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    जानकीपुल ने पिछले दिनों लेखकों की अस्मिता और साहित्यिक संस्थाओं की मनमानी को लेकर कई बेहद जरूरी सवाल उठाए हैं। कोई भी लिखने-पढ़ने वाला व्यक्ति न तो इन सवालों को नज़रअंदाज़ कर सकता है और न ही सब कुछ सुन-समझ कर ख़ामोश ही रह सकता है। अधिकाधिक लोगों ने इस मामले परयथासंभव अपनी राय भी दी हैपर जो एक बात खल रही है वो यह है कि सारी बातें बहुत सनसनीख़ेज़ तरीके से एक लेखक(गौरव) बनाम एक संस्था के पदाधिकारी (कालिया) व ट्रस्टी(आलोक जैन) के बीच अनायास शुरु हुए घमासान की तरह प्रस्तुत की जा रही हैं. साथ ही साथ किसी महायुद्ध की तरह सभी से किसी न किसी पक्ष में कूद पड़ने के लिए अपील भी की जा रही है। मेरा मानना है कि कोई भी बड़ी और खुली बहस इतने संकुचित दायरे में नहीं हो सकती। 
    इस मामले पर कोई भी राय देने या अपना पक्ष तय करने से पहले यह जानना बहुत जरूरी है कि साहित्य के पुस्कारों और प्रकाशनों को किस प्रकार की संस्थाएं संचालित करती हैंउनमें निर्णायक मंडल का चयन किस आधार पर किया जाता हैवास्तव में निर्णायकों को कितनी स्वायत्तता होती हैनिर्णय लेने कीक्या सच में वे निर्णायक होते भी हैं या मात्र संस्था की कारगुज़ारियों को अपने ढ़ंग से चलाने के लिए निर्णायकों का एक मुखौटा भर इस्तेमाल किया जाता हैनिर्णायकों को निर्णयों पर अपनी मुहर लगाने के लिए और हर सही ग़लत फैसले के बाद निर्णायक मंडल में बने रहने के लिएक्या कोई आर्थिक लाभ भी मिलता हैक्या इन ट्रस्टों के द्वारा लिए गए निर्णयों को आर टी आई के दायरे में लाया जा सकता हैयदि लेखक के साथ सचमुच कुछ गलत हुआ है तो क्या वह इसके लिए न्यायालय का दरवाज़ा खटखटा सकता हैक्या कहीं कोई यह सवाल उठा सकता है कि ऐसी संस्थाओं के स्थाई पदों पर बैठे लोगों की क्या योग्यता निर्धारित की गई हैया यह सब किसी ट्रस्ट के मुख्य ट्रस्टी की पसंद न पसंद परया कभी-कभी उसके अच्छे-बुरे मूड पर निर्भर करता है? 
    साथ ही इस बात की भी पड़ताल की जानी चाहिए कि पिछले पाँच सालों में इन संस्थाओं ने किस प्रकार के साहित्य को छापा है?, जिन लेखकों की पुस्तकें इन प्रकाशनों से छपी हैंउनमें से अधिकांश लेखकों की क्या कोई और पुस्तक कहीं और से या किसी व्यवसायिक प्रकाशन से भी छपी हैया वे सब किसी विशेष योजना के तहतकिसी समय विशेष मेंकिसी व्यक्ति विशेष के कहने पर गोद लिए गए थेयदि ऐसा नहीं है तो वह कितनी बार ऐसे विशेष संरक्षण वाली संस्थाओं से इतर छपने तथा अपनी रचनाओं से पाठकों के बीच अपना स्थान बनाने में सफल हुए हैं?

    विवेक मिश्र 
    हम सभी जानते है कि किसी संस्थान में कोई भी गड़बड़ी अनायास ही किसी उल्का पिंड की तरह नहीं गिरतीजब कहीं कुछ पक रहा होता है तो उसकी गन्ध बहुत पहले से आने लगती है और जो परकोटे के भीतर बैठे लोग हैं उन्हें यह सबसे पहले आनी चाहिए पर वह नाक में तब तक पट्टी बाँधे रहते हैंजब तक गन्ध सड़ांध में नहीं बदल जाती। यदि वाकई किसी संस्था और प्रकाशन योजना में इस क़दर मनमानी चल रही है तो संस्था विशेष से एक व्यक्ति विशेष ही क्यों अपनी पांडुलिपि वापस लेता है और पुरुस्कार लौटाता है और बाकी के लोग केवल फेसबुक पर लाईक और शेयर करके या गुपचुप फोन और एस एम एस से ही अपना विरोध जताते हैं। एक बार प्रकाशित हो चुकने के बाद अब तो उनके सामने छपने काया अपनी पहचान का संकट नहीं रह गया है। यह भी जानना जरूरी है कि इस सबके बीच साहित्येतर दुरभसंधियों की कितनी भूमिका हैक्या सचमुच ही यह सस्थाएं लेखन की मौलिकता और लेखक की अस्मिता से बड़ी हो गई हैंक्या यह मान लिया गया है कि यदि कोई लेखक जीवन में कभी इन संस्थाओं से नहीं छपता या पुरुस्कृत नहीं होता तो वह हिंदी समाज में लेखक होने का दर्ज़ा नहीं पा सकताक्या इस प्रकार की पूँजीपतियों द्वारा पोषित संस्थाओं में इनके ट्रस्टों में स्थाई सदस्यता वाला और अपनी इछा से आजीवन बना रहनेवाला कोई साहित्यकार है जिसे सेठ की इछा के आगे घुटने न टेकने पड़ेंअन्यथा ऐसी नख दंत विहीन ज्यूरी और ऐसी नश्वर सदस्यता का क्या अर्थ है जो एक बार न में सिर हिलाते ही समाप्त हो जाएऔर ऐसी लुंज- पुंज ज्यूरी के हाथों पाण्डुलिपि का स्वीकृत होना क्या और पुरुस्कार के लिए चुना जाना और निरस्त किया जाना क्याआखिर लेखक कोई ट्रेलर तो है नहीं जो बिलकुल संस्था के निर्देशक के मन की लम्बाई-चौड़ाई नापकर ऐसी रचना लिखे जो मन का आकार घटते-बढ़ते रहने पर भीनिर्देशक जब भी उसे पहने वह बिलकुल फिटमफिट उसे आ जाए या उसके मन को भा जाए। पर लेखक हैं कि किसी कारीगर से अपने आपको कम नहीं समझते और संस्था के हिसाब से उसके नाप की रचनाएं लिखे जा रहे हैं अब एक आधा बार आर्डर उपर नीचे हो गया कि बस बात उलझ गई। थोड़े से विषयान्तर के साथ एक और बात फिर लेखकों की करना चाहता हूँ कि कुछ लेखकों को एक ही साल में दो-दोतीन-तीन राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त सम्मान दिए जा रहे हैं। ऐसे लेखकों द्वारा लिखित पुस्तकों की विक्री और लोकप्रियता पर प्रकाश डालें तो लेखक द्वारा खरीदी गई प्रतियों और दोस्तों द्वारा लिखी गई समीक्षाओं से इतर एक विशुद्ध पाठक के रूप में इनका नाम लेवा भी कहीं कोई नहीं है। वे लेखक खुद डरे-डरेबचे-बचे और रचनाओं पर खुली चर्चा से छुपे-छुपे फिरते हैं। खैर विश्वविद्यालयों के लेखकों की बात तो समझ में आती है कि इस सबसे बायोडाटा मजबूत होता है। पदोन्नति आदि में मदद बगैरह मिलती हैपर स्वतन्त्र लेखन कर रहे अकादमियों और युनीवर्सिटियों सेमठोंपीठों और न्यासों से अलग बैठ कर लिखने वालों सेगाँव-कसवों के अनुभवों को मन सहेजे बैठे लेखकों सेछपने न छपने की परवाह न करते हुए लिखने वालों से आज भी समाज और साहित्य यह आस बाँधे हुए है कि वे ऐसी चालाकियों को बिना बात की हवा देने के बजाय। हिंदी के पाठकों को यह बताएं ही नहीं बल्कि
    आगे बढ़कर सिद्ध करके दिखाएं कि यहाँ-वहाँ से छपने में या बाइ डिफाल्ट किसी के हाथ कोई अवार्ड आदि जैसी वस्तु लग जाने से लेखन की दशा और दिशा नहीं बदलती। न ही लेखक की सेहत पर कोई बहुत बड़ा असर पड़ता है। यदि लेखक में मौलिकता है तो वह आज नहीं तो कल अपना स्थान पाठकों के बीच जरूर बना लेगा।
     

    काशीनाथ सिंह जी ने हाल ही में प्रकाशित अपने एक साक्षात्कार में कहा है कि लेखक को बाज़ारू हुए बगैर अपनी रचनात्मकता के साथ बाज़ार में जाना चाहिए। अगर रचनात्मकता होगी तो उसे पाठकों का बड़ा समाज भी मिलेगाऊर्जा भी मिलेगी और बाज़ार भी मिलेगा। उन्होने यह भी कहा कि हमने व्यवसायिक लेखन के ख़िलाफ़ 67-68 के ज़माने में आंदोलन शुरु किया था। हमने बड़े घरानों और सेठ पोषित पत्रिकाओं को व्यवसायिक पत्रिका कहा था और कहा ही नहीं था उनमें लिखना बंद भी कर दिया था। उन्होंने बहुत स्पष्ट करते हुए कहा है कि व्यवसायिक लेखन उसे कहते हैं जिसके लिए दूसरों का दुख और गरीबी मनोरंजन हो। हमने मनोरंजन के लिए कभी नहीं लिखा। पुरुस्कारों से लेखक का महत्व बढ़ जाने वाले प्रश्न पर उन्होंने कहा कि ऐसा उनके बीच होता है जो साहित्य की समझ नहीं रखते। जो साहित्य की दुनिया से बाहर के लोग हैंवे ही पुरुकार मिलने पर लेखक का नोटिस लेते हैं। साहित्य से जिनका निरन्तर जुड़ाव है वे तो पहले से ही लेखक और उसकी रचना को जानते हैं। पुरुस्कार से लेखक को लाभ हो या न हो प्रकाशक को इसका लाभ जरूर होता है। काशीनाथ जी की इन बातों के बादअन्त में मैं तो बस यही कहूँगा कि साहित्य में……यह लाभ-हानि का खेल साहित्य को पाठकों की नज़रों में उपर नहीं उठाता वल्कि नीचे ही गिराता है। हमें अपने लेखन की मौलिकता को निरन्तर परखना और उस पर धार धरते रहना चाहिए। बाकी के बादल अपने आप छँटते चले जाएंगे और यह बहस फलाने बनाम ढिकाने की ना होकर साहित्य बनाम साहित्य की चालाकियों की होनी चाहिए। 
    विवेक मिश्र
    9810853128/ vivek_space@yahoo.com

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