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  • पुस्तक अंश
  • कैलाश खेर की किताब शब्दों के पार: तेरी दीवानी का अंश

    संगीत की दुनिया में कैलाश खेर एक प्रतिष्ठित और लोकप्रिय नाम हैं। कौन होगा जिसे उनकी आवाज़ पसंद नहीं होगी। ‘अल्लाह के बंदे‘ नाम से चर्चित हुए कैलाश खेर का गाया ‘तेरी दीवानी‘ हर युवा की ज़बान पर था। मानो यह गीत अपने आप में यूथ एंथम बन गया हो, और आज भी इस गाने का अपना एक फैन बेस है। हालाँकि कैलाश भी इस गीत को ‘लव एंथम‘ का नाम देते हैं। पढ़िए इस गीत के लिखने-तैयार होने की कहानी ख़ुद कैलाश खेर की ज़ुबानी। पेंग्विन स्वदेश से प्रकाशित तेरी दीवानी: शब्दों के पार किताब में कैलाश खेर ने अपने लगभग सभी गीतों की यात्रा के बारे में बताया है। फ़िलहाल आप इस ‘लव एंथम‘ गीत की यात्रा के बारे में पढ़िए। – मॉडरेटर
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    प्रीत की लत, मोहे ऐसी लागी
    हो गई मैं, मतवारी
    बल बल जाऊँ, अपने पिया को
    ही मैं जाऊँ वारी-वारी

    यह गीत किसी प्रेम गीत से कम नहीं है, जिसे अंग्रेज़ी में ‘लव एंथम’ कहते हैं। यह बात तब की है जब ‘अल्लाह के बंदे’ गाना चर्चित हो चुका था और हमारी पहली मंच प्रस्तुति ‘सरहदों की जुगलबंदी’ फ़लकनुमा मुक्ताकशीय मंच प्रगति मैदान, दिल्ली में हो रही थी।
    हमारा पहला एसएचओ (कॉन्सर्ट) था; जिसकी भारत भर में चर्चा हो रही थी। तब पाकिस्तान के दो बैंड और भारत के दो बैंड परफॉर्म कर रहे थे। पाकिस्तान के फ्यूजन बैंड, राहत फ़तह अली एवं पार्टी तथा भारत के इंडियन ओशन व कैलाश खेर (तब तक कैलासा नहीं बना था)। लोगों में बहुत जोश एवं उत्साह देखने को मिल रहा था। दिल्ली की ऑडियंस दुनिया से निराली होती है, और हम स्वयं दिल्ली से ही हैं।
    पहले ही दिन से लग रहा था कि हम घर में परफॉर्म कर रहे हैं, हमारा आत्मविश्वास और उत्तजना चरम पर थी, हम पर प्रभु की कृपा हमेशा रही कि झिझक और घबराहट कोसों दूर रहती है, अर्थात् जो भय से उत्पन्न हों उन्हें डर नहीं लगता।
    हम अपनी रवानी में गा रहे थे, खचाखच भरा संगीत प्रेमी जनसमूह। मानो सारी दिल्ली आनंद ले रही हो।
    यूँ तो उस दिन हमने रिलीज़ हो चुकी फ़िल्मों के अपने कुछ गाने और मौलिक गीत गाए, दिल्ली के लोगों को बहुत मज़ा आ रहा था और जितना मज़ा हमारी ऑडियंस ले रही थी, हमें बिलकुल भी ऐसा एहसास नहीं हुआ कि हम पहली बार इतने बड़े कॉन्सर्ट का हिस्सा हैं। उस दिन कुछ-कुछ जादू जैसा हो रहा था, मानो कोई परम शक्ति हमारे अंदर प्रवेश कर चुकी ही। शायद बहुत दिनों की तपस्या का परिणाम था कि यह पहला कॉन्सर्ट मेरी जन्मभूमि, मेरी तपोभूमि दिल्ली में हुआ।

    सहस्र अनुभूतियाँ, अनंत एहसास हमारे अंदर गोते खा रहे थे। कार्यक्रम अपनी रवानी पर था और हम पूरे समाधिस्थ हो चुके थे – अंग्रेज़ी भाषा में जिसे ‘ट्रांस’ कहते हैं। तभी हमने गाना प्रारंभ कर दिया, जिसको पहले हमने या हमारे साथियों ने कभी सुना भी नहीं था, अर्थात् उसी वक्त शब्द, धुन और हमारा ईश्वर के प्रति पागलपन, अनायास नदी की तरह जैसे उद्गम हो रहा था – 

    ‘प्रीत की लत, मोहे ऐसी लागी, हो गई मैं मतवारी
    बल बल जाऊँ, अपने पिया को, ही मैं जाऊँ वारी-वारी
    अरी ऐरी सखी मैं का से कहूँ, मेरे हृदय उठे उड़ारी
    प्रेम पियला भर भर पीयूँ, हारी मैं दिल हारी…’

    तब ये बोल थे।

    हम गाए जा रहे थे, अपनी धुन में और शब्द बहते जा रहे थे… परमात्मा का जैसे जादू हो रहा और हम अवाक् देख रहे हों। सारी दर्शक दीर्घा (ऑडियंस) हमारे साथ ऐसे गा रही थी मानो उन्होंने पहले से यह गीत सुन रखा है।

    ये गाना और हम इतने मलंग होकर गा रहे, कि पता ही नहीं चला कि हम भी कहीं अटक सकते हैं, कहीं भटक सकते हैं। परंतु जैसा कहते हैं, ‘यदि आप संपूर्ण रूप से समर्पित हो जाएँ तो कुछ कार्य, कार्य नहीं बल्कि यज्ञ हो जाते हैं और उनको परम शक्ति संपूर्ण करती है… पूर्ण आहुति देती है’।
    जिस प्रकार धरती से पानी अचानक निकलना प्रारंभ हो जाए, अपनी रवानी में बहने लगे, और नदी का निर्माण हो, उसी प्रकार ‘तेरी दीवानी’ बनाता गया। जब ये पंक्ति आई ‘तूने क्या कर डाला मर गई मैं, मिट गई मैं’ और हम थोड़ी देर हार्मोनियम बजाते रहे और ईश्वर से प्रार्थना करते रहे कि ‘बाबा रुकने मत देना, अब बहते जाना मेरे भीतर’, तब ही ‘मर गई मैं, मिट गई मैं’ के बाद कुश शब्द नहीं सूझे तो हमने ‘हो जी हाँ हाँ जी… हो गई मैं, तेरी दीवानी…’ से उसका सम दिखा दिया तो जान-में-जान आई और दर्शक भी उत्साह से दीवाने होने लगे। आनंद-ही-आनंद बरस रहा था।

    इस प्रकार पूरा गाना बना। ‘तेरी दीवानी’ गाना नहीं, एक जादू है, एक चमत्कार है, जो मेरी संघर्ष की भूमि, हमारी जन्मभूमि दिल्ली की उपज है। आज ‘तेरी दीवानी’ के बग़ैर कैलासा का कोई भी कॉन्सर्ट पूरा नहीं होता और जितने भी नवोदित संगीतकार हैं, उनके लिए ‘तेरी दीवानी’ गुणवत्ता का एक मापक है, बहुत सारे प्रेमी युगल अपने प्रेम चयन के लिए ‘तेरी दीवानी’ का आसरा लेते हैं।

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