• Blog
  • फ़ालतू तो दूर मुझ में तो बेफ़ालतू भी अक़्ल नहीं!

    पुलिस अफ़सर शायर सुहैब अहमद फ़ारूक़ी ने लल्लनटॉप पर ईश्वर को लेकर चली बहस की पृष्ठभूमि में यह टीप लिखी है, मगर शेरो-शायरी के हवाले से, अकबर इलाहाबादी और ग़ालिब के हवाले से। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

    =================================

    हज़रात!

    कल से मेरे ज़ेहन में ये अशआर गूंज रहे हैं। जज साहिब अकबर इलाहाबादी के हैं। उनसे अपना नाता सरकारी तनख्वाह पर शायरी करने वाले शायर वाला है। ये अशआर सुने उन्होंने भी होंगे जो शायरी को पढ़ते नहीं। ग़ुलाम अली साहब का शाहकार है यह कम्पोज़िशन, ‘हंगामा है क्यों बरपा’ । ख़ैर ज़ैरे मौज़ूअ अशआर ये रहे:-

    हर ज़र्रा चमकता है अनवारे इलाही से
    हर सांस यह कहती है हम हैं तो ख़ुदा भी है

    सूरज में लगे धब्बा फ़ितरत के करिश्मे हैं
    बुत हम को कहें काफ़िर अल्लाह की मर्ज़ी है

    बज़ाहिर ये दोनों अशआर बड़े रूहानी, फ़लसफ़ियाना और कायनाती सच्चाइयों से लबरेज़ नज़र आते हैं। मगर अगर इन्हें ज़रा मेरे चश्मे से, जो मेरे ज़ेहन की तरह ही थोड़ा मोटा है देखा जाए — —तो इंटरप्रिटेशन कुछ यूँ उभरती है।

    पहले शेर में फ़रमाया गया है कि कायनात का हर ज़र्रा अनवारे इलाही, यानी अल्लाह के नूर से जगमगा रहा है। ठीक है।
    लेकिन भाई साहब, ज़रा ठहरिए — जज साहिब की हिम्मत पर ग़ौर कीजिए।

    दूसरे मिसरे में ख़ुदा की मौजूदगी को हमारी साँसों की शर्त से बाँध दिया गया है:
    “हम हैं — तो ख़ुदा भी है।” मतलब यह कि अगर ख़ाकसार छींक ले, या SpO₂ 90 से नीचे चला जाए, तो क्या ख़ुदा को भी थोड़ी देर के लिए pause लेना पड़ेगा?

    यह वही रूहानियत है जहाँ बंदा आजिज़ होने के बजाय ख़ुदा का existential partner बन बैठता है।

    अब दूसरे शेर पर आइए। यह शेर तो साइंस को पूरे ठाठ से दाख़िल करता है।
    सूरज के धब्बे — फ़ितरत, यानी Nature, के astrophysics-approved करिश्मे हैं। लेकिन अगर जज साहिब जैसा कोई इंसान — जो सरकारी तन्ख़्वाह पर शायरी करता है — ज़रा सा ज़ाविया बदल दे, या सवाल उठा ले, या मिसाल कहीं और से ले आए — तो फ़ौरन “काफ़िर” का सर्टिफ़िकेट थमा दिया जाता है। और इस पूरी प्रक्रिया को बेहद सुकून और इत्मीनान से कहा जाता है: “अल्लाह की मर्ज़ी है।”

    मतलब, लेबल हमने लगा दिया — अब ऊपर वाले की ज़िम्मेदारी है कि वह उसे धोए।

    मेरी कमअक़्ली ने इन अशआर से यह समझा:

    1. ख़ुदा हर जगह है — मगर हमारी मौजूदगी के साथ।
    2. साइंस दुरुस्त है — जब तक वह सूरज तक सीमित रहे।
    3. इंसान अगर ज़रा भी अक़्ल इस्तेमाल कर ले, तो पहले उसकी नीयत संदिग्ध ठहरती है।
    4. और जब नीयत संदिग्ध हो जाए — तो फ़ैसला नहीं, फ़तवा उतरता है।
    वो भी express delivery में।

    यहाँ रूहानियत का पैमाना भी बड़ा practical रखा गया है: ख़ुदा मौजूद है — मगर हमारी साँस के साथ; साइंस क़ाबिल-ए-क़बूल है — मगर सूरज की सतह तक;
    और सोचने की इजाज़त है — मगर उतनी ही, जितनी किसी को चुभे नहीं।

    जज साहिब का कमाल यही है कि उन्होंने बात भी कह दी और कहने वाले की शक्ल भी बचा ली। न उन्होंने ख़ुदा को नकारा, न इंसान को ख़ुदा बनाया — बस दोनों को एक ही साँस में बाँध दिया।

    अब अगर कोई उस साँस को ज़रा ज़ोर से खींच ले या सवाल पूछ बैठे, तो जवाब में दलील नहीं मिलती — सिर्फ़ यही सुनाई देता है: “अल्लाह की मर्ज़ी है।”

    लेकिन साहिबान बात यहीं ख़त्म नहीं होती। अस्तित्व के इस संघर्ष से जूझते ज़ेहन में अब चचा ग़ालिब का शेर दस्तक देता है। चचा से भी अपना रिश्ता है। यह रिश्ता यूनिफ़ॉर्म वाला है — नाआशना लोगों को बता दूँ, उनके वालिद सिपाही थे।

    शेर ये है:

    न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता
    डुबोया मुझको होने ने न होता मैं तो क्या होता

    ग़ालिब एक आस्तिक हैं। वह सीधे यह नहीं कह सकते कि “न होता मैं तो ख़ुदा होता।” क्योंकि ऐसा कहने का मतलब है: फ़िक़्ही अलर्ट- सामाजिक बहिष्कार और मुमकिन हो तो फ़तवे के साथ free delivery

    इसलिए ग़ालिब बड़ी होशियारी से emergency brake लगाते हैं और सवाल छोड़ देते हैं: “न होता मैं तो क्या होता?” यह वही जुमला है जो महफ़िल में ख़तरनाक बात कहकर
    फ़ौरन जोड़ा जाता है: “मैं तो बस पूछ रहा था।”
    अब देखिए कमाल। ग़ालिब ने बात भी कह दी और denial का रास्ता भी खुला रखा।

    सूफ़ी कहेगा: “ख़ुदा होता”, फ़लसफ़ी कहेगा: “अदम-ए-महज़”,  अक़्लमंद आदमी कहेगा: “अल्लाह बेहतर जानता है” — discussion closed

    तंज़िया तौर पर यह शेर हमें यह भी सिखाता है कि मसअला ख़ुदा का नहीं, मसअला हम हैं।

    हमारी मैं, हमारी अना़, और हमारा वुजूद — यही सबसे भारी baggage है।

    ग़ालिब का फ़लसफ़ा सीधा है: ख़ुदा हर हाल में safe है, डूबा हुआ सिर्फ़ इंसान है — अपने “होने” की वजह से। और शायद इसी लिए ग़ालिब ख़ुदा नहीं बनते, न बनने का दावा करते हैं — बस सवाल छोड़ देते हैं, और बाक़ी काम क़ारी के ज़मीर पर।

    जज साहिब ने भी तो यही कहा था:

    मज़हबी बहस मैंने की ही नहीं
    फ़ालतू अक़्ल मुझ में थी ही नहीं

    तो भाइयों और बहनों, फ़ालतू तो दूर — मुझ में तो बेफ़ालतू भी अक़्ल नहीं।

    दुआओं में याद रखिएगा।

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins
    WordPress Center Ankara Escort: Beypazarı Escort, Pursaklar Escort, Etimesgut Escort İstanbul Escort: Esenyurt Escort, Bahçelievler Escort, Maltepe Escort Bursa Escort: Gürsu Escort, Keles Escort, İznik Escort What are the best budget smartphones available in 2025? Reason Why Everyone Love Travel Doubts About Lifestyle You Should Clarify CCGallery – HTML5 Multimedia Gallery WPBakery Page Builder Add-on – Sticker & Type Writer JL Token – Queue Management System WooCommerce & POS Loyalty Management Animated Intro for Elementor FluxStore Manager – Vendor and Admin Flutter App for Woocommerce WooCommerce PayPal Express Checkout and PayPal Credit Super WooCommerce Product Filter & Shop Builder Multi Vendor Daily Deals Plugin for WooCommerce HR Manager – Human Resource Management System HR Software (HRMS)