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  • इस प्रकार की बहस हो तो माहौल ज़रूर बदलेगा और लोगों का नज़रिया भी!

    ‘लल्लनटॉप’ पर ‘does god exist’ वाली बहस पर बहुत प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। आज पढ़िए युवा वर्ग की प्रतिक्रिया, लिखा है युवा छात्र मुशर्रफ परवेज़ ने- मॉडरेटर 

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    आज एक श्रद्धेय आलोचक ने मुझसे सवाल किया कि “क्या ईश्वर कहीं बसता है?” मुझसे रहा नहीं गया, मैंने तुरंत कहा हां और मेरे घर में। आलोचक साहब भौंचक्का रह गए और बोले क्या बहकी- बहकी बातें करते हो?जब मैंने कहा “मेरी अम्मा” इतना सुनना था कि उनके चेहरे पर हँसी आ गई।

    खैर, “Does God Exist” वाली बहस पिछले कुछ एक दिनों से तूल पकड़े हुई है। सभी पढ़ने, लिखने, सोचने और समझने वाले अपनी सोच व समझ के आधार पर बातों को सोशल मीडिया के ज़रिए रख रहे हैं। ये इस बात का प्रमाण है कि लोग इस मुद्दे को बाक़ी तमाम मुद्दों के जैसे इस कान से सुनकर उस कान से निकाल नहीं रहे हैं अपितु उसपर गहन अध्ययन भी कर रहे हैं। इसी जगह यदि अरावली की बहस होती तो शायद ठंडे बस्ते में रख दिया जाता।
    यही तो खूबसूरती हमारे राष्ट्र की जहां आपस में मतभेद की गुंज़ाइश रहती ही है पर मनभेद की नहीं।
    इसीलिए तो कभी आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने निबंध ‘कविता क्या है?’ में “विरुद्धों के सामंजस्य” की बात कही थी। शुक्ल जी का वाक्य सटीक बैठता है इस दो घंटे वाली बहस पर। पते की बात ये भी है कि इस एक मात्र बहस ने एक प्रतिमान गढ़ दिया कि बहस ऐसे भी किया जा सकता।
    हर दिन जो रात के 8 बजे ’प्राइम टाइम’ वाली बहस होती है जिसके लोग दीवाने बन चुके हैं। उनके एंकरों और दर्शकों के समक्ष एक नज़ीर पेश करती हुई दिखाई देती है ये बहस।
    एक बात स्पष्ट करता चलूं साहब कि अपनी धर्म के बारे में कोई पुख़्ता जानकारी है नहीं। अपने को तो मानवता ही एक धर्म सिखाया है मां-बाबा ने। आप मुझसे बिल्कुल ये उम्मीद न रखें कि मैं कोई ऐसी बात कह दूंगा जिससे एक तबका खुश हो जाए और दूसरा नाखुश।

    मुफ्ती शमाइल नदवी ने इतनी बार “Contingency” शब्द का प्रयोग किया कि उससे हम जैसे हल्के अक़्ल वालों को कम से कम कॉन्टिंजेंसी का अर्थ पता चल ही गया। जिन्हें नहीं भी चला होगा तो उन्होंने गूगल पर इतनी बार सर्च किया होगा कि गूगल बाबा भी परेशान हो गए होंगे!
    ज्यों ही उन्होंने बॉल का उदाहरण दिया अनायास ही मुझे यूजीसी के प्रश्नपत्र का एक हॉट क्वेश्चन याद आ गया। प्रश्न यूँ होता है-
    “Sound is Eternal because it is Produced” इस प्रश्न में एक ‘Fallacy’ है जिसे लॉजिक के विद्वान ‘Contradictory’ कहते हैं।
    ज़रा सोचिए, जो Eternal होगा क्या उसे पैदा किया जा सकता है?

    जावेद अख्तर ने अपने ओपनिंग स्पीच की शुरुआत जैसे ही ये कहकर की कि “मेरी नॉलेज साइंस के बारे में बड़ी मामूली है!” तब मुझे हिंदी साहित्य के द्विवेद्वी युग का “आत्माराम की टेंटें” वाला विवाद ज़हन में दौड़ने लगा। ठीक ऐसा ही कभी महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने बालमुकुंद गुप्त के बारे में कहा था। वे कहते हैं- “अच्छी हिंदी बस एक व्यक्ति लिखता था!”
    क्या जावेद साहब का भी द्विवेदी जी जैसा ही व्यंग्य था?

    जब एक जगह दोनों वक्ता ने कहा कि हम उसी फेथ को मानते हैं जिसमें तर्क हो, प्रमाण हो और जिसे सिद्ध किया जा सके। इस सहमति ने इस बात को पुष्ट किया कि एक हस्सास और पढ़ा-लिखा व्यक्ति अपने-अपने बातों पर अडिग तो अवश्य हो सकता है पर कुतर्क नहीं कर सकता।

    इस बहस के ज़रिए गाज़ा पर ख़ूब चर्चा हुई। दोनों ने अपने-अपने तर्क दिए। लेकिन इस मक़ाम पर जावेद अख्तर का तर्क भारी पड़ा जब उन्होंने कहा कि “समस्या तब आती है जब कोई धर्म को पीता है।” ये कथन कई सवाल खड़ा कर रहा है। और करना भी चाहिए। मुझे तो लगा कि मैं घुस जाऊं टीवी में और कहूं बांग्लादेश में जो हुआ वो भी धर्म को पीने के कारण ही हुआ।

    डायनासोर वाला प्रसंग बड़ा मजाकिया लगा। मैं ऐसा बिल्कुल नहीं कह रहा लोक में ऐसी चर्चा है। मैं एक माध्यम मात्र हूँ और उद्धरित कर रहा हूँ क्योंकि प्रतिवाद में जब मुफ्ती शमाइल ने कहा कि “हैरत की बात देखिए डायनासोर का ज़िक्र मैथमेटिक्स के किताबों में भी नहीं है”
    एक दो जगह मुफ्ती शमाइल नदवी तो हल्के आक्रामक होते हुए दिखे फ़िर उन्होंने खुद को कंट्रोल किया। हम लोग भी जब ज़ाकिर हुसैन दिल्ली महाविद्यालय (सांध्य) में थे और डिबेट में हारते दिखते थे तो आक्रामक होकर बात सिद्ध करने की कोशिश करते थे। तकरीबन क़ामयाब भी हो ही जाते थे। धर्म की तो पहली सीढ़ी ही है संयमित बनना।

    जावेद अख्तर ने जब कहा कि “बच्चों का क़त्ल न किया जाए तब तक आपको उसकी मासूमियत समझ नहीं आएगी।” उसी दिन से इस कथन ने मेरे दिमाग़ को हॉच-पॉच कर रखा है।
    लोगों के मत दो गुटों में बंट गए हैं कोई जावेद साहब की तरफ़ है तो की मुफ़्ती साहब की तरफ़। लेकिन एक बार ठंडे दिमाग़ से सोचिएगा तो आंखों से पर्दा हटेगा। हमारी यही खामी है कि हम सोचते कम हैं और देखकर ज़्यादा रिएक्ट करते हैं। इतना विवेक तो अवश्य होना चाहिए कि क्या ग़लत है और क्या सही? अब जब मैं ये कह रहा हूँ तो राजनीति वाला राइट नहीं। जीवन वाला राइट जो हमारी और आपकी पहचान है।

    जनाब यही कहना चाहूंगा कि इस डिबेट का कोई विजेता नहीं रहा न ही कोई हारा। बात इतनी सी हुई कि इससे पूर्व इस प्रकार का खुला डिबेट नहीं होता था। जावेद अख्तर बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने इस बात को स्टेज तक लाया। साथ ही मुफ्ती शमाइल नदवी भी उतने ही मुबारकबाद के मुस्तहक हैं कि उन्होंने भी बख़ूबी निभाया।

    सच बताऊं तो मैं इस डिबेट के टीजर को देखकर बड़ा हैरान था और साल 2014 की फ़िल्म याद आ गई कि कहीं पीके फ़िल्म जैसी बहस न बन जाए। पर बहस ने अपना संतुलन बिल्कुल भी नहीं खोया। जिस लीक से शुरू हुई उसी पर ख़त्म हुई। यदि साल भर या छः महीने में इस प्रकार की बहस हो तो माहौल ज़रूर बदलेगा और लोगों का नज़रिया भी।

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