ब्रश पकड़ने वाली ऊँगलियाँ संसार बनाती हैं, वीरान नहीं करतीं

उपन्यासकार गीताश्री जम्मू के पहाड़ी क़स्बे पटनीटॉप में कला शिविर में हैं और वहां से अपने जीवंत रपटों के माध्यम से हमें भी कला शिविर की सैर करवा रही हैं. दूसरी क़िस्त- मॉडरेटर

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लड़कियाँ बना रही हैं तितली, फूल और मकान, लड़के बना रहे थे पहाड़, खेत और ऊँचे देवदार . चित्रकारों की टोली उन्हें चित्र बनाने के लिए उकसा रही थी कि वे सफेद बोर्ड पर चित्र बनाएँ, उस वक़्त उनके मन में जो चल रहा है, जो ख़याल आ रहे हैं, उन्हें व्यक्त कर दें.
वे सब छठी क्लास से लेकर आठवीं क्लास तक के छात्र हैं जो पास के करला गाँव के सरकारी मिडिल स्कूल में पढते हैं.
बालों में लाल रिबन के फूल बनाई हुई लडकियां अपने चित्रों में अपना देखा हुआ और कुछ कल्पित संसार भी व्यक्त कर रही हैं जिनमें उनके ख़्वाब कम चाहतें ज़्यादा झलक रही थीं. अनगढ काली रेखाएँ उनकी अभिव्यक्ति को ठीक ठीक भले न पकड़ पा रही हों मगर सफेद बोर्ड पर दर्ज करने की उनकी गति अनूठी है.
लगभग सत्तर बच्चों को कला का पाठ पढा रहे वरिष्ठ चित्रकार राजेश शर्मा उन्हें बार बार हँसाते हैं, कुछ क़िस्से सुनाते हैं, कला का महत्व बताते हैं और रेखाओं का दिलचस्प संसार खोलते हैं. गुनगुनी धूप में बैठे बच्चों ने स्कूल में कभी ड्राइंग की पढाई नहीं की फिर भी उन्हें चित्रकला की इस क्लास में मस्ती आ रही है. यहाँ शब्द नहीं, रेखाएँ बोल रही थीं और उनके भीतर भावनाएँ जोर मार रही थीं. अपने आंतरिक संसार से कुछ खंगाल कर निकालना था, जहाँ छुपे बैठे हैं कुछ ख़रगोश, बकरियाँ, पहाड़, एक चश्मा ( पहाड़ी झरना), नदी , नावें, बर्फ़ीली चादरें और पहाड़ी खेत.
चित्रकार उन्हें उकसा रहे हैं – चित्र बनाइए, आप क्या सोचते हो, क्या देखा है, क्या देखना चाहते हो….
एक बड़ी-सी लडकी उठती है और सफेद बोर्ड पर बड़ी-सी तितली बनाती है , दूसरी उठती है – बड़ा-सा फूल बनाती है. खूशबू और उड़ान रचते हैं हाथ. अरुण कमल की कविता याद आ जाती है.
चित्रकारों की टोली ताली बजाती है कि बच्चे खुद को कितनी स्पष्टता से व्यक्त कर पा रहे हैं. उनके मन की थाह आसान है क्या ? सहमे हुए बच्चे एक स्वर में जवाब देते हैं- जब उनसे पूछा गया कि उन्हें क्या अच्छा लगता है-
“ सबसे अच्छा व्यवहार करना…
एक स्थानीय व्यक्ति गुलज़ार भट्ट दूर से ये सब देख रहे हैं. वे धीरे से फुसफुसाए – बस इतना ध्यान रखना कि इन लड़कों के गाल पर सेना वाले थप्पड़ न मारें. बेवजह शक के आधार पर गाल पर एक थप्पड़ पड़ा नहीं कि पहाड़ लाँघ जाएंगे. ये पहाड़ इनके क़दमों तले है…!”
हालाँकि पटनी टॉप का इलाक़ा सुरक्षित है लेकिन आतंक का हल्का साया यहाँ मँडराता रहता है और चौकसी क़दम क़दम पर है. जे एंड के का होटल अल्पाइन भी कड़ी सुरक्षा के घेरे में है फिर भी कुछ स्थानीय लोग ख़ौफ़ज़दा दिखे. बच्चे कड़ी सुरक्षा में लाए गए थे और उनके आसपास लगभग छावनी-सी बन गई थी.
सुंदर और फूल से बच्चे, हमारे शहरी बच्चों की तुलना में ज्यादा शांत थे. चित्रकार चकित थे कि अलग अलग बच्चों से एक ही सवाल पूछे गए मगर सबका जवाब एक कैसे हो सकता है, जबकि वे बहुत धीरे और सहमे स्वर में बोल रहे थे.
युवा चित्रकार साहिल ओहरी उन्हें प्रेरित कर रहे कि कुछ और अच्छा नहीं लगता ? सब एक ही तरह का जवाब क्यों दे रहे हो?
बच्चों के मन पता नहीं कैसे मिला हुए थे, या उन्हें “अच्छा व्यवहार” की अपेक्षा इस बाहरी दुनिया से है.
एक सातवीं क्लास की छात्रा रजनी देवी थोड़ा अलग जवाब देने की कोशिश करती है – “मुझे अच्छी बातें करनी अच्छी लगती हैं”
आठवीं के छात्र सतीश कुमार को लगा – अपना जवाब भी कुछ अलग होना चाहिए. थोड़ी देर सोच कर बोला- “पहाड़ पर सुबह की सैर अच्छी लगती है, बस ऐसे ही सुंदर बने रहे पहाड़”
बच्चे हमेशा चकित करते हैं. उनके व्यवहार में भविष्य की दुनिया का चेहरा देखा जा सकता है.
करला गाँव के बच्चे , बाहरी बड़ों के बीच बड़ा संदेश दे रहे थे.
आर्ट क्लास में बच्चों को बहुत आनंद आ रहा था लेकिन उनका दुख झलका कि उनके स्कूल में ड्राइंग टीचर नहीं होते. उनके सिलेबस में कला की पढाई नहीं है तो पढ़े कैसे?
बच्चों ने अहसास किया कि कला कितनी जरुरी है उनके जीवन के लिए. जब उन्हें बताया गया कि अजंता की गुफ़ाओं में आदि मानव ने कैसे गुफा की दीवारों पर रेखाएँ खींची, चित्र बनाए और अपने समुदाय से संवाद स्थापित किया.
स्कूल के शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर दुखड़ा रोया कि पच्चीस साल पहले विषय के रुप में कला की पढाई होती थी, तब टीचर भी थे. अब न कुछ भी नहीं. जबकि बच्चों को साइंस में चित्र बनाने पड़ते हैं, वे बनाते भी हैं , अगर उन्हें सीखाया जाता तो और बेहतर बना सकते थे, शायद कोई इन्हीं लोगो की तरह बड़ा चित्रकार बन जाता.
टीचर ने इस मामले में खुद को बहुत असहाय महसूस किसा और प्रशासन की तरफ अपनी उम्मीदें टिका दीं.
चित्रकार भी हैरान थे कि ऐसा कैसे हो सकता है कि सरकारी स्कूलों में ड्राइंग टीचर न हो. प्राइवेट और सरकारी सबके लिए कला नीति एक है.
फिर करला गाँव के स्कूल में कोई ड्राइंग टीचर क्यों नहीं? कला की पढाई सिलेबस में क्यों नहीं?
इस बड़े सवाल के बीच एक सवाल और उठा कि इन बच्चों में बकरवाल समुदाय से कोई बच्चा है या नहीं?
टीचर ने इनकार किया. इस स्कूल में बकरवाल बच्चे अस्थायी छात्र के रुप में पढाई करते हैं. जब मन हो छुट्टी कर लेते हैं और साल के छह महीने मोबाइल स्कूल में पढाई करते हैं.
एक स्थानीय बच्चा बिलाल ने चहकते हुए बताया- “उनको पढाई से ज्यादा बकरियाँ चराना पसंद है!”
बच्चो के साथ आए शिक्षक महोदय ने बताया कि बकरवाल बच्चों के लिए मोबाइल स्कूल की व्यवस्था की गई है जो उनकी टोली के साथ चलता है. पहाड़ों से उतर कर जब वे कठुआ, सांबा की तरफ जाने लगते हैं, लगभग पंद्रह दिनों की यात्रा होती है, तब टीचर साथ चलते हैं और बच्चों की सुविधा और उनकी उपलब्धता के अनुसार क्लास लेते हैं.
बच्चो की इस टोली में बकरवाल बच्चे होते तो कैसा चित्र बनाते? चित्रकला की शिक्षा उन्हें भी नहीं मिल रही. उनका जीवन ही इतना रुमानी है कि अपना सत्य ढूँढने कहीं बाहर नहीं जाना पड़ता.
इससे पहले कि बच्चों के मन पर धूल जमे , कला किसी डस्टर की तरह धूल झाड़ती चले. पिकासो कह गए हैं कि कला आत्मा पर जमी धूल को साफ कर देती है.
इन बच्चों को कला की सख्त जरुरत है कि हाथ संसार का पुनर्सृजन करते हैं वे कभी हिंसक नहीं हो सकते. ब्रश पकड़ने वाली ऊँगलियाँ संसार बनाती हैं, वीरान नहीं करतीं.
क्या हम सयाने लोग समझ पाएँगे कभी इस सत्य को ?

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